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आजादी नहीं ये मोक्ष का द्वार है!

सरकार ने बहुत बड़ा कदम उठाया है। इसे पूरी तरह से देश हित में उठाया गया कदम माना जा सकता है। आज़ादी के बाद इतने सालों में ये दिन देख पाऊंगा इसका अंदाज़ा भला कहां था मुझे! आज धन्य हुई ये धरती और धन्य हुआ ये देश! आज तक जो लोग हर काम के लिये सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते थे वही लोग देश की हालत बिगाड़ने के ज़िम्मेदार निकले। ये नामाकूल बुद्धिजीवी लोगों के दिमाग़ में बुद्धि की घास पैदा कर उसे चरते रहे और ऐसे ही लोगों ने आज पूरी दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पैदा कर दी है। इससे पूरी मानव जाति को खतरा पैदा हो गया है। इन्हीं की वजह से हम शिक्षा और स्वास्थ्य की पुरातन और कल्याणकारी परम्पराओं से विमुख हुए हैं। ऐसे लोग निश्चित तौर पर बौद्धिक आतंकी हैं जो हर सरकार के लिये बड़ा खतरा हैं। उनकी इस गैर ज़िम्मेदाराना हरकत के लिये उनकी ज़िम्मेदारी तय कर दी गयी है ये इस सदी की सबसे क्रांतिकारी पहल है।

सरकार हमेशा से ही सरकार रही है और जनता हमेशा से जनता। जिस तरह अधिकार हमेशा अधिकार और कर्तव्य हमेशा कर्तव्य रहता है। अधिकार सरकार के पास जाकर खास और जनता के पास जा कर आम हो जाते हैं। आम को चूस कर खाने की परंपरा है। विपक्ष भी अपने अधिकारों समेत सरकार के ही पाले में शामिल रहता है। इसीलिए सरकार को अपनी आमदनी बढ़ाने में सदन के भीतर कोई दिक्कत नहीं होती। इस पाले के जिन लोगों को अधिकार विशेष प्रिय होते हैं वो विपक्ष को छोड़ सरकार में जाने के लिये स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। सरकार भाईचारा बढ़ाने के लिये कई तरह से इस प्रक्रिया को प्रोत्साहन देती है। वहीं कर्तव्य हमेशा नागरिकों के पाले में रहते हैं। उन्हें वहीं होना भी चाहिये। जनता अपने मताधिकार से जो सरकार बनाती है उसी के हर काम की सराहना न कर वो भ्रष्टाचार पर सूचना तलाशने लगती है और अपने कर्तव्य के पथ से हट जाती है। सरकार ने देर से ही सही लेकिन जनता की इस गैर ज़िम्मेदारी को पहचान लिया है। सरकार की ये पारखी नज़र क़ाबिले तारीफ़ है।

सरकार का ये मानना बिल्कुल उचित है कि जो लोग अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत नहीं होते वो आज़ादी के हक़दार नहीं हैं। ऐसे लोगों के गैर ज़िम्मेदाराना रवैये ने देश का विकास पैदा होने से रोक दिया है। ऐसे लोगों को उनके नागरिक अधिकारों से वंचित किया ही जाना चाहिए। मीडिया के एक बड़े तबके ने समय रहते इस बात को समझ लिया और देखिये हमारे देश में मीडिया की इसी कर्तव्यनिष्ठा ने उसकी आज़ादी को आज भी बचाये रखा है। सरकार जल्द ही बाकियों को भी अपने तरीके से कर्तव्य याद दिला ही देगी। क्रिकेट का मैच छोड़ कर जो नौजवान जुलूसों, रैलियों और प्रदर्शनों में शामिल होते हैं उनका भी सरकार को पिछवाड़ा सुजा देना चाहिए। इन्हें नहीं पता कि इस गैर ज़िम्मेदाराना हरकत ने कई विज्ञापनदाताओं और सटोरियों का नुकसान किया है। देश के अर्थतंत्र से छेड़छाड़ की उनकी जवाबदेही बनती है।

