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Categories: बीच बहस

लोकतंत्र का पतन और जो बाइडेन की जीत

मशहूर अमेरिकी लेखक कर्ट वॉनगट कहा करते थे- ‘अमेरिका में दो वास्तविक राजनीतिक दल हैं, विजेता तथा पराजित’ लेकिन यह पुरानी बात हो गई। इस बार नारीवादी समाजशास्त्री और दार्शनिक जुडिथ बटलर ने वोट डालने के बाद जो बात कही वह ध्यान देने योग्य है। जूडिथ ने कहा- “जब हमने इस बार मतदान किया तो हम जो बाइडेन और कमला हैरिस (वह मध्यमार्गी जिन्होंने बर्नी सैंडर्स और एलिज़बेथ वार्न की सेहत और वित्तीय क्षेत्र के बारे में बहुत बढ़िया प्रस्तावों को पीठ दिखाई) के पक्ष में मतदान नहीं कर रहे थे, बल्कि हम इसलिए मतदान कर रहे थे कि भविष्य में मतदान करने की संभावना बनी रहे; हम इसलिए मतदान कर रहे थे कि मतदान करके सरकार बनाने वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया बरकरार रहे।”

अगर आप जुडिथ बटलर के इन शब्दों की ओर ध्यान दें तो पाएंगे वह सिर्फ लोकतंत्र में हो रहे पतन को लेकर ही चिंतित नहीं हैं, बल्कि उसकी चिंताओं के दायरे में मुख्य रूप से वह समाज है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी जैसे दक्षिणपंथी नेताओं ने नफरत के बीज इतने गहरे बो दिए हैं कि समाज को विभाजित होते हुए आप अब स्पष्ट देख सकते हैं। उसकी चिंताओं के केंद्र में नव-फासीवाद है जहां जाकर तमाम लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं समाप्त हो जाती हैं।

यह बात सच में चिंताजनक है। पूरे विश्व में ही लोकतंत्र का पतन हो रहा है और एक नए तरह के फ़ासीवाद को सब अपने-अपने देश में देख तो रहे हैं लेकिन उसके खिलाफ उठने वाली आवाज़ें बौद्धिक जगत के तहख़ानों से निकल कर आम जनता तक नहीं पहुंच पा रही हैं। एक आम आदमी श्वेत-अश्वेत, हम और वो, ब्राह्मण-दलित-महादलित, हिंदू-मुस्लिम-ईसाई जैसे सांचों में इस तरह से ढाल दिया गया है कि उसकी अस्मिता अपने ही अहं की फौलादी गिरफ्त से बाहर के काबिल ही नहीं रही।

जुडिथ बटलर के साथ खड़े होकर आप बिहार के चुनावी नतीजों को देखेंगे तो आप को भी हैरानी होगी। कुपोषण, भुखमरी, बेरोजगारी और हाल में हुई आप्रवासी मजदूरों की तबाही के बावजूद वह क्या है जो बिहार की जनता को इतनी बड़ी संख्या में फिर एक बार नितीश कुमार या यों कहें मोदी के पीछे जा खड़े होने के लिए मजबूर करता है। अमेरिकी जनता ने ट्रंप के चार वर्षीय शासन-काल ने अमेरिकी लोकतंत्र का जितना विकृत स्वरूप देखा है, शायद उससे ज्यादा घिनौना स्वरूप भारतीय जनता ने मोदी के साढ़े छह वर्षीय शासन-काल में देखा है।

चुनावी नतीजों के बाद जुडिथ बटलर लिखती हैं, ‘दो सवाल हैं कि जो अमेरिका में मतदाता खुद से पूछ रहे हैं: ये कौन लोग हैं जिन्होंने ट्रंप के लिए मतदान किया है? और हमने इस निष्कर्ष के लिए खुद को बिल्कुल तैयार क्यों नहीं किया? एक शब्द ‘तबाही’ के पल-पल का व्यापक अहसास उनके बीच पसर रहा है, जिन्हें मैं जानती हूं। हमें नहीं पता था कि कुलीनों के ख़िलाफ़ गुस्सा कितना व्यापक है, गोरे लोगों का गुस्सा नारीवाद और नागरिक अधिकारों के आंदोलन के ख़िलाफ़ कितना गहरा है, आर्थिक बेदखली से कितने लोगों का मनोबल गिरा है, अलगाववाद और नई दीवारों की संभावनाओं और राष्ट्रवादी युयुत्सा से लोग कितने आहत हैं। क्या यह नया ‘गोरा-आक्रोश’ (नस्लवादी) है? हम इसे आते हुए क्यों नहीं देख पाए?

