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‘हाया सोफिया मस्जिद’ में दफ़्न कर दी गयी तुर्की की धर्मनिरपेक्ष सांस्कृतिक विरासत

तुर्की की एक अदालत के फैसले और फिर राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन के आदेश के पालन में 86 वर्षों से एक संग्रहालय के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्याति पा रही इमारत हाया सोफिया (यूनानी भाषा में ‘पवित्र विवेक’) फिर से मस्ज़िद बना दी गई है। अपने अस्तित्व के लगभग पंद्रह सौ वर्षों में, 1935 ई. में संग्रहालय बनाये जाने से पहले लगभग नौ सौ साल तक यह चर्च थी और उसके बाद लगभग पांच सौ साल तक मस्ज़िद थी। तुर्की के इस निर्णय ने एक बार फिर अतीत के प्रेतों को वर्तमान पर मंडराने के लिए खुला छोड़ दिया है।

हाया सोफिया तुर्की के इस्तांबुल में स्थित एक शानदार इमारत है। यह दुनिया भर के पर्यटकों के लिए यह आकर्षण का केंद्र है। इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिया हुआ है।

आज के इस्तांबुल को कान्सटेंटिनोपल यानि कुस्तुन्तुनिया शहर के नाम से विशाल रोमन साम्राज्य की पूर्वी राजधानी के रूप में 326 ई. में सम्राट कांस्टेंटाइन द्वारा बसाया गया था। सम्राट कांस्टेंटाइन के नाम पर ही इस शहर का नाम कान्सटेंटिनोपल पड़ा। पूर्वी रोमन साम्राज्य को ही बाइज़ेंटाइन साम्राज्य भी कहा जाता है। कुस्तुन्तुनिया शहर तुर्की के बड़े हिस्से को यूरोप से अलग करने वाली बॉस्फोरस नदी के पूर्वी तट पर बसाया गया। यूरोप और एशिया के बीच जल और थल दोनों तरह के ज्यादातर व्यापारिक मार्ग कुस्तुन्तुनिया यानि आज के इस्तांबुल से होकर ही गुजरते थे।

कुस्तुन्तुनिया में हाया सोफिया चर्च को 532 ई. में बनवाना शुरू किया गया था। तुर्की के रोमन सम्राट जस्टीनियन की योजना एक ऐसा विशाल और शानदार चर्च बनवाने की थी जैसा न कभी बना हो न कभी बन सके। 537 ई. में यह इमारत बन कर तैयार हुई। यह इमारत न केवल स्थापत्य कला की बेमिसाल संरचना थी, बल्कि अपने पूरे इतिहास में यह राजनीतिक सत्ता का प्रतीक भी बनी रही। लगभग 900 साल तक यह ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च का मुख्यालय बनी रही। इस शानदार इमारत ने जितनी प्राकृतिक आपदाओं की मार सही, उतने ही हमले भी झेले। समय-समय पर इसके अनेक हिस्से ध्वस्त भी हुए और उनका अलग-अलग तरीके से पुनर्निर्माण भी हुआ। 13वीं सदी तक इस पर अधिकार को लेकर ईसाइयों के दो संप्रदायों में ही लड़ाइयां होती रही थीं। कुछ समय (1204 से 1261 ई. तक) के लिए यह कैथोलिक चर्च भी रहा। 1261 में यह फिर से ऑर्थोडॉक्स चर्च हो गया।

1453 में ऑटोमन (उस्मानी) वंश के सुल्तान मुहम्मद द्वितीय ने कुस्तुन्तुनिया पर क़ब्जा कर लिया और हाया सोफिया को मस्ज़िद में बदल दिया गया और इसे ‘अया सोफिया’ कहा जाने लगा। इसमें गुंबद और इस्लामी मीनारें बनवाई गईं और चर्च के सभी प्रतीक चिह्नों को या तो तोड़ दिया गया अथवा ढक दिया गया। सैकड़ों वर्षों तक इसमें तब्दीलियां की जाती रहीं। इस तरह 1453 ई. से 1931 ई. तक मस्ज़िद के रूप में इसका इस्तेमाल होता रहा।

20वीं सदी के शुरू में तुर्की की राजनीति में मुस्तफा अतातुर्क उर्फ कमाल पाशा का उदय हुआ। उन्होंने तुर्की से ऑटोमन राजशाही का खात्मा किया और वहां एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम किया, और इस तरह आधुनिक तुर्की का जन्म हुआ। वे नए तुर्की गणतंत्र के प्रथम राष्ट्रपति बने। कमाल पाशा ने तुर्की की राजधानी कुस्तुन्तुनिया से हटाकर अंकारा में बनाया ताकि नए लोकतंत्र को तुर्की के राजतंत्रीय अतीत की स्मृतियों से भी मुक्त रखा जाए। इस तरह कुस्तुन्तुनिया, जो कि लगभग पंद्रह सौ साल तक, पहले बाइज़ेंटाइन साम्राज्य की और बाद में ऑटोमन साम्राज्य की राजधानी रहा, उससे 1923 में राजधानी का दर्जा छिन गया। लंबे समय से कुस्तुन्तुनिया को अनौपचारिक तौर पर इस्तांबुल कहा जाता था, 1930 से इसे औपचारिक तौर पर यह नाम भी दे दिया गया।

