‘ईमेल बम’ हमले की जावड़ेकर की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने वेबसाइट पर पहले यूएपीए लगाया फिर वापस लिया

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नयी दिल्ली। दिल्ली पुलिस की साइबर अपराध शाखा ने दस दिनों के अंदर वेबसाइट www.fridaysforfuture.in को ब्लॉक करने के लिए दो नोटिस भेजे और फिर वापस ले लिये। वेबसाइट प्रसिद्ध जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता ग्रेटा थंबर्ग के नेतृत्व वाली अंततराष्ट्रीय मुहिम के भारतीय चैप्टर का प्रतिनिधित्व करती है। आरोप है कि पोर्टल का इस्तेमाल पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के ईमेल पते पर लाखों ईमेल भेजने के लिए इस्तेमाल किया गया जो कि पुलिस का दावा है कि ‘ईमेल बम‘ हमले जैसा था।

विभिन्न वर्गों के लोगों के ऑनलाइन अभियान के हिस्से के रूप में ई-मेल पर्यावरणीय मंजूरी के लिए नरेंद्र मोदी के नये प्रस्तावित कानून पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 के विरोध में थे। पहला नोटिस जिसमें पुलिस ने गैरकानूनी गतिविधि प्रतिरोधक अधिनियम (यूएपीए) की धाराएं लगाई थीं, सोशल मीडिया पर वायरल होते ही बवाल मच गया। 

साइबर अपराध यूनिट के पुलिस उपायुक्त अन्येश रॉय ने हफपोस्ट को गुरुवार शाम बताया, “आठ जुलाई 2020 को भेजा गया नोटिस जो कि सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, स्पष्ट किया जाता है कि नोटिस असंबद्ध कानूनी धाराओं के साथ अनजाने में भेजा गया था।“ डीसीपी रॉय ने बताया, “यह महसूस करने पर कि अनुचित धारा लगाई गई है, 12 जुलाई को नोटिस वापस ले लिया गया, क्योंकि धारा बदलनी थी। बाद में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा के तहत संशोधित नोटिस संबंधितों को भेजा गया।“

रॉय के अनुसार पहला नोटिस जो पर्यावरण मंत्री की शिकायत के बाद यूएपीए की धारा 18 के तहत 8 जुलाई को भेजा गया था,  उसमें ‘टाईपोग्राफिकल त्रुटि‘ है यह महसूस होते ही 12 जुलाई को वापस लिया गया था। उन्होंने कहा कि त्रुटि गलत धारा लगाये जाने की थी।  यूएपीए की धारा 18 किसी आतंकवादी गतिविधि के षड्यंत्र, षड्यंत्र रचने की कोशिश का अपराध है और यह ऐसे मामलों में लगती है जहां राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो। डीसीपी रॉय ने कहा कि यह धारा दिल्ली पुलिस की किसी और यूनिट से संबंधित किसी और नोटिस में लगाई जानी थी।  

12 जुलाई को साइबर अपराध शाखा ने दूसरा नोटिस भेजा सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 66 के तहत वेबसाइट ब्लॉक करने के लिए जो किसी कंप्यूटर या कंप्यूटर नेटवर्क पर हमले से संबंधित अपराधों का जिक्र करता है।  यह नोटिस भेजने के अपने फैसले को सही करार देते हुए डीसीपी रॉय ने कहा, “कुछ आधिकारिक ईमेल खातों पर ईमेल की बारिश की जा रही थी और इससे वास्तविक ई-मेल इन ई-मेल के ढेर में खो जा रहे थे।“

रॉय ने दावा किया कि यह ईमेल खाते सिर्फ पर्यावरण मंत्री जावड़ेकर के ई-मेल पते पर ही नहीं बल्कि पर्यावरण मंत्री के अन्य अधिकारियों के ईमेल पतों पर भी भेजे जा रहे थे जो पर्यावरणीय मंजूरी के लिए नये कानून से संबंधित मशविरा प्रक्रिया से असंबंधित थे। दूसरा नोटिस भेजने व 16 जुलाई तक जावड़ेकर व अन्य ईमेल खातों पर भेजे जाने वाले ईमेल का सिलसिला रुक गया और दूसरा नोटिस भी वापस ले लिया गया। 