आधुनिक समाजों में संयुक्त राज्य अमेरिका में पाए जाने वाले नस्लवाद की समाज-विज्ञान के हलकों में काफ़ी चर्चा मिलती है। हाल में प्रकाशित कुछ अध्ययनों में दिखाया गया कि अमेरिकी समाज का नस्लवाद इतिहास की दुर्घटना न हो कर सत्रहवीं सदी के बाद से धीरे-धीरे योजनाबद्ध रूप से खड़ी की गई एक संरचना है, जिसे कई तरह के परिवर्तनों के बावजूद क़ायम रखा गया है। आज अमेरिका का नस्लवाद वहां के सभी प्रमुख सामाजिक समूहों, नेटवर्कों और संस्थाओं में कहीं मुखर तो कहीं मौन भाव से प्रभावी होते हुए देखा जा सकता है।

पुलिस हिंसा को आधार बनाकर शोध करने वाले एक समूह के अनुसार वर्ष 2013 से लेकर 2019 तक अमेरिकी पुलिस ने 7666 लोगों की हत्या की। इसमें अश्वेत अमेरिकियों के मारे जाने की दर श्वेत अमेरिकियों की तुलना में दोगुना थी और मिनीसोटा राज्य में तो यह दर चार गुना है। अनुमान यह भी कहता है कि कैलिफोर्निया, टेक्सास और फ्लोरिडा में पुलिस के हाथों सबसे अधिक अफ्रीकी-अमेरिकी यानी काले लोग अश्वेत लोग ही मारे जाते हैं। अलाबामा के मोंटगोमरी में बना ‘द नेशनल मेमोरियल फॉर पीस एंड जस्टिस’ अमेरिका के इतिहास में पहली बार अश्वेत लोगों के खिलाफ की गई हिंसा को जाहिर तौर पर स्वीकार करता है।

अमेरिका के भीतर वहां के श्वेत निवासियों द्वारा नस्लवाद के खिलाफ अश्वेत लोगों के पक्ष में उतरने का एक लंबा इतिहास है। वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक देश में अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर के डर को खत्म करने और उन्हें हाशिए पर चले जाने से बचाने का कार्यभार बहुसंख्यक आबादी पर ही होता है। अमेरिका जैसे बहुसांस्कृतिक कहलाना पसंद करने वाले देश को तो यह कार्यभार निश्चित वहां की श्वेत आबादी को उठाना चाहिए।

यह कार्यभार उठाया भी गया है। वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा मेक्सिको की सीमा पर दीवार खिंचवाने की कोशिश की गई तो उसका प्रतिरोध गोरे अमेरिकियों ने किया। इसी तरह वर्ष 2017 में सात देशों के मुसलमानों पर अमेरिका में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगाया तो उसके निर्णय के खिलाफ लोग सड़कों पर उतार आए। सड़कों पर ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ के गूंजते नारे भी कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। शायद जुडिथ बटलर इस बात को लेकर परेशान हैं कि इतने विरोध के बावजूद लोगों में चेतनता क्यों नहीं जागी।

पंजाबी कवि सुरजीत पातर का एक शेर है:
दूर अब तक अगर सवेरा है
इसमें काफी कसूर मेरा है।

सुरजीत पातर की तरह जुड़िथ बटलर भी खुद को कटघरे में खड़ा करती हैं। लिखती हैं: वे कौन हैं, जिन्होंने उसे वोट दिया था, लेकिन हम कौन हैं, जिन्होंने अपनी शक्ति को नहीं पहचाना, जिन्होंने इस बात की बिल्कुल भी आशंका नहीं जताई, जो इस बात की थाह नहीं ले सकते कि लोग नस्लवादी और अप्रवासी घृणा फैलाने वाले एक व्यक्ति के लिए मतदान करेंगे, जिसका इतिहास यौन अपराधों में, श्रमिकों का शोषण, संविधान के लिए तिरस्कार, प्रवासियों के प्रति लापरवाही और सैन्यीकरण की जनविरोधी योजनाओं से भरा हुआ है। शायद हम लोगों ने अपने अस्तित्व को वाम और उदारवादी सोच की सच्चाई से अलग-थलग कर लिया है? या शायद हम कुछ शालीन और निष्कपट मानव स्वभाव में विश्वास करते थे। किस परिस्थिति में नफरत फैलाने और लापरवाह सैन्यीकरण ने बहुसंख्यक वोट को मजबूर किया?

प्रतिरोध के स्वर में नागरिक की आवाज़ का शामिल नहीं होना ही जुडिथ बटलर की चिंता का सबब नहीं है। बल्कि वह इस बात को लेकर परेशान हैं कि इतनी बड़ी संख्या में वह कौन लोग हैं जो इतनी तबाही के बावजूद ट्रंप के साथ खड़े हैं। यहां ट्रंप या मोदी एक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि एक विचार का नाम है जिससे ‘ट्रंपवाद’ या ‘मोदीवाद’ पैदा हुआ है।