1931 में हाया सोफिया को बंद कर दिया गया। फिर 1934 में लिए गए कैबिनेट के एक फैसले के अनुसार 1935 में इसे धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक के तौर पर एक संग्रहालय के रूप में सभी धर्मों व दुनिया के सभी नागरिकों के लिए खोल दिया गया। 2014 में यहां 33 लाख पर्यटक आए थे। 2015 और 2019 में भी तुर्की में सबसे ज्यादा पर्यटकों को आकर्षित करने वाला पर्यटन स्थल हागिया सोफिया ही था।

एर्दोगन ने पिछले साल चुनाव के दौरान ही इसे फिर से मस्ज़िद बनाने का वादा किया था। उनको तुर्की के ऐसे मतदाताओं का भारी समर्थन प्राप्त है जो इस्लामिक राष्ट्रवाद से प्रेरित हैं और जो 1453 में बाइज़ेंटाइन साम्राज्य पर ऑटोमन साम्राज्य की विजय को ईसाइयत पर इस्लाम की विजय और हाया सोफिया को इस विजय के प्रतीक के रूप में देखते हैं। एर्दोगन जान-बूझ कर अपने भाषणों में कमाल पाशा का जिक्र नहीं करते। अगर जिक्र करते भी हैं तो उन्हें अतातुर्क (तुर्कों के पिता) नहीं कहते। वे पाशा की नीतियों को और विचारधारा को एक-एक कर पलटने में लगे हैं। उन्होंने महिलाओं को सिर पर रूमाल बांधना फिर से शुरू करा दिया है और फिर से धार्मिक शिक्षा शुरू कराया है। अतातुर्क द्वारा प्रचलित कराई गई तुर्की भाषा, जिसमें रोमन लिपि का इस्तेमाल किया जाता है, उसे बदल कर उस्मानी तुर्की को प्रचलित कराया गया है जो अरबी लिपि में लिखी जाती है। यह सारा काम तुर्क स्वाभिमान और विरासत के नाम पर किया जा रहा है। 2018 में दुबारा चुने जाने के बाद एर्दोगन ने देश में चल रही संसदीय प्रणाली को बदल कर राष्ट्रपति प्रणाली लाया।

एर्दोगन अपनी नीतियों की असफलताओं तथा खो रहे अपने जनाधार से परेशान हैं। पहले से कमजोर पड़ रही अर्थव्यवस्था कोरोना के कारण और भी तबाह हो गई है। उनकी ‘जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी’ (एकेपी) 2002 में तुर्की राज्य को और अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक राज्य बनाने के आह्वान के साथ सत्ता में आई थी। लेकिन उसने योजनाबद्ध तरीके से देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को तोड़ने और धर्म को प्रशासन के केंद्रीय तत्व के रूप में स्थापित करके सत्ता पर अपनी पकड़ को और मजबूत करने का काम किया है। उसकी विदेश नीतियों के कारण सीरिया और लीबिया में जेहादी तत्व और मजबूत हुए। वह सांप्रदायिक मुद्दों का सहारा ले रही है और इस तरह कमाल पाशा द्वारा तुर्की के आधुनिकीकरण के लिए उठाए गए कदमों को उलटने में लगी है। पार्टी की ओर से इस तरह बयान दिए जाते रहे हैं कि “हागिया सोफिया हमारी भौगोलिक संपत्ति है”, “जिन्होंने इसे तलवार के बल पर जीता है, संपत्ति पर उन्हीं का अधिकार है”, “यह हमारी संप्रभुता का हिस्सा है”, वगैरह-वगैरह।

बेमिसाल स्थापत्य कला की इस विराट संरचना को फिर से मस्ज़िद में बदलना दशकों से तुर्की के राष्ट्रवादियों और इस्लामवादियों के एजेंडे में शामिल हो चुका था। इस सांप्रदायिक कार्ड की संवेदनशीलता की वजह से वहां की विपक्षी पार्टियां भी खुल कर विरोध में नहीं बोल रही हैं। जाहिर है कि इस कदम से तुर्की के ईसाई अल्पसंख्यकों के भीतर असुरक्षा बढ़ेगी और तुर्की का धर्मनिरपेक्ष चरित्र लहूलुहान होगा।

