Friday, October 22, 2021

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सामाजिक न्याय के आईने में बिहार की बदलती राजनीति

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बिहार चुनाव के बाद नई सरकार बन चुकी है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन सत्ता से कुछ कदम पीछे रह गया। भाजपा ने ताकत बढ़ा ली है, नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने हैं, लेकिन बड़े भाई की हैसियत में नहीं रह गये हैं। इस चुनाव, उसके परिणाम व नई सरकार के गठन ने बिहार में आगे की राजनीति के लिहाज से खास संकेत दिया है। जरूर ही बिहार की राजनीति बदल रही है। इस बदलाव को मंडल-कमंडल के दौर और जाति-धर्म के दायरे से राजनीति के बाहर निकलने के बतौर रेखांकित किया जा रहा है। जोर-शोर से चर्चा चल रही है कि इस बार के चुनाव के केन्द्र में रोजगार, विकास, भ्रष्टाचार सहित जनता का बुनियादी एजेंडा रहा है। यह एजेंडा जनता व जन संघर्षों ने तय किया है। बेशक, इस चुनाव के साथ बिहार की राजनीति एक नया मोड़ ले रही है। लेकिन, अहम सवाल है कि दिशा क्या है?

खास बात है कि बहुजनों का विशिष्ट एजेंडा-सामाजिक न्याय चुनाव का एजेंडा नहीं बना। जबकि आज भी राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े बता रहे हैं कि शासन-सत्ता की संस्थाओं, उच्च शिक्षा के संस्थानों से लेकर जीवन के तमाम क्षेत्रों में सवर्ण वर्चस्व बना हुआ है। 2014 के बाद यह वर्चस्व आगे ही बढ़ा है तो दूसरी ओर सामाजिक न्याय पर जारी चौतरफा हमले के बीच आबादी के अनुपात में आरक्षण लागू करने व असंवैधानिक क्रीमी लेयर का प्रावधान खत्म करने, प्रोन्नति में आरक्षण, बैकलॉग भरने, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति सहित मीडिया व निजी क्षेत्र में आरक्षण के साथ ही धन-धरती में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी जैसे बहुत ही स्पष्ट व ठोस सवाल लंबे समय से लंबित हैं। ओबीसी के संदर्भ में सामाजिक न्याय के ठोस उपाय बताने वाले मंडल कमीशन की केवल सरकारी सेवाओं व उच्च शिक्षा संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के सिवा शेष सिफारिशें ठंडे बस्ते में ही रह गई हैं।

बढ़ते ब्राह्मणवादी हमले के खिलाफ नये सिरे से आगे बढ़ रहे बहुजन आंदोलन की ओर से भी इन लंबित सवालों को उठाया जाता रहा है। लेकिन,सामाजिक न्याय के संघर्षों व मंडल राजनीति के महत्वपूर्ण केन्द्र-बिहार के चुनाव में सामाजिक न्याय पर जारी हमले सहित इन सवालों पर चर्चा तक नहीं हुई। भाजपा और कांग्रेस को तो छोड़ ही दीजिए, मंडलवादी धारा की राजनीतिक पार्टियों-नेताओं ने भी सामाजिक न्याय के एजेंडा पर चुनाव में चर्चा नहीं की। इन पार्टियों के घोषणापत्र में भी उल्लेखनीय तौर पर ये सवाल मौजूद नहीं रहे। मंडल धारा में भी बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय का पर्याय और मंडल मसीहा कहे जाने वाले लालू यादव की पार्टी-राजद भी सामाजिक न्याय के एजेंडा से पीछे हट गई। नये नेता तेजस्वी यादव ने तो चुनाव के पहले से ही बार-बार कहना जारी रखा कि ‘लालू जी ने सामाजिक न्याय किया, हम आर्थिक न्याय करेंगे।’ चुनाव के दरम्यान तेजस्वी यादव की जुबान पर ‘आरक्षण’ जैसे शब्द भी नहीं चढ़े।

राजद और महागठबंधन के चुनावी घोषणापत्र से आरक्षण-सामाजिक न्याय गायब ही थे। हां, राजद के घोषणापत्र में राज्य की नौकरियों में 85 प्रतिशत बिहारियों के आरक्षण की बात जरूर आई। कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं की जुबान तो इन सवालों पर खुलना मुश्किल ही है। चुनाव के बीच एक सभा में भले ही नीतीश कुमार ने प्रसंगवश आबादी के अनुपात में आरक्षण और जाति जनगणना की चर्चा की, जिस पर उनके सहयोगी भाजपा के नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरक्षण के बारे में स्पष्ट रूप से कहा है कि भाजपा कानून के अलावा कुछ नहीं करने जा रही है। वह कानून के दायरे में ही आरक्षण के संबंध में हर निर्णय लेगी। लेकिन तेजस्वी यादव सहित एनडीए विरोधी गठजोड़ों के किसी दलित-पिछड़े नेता ने इसके बाद भी जुबां नहीं खोली। स्पष्ट संकेत है कि बिहार की राजनीति सामाजिक न्याय को छोड़ते हुए नया मोड़ ले रही है।

