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पुण्यतिथि पर विशेष: आधुनिक रंग समीक्षा के बेताज बादशाह थे नेमिचंद जैन

नेमिचंद जैन हिन्दी साहित्य में अकेली ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने जिंदगी के मंच पर कवि-साहित्यालोचक-नाट्य आलोचक-अनुवादक-पत्रकार और संपादक जैसे मुख्तलिफ किरदारों को एक साथ बखूबी निभाया। जिस क्षेत्र में भी वे गए, उन्होंने उसे अपना बना लिया। उस पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। नेमिचंद जैन ने अपने दौर तथा अपने समकालीनों को हद दर्जे तक प्रभावित किया। ‘तार सप्तक’ के इस प्रतिनिधि कवि ने कविता, उपन्यास, नाट्य समीक्षा में तो नए प्रतिमान स्थापित किए ही, साथ ही भारतीय रंगमंच को एक नई दृष्टि प्रदान करने वाली नाटक की पूर्णतः समर्पित पत्रिका ‘नटरंग’ भी दी, जो आधी सदी से अनवरत निकल रही है।

16 अगस्त, 1919 को जन्मे नेमिचंद जैन की सारी जिंदगानी पर यदि गौर करें, तो हमें उनकी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिलेंगे। एक दौर वह था, जब उनका आगरा में बसेरा था और आजादी की जद्दोजहद अपने चरम सीमा पर थी। कम्युनिस्ट लीडर प्रकाशचंद गुहा और दीगर वामपंथी साथियों के संपर्क में आकर, युवा विद्रोही नेमिचंद जैन ने प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया। उनका झुकाव मार्क्सवाद की ओर बढ़ता चला गया। उस समय तक इप्टा ने पूरे उत्तर भारत में जन आंदोलन का रूप ले लिया था।

नेमि बाबू की भागीदारी प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा दोनों में ही समान रूप से रहती थी। इप्टा के तो वे केन्द्रीय दल का हिस्सा थे। बंगाल में जब सदी का भयानक अकाल पड़ा, तो उन्होंने नाटकों के अनुवाद और उनके लिए गीत से लेकर सड़कों पर अकाल पीड़ितों के लिए चंदा तक इकट्ठा किया। आगरा इप्टा के ये बीज ही थे, जिन्होंने नेमिचंद जैन को आगे चलकर आधुनिक रंग समीक्षा का बेताज बादशाह बना दिया।

आगरा की राष्ट्रवादी सरगर्मियों से नेमिचंद जैन साम्राज्यवादी अंग्रेज सरकार की निगाह में आ गए। जासूस उनका पीछा करते रहते और जेल जाने की आशंका बनी रहती थी। लिहाजा आगरा छोड़कर वे ग्वालियर आ गए। ग्वालियर और उनका साथ कुछ दिन का रहा। विद्रोही स्वभाव, आंतरिक बेचैनी और रोजी-रोटी की तलाश उन्हें शुजालपुर मंडी खींच लाई। शुजालपुर मंडी के शारदा शिक्षा सदन में वे अध्यापन कार्य से जुड़ गए। यहीं उनकी मुलाकात गजानन माधव मुक्तिबोध और डाॅ. विष्णु नारायण जोशी से हुई। जो जल्दी ही गहरी मित्रता में बदल गई। संस्कारों की भिन्नता के बावजूद मुक्तिबोध से उनकी मित्रता बड़ी ही आत्मीय थी।

दोनों घंटों मार्क्सवाद पर बात करते। नेमिचंद जैन और मुक्तिबोध के आपसी पत्र संवादों से यह बात मालूम चलती है कि गजानन माधव को ‘मुक्तिबोध’ बनाने वाले नेमिचंद जैन ही थे। नेमि बाबू कुछ साल कोलकाता भी रहे। जहां उन्होंने वामपंथी साप्ताहिक ‘स्वाधीनता’ में काम किया। बीसवीं सदी के चालीस के दशक में नेमिचंद जैन की पहली कविता ‘विजयादशमी’, पत्रिका ‘लोकयुद्ध’ में प्रकाशित हुई। भाषा शैली की नवीनता, शिल्प के क्षेत्र में नए प्रयोगों से साहित्य जगत में नेमिचंद जैन की पहचान जल्द ही बन गई। उस दौर के अधिकांश कवियों मसलन भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा, गिरिजा कुमार माथुर, मुक्तिबोध की तरह उनकी कविता में भी मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव दिखलाई देता है। जिसकी बानगी उनकी कविताओं में साफ दिखाई देती है।

मसलन ‘‘पर मैं नहीं हूं नगण्य/डाल दी है दरार मैंने इस पक्के भवन में/यही अब फैलेगी लाएगी ध्वंस चरम।’’ जटिल मानवीय क्रियाशीलता की प्रकृति के कवि नेमिचंद जैन के साल 1973 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘एकांत’ का मूल्यांकन करते हुए प्रसिद्ध कवि शमशेर बहादुर सिंह ने कहा था,‘‘नेमिचंद जैन को मैं बड़ा संयत और सुथरा कवि मानता हूं। मात्र प्रभाव के लिए किसी उपकरण को लाने में वे प्रकृत्या बचते हैं। इसलिए मेरे मन में उनके लिए खास सम्मान है।’’ साल 1943 में प्रकाशित ‘तार सप्तक’ को यूं, तो अज्ञेय के नाम से जोड़ा जाता है, लेकिन यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि ‘तार सप्तक’ के नामकरण से लेकर, इसमें शामिल होने वाले कवियों के नाम तक नेमिचंद जैन की योजना थी। बहरहाल ‘पहला सप्तक’ के प्रकाशन के बाद कई और ‘सप्तक’ निकले। एक समय ऐसा भी आया कि अज्ञेय से वैचारिक मतभिन्नता की वजह से उन्होंने खुद को ‘तार सप्तक’ से अलग कर लिया।

नेमिचंद जैन की जिंदगी का दूसरा अहम हिस्सा कवि से आलोचक-नाट्य आलोचक के रूप में उनका विकास है। आजादी मिलने के बाद संगीत अकादमी की नौकरी में आकर उनका ध्यान एक बार फिर नाटक की ओर गया। संगीत, नाटक से शुरूआती लगाव ने उन्हें पूरी तरह से नाटक का बना दिया। रंग समीक्षाएं, जो उस समय केवल अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में ही छपती थीं, नेमिचंद जैन ने उसे हिंदी में भी संभव कर दिखाया। ‘कल्पना’, ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’ आदि उस दौर की चर्चित पत्रिकाओं में उन्होंने रंग समीक्षा के नियमित काॅलम लिखे।

नाटक के बहुस्तरीय माध्यम के प्रति उनके विशिष्ट बोध और संवेदनशीलता ने आधुनिक रंग समीक्षा को नए आयाम दिए। रंग समीक्षा के मुताल्लिक उनका कहना था,  ‘‘रंग समीक्षा को सार्थक और मूल्यपरक होना चाहिए।’’ वहीं रंगमंच के लिए वे समीक्षा को बेहद जरूरी मानते थे। जिसके बिना रंगमंच का विकास नहीं हो सकता। नेमिचंद जैन का आधुनिक रंगमंच को एक और खास योगदान नाटक और नाट्य समीक्षा को पूरी तरह से समर्पित पत्रिका ‘नटरंग’ का प्रकाशन था। साल 1965 में प्रकाशित ‘नटरंग’ से पूर्व हिंदी में रंगमंच और नाटक से जुड़ी कुछ पत्रिकाएं ‘अभिनय’ एवं ‘नटराज’ ही निकलती थीं। अलबत्ता अंग्रेजी में जरूर उस समय कई स्तरीय प्रकाशन थे।

मसलन जन नाट्य संघ की ‘यूनिटी’, भारतीय नाट्य संघ की ‘नाट्य’ और अब्राहम अलका जी का ‘थियेटर बुलेटिन’। नेमिचंद जैन की रंग कला के चिंतन-विवेचन की अद्भुत क्षमता, बौद्धिक संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता ने जल्दी ही ‘नटरंग’ को रंगमंच की प्रमुख पत्रिका बना दिया, जो आज भी कमोबेश वही भूमिका बखूबी निभा रही है। नेमिचंद जैन, अच्छे नाट्य लेखन को हमेशा रंगमंच का जरूरी हिस्सा समझते थे, जिसके बिना अच्छी प्रस्तुति नामुमकिन है। रंगमंच और नाटक के प्रति उनके सरोकार ही थे, जो कि वे ‘नटरंग’ के हर अंक में एक नए नाटक को प्रकाशित करते थे।

