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Categories: बीच बहस

जांच एजेंसी और जांच के तौर-तरीके तय करने का हक आरोपी को नहीं

जितने भी प्रभावशाली व्यक्ति हैं या जिनकी राजनीतिक पहुँच है बहुधा अपने खिलाफ दर्ज मामलों में मनोवांछित परिणाम पाने या मामले को लम्बा खींचने के लिए जाँच एजेंसी बदलवा देते हैं और मामला ठंडे बसते में चला जाता है। जिस राज्य की घटना होती है वह यदि अनुकूल नहीं हुई तो आरोपी और पीड़ित दोनों में से कोई भी न्यायालय में जाकर जांच एजेंसी बदलवाने का प्रयास करता है। आरोपी जब न्यायालय जाता है तब जाँच एजेंसी पर पूर्वाग्रही, पक्षपाती और उत्पीड़नात्मक जाँच का आरोप लगाता है और पीड़ित जब जाता है तो जाँच एजेंसी पर आरोपी से मिलीभगत का आरोप लगाता है।

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस चंद्रचूड़ द्वारा अर्णब गोस्वामी मामले में लिखे गए फैसले में कहा गया है कि सीबीआई को जांच का स्थानांतरण रोज़मर्रा का सामान्य मामला नहीं है। विवेचनाओं के रूटीन स्थानांतरण से न सिर्फ कानून की सामान्य प्रक्रिया में जनता का विश्वास उठता है बल्कि वे असाधारण स्थितियां भी निरर्थक हो जाती हैं जो जांच को स्थानांतरित करने का अधिकार देती हैं।

पी चिदंबरम बनाम प्रवर्तन निदेशालय फैसले का जिक्र करते हुए उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब तक जांच में कानून के किसी प्रावधान का उल्लंघन नहीं होता, तब तक जांच एजेंसी को जांच के निर्देश देने में विवेकाधिकार निहित है, जिसमें सवालों की प्रकृति और पूछताछ के तरीके का निर्धारण करना शामिल है ।

उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को जांच स्थानांतरित करने की अर्णब गोस्वामी की याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि जांच के लिए जिस तरह से जांच आगे बढ़ती है या जांच करने वाली पुलिस के खिलाफ हितों के टकराव के अप्रमाणित आरोप को लेकर किसी आरोपी व्यक्ति की नाराजगी के कारण कानून की वैध प्रक्रिया को पटरी से नहीं उतरने देनी चाहिए और सीबीआई को जांच स्थानांतरित करने के लिए अदालत की असाधारण शक्ति का उपयोग नहीं होना चाहिए।जस्टिस  डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस शाह की पीठ ने दोहराया कि इस तरह के स्थानांतरण  का उपयोग असाधारण परिस्थितियों में किया जाना एक असाधारण शक्ति है।

अर्णब गोस्वामी ने सीबीआई को जाँच देने के लिए जिन आधारों की बात कही थी उनमें 27 अप्रैल 2020 को हुई लम्बी पूछताछ, याचिकाकर्ता और सीएफओ से  सम्बंधित जांच की प्रकृति और पूछताछ के दौरान पूछे गये प्रश्न, याचिकाकर्ता द्वारा पालघर में हुई घटना की पर्याप्त जांच करने में राज्य सरकार की असफलता, मुंबई पुलिस कमिश्नर के संबंध में याचिकाकर्ता द्वारा 28 अप्रैल 2020 को लगाए गए आरोप और कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा सोशल मीडिया पर ट्वीट और शिकायतकर्ता द्वारा आर भारत के एक प्रतिनिधि को साक्षात्कार शामिल हैं। पीठ ने कहा कि इन आशंकाओं ने जांच सीबीआई को स्थानांतरित करने के लिए कोई विशेष मामला नहीं बनता ।

पीठ ने कहा कि आरोपी व्यक्ति के पास यह विकल्प नहीं है कि किस जांच एजेंसी से जाँच करायी जाय या किस तरीके से जाँच करायी जाय। इस संबंध में 2018 भीमा कोरेगांव मामले (रोमिला थापर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) में उक्ति का हवाला दिया गया ।

