Sunday, June 26, 2022

संगीन अपराध का आरोपी हुआ नायक के तौर पर पेश!

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इंटीरियर डिजाइनर को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार अर्णब गोस्वामी को सात दिन बाद उच्चतम न्यायालय द्वारा बुधवार को अंतरिम जमानत मिल गई। रात लगभग 8.30 बजे तलोजा जेल से बाहर निकलते ही रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब कार की छत पर बैठ गए। अर्णब ने नारे लगाते हुए अपनी रिहाई को भारत के लोगों की जीत बताया। उच्चतम न्यायालय ने मुंबई पुलिस कमिश्नर से जमानत के आदेश पर तत्काल अमल करने को कहा था।

जमानत मंजूर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अर्णब गोस्वामी और दो अन्य आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेंगे। इसके अलावा आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले की जांच के दौरान वो पूरा सहयोग करेंगे।

2018 में इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक और उनकी मां ने खुदकुशी कर ली थी। अन्वय की पत्नी ने सुसाइड लेटर में अर्णब का नाम होने के बावजूद कार्रवाई न होने पर सवाल उठाया था। इसके बाद रायगढ़ पुलिस ने अर्णब और दो अन्य लोगों को 4 नवंबर को गिरफ्तार किया था। बाद में अदालत ने इन्हें 18 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। अर्णब तलोजा जेल में बंद थे।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और इंदिरा बनर्जी की एक अवकाश पीठ की सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या आत्महत्या के उकसाने के लिए अपराध को पैसे का भुगतान न करने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है, गोस्वामी की हिरासत और उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम राहत से इनकार करने के खिलाफ कड़ी मौखिक टिप्पणियां भी कीं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आत्महत्या के एक मामले के लिए सक्रिय रूप से उकसाना और प्रोत्साहन देना पड़ता है। यदि किसी व्यक्ति पर पैसा बकाया है, तो क्या यह आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला है? ए का बी पर बकाया है। वित्तीय तनाव के कारण बी ने आत्महत्या कर ली, क्या ये आत्महत्या के लिए उकसाना है? यह धारा 306 आईपीसी के तहत अपराध को आकर्षित करता है? हम यहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ काम कर रहे हैं और क्योंकि उन पर पैसा बकाया था, नाइक ने वित्तीय तनाव के कारण आत्महत्या कर ली। क्या यह हिरासत में पूछताछ के लिए मामला है?

जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि यदि एफआईआर लंबित है, जमानत नहीं दी जाती है तो यह न्याय का मखौल होगा। उन्होंने पूछा कि अगर हम एक संवैधानिक अदालत के रूप में कानून नहीं बनाते हैं और स्वतंत्रता की रक्षा नहीं करते हैं तो कौन करेगा? जस्टिस चंद्रचूड़ ने निराशा भी व्यक्त की कि उच्च न्यायालय एक नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने में विफल रहा। यदि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध का गठन किया जाता है, तो उच्च न्यायालय ने उस पहलू से निबटा नहीं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने हैबियस के सुनवाई योग्य न होने पर टनों पन्ने लिख दिए जबकि ये प्रार्थना वापस ले ली गई थी। उन्होंने कहा कि अगर यह अदालत आज हस्तक्षेप नहीं करती है, तो हम विनाश के रास्ते पर यात्रा कर रहे हैं। गोस्वामी को भूल जाओ। आप उनकी विचारधारा को पसंद नहीं करते तो अपने आप को अलग रखें। अगर मुझ पर छोड़ें तो मैं उनका चैनल नहीं देखूंगा। सब कुछ अलग रखें। अगर हमारी राज्य सरकारें ऐसे लोगों के लिए यही करने जा रही हैं, जिन्हें जेल भेजना है, तो उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना होगा। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अस्वीकार करने के लिए तकनीकी आधार नहीं हो सकता। यह आतंकवाद का मामला नहीं है।

अर्णब अपनी जमानत के लिए हाईकोर्ट भी गए थे, लेकिन हाईकोर्ट ने उनसे कहा था कि अंतरिम जमानत के लिए उनके पास लोअर कोर्ट का भी विकल्प है, लेकिन 4 नवंबर को गिरफ्तारी के बाद ही अलीबाग सेशन कोर्ट ने उनकी जमानत नामंजूर कर दी थी। हालांकि, अलीबाग कोर्ट ने पुलिस को रिमांड न देते हुए अर्णब को न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।

अर्णब ने अग्रिम जमानत की अर्जी दी
इस बीच अर्णब गोस्वामी ने एक महिला पुलिसकर्मी की कथित रूप से पिटाई करने के सिलसिले में मुंबई पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर बुधवार को सत्र अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी दी। चार नवंबर को पुलिस की टीम जब गोस्वामी को गिरफ्तार करने उनके आवास पर पहुंची थी तब उन्होंने एक महिला पुलिसकर्मी की कथित रूप से पिटाई कर दी थी। इस सिलसिले में मध्य मुंबई के एनएम जोशी मार्ग थाने में पिछले सप्ताह उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। अग्रिम जमानत संबंधी गोस्वामी की याचिका पर बृहस्पतिवार को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पीबी जाधव सुनवाई करेंगे।

गोस्वामी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 353 (सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालना), 504 (शांति भंग करने के लिए जानबूझकर किसी का अपमान करना) और 506 (आपराधिक रूप से डराना/धमकी देना) और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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