अपने भाषणों, लेखों और कविता कहानियों में सरकार को उसके कर्तव्य की याद दिलाने वाले भूल जाते हैं कि ये शब्द उसके शब्दकोश में प्रतिबंधित हैं। वो ये भी भूल जाते हैं कि इस सरकार को उन्होंने ही पैदा किया है और उस पर उंगली उठाकर दरअसल वो अपने चुनाव पर ही शक कर रहे हैं। कोई भी बहुमत से चुनी सरकार इतनी गैर ज़िम्मेदार और अनैतिक जनता को ये आज़ादी नहीं दे सकती। सरकार की मंशा इसमें किसी भी तरह से बोलने की आज़ादी पर पाबंदी लगाने की नहीं है वो तो केवल बेवकूफ़ जनता की सोच पर कंट्रोल चाहती है। जिस तरह सारे कौवे कांव कांव करते हैं और सारे गधे ढेंचू ढेंचू, उसी तरह जनता की सोच में भी एकरूपता होनी चाहिए। बाकी आपको बोलने से रोक कौन रहा है।

सरकार के इस कदम ने देश में जवाबदेही की एक नयी परंपरा कायम की है। हालांकि हर सरकार तकरीबन ऐसा ही करती है लेकिन पहली बार इसे औपचारिक तौर पर स्वीकार किया गया है। अब सरकार ऐसे लोगों की निशानदेही कर उन्हें देश की सरकार का विरोधी यानी देश विरोधी बता सकती है। ऐसा क़ानून देश की जनता को अपने अधिकारों की बात करने की बजाय अपने कर्तव्यों के बारे में सोचने का वक्त देगा। सलाखों के अंदर भी और बाहर भी। मौजूदा सरकार ये जानती है कि इसी जनता ने कई सालों तक देश को उसकी सत्ता से वंचित रखा। इससे उन सालों में जो विकास के काम नहीं हो पाये उसकी जवाबदेह तो ये जनता ही है।

भले ही सरकार को इसी जनता ने पांच साल के लिये बहुमत से चुना हो लेकिन आलोचना करने का अधिकार उसे किसने दे दिया। उसके लिये तो विपक्ष है ही और उसे भी तो जनता ने ही चुना है। लिहाज़ा ये एक ही पाले में खड़े दो लोगों का आपसी मामला है और वो इसे सौहार्द्रपूर्ण माहौल में अच्छी तरह से निपटा भी रहे हैं। इसमें जनता कौन होती है टांग अड़ाने वाली? उसे तो बस अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिये सरकार का मुंह ताकने की बजाय खुद उस तक पहुंचने की जद्दोजहद करनी चाहिए। बाकी सरकार तो अपना काम कर ही रही है क़ानून बनाने का।

किसी बौद्धिक आतंकी ने कहा था कि ज़िंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं। वो ये बताना भूल गया कि कौम ज़िंदा तो हो लेकिन नींद में हो तो पहले उसके टूटने का इंतज़ार करना पड़ेगा। लेकिन यहां तो सरकार ने नींद से जागने वालों को ही तोड़ने की तैयारी कर ली है। अब ऐसी उनींदी कौम का और हश्र भी क्या होगा। वैसे भी जनता की चुप्पी बता रही है कि उसे यही आज़ादी तो चाहिये थी हर अधिकार की क़ीमत पर। ये आज़ादी नहीं मोक्ष का द्वार है। इति सिद्धम्।

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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  • जनता को गाली देने वाले नासमझ है। यानी दुनिया के महान समाजवादी क्रांतिकारी गुरु गलत है जब वह कहते हैं कि जनता महान है ? फिर तो सारी बातें ही खत्म । नंदीग्राम सिंगूर कांड करने वाली तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों के बारे में क्या ख्याल है ?केंद्र में नई आर्थिक नीतियों का विरोध, बंगाल में सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के लिए बोली आमंत्रित करना ,इराक युद्ध के बाद कहना कि हमने अमेरिकी सामानों का बहिष्कार नहीं किया l 30 सालों से एक-दो दिन की वार्षिक हड़ताल के अनुष्ठान आयोजित करना ताकि मजदूर का तीसरा नेत्र न खुले, पूंजीवाद बचा रहे । जब भारत के मारुति जैसे होंडा जैसे संघर्षों में मजदूर बाउसरों द्वारा पीटा जा रहा है हमारी बड़ी-बड़ी ट्रेड यूनियन कहां है । दस करोड़ बीस करोड़ अगर इनके हिसाब से इस साल आए थे तो पांच सौ शहरो में एक लाख हुए। यानि एक दिन में पांच करोड़,दो में दस। दो लाइन बनती तो पच्चीस कि मी लंबी दूरी होती।( अगर एक शहर में एक जगह हड़ताल पर रहते )। संसोधनवादी गणित भी भूल गए ? १८से ६० साल के सब मर्द हड़ताल पर रहते तो भी २५ करोड़ होते। कार्यशक्ति में महिलाएं मात्र १/५ है। इसलिए नहीं लिया।

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi