Monday, October 25, 2021

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दशहरा के बाद की लड़ाई

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विजयदशमी (दशहरा) को सशक्तीकरण का क्षण माना जाता है: शाब्दिक और लाक्षणिक दोनो अर्थों में। रावण को पराजित कर दिया गया है। सीता को बचा लिया गया है। और सम्पूर्ण सद्गुणों के अवतार राम के वनवास का अन्त होने को है। लेकिन हमारे तमाम महाकाव्य हमें बताते हैं कि जीत का क्षण धुंए के एक परदे के धूम्र आवरण समान है। जनता एक ऐसी जीत का जश्न मनाती है। जो सर्वनाशी साबित होने वाली है। 

इस बात को आम तौर पर महाभारत के सन्दर्भ में रेखांकित किया जाता है, जहाँ कौरवों पर विजय के बाद अभूतपूर्व पैमाने पर नरसंहार होता है, दुख भोगने पड़ते हैं: यहाँ तक कि उद्धारक भी घृणित मौत मरते हैं और मानवजाति की दशा शापित अश्वत्थामा जैसी हो जाती है- एक असीम अस्तित्व जिसमें न कोई आशा है न उद्धार की सम्भावना। यही वजह है कि अमरता एक अभिशाप है। 

लेकिन रामायण भी, विजय के क्षण में भी, किसी भी तरह से कम विषादपूर्ण नहीं है। महाभारत में आपसी विद्वेष और पूर्व कर्मों का अवसादग्रस्त संचित बोझ भविष्य पर इतना भारी पड़ता है कि आपको पता होता है कि राहत के क्षण कागज की नाव जैसे हैं। जिन्हें शाप दर शाप, पाप दर पाप एक अति निर्धारित अतीत धो डालेगा। रामायण और उसमें मौजूद विजय के क्षण उससे भी ज़्यादा अवसादपूर्ण ठीक इस वजह से हैं क्योंकि राम सम्पूर्ण सद्गुणों से पूर्ण अवतार हैं। और इसके बावजूद, विजय एक त्रासदी में बदल जाती है। यह त्रासदी दरअसल सीता के चरित्र में केन्द्रित है।

राम-रावण युद्ध को इतनी ज़्यादा वरीयता इसलिए दी गयी है क्योंकि वह जनता के उम्मीदों का प्रतीक है। मुक्ति और उद्धार का क्षण है। लेकिन स्पष्ट तौर पर कहें तो वह महाकाव्य के धड़कते दिल में राम-सीता की प्रेम कहानी, एक सच्ची प्रेम कहानी में यह कथा एक साइड शो (क्षेपक) जैसी है। विजय के बाद और उत्तरकांड में भी जो कुछ घटित होता है वही महाकाव्य के अर्थ और उसमें निहित अवसाद को खोलता है। और तब रामायण प्रचलित अर्थों के ठीक विपरीत में बदल जाता है: बुराई पर अच्छाई की जीत नहीं बल्कि अन्याय की स्थायी जीत। सम्पूर्ण सद्गुणों के अवतार राम का सामना यहाँ एक स्थायी अन्याय से होता है जिससे मुकाबला उनके तेज को नष्ट कर डालता है।

विजयदशमी इसलिए एक उदासी भरा त्योहार है क्योंकि असली और गहरी बुराई तो अब प्रकट होनी है जब रावण के ऊपर राजनीतिक विजय हासिल हो चुकी है। सीता के हिस्से में एक अकथनीय घृणित अन्याय आता है। इसके बावजूद कि जो राम और हर कोई अच्छी तरह जानता है कि उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि उसे सजा मिले। सीता की मनोवैज्ञानिक अग्निपरीक्षा तो शायद और बदतर है। रावण ने सीता का अपहरण किया था। लेकिन अब बार-बार वही अपराधी ठहराई जाती है। उसके सद्गुण/पुण्य बदनामी को रोक नहीं पाते। उसको बदनाम करने वाले अदंडित जहां रहते हैं और वह सज़ा पाती है। सीता का आख्यान एक ऐसा बिंदु है जिसके आगे हर सद्गुण टूटकर बिखर जाता है। वह जो अहिल्या जैसी ‘दूषित’ औरत का भी उद्धारक है यहाँ पवित्रता की प्रतिमूर्ति को सजा देता है।

वह दयानिधान उद्धारक जो हर किसी का मुक्तिदाता माना जाता है- अचानक से मर्यादा की बात करने लगता है। राजतन्त्र द्वारा किसी उच्च आदर्श की आड़ में सजा दी जाती है। राम अपनी प्रजा का विश्वास कायम रखना चाहते हैं। धर्म के लिए वह सब कुछ बलिदान कर देता है। लेकिन यह सब कोरी बकवास है। यहाँ धर्म की कोई बात नहीं है। राम अपनी प्रजा की इच्छा के विरुद्ध वनवास को जाते हैं इसलिए प्रजा की इच्छा का यहां कोई मुद्दा नहीं है। सीता भी पहले ही एक अनुचित परीक्षा से गुज़र चुकी है पर अपनी सच्चाई को प्रमाणित करने का यह वैध तरीका व्यंग्यबाणों/ वक्रोक्तियों और अफवाहों के सामने कहीं नहीं टिक पाता। 