लेकिन रॉय ने चेतावनी दी कि, “यदि फिर ऐसा हुआ तो हम आवश्यकता पड़ने पर फिर इसी तरह की कार्यवाही कर सकते हैं।“ रॉय ने यूएपीए और आईटी एक्ट के तहत भेजे नोटिस वापस लेने वाली ईमेल हफपोस्ट से साझा की। जिसकी प्रति नीचे दी जा रही है। 

Fridaysforfuture.in के एक प्रवक्ता ने इस संवाददाता को बताया कि उन्हें दूसरा नोटिस या पहले नोटिस को वापस लेने की सूचना नहीं मिली है। उन्हें उनके इंटरनेट सेवा प्रदाता की तरफ से नहीं बताया गया कि उन्हें कोई दूसरा नोटिस भी आया है। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि वह अभी तक यह समझ नहीं पाये हैं कि वेबसाइट अब भी ब्लॉक क्यों है। हफपोस्ट इंडिया स्वतंत्र रूप से यह पता नहीं लगा पाया कि वेबसाइट बंद होने के कारण क्या हैं। 

वेबसाइट के एक वालंटियर की ओर से जारी बयान के अनुसार, “हमने अपनी वेबसाइट पर ईआईए मसौदे पर मशविरा प्रक्रिया पर अभियान छेड़ा, जो कि भारत सरकार ने मार्च 2020 में आमंत्रित की थी। अंत में यह अभियान ही जुलाई 2020 में आकर वेब सेंसरशिप का कारण बना। समाधानों की खोज की दिशा में हमारे सक्रिय होने के कारण हमें सेंसर किया जा रहा है और उस निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं होने दिया जा रहा जिससे हमारा भविष्य जुड़ा है। हम देश का मूक भविष्य नहीं होंगे।“

ईआईए 2020 और इसके कई विवाद

पर्यावरणीय मंजूर के प्रस्तावित कानून से सार्वजनिक विमर्श के लिए जारी करने के साथ ही विवाद जुड़ गये हैं। यह मार्च के अंत में जारी किया गया जब मोदी सरकार ने कोरोनावायरस लॉक डाउन लगाया। हफपोस्ट इंडिया के सूचना अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार इसे लॉक डाउन के दौरान जारी करने को लेकर जनता से  नकारात्मक प्रतिसाद के बावजूद पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपने अधिकारियों के सुझावों को ठुकराते हुए मसौदे के खास प्रावधानों के बारे में प्रतिसाद देने के लिए जनता को कम दिनों का समय देने का फैसला किया। 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाद में जन परामर्श के लिए समय सीमा 11 अगस्त तक बढ़ाई। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि कानून के मसौदे का भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में अनुवाद कराया जाए। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल में कहा कि यदि प्रस्तावित कानून के लिए पर्याप्त जन परामर्श नहीं किया गया तो वह प्रस्तावित कानून पर स्थगन लगा सकती है। 

कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह आदेश उसी सप्ताह आया जब हफपोस्ट इंडिया ने खुलासा किया कि वेबसाइट www.letindiabreathe.in से हजारों ईमेल पर्यावरण मंत्रालय के राडार पर थीं, जब प्रस्तावित अधिसूचना को वापस लेने की मांग पर चर्चा की जा रही थी और इस चर्चा के कुछ सप्ताह बाद मोदी सरकार नियंत्रित नेशनल इंफार्मेशन एक्सचेंज ऑफ इंडिया (निक्सी) ने उक्त वेबसाइट के अलावा दो अन्य वेबसाइट को ब्लॉक किया। इनमें  www.FridaysForFuture.in और  www.ThereisnoEarthB.com शामिल थीं। इन वेबसाइटों ने ‘इंटरनेट सेंसरशिप‘ की आशंका व्यक्त की और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिये बिना मनमाने तरीके से ब्लॉक करने के निर्णय की आलोचना की। 

गुरुवार को एक आधिकारिक बयान में  fridaysforfuture.in ने कहा, ‘‘हमारी वेबसाइट ने केवल एक प्रस्तावित ईमेल की सामग्री और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, संबंधित मंत्री और ईआईए परामर्श प्रक्रिया के लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ईमेल पते मुहैया कराये। हमने उन्हें सामग्री मुहैया कराई जो अपनी आपत्तियां बनाकर भेजना चाहते थे। और जिस तरह माननीय मंत्री के पास ईमेल आईं वह देश भर में युवाओं, पर्यावरणविदों व नागरिकों की प्रस्तावित अधिसूचना के जरिये ईआईए नियमों के संभावित बदलाव से उपजी चिंताओं को ही दर्शाती हैं।“

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