पीठ ने कहा कि जांच के किसी हस्तांतरण का आदेश इस आधार पर नहीं दिया जा सकता है क्योंकि एक पार्टी ने स्थानीय पुलिस के खिलाफ कुछ आरोप लगाए हैं । याचिका को ख़ारिज करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि जांच के तहत एक व्यक्ति को कानून के अनुरूप एक निष्पक्ष प्रक्रिया की एक वैध उम्मीद है। जांच करने के तौर-तरीके से नाराज किसी अभियुक्त द्वारा जाँच करने वाली पुलिस के खिलाफ हितों के टकराव का अपुष्ट आरोप लगाकर या कानून की वैध प्रक्रिया को पटरी से नहीं उतारना चाहिए और सीबीआई को जांच हस्तांतरित करने के लिए इस न्यायालय की असाधारण शक्ति के प्रयोग का कारण नहीं बनना चाहिए।

अदालतें असाधारण स्थितियों में जांच हस्तांतरित करने के लिए असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करती हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आपराधिक न्याय के प्रशासन की पवित्रता संरक्षित रह सके। असाधारण परिस्थितियों के बिना जाँच का  स्तांतरण न सिर्फ कानून की सामान्य प्रक्रिया में जनता के विश्वास को झुठलाना होगा बल्कि यह जाँच प्रक्रिया को भी निरर्थक बना देगा।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का तर्क है कि लम्बी जांच या पूछताछ के दौरान उसे और सीएफओ से पूछे गये सवालों की प्रकृति के आधार पर जांच स्थानांतरण कर दिया जाना चाहिए। जांच एजेंसी को सवालों की प्रकृति और पूछताछ की अवधि तय करने का अधिकार है। याचिकाकर्ता को एक दिन जांच के लिए बुलाया गया था। इसके अलावा याचिकाकर्ता का यह आरोप कि पालघर में हुई घटना की पर्याप्त जांच करने में राज्य सरकार की कथित विफलता की आलोचना से उत्पन्न हितों का टकराव ही मान्य नहीं है। पालघर की घटना की जांच मुंबई पुलिस के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार से बाहर है।

पीठ ने कहा कि उसे ऐसा कोई कारण नहीं मिला जिससे जांच को सीबीआई को स्थानांतरित करनी जरूरी हो। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा अभिनियोजित रिकार्ड और प्रस्तुतियों के साथ-साथ सामग्री को संतुलित और विचार करने के बाद, हम पाते हैं कि इस न्यायालय के उदाहरणों में प्रतिपादित परीक्षणों के दायरे में आने वाले प्रकृति का कोई भी मामला जांच के स्थानांतरण के लिए स्थापित नहीं किया गया है।

पीठ ने अपने फैसले में अहम टिप्पणी की कि भारत की आज़ादी तब तक सुरक्षित रहेगी जब तक कि पत्रकार बदले के डर के बिना सत्ता से सीधे सवाल कर सकते हैं।पीठ ने कहा कि हमारे फैसले मानते हैं कि अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत पत्रकार का अधिकार बोलने और व्यक्त करने के लिए नागरिक के अधिकार से अधिक नहीं है, लेकिन हमें एक समाज के रूप में यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि एक दूसरे के बिना हमारा अस्तित्व नहीं हो सकता। स्वतंत्र मीडिया तब मौजूद नहीं रह सकता है जब समाचार मीडिया को जंजीर में बांध दिया जाए।

पीठ ने कहा कि मौलिक अधिकारों पर कोई भी उचित प्रतिबंध आनुपातिकता मानक के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें से एक घटक यह है कि अपनाए गए उपाय को राज्य के वैध उद्देश्य को प्रभावी ढंग से प्राप्त करने के लिए कम से कम प्रतिबंधात्मक उपाय होना चाहिए। फैसले में युवल नोवल हरारी द्वारा लिखित पुस्तक “21 वीं सदी के लिए 21 पाठ” से टिप्पणी की गई है कि जिन सवालों का आप जवाब नहीं दे सकते हैं वे आम तौर पर आपके लिए उस जवाब से बेहतर हैं जिस पर सवाल नहीं कर सकते।पीठ ने कहा कि मुंबई में दर्ज एफआईआर पर जांच जारी रहेगी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on May 21, 2020 7:37 am

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