नेमिचंद जैन ने नाटक और रंगमंच से संबंधित कई किताबें लिखीं। ‘दृश्य-अदृश्य’, ‘तीसरा पाठ’, ‘रंगकर्म की भाषा’, ‘रंगदर्शन’, ‘भारतीय नाट्य परम्परा’, ‘एसाइट्स इंडियन थियेटर’, ‘ट्रेडिशन’ ‘कंन्टयूनिटी एंड चैंज’ आदि उनकी ऐसी किताबें हैं जो रंगमंच, नाटक से जुड़े हर विद्यार्थी, लेखक और आलोचक के मार्गदर्शन में हमेशा मददगार रहेंगी। वहीं ‘अधूरे साक्षात्कार’ और ‘जनान्तिक’ किताब में उन्होंने औपन्यासिक आलोचना को नये आयाम दिए हैं। ‘बदलते परिप्रेक्ष्य’, ‘रंग परम्परा’ और ‘मेरे साक्षात्कार’ आदि उनकी अन्य महत्वपूर्ण किताबें हैं। नेमिचंद जैन ने इसके अलावा ‘मुक्तिबोध रचनावली’ और ‘मोहन राकेश के संपूर्ण नाटक’ जैसी किताबों का श्रमसाध्य संपादन भी किया है।

नाट्य विशेषज्ञ के तौर पर उन्होंने कई देशों मसलन अमेरिका, इंग्लैंड, पूर्वी एवं पश्चिमी जर्मनी, फ्रांस, यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया, पौलेंड आदि की यात्रा की। हिन्दी साहित्य, नाटक और रंगकर्म के क्षेत्र में किए गए उनके विशिष्ट योगदान के लिए नेमिचंद जैन को कई सम्मानों से नवाजा गया। जिनमें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री अलंकरण, संगीत नाटक अकादमी का राष्ट्रीय सम्मान और दिल्ली हिन्दी अकादमी का ‘शलाका सम्मान’ प्रमुख हैं।

नेमिचंद जैन ने रंगमंच को मनोरंजन से बढ़कर कलात्मक, उद्देश्यपरक विद्या के रूप में प्रतिष्ठित किया। हिन्दुस्तानी रंगमंच की समस्याओं और उसके समाधान के मुताल्लिक उनका कहना था,‘‘सृजनात्मक विद्या के रूप में भारतीय रंगमंच के सामने सबसे बड़ी समस्या आत्म साक्षात्कार की है।’’ बहरहाल आत्म साक्षात्कार की यह समस्या केवल भारतीय रंगमंच की ही नहीं, बल्कि आज साहित्य, कला से जुड़े हर क्षेत्र की भी है, जिसके बिना हमारा विकास संभव नहीं। नेमिचंद जैन के जीवन का मुख्य उद्देश्य, आधुनिक रंगमंच को देश में समर्थ और सृजनशील अभिव्यक्ति माध्यम के रूप में स्वीकृति दिलाना था।

जिसकी कोशिशें, उन्होंने अपने आखिरी दम तक की। कभी ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ में प्राध्यापक के तौर पर (साल 1959-1976), तो कभी ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ के कला अनुशीलन केन्द्र के प्रभारी (साल 1976-1982), संगीत नाटक अकादमी के सहायक सचिव और कार्यकारी सचिव का दायित्व निभाते हुए। ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ आज जिस रूप में है, उसको बनाने में भी नेमिचंद जैन का अहम योगदान है।  हिन्दी रंगमंच में नए रंग भरने वाले नेमिचंद जैन, 24 मार्च 2005 को जिंदगी के रंगमंच में एक लंबा रोल निभाकर, नेपथ्य में चले गए।

(ज़ाहिद खान पत्रकार होने के साथ कई किताबों के लेखक हैं। आजकल वह मध्य प्रदेश के शिवपुरी में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 24, 2020 4:46 pm

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