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे इस ‘ट्रंपवाद’ के बारे में कहते हैं कि ट्रंप की हार ‘ट्रंपवाद’ की हार नहीं है। ‘ट्रंपवाद’ एक फ़ूहड़ और अतिवादी किस्म की विचारधारा है, जिसने अमेरिकी समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है। ‘ट्रंपवाद’ का भाव है अश्वेतों के खिलाफ नस्लवादी नजरिया, औरतों के प्रति तिरस्कार वाला रवैया रखना, वातावरण और विभिन्न प्रकृतिक स्थितियों की परवाह न करना, अप्रवासियों को शक की नजर से देखना एक राष्ट्र के रूप में उग्र विचारों के साथ नागरिकों को श्वेत भाईचारे के देश के रूप में स्थापित करना, विभिन्न तरह की साजिश के सिद्धांतों को उछलना, अपने विरोधियों और आलोचकों के के साथ अनुचित व्यवहार करना और किसी तरह की वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अंगूठा दिखाना आदि।

उदारतावादी लोकतंत्र के पैरोकार अभय कुमार दुबे भी उदारतावाद को घेरते हुए जनता में आए इस बदलाव को लेकर जुडिथ बटलर की ही तरह हैरान होते हुए कहते हैं, “डॉनल्ड ट्रंप ने अपने चार साल के कार्यकाल में यही सब कुछ किया है पर हैरानी यह है कि अमेरिकी जनता के काफी बड़े और प्रभावी हिस्से को उनकी यह हरकतें बहुत पसंद आई हैं। वह डेमोक्रेटिक पार्टी के उदारवादी रवैये से खुश नहीं हैं। ट्रंप का दावा है कि यह उदारवाद मुख्य तौर पर पाखंडी किस्म का है। कुछ हद तक उनकी बात सही भी है। जनता ने लंबे अरसे तक इसके अहलकारों को  सत्ता पर बिठाया पर अब हर जगह इनकी असफलताएं और चोंचलेबाजियों के चलते ही इनकी आलोचना हो रही है।”

अब डोनाल्ड ट्रंप से जरा परे हटकर इस तस्वीर के दूसरे रुख पर भी एक नज़र डाल लेते हैं। जो लोग जो बाइडेन और कमला हैरिस की जीत की खुशियां मना रहे हैं सवाल उनके लिए हैं। क्या जो बाइडेन ईरान और वेनेजुएला पर लगाए प्रतिबंध हटा देंगे (जिनसे भारत सस्ता और आसान शर्तों पर पेट्रोल लेता रहा है)? डेमोक्रेट्स मानवाधिकारों की बातें ज़्यादा करते हैं, लेकिन बाइडन कश्मीर को लेकर और धारा 370 ख़त्म करने के भारत के फ़ैसले को उलटने के लिए दबाव नहीं बना पाएंगे? भारतीय मूल की कमला हैरिस के भीतर का भारत क्या भारतीय दलित बच्चियों के साथ हो रही दरिंदगी को लेकर दिल कभी रुआंसा होगा?

रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक बेचारा मुकेश अंबानी यूरोप में एक फर्जी कंपनी खोलकर वेनेजुएला से तेल का धंधा कर रहा था। ट्रंप ने घुड़की लगाई तो उसे बंद करना पड़ा, अब क्या उसे इजाज़त मिल जाएगी? चलो मान लिया, यह भारत के अंदरूनी मामले हैं, लेकिन क्या इराक़ पर किए गए हमले और लाखों इराकियों की मौत के लिए जो बाइडेन माफी मांगेंगे? क्या वह एडवर्ड स्नौडेन और जूलियन असांज को गले से लगा कर अपने देश का सच्चा ‘देशभक्त’ नागरिक स्वीकार कर लेंगे? सीआईए के समर्थन से जनरल सुहार्तो ने दस लाख लोगों की हत्या कारवाई थी, क्या बाइडेन इस बात की शपथ लेंगे कि आगे से लातिनी अमेरिका या दुनिया के किसी देश में ऐसा कुछ नहीं होगा? क्या फोर्ड फ़ाउंडेशन और रॉकफैलर अपना इतिहास नहीं दोहराएगा? क्या इज़राइल-फिलिस्तीनी संघर्ष खत्म हो जाएगा और इज़राइल ने जो अपनी गैरकानूनी बस्तियों के जरिए फिलिस्तीन की ज़मीन हड़प रखी है उसे वापस मिल जाएगी? भारतीय मूल की कमला हैरिस क्या भारतीय मूल की ही गीता गोपीनाथ से कहकर विकासशील देशों की जनता का ख़ून निचोड़ने वाला ढांचागत समायोजन कार्यक्रम बंद करवा देंगी?

सवाल तो और भी बहुत हैं, फिलहाल इनके जवाब मिल जाएं तो जो बाइडेन की जीत के मायने समझ में आएं। नहीं तो हम तो यही समझेंगे नव साम्राज्य की कुछ और नयी कलंक-कथाएं लिखने के लिए नया शिकारी चुनाव जीता है, क्योंकि अब जो लोकतंत्र इस दुनिया को हासिल है वहां जीत उसी शिकारी की होती है जो भरम का जाल बेहतर ढंग से फेंकता है।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 12, 2020 12:39 pm

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