Wednesday, December 7, 2022

कांग्रेस की हल्लाबोल रैली: आगे बहुत लड़ाई है

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कांग्रेस द्वारा गत रविवार को राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में की गई हल्ला बोल रैली को नरेन्द्र मोदी सरकार की रीति-नीति के खिलाफ उसकी अब तक की रैलियों से इस अर्थ में अलग रेखांकित किया जा सकता है कि वह महंगाई व बेरोजगारी को लेकर सरकार पर हल्ला बोलने के अपने पूर्वघोषित एजेंडे तक ही सीमित नहीं रही। उसे सम्बोधित करने वाले ज्यादातर नेताओं ने देश की इनसे इतर कई ऐसी चिन्ताओं को भी स्वर दिया जो उसके निवासियों को कहीं ज्यादा मथ रही है।

इनमें सबसे बड़ी चिन्ता निस्संदेह लोकतंत्र के भविष्य से ही जुड़ी हुई है, जो विभिन्न संवैधानिक व विधिक संस्थाओं के सत्ता प्रायोजित क्षरण के चलते लगातार अंधेरा व काला होता जा रहा है। राहुल गांधी ने रैली में इसकी क्रोनोलाजी कुछ इस तरह समझाई: डरे हुए सत्ताधीश देश में भविष्य, महंगाई और बेरोजगारी से जुड़े डरों को लगातार बड़ा कर रहे हैं। इन डरों से नफरत और गुस्से का जन्म हो रहा है, जिससे लोग बंट रहे हैं और देश कमजोर हो रहा है।

उसके यों कमजोर होने का सारा दर्द आम आदमी को व सारा लाभ महज दो उद्योगपतियों को मिल रहा है। इन उद्योगपतियों व इनके द्वारा नियंत्रित मीडिया की बदौलत ही मोदी प्रधानमंत्री बने हुए हैं और अपने विरुद्ध कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने विपक्ष की आवाज तो दबा ही दी है, प्रायः सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को शक्तिहीन करके रख दिया है। इसलिए अब विपक्ष के पास जनता के पास जाने और उससे सीधा संवाद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। 

आगे उन्होंने कहा कि अब ‘भारत जोड़ो’ यात्रा में हम सीधे जनता के ही पास जायेंगे, उसकी आवाजें जोड़ेंगे और उसकी शक्ति से ‘राजा’ को सुनने को मजबूर करेंगे। उनकी इस क्रोनोलाजी की आलोचना करनी हो तो कहा जा सकता है कि इसका ‘ज्ञान’ उन्हें बहुत देर से प्राप्त हुआ है और जहां तक जनता के पास जाने का ही रास्ता बचने की बात है, तो यह स्थिति तो 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही बनी हुई है और 2019 के लोकसभा चुनाव में जनता के पास जाकर भी कांग्रेस उसे नहीं बदल पाई।

लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि यह क्रोनोलाजी गलत है या कि उसे सामने लाने में इतनी देर हो चुकी है कि वक्त हाथ से निकल गया है। वह निकल गया होता तो सत्ता पक्ष को इस हल्ला बोल रैली से इतना डर न सताता कि वह अपने समर्थक पत्रकारों से एडवांस में ऐसी अफवाह उड़ाने को कहे कि रैली को लेकर सकारात्मक ट्वीट करने वाले पत्रकारों को कांग्रेस की ओर से पैसे दिये गये हैं।

हां, कह सकते हैं कि जो समय उनके व उनकी पार्टी के सामने बरबस आ खड़ा हुआ है, उसका उन्होंने ठीक से इस्तेमाल नहीं किया तो कौन जाने लौटकर वापस चले जाने के बाद वापस आने में वह कितनी देर कर दे। यहां ‘ठीक से इस्तेमाल’ को ठीक से समण् लेना चाहिए। यह ‘ठीक से इस्तेमाल’ सिर्फ रैलियों में क्रोनोलाजी समझाने या ‘भारत जोड़ो’ जैसी यात्राएं निकालने से ही संभव नहीं होगा। हां, जैसे राहुल ने पहली बार स्पष्ट क्रोनोलाजी के साथ अपने कार्यकर्ताओं को निर्णायक संघर्ष का रास्ता दिखाने की कोशिश की है, वैसे ही पार्टी की नीतियां व कार्यक्रमों को भी स्पष्ट व पारदर्शी रूप देकर पार्टी के भीतर उन पर आम सहमति बनानी होगी। हताशा व निराशा के शिकार कार्यकर्ता इसके बगैर शायद ही उनकी रक्षा के प्रति खुद को सच्चे मन से समर्पित कर पायें। 

इस बात को यों समझ सकते हैं कि जब राहुल कहें कि मोदी सरकार की नीतियों का सारा फायदा दो उद्योगपतियों को ही मिल रहा है तो उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए कि कांग्रेस या उसके गठबंधन द्वारा शासित राज्यों की सरकारों की नीतियां उन उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाती न दिखें। दिखेंगी तो लोगों को ‘हाथी के खाने वाले दांत और, दिखाने वाले दांत और’ की कहावत तो याद आयेगी ही, कांग्रेस के अनेक पुराने नैतिक असमंजस भी याद आयेंगे।

