Monday, October 18, 2021

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बिहारः जाति से बाहर निकलने की छटपटाहट

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बिहार के चुनाव रोचक और दिलचस्प हो गए हैं। इसकी वजह यह नहीं है कि तेजस्वी का महागठबंधन नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए को पछाड़ने की स्थिति में है और लंबे समय से चले आ रहे शासन के जाने के संकेत मिल रहे हैं। इसकी वजह यह है कि ये चुनाव पिछले सालों के चुनावों से भिन्न हैं। इसमें अचानक वे मुद्दे मुख्य हो गए हैं, जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति ने अब तक हाशिए पर रखा हुआ था। लंबे समय के बाद गैर-वाम पार्टियों ने नारे की राजनीति से बाहर आकर विचारों की राजनीति की ओर रुख किया है। भाजपा-जेडीयू को छोड़ कर सभी पार्टियां यह समझ चुकी हैं कि जातियों का घेरा तोड़ कर ही बिहार को कंगाली से बचाया जा सकता है। जातियों की गोलबंदी अगर टूट गई तो बिहार में एक नई राजनीति शुरू हो सकती है, जिसमें पूरे देश को प्रभावित करने की ताकत होगी। 

मनमोहन सिंह की कॉरपोरेट समर्थक नीति नरम थी। इसे मोदी सरकार ने एकदम आक्रामक बना दिया है। सरकार का असली चेहरा कोरोना महामारी के समय सामने आया जब मुंबई तथा बड़े शहरों से प्रवासी मजदूर अपने घर की ओर पैदल भागे और  केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार, दोनों में से किसी ने उनकी सुध नहीं ली। यही नहीं, कोरोना से लड़ने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों को कम से कम आर्थिक सहायता दी और थाली पीटने से लेकर, दीया जलाने के कार्यक्रमों के जरिए लोगों का ध्यान बंटाए रखा। उसने फूल बरसाने जैसे भोंडे कार्यक्रम किए, लेकिन महामारी के आतंक के बीच सरकार ने दवा की कंपनियों तथा निजी अस्पतालों पर अपनी कृपा बदस्तूर बनाए रखी और कमाई की छूट दी। महामारी से आई मंदी से मुकाबले के लिए भी उसने 20 लाख करोड़ रुपये के जिस राहत पैकेज का एलान किया, वह फर्जी था। सरकार ने बजट में तय खर्च फिर से गिना दिए।

कोरोना महामारी में भी सरकार ने अपने पसंदीदा अभियानों को चलाए रखा। ये अभियान थे- देशी-विदेशी कंपनियों को लूट की खुली छूट देने, रेलवे समेत दूसरी सरकारी कंपनियों को बेचने और मजदूरों को सुरक्षा देने वाले कानूनों को खत्म करने के अभियान। कॉरपोरेट के हाथ में देश के संसाधन सौंप डालने की नीति के तहत उसने खेती से संबंधित कानून भी बदल डाले, ताकि कॉरपोरेट खेती का रास्ता बने और अनाज का व्यापार कॉरपोरेट कंपनियों के हाथ में चला जाए।

इस दौर में मानवाधिकारों के दमन तथा जांच एजेंसियों का इस्तेमाल विरोधियों के दबाने के लिए करने की मोदी सरकार की तानाशाही भी सामने आती रही है। ऐसे समय में, बिहार के चुनाव लोगों के मुद्दे उठाने का एक बड़ा मौका लेकर आए थे और इसमें शक नहीं है कि विपक्षी पार्टियों ने इस जिम्मेदारी को उठाने का साहस दिखाया है। वामपंथी पार्टियां इन मुद्दों को लगातार उठाती ही रही हैं, लेकिन आरजेडी तथा कांग्रेस जैसी पार्टियां इस मामले में कमजोर साबित होती रही हैं।

कांग्रेस इन मुद्दों को उठाने में सदैव हिचकती रही है। वह भी इन्हें इस बार आगे बढ़ कर उठा रही है। दस लाख सरकारी नौकरियां देने के महागठबंधन के वादे ने राजनीति को एक नई दिशा ही दे दी है। सरकारी नौकरी देने के इस वादे ने निजी क्षेत्र बनाम सरकारी क्षेत्र की बुनियादी बहस को केंद्र में ला दिया है। इस पुरानी बहस से विश्व बैंक तथा आईएमएफ के इशारे पर चलने वाली आर्थिक नीतियों को लेकर गैर-वामपंथी पार्टियों के बीच जो आम सहमित बनी थी, वह टूट गई है।

कांग्रेस से लेकर भाजपा तथा समाजवादी पार्टी से लेकर बहुजन समाज पार्टी तक यही मानने लगी हैं कि निजीकरण ही विकास का एकमात्र रास्ता है। विकास की इन नीतियों ने उन्हें व्यवहारिक स्तर पर कॉरपोरेट का हिस्सेदार बना दिया। अब उन्हें कोयला खदान, हवाई अड्डा, बंदरगाह बेचने के लिए चोरी-छिपे फैसला लेने की जरूरत नहीं है।  वे आर्थिक सुधारों के नाम पर कुछ भी कर सकती हैं। जाहिर है कि यह इन पार्टियों की अमीरी का सबसे बेहतर जरिया बन गया है।

