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अत्याचार विरोधी कानून लाने से पहले मानसिकता में बदलाव की जरूरत: जस्टिस दीपक गुप्ता

पुलिस विशेषाधिकार प्राप्त लोगों पर हमला नहीं करती। अधिकांश मामले गरीबों के खिलाफ होते हैं। पहले जो कानून हमारे पास हैं उसे लागू करें। विवेचना, अभियोजन निष्पक्ष नहीं हैं; इन्हें पहले दुरुस्त किया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता का ऐसा मानना है। लाइव लॉ की ओर से आयोजित “हिरासत में मौतें: अत्याचार-रोधी कानून की आवश्यकता” विषयक वेबिनार को सम्बोधित कर रहे थे।
वेबिनार की शुरुआत में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में पिता-पुत्र की हिरासत में हुई मौत पर चर्चा हुई, जिसमें दोनों को पुलिस ने कर्फ्यू की अव‌ध‌ि में 15 मिनट तक अपनी दुकान खुली रखने के कारण पकड़ ‌लिया था। दोनों को हिरासत में बेरहमी से पीटा गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने एक बयान जारी करके कि दोनों की दिल की बीमारियों के कारण मौत हुई है, मामले को छुपाने का प्रयास किया। इस संदर्भ में, बंसल ने ज‌स्टिस दीपक गुप्ता से पूछा कि डीके बसु बनाम पश्च‌िम बंगाल राज्य में कैदी के अधिकारों के संबंध में दिशानिर्देशों के जारी होने के बावजूद, क्रियान्वयन क्यों एक चुनौती है?

जस्टिस गुप्ता ने कहा कि तमिलनाडु मामले में जिन दो पिता-पुत्र की हिरासत ने बर्बर पिटाई से मौत हुई, उन्होंने अपनी दुकान को 15 अतिरिक्त मिनटों के लिए खुला रखा था? क्या यह गंभीर अपराध है? जस्टिस गुप्ता ने कहा कि मुझे एक एक्टिविस्ट जज कहा जाता रहा है, और मुझे इसकी खुशी है। लेकिन, हम केवल कानून के दायरे के भीतर ही एक्टि‌विस्‍ट हो सकते हैं। जस्ट‌िस गुप्ता ने कहा, मौजूदा कानूनों को लागू करना समय की जरूरत है। डीके बसु मामले में उच्चतम न्यायालय ने सोचा कि हम संसद को कुछ सुझाव दे सकते हैं। तमिलनाडु में, ऐसे नियम हैं, जिनमें तय किया गया है कि कि आरोपी को रिमांड पर देने से पहले उसे शारीरिक रूप से पेश किया जाना चाहिए। आपके पास यह नियम है, लेकिन इसका उल्लंघन किया गया था।

जस्टिस गुप्ता ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि अधिकांश मामले गरीबों के खिलाफ होते हैं, न कि विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों के खिलाफ। उन्होंने कहा कि पहले जांच और अभियोजन की प्र‌क्रिया में सुधार की जरूरत है, और मौजूद कानूनों को लागू करने की जरूरत है। उन्होंने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि अधिकांश मामले गरीबों के खिलाफ हैं, न कि विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के खिलाफ। उन्होंने कहा कि विवेचना और अभियोजन में सुधार की जरूरत है और सबसे पहले उन कानूनों को लागू करने की जरूरत है, जो कि हमारे पास हैं। “कोविड-19 के दौरान भी हम एक ओर पुलिस की बर्बरता और दूसरी ओर पुलिस के मददगार होने के मामलों को देख रहे हैं। लेकिन पुलिस की बर्बरता अधिक देखने को मिल रही है और वह भी गरीबों के खिलाफ”।

मजिस्ट्रेटों की भूमिका और जवाबदेही के जवाब में जब पुलिस की ओर से अधिकार का दुरुपयोग किया जाता है, के सवाल पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि एक अत्याचार-विरोधी कानून लाने से पहले मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। हैदराबाद एनकाउंटर मामले का जिक्र करते हुए, जहां बलात्कार और हत्या के आरोपियों को पुलिस ने भागने की कथ‌ित कोशिश के आरोप में गोली मार दी ‌‌थी। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हमने कसाब का निष्पक्ष ट्रायल किया था, फिर उनका ट्रायल क्यों नहीं हुआ?” जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हैदराबाद एनकाउंटर मामले में काफी गड़बड़‌ियां हुई थीं।

जस्टिस गुप्ता ने कानूनी जवाबदेही पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई मजिस्ट्रेट यह कहकर कि उच्च न्यायालय को उसकी निगरानी करनी चाहिए क्योंकि उन्हें ऐसा करने का अधिकार है नियमों का उल्लंघन करता है तो उच्च न्यायालयों को कार्रवाई करने का अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है। अब सीआरपीसी की धारा 167 क्या कहती है? मजिस्ट्रेट तय करेगा कि किसी आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाए अथवा न्यायिक या पुलिस हिरासत में अभियुक्त को रिमांड पर लिया जाए या नहीं । उच्च न्यायालयों को कार्रवाई करने का अधिकार है। उन्हें ऐसा करना चाहिए, और अगर वे ऐसा करते हैं, तो बाकी सभी वैधानिक नियमों का पालन करने लगेंगे ।

जस्टिस गुप्ता ने कहा कि अत्याचार सिर्फ शारीरिक यातना नहीं है। यदि आप किसी व्यक्ति को मामूली कारणों से सलाखों के पीछे रखते हैं, तो यह भी अत्याचार है। दरअसल न्यायालय लोगों को जमानत देने के लिए अनिच्छुक होते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये तो अपराधी हैं, यह जेल में ही रहें। मुझे यह भी लगता है कि उच्च पदों पर आने के दौरान कुछ जवाबदेही होनी चाहिए।

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डॉ अश्विनी कुमार द्वारा दायर याचिका के संदर्भ में, जिसमें अत्याचार विरोधी कानून की मांग की गई थी, जिसे उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था, ज‌स्टिस गुप्ता ने कहा कि हालांकि यातना-विरोधी कानून की आवश्यकता के बारे में कोई सवाल नहीं है, ऐसा कानून केवल संसद ला सकती है न की उच्चतम न्यायालय । जस्टिस गुप्ता ने कहा कि न्यायालय केवल यह तय कर सकता है कि कानूनी क्या है और गैर कानूनी क्या है।

पुलिस की ज्यादती के मामले में मजिस्ट्रेटों की भूमिका और जवाबदेही के मुद्दे पर ज‌स्टिस गुप्ता ने कहा कि अत्याचार-रोधी कानून लाने से पहले मानसिकता में बदलाव की जरूरत है।

वेबिनार के अंत में उन्होंने कहा कि कानूनों में व्यापक सुधार से पहले पुलिस अधिकारियों को बेहतर प्रशिक्षण की जरूरत है। उन्होंने अपराधों की जांच के लिए पुलिस को बेहतर प्रशिक्षण देने की आवश्यकता पर भी बात की, ताकि पुलिसकर्मी अभियुक्तों के खिलाफ थर्ड डिग्री का प्रयोग न करें। वेबिनार में जस्टिस दीपक गुप्ता के अलावा पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री डॉ. अश्विनी कुमार और हिंदुस्तान टाइम्स की राष्ट्रीय राजनीतिक मामलों की संपादक सुनेत्रा चौधरी शामिल ‌‌थीं। संचालन एडवोकेट अव‌नि बंसल ने किया।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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