Sunday, December 4, 2022

विलुप्त प्राय बिरहोर का शब्दकोश तैयार कर देव कुमार ने रचा नया इतिहास

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37 वर्षीय एक युवा देव कुमार, आत्मविश्वास से लवरेज, जो कुड़मी समुदाय से आते हैं। ये झारखंड की राजधानी राँची जिले के ओरमांझी प्रखंड के हेठ नगडू गाँव के एक किसान अघनु महतो की दो बेटियों के बाद तीसरी संतान हैं, इनसे छोटे एक भाई और एक बहन हैं। इन्होंने मैट्रिक परीक्षा राज्य संपोषित विद्यालय, ओरमांझी, आईएससी (गणित) एवं बीएससी (भौतिकी प्रतिष्ठा) की परीक्षा गोस्सनर काँलेज, राँची से उत्तीर्ण की। इसके पश्चात देश-विदेश के चर्चित संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड मैनुफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी, राँची से पोस्ट डिप्लोमा की उपाधि प्राप्त की। संस्थान द्वारा ही तीन प्रतिष्ठानों में कैंपस प्लेसमेंट प्राप्त हुआ।

अंततः आधुनिक ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज में बतौर अभियंता के पद पर डेढ़ वर्षों तक योगदान दिया लेकिन शहर की चकाचौंध जिंदगी पसंद नहीं आयी। पुनः राँची विश्वविद्यालय, राँची से मानव संसाधन में एमबीए की उपाधि प्राप्त करने के बाद ग्रामीण विकास विभाग, झारखंड सरकार अंतर्गत झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसाइटी, राँची में सलाहकार एवं प्रखंड कार्यक्रम प्रबंधक के पद पर योगदान दिया। ज्ञातव्य हो कि देव कुमार करम फाउंडेशन, राँची के संस्थापक सचिव हैं एवं शिक्षा व शोध कार्यों को बढ़ावा दे रहे हैं।

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देव कुमार ने झारखंड की लुप्तप्राय आदिम जनजाति बिरहोर द्वारा प्रयोग होने वाले शब्दों एवं ध्वनियों को संकलित करते हुए बिरहोर-हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश की रचना की है और देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।

बताना जरूरी होगा कि आदिम जनजाति बिरहोर झारखंड के राँची, हजारीबाग, कोडरमा, चतरा, रामगढ़, गिरीडीह इत्यादि जिलों में निवास करते हैं। जनगणना 2011 के अनुसार राज्य में इनकी जनसंख्या मात्र 10,726 है और यह जनजाति अपनी भाषा-संस्कृति को बचाने के लिए संघर्षरत है। इस शब्दकोश के माध्यम से बिरहोर जनजाति की भाषा एवं संस्कृति को बचाने का प्रयास किया गया है। लेखक द्वारा बिरहोर समुदाय के बीच जाकर उनकी धरातलीय विशेषताओं को समेटते हुये शब्दकोश की रचना की गई है, जिससे मौलिक शब्दों एवं पृष्ठभूमियों का समावेशन हो पाया है। शब्दकोश में बिरहोर जनजातियों द्वारा दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाली शब्दावलियों को शामिल किया गया है एवं 22 अध्यायों में विभक्त किया गया है। स्कूली बच्चों की मनोवृत्ति का ख्याल रखते हुए विशिष्ट शब्दों को रंग-बिरंगे सुंदर चित्रों में प्रस्तुत किया गया है जो लेखक की कल्पनाशीलता एवं समुदाय के प्रति संवेदनशीलता का परिचय कराती है।

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शब्दकोश तैयार करने के कारण पर देव कुमार बताते हैं – “मैं झारखंड सरकार के अंतर्गत झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रोमोशन सोसाईटी में हजारीबाग जिला के चलकुशा प्रखंड में नवंबर, 2014 से मार्च 2019 तक सलाहकार के पद पर एवं अप्रैल, 2019 से फरवरी, 2022 तक प्रखंड कार्यक्रम प्रबंधक के पद पर ग्रामीण विकास विभाग में पदस्थापित था। तब अक्सर बिरहोर समुदाय के लोगों से रूबरू होने का मौका मिलता था। लेकिन उनकी स्थिति देखकर बार-बार उनके लिए कुछ करने की इच्छा मन में उमड़ती रहती थी। ऐसे में मेरी नजर बिरहोर के बच्चों पर पड़ी तो मैंने पाया कि वे प्रायः स्कूल नहीं जाते हैं।