उसे आपराधिक तरीके से कलंकित किया जाता है जबकि उस पर दोष मढ़ने वाले और उसे दण्ड देने वाले न्याय से कोसों दूर रहते हैं। सीता के मामले में बदनीयती से की गई गपशप को सार्वजनिक अग्निपरीक्षा से ज़्यादा आधिकारिक अहमियत दी जाती है। अगर धर्म को लोकनिंदा की सनक का बन्धक बनाया जा सकता है तो फिर धर्म क्या है? सम्पूर्ण सद्गुणों के अवतार राम, एक पूरी तरह कायर आदमी में बदल जाता है, जिसमें सीता की आँख में आँख डालने का भी साहस नहीं रहता और उसे निर्वासित करने के लिए छल का सहारा लेना पड़ता है। यह ठीक है कि सीता के प्रति उसकी एकनिष्ठा, उनकी निर्विवाद कर्तव्यपरायणता, प्रायश्चित के लिए/ क्षतिपूर्ति के लिए खुद कष्टपूर्ण जीवन जीना संदेह से परे है। लेकिन इस सबके कोई मायने नहीं हैं। राम कष्ट भोगते हैं पर न्याय नहीं करते। 

सीता का वनवास महाकाव्य का सबसे असंगत प्रसंग है। राम और रावण के युद्ध की राजनीतिक बुराई तो बड़ी आसानी से देखी जा सकती है और उसका समाधान भी आसान है। लेकिन संस्कृति के संचित भार में छिपी गहरी बुराई का मुकाबला करना लगभग असम्भव प्रतीत होता है। राम को अपने खुद के सत्यता पर भरोसा नहीं है। हर क्षण वह उसका परित्याग करता है। इसके लिए वह उस पर दोषारोपण करता है। जब वह जीत कर लायी जाती है तो वह कहते हैं कि यह ज़रूरी था ताकि सार्वजनिक तौर पर लोग देखें कि उसे जीत लिया गया है। राम को अपनी कायरता को उसकी अन्यायपूर्ण अग्निपरीक्षा के पीछे छिपा लेना पड़ता है और अन्त में वाल्मीकि की गवाही के पीछे।

निर्दोष सिद्ध होने के बावजूद सीता अपराध मुक्त नहीं होती जबकि उस पर दोष मढ़ने वालों की बात का विश्वास किया जाता है। इसके बावजूद भी कि वे कोई प्रमाण नहीं देते। यह वाल्मीकि की महानता ही कही जायेगी कि वे न प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ देते हैं। न ही वे परिणाम को चीनी की चाशनी में डालकर पेश करते हैं । कोई पौराणिक शब्दाडंबर खड़ा नहीं करते (राम के अवतार रूप और मानव रूप के बीच विभेद पैदा करने का औचित्य प्रतिपादन नहीं करते)। जैसा कि बाद के बहुत से लेखकों जैसे कि महान नाटककार भवभूति और दिन्गंगा ने इसका अन्त अपने नाटकों में सुखान्त में किया है- जहां राम और सीता का मिलन हो जाता है क्योंकि अन्त में उनका अलगाव स्वीकार कर लेना उनके प्यार की हार स्वीकार करने के बराबर होता।

लेकिन भले ही इन नाटकों में सुखान्त है लेकिन यहां कोई वास्तविक समाधान प्रस्तुत नहीं होता, राम निरपराध नहीं ठहराये गये हैं। सीता के मामले में उपस्थित नैतिक धर्मसंकट से राम को छुटकारा नहीं मिलता। सीता बार-बार राम को निष्ठुर/निर्दयी कहती है। उनके नाटकों में वास्तविक खतरा यह है कि वो शासक को दोषी नहीं ठहराते बल्कि बेलगाम जनता को जिम्मेदार ठहराते हैं। यहां जनता का मतलब आधुनिक लोकतंत्र के अर्थ में जनता से नहीं है बल्कि लोकरीति से है। जो राम रावण को हरा सकते हैं वही सांस्कृतिक विधान के सामने असहाय हो जाते हैं और अपने पापमोचन के लिए उन्हें कवियों और ऋषियों की शरण लेनी पड़ती है।

सत्य के रक्षक राम एक दयनीय आत्म संदेही व्यक्ति में बदल जाते हैं। उनके इस निरन्तर कष्ट और दुविधा से अन्त में सीता ही उन्हें मुक्त करती है। अपनी मां धरती की गोद में समाकर वह अपनी शुचिता के सवाल को हमेशा के लिए खत्म कर देती हैं। दरअसल एक तरह से राम इस दुख से टूट जाते हैं। सीता को रावण से बचाना आसान था लेकिन उसकी सच्चाई को सांस्कृतिक मानकों से लोकापवाद से बचा पाना लगभग असंभव हो जाता है। दरअसल इन सांस्कृतिक मान्यताओं में इस कदर हृदयहीनता है कि हर चीज सिर के बल खड़ी हो जाती है: यथोचित कार्रवाई की जगह नाइंसाफी ले लेती है और फरियादी ही अपराधी समझे जाते हैं।

धर्मशास्त्रों में भले ही राम और सीता एक दूसरे के बिना अधूरे हैं लेकिन लिंग मानक इतने प्रभावी हैं कि वे उनका मिलन असंभव बना देते हैं। यह लगभग ऐसा है मानो वाल्मीकि कहना चाहते हैं कि: विजयदशमी के दिन जो युद्ध खत्म हुआ वह तो बेहद आसान था। उसके बाद की लड़ाई सीता को अकेले ही लड़नी पड़ती है। अब राम की तरह कोई उद्धारक नहीं है जो उसकी रक्षा करे। परम्परा का सत्य उसके साथ नहीं है। एक दिन सीता को खुद पहल करनी होगी और तब देखना बाकी सारे सत्य उसके रास्ते का रोड़ा नहीं बनेंगे।

(प्रताप भानु मेहता का यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था। इसका हिंदी अनुवाद ज्ञानेंद्र सिंह ने किया है।)    

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