हाया सोफिया को संग्रहालय से बदल कर मस्ज़िद बनाने के लिए पहले भी याचिकाएं दायर होती रही हैं, लेकिन न्यायालय ने उन्हें स्वीकार नहीं किया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में न्यायालय के ऐसे कई निर्णय आ चुके थे जिनसे पहले से ही पता चल गया था कि इस बार हाया सोफिया को भी संग्रहालय से मस्ज़िद में बदलने का ही निर्णय आएगा। दरअसल 2011 में इज्निक, 2013 में ट्रैबजॉन और 2019 में चोरा के संग्रहालयों को भी वहां की न्यायपालिका ने मस्ज़िदों में बदलने के फैसले सुनाए थे। ये फैसले हागिया सोफिया मामले में नज़ीर बने। इनसे यह भी पता चलता है कि किसी समाज में बढ़ रही आधुनिकता और प्रगतिशीलता अथवा कट्टरपंथ और रूढ़िवादिता का प्रभाव वहां की कार्यपालिका और न्यायपालिका सहित राज्य और समाज की सभी संस्थाओं और सभी अंगों पर पड़ता है।

इस तरह से एक धार्मिक उपासना-स्थल, जिसे धर्मों और सभ्यताओं के बीच अमन और भाईचारे के प्रतीक में बदल दिया गया था, जो मनुष्यता की साझा, सार्वभौमिक सांस्कृतिक विरासत बनी हुई थी, उसे क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए इतिहास की जमीन खोद कर धर्मों और सभ्यताओं के बीच टकरावों और कटुता को पुनर्जीवित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जाहिर है कि जिस तरह से कमाल पाशा द्वारा 1935 में इसे संग्रहालय घोषित करने का प्रतीकात्मक महत्व था, उसी तरह आज की तुर्की सत्ता का इसे मस्ज़िद में बदलने के काम का भी एक प्रतीकात्मक महत्व है। कमाल पाशा का कदम जहां कलह को समाप्त कर लौकिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान था, वहीं एर्दोगन का यह कदम इंसानियत को पीछे ले जाने वाला और सभ्यताओं को कलह के एक नए युग में धकेलने वाला कदम है। दुनिया में ऐसी गिनी-चुनी इमारतें ही बची होंगी जो हागिया सोफिया की तरह धर्मों और सभ्यताओं के बीच सेतु बन सकें।

अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद भी पुनरुत्थान और कट्टरपंथ के सहोदर हैं। तुर्की में भी इसकी बानगी आसानी से देखी जा सकती है। राष्ट्रपति एर्दोगन की बयानबाजियों में युद्ध संबंधी जुमले काफी बढ़ गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में ग्रीस के साथ दुश्मनी को बढ़ाया जा रहा है। विभाजित साइप्रस के भविष्य को लेकर, शरणार्थियों के प्रवाह को लेकर, भूमध्य सागर में तेल और गैस की ड्रिलिंग के अधिकारों को लेकर दोनों देशों में आए दिन विवाद होता रहता है। अतः एर्दोगन ग्रीस के खिलाफ आक्रामक भाषा का इस्तेमाल ज्यादा करने लगे हैं।

यह कहानी दुनिया के अन्य हिस्सों से अलग नहीं है। हर जगह सत्ता पाने के लिए या सत्ता बचाने के लिए अतीत का सहारा लेने की एक होड़ सी लगी हुई है। धार्मिक अंधराष्ट्रवाद का उभार काफी देशों में हो रहा है। नागरिकों को स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और न्याय के आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों में सुसंस्कृत करने के श्रमसाध्य काम की बजाय सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए आज के दौर में अतीत के प्रति अंधमोह को सहलाने की राजनीति का बोलबाला पूरी दुनिया में है। ये लोग इतिहास को उसकी जटिलता में देखने, समझने और और स्वीकार करने वाली तटस्थता की बजाय अपने शब्दाडंबरों के माध्यम से उसकी सतही और सपाट मिथकीय व्याख्या से लोगों को अतीत के प्रति मोहग्रस्त करने की साजिश रचते हैं और उन्हें इतिहास के उत्पीड़ित पक्ष के तौर पर अपने पीछे गोलबंद करते हैं।

क्या तुर्की में धार्मिक अंधराष्ट्रवाद के उभार की कहानी भारत में इसके उभार की कहानी से बहुत अलग है? ऐसा लगता है जैसे कि केवल इमारतों के नाम और पीड़ित अल्पसंख्यकों की धार्मिक पहचानें बदल गई हैं। जैसे कहानी वही हो केवल जगह और पात्र बदल गए हैं। हम अगर न्याय की लड़ाई लड़ना चाहते हैं तो न्याय के पैमानों को अपनी सुविधा के हिसाब से स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर सकते। हमें इस पूरी प्रवृत्ति से लड़ना होगा तभी पूरी दुनिया के लिए एक बेहतर समाज की संकल्पना साकार हो पाएगी।

(शैलेश स्वतंत्र लेखक हैं।)

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This post was last modified on July 15, 2020 10:14 am

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