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यदि विद्यालय जाते भी हैं तो भाषा (हिन्दी) की समझ नहीं होने के कारण विद्यालय बहुत जल्द जाना छोड़ देते हैं। हमने तब निर्णय लिया कि चित्रात्मक प्रस्तुति के साथ बिरहोर शब्दकोश का निर्माण करूँ, जिससे कुछ उनकी सहायता हो सके। तब मैंने उनके लिए शब्दकोश लिखने के लिए आगे कदम बढ़ाया। परंतु यह चुनौती पूर्ण कार्य था जिसे करते-करते बीच में निराशा भी होने लगी थी। तभी मेरी नजर अचानक कोडरमा के श्री रमेश घोलप, तत्कालीन उपायुक्त, कोडरमा के सोशल मीडिया पोस्ट पर पड़ी। जिसमें वे बिरहोर टोला में सपरिवार खाना खाते हुये, उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास कर रहे थे। इस प्रेरणा ने मुझमें एक नई ऊर्जा के साथ मेरे कार्य में गति ला दी। अंततः शब्दकोश प्रकाशित हुआ एवं बिरहोर बच्चे रुचि से आज इसका लाभ उठा रहे हैं।

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देव बताते हैं कि हमारी योजना है कि दीवार लेखन के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक इस भाषा का प्रचार-प्रसार करम फाउंडेशन, राँची के माध्यम से करुँ।”

उल्लेखनीय है कि पद्मश्री बुलु इमाम द्वारा इस पुस्तक का विमोचन किया गया तथा उन्होंने इस पुस्तक को 21 वीं शताब्दी का अनोखा प्रकाशन बताया है। यूरोपियन यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट एंड ईस्ट, नीदरलैंड के कुलपति प्रो. मोहन के गौतम द्वारा कहा गया है कि शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मातृभाषा को बढ़ावा देने हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 लागू की गई है एवं यूनेस्को द्वारा बिरहोर भाषा को गंभीर खतरे की भाषा में शामिल किया गया है, ऐसे में इस शब्दकोश को पाठ्यक्रम में अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।

कील विश्वविद्यालय, जर्मनी के शोध विद्वान डॉ. नेत्रा पी पौडयाल द्वारा कहा गया है कि तीन भाषाओं में लिखी गई सचित्र शब्दकोश केवल बिरहोर बच्चों को मातृभाषा सीखने में मदद ही नहीं करेगी बल्कि भाषाविदों को बिरहोरों द्वारा प्रयुक्त होने वाली सामान्य शब्दावलियों को सीखने में भी मददगार साबित होगी।

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विभागाध्यक्ष, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची के डॉ. हरि ऊराँव ने कहा कि ऐसे ही कार्यों से भाषा का संरक्षण एवं संवर्धन होता है और भाषा जीवंत होती है। इस शब्दकोश का निर्माण हो जाने से अन्य भाषाविदों को बिरहोरी भाषा के संबंध में अवगत होना आसान हो जायेगा। अब यह शब्दकोश प्रारंभिक शिक्षा से उच्च शिक्षा के कार्य में काफी सहायक साबित होगी।

खोरठा भाषा के चर्चित साहित्यकार प्रो. दिनेश कुमार दिनमणी ने कहा है कि बिरहोर जनजाति को मुख्यधारा से जोड़ने के लिये आवश्यक है उनकी भाषा को समझना। इसे शिद्दत से देव कुमार जी ने समझा एवं इसी का परिणाम है बिरहोर-हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश। यह अनूठा एवं सराहनीय प्रयास है।

सहायक प्राध्यापक, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची के डॉ. बीरेंद्र कुमार महतो ने कहा कि इस शब्दकोश के माध्यम से बिरहोर जनजाति की भाषा के संरक्षण और आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया है, जो वाकई काबिले तारीफ है। चर्चित खोरठा गीतकार विनय तिवारी ने कहा है कि इस शब्दकोश से झारखंड की माटी की खुशबू आती है। किसी सामान्य पुस्तक की रचना करना आसान है लेकिन विलुप्त हो रही बिरहोर भाषा का चित्रों के माध्यम से तीन भाषाओं में समाहित करने में काफी रिसर्च की आवश्यकता होती है। आज बिरहोर भाषा के लिए स्वर्णिम दिन हैं। यह पुस्तक बच्चों से लेकर विकास कार्यों से जुड़े प्रोफेसनलों हेतु मील का पत्थर साबित होगी।

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पत्रकार दीपक सवाल ने कहा कि देव कुमार जी ने जिस सरलता से उपयोगी बिरहोर शब्दों को चुनकर “बिरहोर-हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश” तैयार किया है, वह अत्यंत सराहनीय है। इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता है। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों से लेकर उच्च शिक्षा के लिए यह विशेष उपयोगी साबित होगी।

आदित्य प्रसाद साहु, राज्य सभा सांसद ने लेखक को शुभकामना देते हुए कहा कि ऐसे ही प्रयासों से बड़े कार्य किये जाते हैं। हम सभी के लिए गर्व की बात है कि ओरमांझी के युवा लेखक ने विलुप्त जनजाति का शब्दकोश तैयार कर इतिहास रचा है। यह विलुप्त प्राय जनजाति की भाषा को तीन भाषाओं में पिरोकर इसे विलुप्त होने से बचाने का प्रयास है। ऐसे युवा लेखक के भविष्य के लिए मैं दिल से कामना करता हूँ।

राज्यसभा सांसद द्वारा देव कुमार को अति उत्कृष्ट लेखक की उपाधि से सम्मानित किया गया।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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