इन असमंजसों के ही कारण भाजपा के राममन्दिर आन्दोलनकाल से ही वह बार-बार सौ जूते भी खाती रही है और सौ प्याज भी क्योंकि प्रायः दो टूक वैकल्पिक नजरिया अपनाने के बजाय अपनी धुरी पर ही एक कदम आगे और एक कदम पीछे करती रह जाती है। याद कीजिए, 2019 में पांच अगस्त को मोदी सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया तो भी किस तरह कांग्रेस कोई लाइन ले रही थी और उसके अनेक नेता कुछ और। इन नेताओं में कई ने तो सरकार के कदम के समर्थन से भी गुरेज नहीं किया था।

कहने का आशय यह कि अगर सत्ताधीशों की तथाकथित विचारधारा खतरनाक व नुकसानदेह होने के बावजूद लोगों को ‘सम्मोहित’ या उन पर इमोशनल अत्याचार करती है, तो अपने लोगों को उस अत्याचार के पार ले जाने के उपाय किये बिना उससे लड़ाई में जीत नहीं हासिल की जा सकती। ऐसे सैनिकों के भरोसे तो कतई नहीं जो युद्ध के बीच खुद ऐसे अत्याचार के शिकार हो जाते हों। शायद इसी के मद्देनजर पिछले दिनों राहुल ने कहा था कि कांग्रेस के ऐसे नेता या कार्यकर्ता जो राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ व भाजपा से वैचारिक संघर्ष में उतरते हुए डरते हैं, उसे छोड़कर जा सकते हैं और जो पहले से ऐसे संघर्ष में मुब्तिला हैं या उसमें योगदान करना चाहते हैं, वे कांग्रेस के बाहर भी हैं तो वह अपनों की तरह उनका स्वागत करेगी।

अभी किसी को नहीं मालूम कि अपने इस रवैये को लेकर राहुल कितने गम्भीर हैं या उसे हकीकत में बदलने चलेंगे तो कांग्रेस का क्या हाल हो जायेगा। अभी तो प्रतिद्वंद्वी भाजपा की मानें तो रैली में आये कांग्रेसियों को देश के लोकतंत्र, महंगाई या बेरोजगारी से ज्यादा चिन्ता राहुल गांधी की अध्यक्ष के रूप में रिलांचिंग की थी। ‘भारत जोड़ो’ यात्रा की तो वह यह कहर भी खिल्ली उड़ा रही है कि राहुल पहले कांग्रेस को तो जोड़कर दिखायें। दूसरी ओर जी-23 के नेताओं की चिन्ता यह है कि उनके नेतृत्व के खिलाफ अपने अभियान कैसे उसके अंजाम तक पहुंचायें।

स्वाभाविक ही यह बात सबको मालूम है कि राहुल के विकल्प बहुत सीमित हैं और नतीजा कुछ भी हो, इन विकल्पों को आजमाने के सिवाय उनके पास कोई और रास्ता भी नहीं है। क्योंकि अगर इस बार भूतपूर्व कहें या भावी अध्यक्ष के तौर पर वे अरसे से फूटग्रस्त कांग्रेस और उसके नेताओं व कार्यकर्ताओं को इसका अहसास नहीं करा पाये कि इस वक्त वे मजबूती से खड़े नहीं हुए तो कांग्रेस को आगे अपना अस्तित्व बचाने की जानें कितनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी, तो देश के भविष्य व इतिहास उन्हें माफ नहीं करने वाले। आखिरकार, जैसा कि पिछले दिनों एक प्रेक्षक ने कहा भी कि कांग्रेस भले ही गांधी परिवार या राहुल के पास है, वह उनकी नहीं देश की धरोहर है।

सवाल है कि इस धरोहर की रक्षा के लिए वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार से लड़़ाई कैसे , जीतेंगे, जब दुर्दिन में उन्हें छोड़कर गये ‘योद्धा’ ही उनसे बारम्बार ‘युद्धम देहि’ की मांग करते रहेंगे? इन ‘योद्ध़ाओं’ की मंशा को यों समझ सकते हैं कि गुलाम नबी आजाद ने जम्मू-कश्मीर में अपनी रैली के लिए वही दिन चुना, जो कांग्रेस ने दिल्ली में अपनी हल्ला बोल रैली के लिए तय कर रखा था। ऐसे में यह सवाल तो पूछा ही जायेगा कि क्या इसके बावजूद कांग्रेस जी-23 के गुलाम नबी की राह पर जाने को आतुर अपने नेताओं का कोई इलाज ढूंढ़ पाई है? और जवाब इसलिए जरूरी है कि अच्छे सेनापति कोई भी लड़ाई शुरू करने से पहले अपने अस्त्रों-शस्त्रों व सेनाओं को ठीक से सहेज लेते हैं-उनकी निष्ठा को भी। वरना हमारा अतीत गवाह है कि बिगड़ैल हाथी दुश्मन से यु़द्ध के वक्त हिम्मत हारकर पीछे मुड़कर लौटने लगते हैं तो अपनी ही सेना को कुचल डालते हैं।  

(कृष्ण प्रताप सिंह जनमोर्चा के संपादक हैं और आजकल फैजाबाद में रहते हैं।)

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