वामपंथी पार्टियां छोड़ कर इस कॉरपोरेट-लीला का आनंद सभी पार्टियां लेने लगी हैं।  सरकार यानी सताधारी पार्टी गरीब लोगों को मुफ्त गैस सिलेंडर और जनधन खाते में कुछ पैसे दे सकती हैं, लेकिन रोजगार नहीं। उसे ऐसे गरीबों की फौज चाहिए जो इस पैसे की एवज में उसका वफादार बन कर रहे। इसलिए मोदी सरकार ने मनरेगा में प्रवासी मजदूरों को काम नहीं दिया, लेकिन कुछ लोगों को मुफ्त राशन जरूर दे दिया। सरकारी नौकरियां देना नकारा बन गए सरकारी क्षेत्र में भरोसा कायम करने का बेहतरीन तरीका साबित हो सकता है।

यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब शिक्षा तथा स्वास्थ्य निजी क्षेत्रों के चरागाह बन गए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सरकारी अस्पतालों को बेहतर बनाने तथा सरकारी स्कूलों को ठीक करने की बात करते रहे हैं, लेकिन इसे वह एक ठोस कार्यक्रम की शक्ल नहीं दे पाए थे। सरकारी नौकरियों के वादे का मतलब ही होता है कि अस्पतालों तथा स्कूल-कालेजों को बेहतर बनाना, क्योंकि ज्यादातर नौकरियां स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्रों में ही हैं।

समान काम के लिए समान वेतन और नौकरियों में ठेके की प्रथा के खात्मे तथा ठेके पर काम कर रहे कर्मचारियों को स्थायी करने के मुद्दे भी ऐसे हैं, जो पिछले तीस साल के दौर में सिर्फ मजदूर संगठनों तथा वामपंथी पार्टियों के नारों में ही सुनाई देते थे। पुरानी पेंशन योजना का मुद्दा भी देश भर के कर्मचारी संगठन उठा रहे हैं, लेकिन इसे मानने के लिए सरकार तैयार नहीं है। बिहार के महागठबंधन ने इसे चुनावी मुद्दा बना दिया है। ये सारे मुद्दे कॉरपोरेट समर्थक आर्थिक नीतियों से सीधे टकराव की घोषणा हैं। ऐसी खुली घोषणा चुनावों में सालों बाद दिखी है।

बिहार के संदर्भ में ये वादे इस वजह से भी महत्वपूर्ण हैं कि इस राज्य में उद्योग नहीं हैं और सरकार ही संगठित क्षेत्र का रोजगार दे सकती है। बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश से पढ़ाई के लिए छात्रों के बाहर जाने से जो धन गंवाया जा रहा है, वह भी प्रदेश में रुकेगा। बिहार से सिर्फ मजदूरों का नहीं बल्कि धन का पलायन भी होता है।

भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र में कॉरपोरेट समर्थक नीतियों से उसके चिपके रहने की मजबूरी का अंदाजा होता है। इसमें सरकारी नौकरियों के वायदे नहीं हैं। इसमें आईटी हब खोलने तथा इसके जरिए पांच लाख रोजगार की बात कही गई है। इसी तरह खेती आधारित उद्योगों में दस लाख रोजगार पैदा करने की बात की गई है। दोनों ही वादे निजी हाथों से संचालित अर्थव्यवस्था को चलाए रखने की उसके संकलप के हिस्सा हैं।

कॉरपोरेटी अर्थव्यवस्था और सरकार नियंत्रित अर्थतंत्र की इस लड़ाई को वाम दल, कांग्रेस तथा आरजेडी अपने-अपने तरीके से लड़ रहे हैं। वाम दल अगर मोदी सरकार की नीतियों का सीधा विरोध करते हैं तो राहुल गांधी इसे अडानी-अंबानी की कठपुतली बता रहे हैं, लेकिन चुनाव की यह कहानी इससे पूरी नहीं होती हैं। यह तो तेजस्वी के इस कथन से पूरी होती है कि अब बिहार में आर्थिक न्याय की जरूरत है। उनका कहना है कि यह सामाजिक न्याय से आगे का दौर है। इस तरह वह सामाजिक न्याय पर अटकी बिहार की राजनीति को एक नए दौर में ले जाने की कोशिश में है। वह हर सभा में कहते हैं कि उनकी सरकार जाति तथा धर्म से उठ कर काम करेगी। उन्होंने गठबंधन तथा टिकट के बंटवारे में इसे दिखाया भी है।

मोदी-अमित शाह तथा नीतीश कुमार चुनाव को धर्म तथा जाति के समीकरण में बांधे रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। कॉरपोरेट समर्थक नीतियां सामजिक विभाजन के बगैर नहीं चल सकती हैं। यह काम वीआईपी पार्टी तथा हिंदुस्तानी अवामी मोर्चा के जरिए किया जा रहा है। इसी वजह से भाजपा ने चिराग पासवान को अप्रत्यक्ष समर्थन दे रखा है। सवर्णों तथा अति पिछड़ी जातियों का समीकरण तो नीतीश तथा भाजपा ने पहले से बनाए रखा है। भाजपा सांप्रदायिक विभाजन की कोशिश भी कर रही है। देखना है कि मतदाता जाति और संप्रदाय के विभाजन से कितना अलग होते हैं और कॉरपोरेट समर्थक नीतियों के मुकाबले सरकारी क्षेत्र के हाथ में अर्थतंत्र की नीति को चुनते हैं।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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