उल्लेखनीय है कि पिछले ही विधानसभा चुनाव-2015 में मंडल धारा के दो शीर्षस्थ नेता लालू यादव और नीतीश कुमार ने मिलकर भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन को धूल चटाया था और चुनाव के केन्द्र में सामाजिक न्याय रहा था। लालू यादव ने मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा के बयान को चुनाव का एजेंडा बना दिया था। मंडल राज-2 की बात करते हुए जाति जनगणना, आरक्षण बढ़ाने जैसे सवालों को प्रमुखता से उठाया था। राजद-जद(यू) की साझा सरकार बनी थी, तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने थे। लगभग 2 वर्ष में ही गठबंधन टूट गया और राजद सत्ता से बाहर हो गया।

अब 5 वर्ष के बाद 2020 के चुनाव में सामाजिक न्याय के एजेंडा पर चर्चा तक नहीं हुई और राजद के एजेंडा से भी बाहर हो गया। जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तक तेजस्वी यादव भी आरक्षण बढ़ाने, असंवैधानिक क्रीमी लेयर के खात्मे और जाति जनगणना जैसे सवालों पर जुबां चलाते रहे हैं। अब 2020 के चुनाव में सामाजिक न्याय को छोड़कर आर्थिक न्याय की बात कर रहे हैं। तो क्या बिहार के परिदृश्य में सामाजिक न्याय का एजेंडा महत्वहीन हो गया है? सामाजिक न्याय को छोड़कर आर्थिक न्याय की बात करने और चुनाव के परिदृश्य से सामाजिक न्याय के गायब होने के क्या राजनीतिक मायने हैं? क्या बिहार की राजनीति उत्तर मंडल दौर में प्रवेश कर रही है?

चुनाव के बीच ही बिहार में मंडल दौर में आए परिवर्तन पर चर्चित बुद्धिजीवी क्रिस्टोफ़ जैफरलोट का एक आर्टिकिल 4 नवंबर, 2020 को इंडियन एक्सप्रेस में ‘व्हाट मंडल मिस्ड’ शीर्षक से छपा है। जिसमें लेखक बताते हैं कि वास्तव में, बिहार में राजनीतिक सत्ता निचली जातियों के पास है जबकि आर्थिक अधिशेष और नौकरशाही का शासन सवर्णों के साथ निर्णायक रूप से बना हुआ है। वे बताते हैं कि यदि ओबीसी को राजनीतिक शक्ति और वेतनभोगी नौकरियों के मामले में बिहार के तथाकथित “मंडलीकरण” से लाभ हुआ है, तो उन्होंने अन्य डोमेन में ज्यादा कमाई नहीं की है। सवर्णों द्वारा मुख्य रूप से ग्रामीण समाज की अधिकांश भूमि पर नियंत्रण रखने के पक्ष में वे मानव विकास संस्थान द्वारा किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े पेश करते हुए बताते हैं कि 2009 में भूमिहारों के पास प्रति व्यक्ति सबसे अधिक भूमि 0.56 एकड़ थी, उसके बाद कुर्मी के पास 0.45 एकड़।

भूमिहारों के पास यादवों की तुलना में दोगुना और अधिकांश पिछड़ी जातियों के पास मौजूद औसत भूमि की तुलना में चार गुना था। आगे उन्होंने आईएचडीएस के अंतिम दौर के आंकड़े पेश करते हुए बताया है कि ब्राह्मण औसत प्रति व्यक्ति आय में 28,093 रुपये के साथ शीर्ष पर रहे, इसके बाद अन्य उच्च जातियों ने 20,655 रुपये, जबकि कुशवाहा और कुर्मियों ने क्रमशः 18,811 रुपये और 17,835 रुपये कमाए। इसके विपरीत, यादवों की आय ओबीसी में सबसे कम 12,314 रुपये है,जो ओबीसी के 12,617 रुपये की तुलना में थोड़ा कम है। इसी प्रकार, जबकि 2011-12 में ब्राह्मणों के बीच स्नातकों का प्रतिशत 7.5 था, उसके बाद अन्य उच्च जातियों में 7 प्रतिशत, कुर्मियों में यह केवल 5.3 प्रतिशत, कुशवाहा के बीच 4.1 प्रतिशत और यादवों में 3 प्रतिशत था। उनके अनुसार, उच्च जातियों का अभी भी राज्य सत्ता पर निर्णायक नियंत्रण है….बिहार में नौकरशाही अभी भी उच्च जातियों द्वारा नियंत्रित है। इसके पक्ष में अपने लेख में क्रिस्टोफ़ जैफरलोट ब्राउन विश्वविद्यालय में पोलोमी चक्रवर्ती द्वारा एक अप्रकाशित डॉक्टरेट थीसिस से आंकड़े उद्धृत करते हुए बताते हैं कि राज्य सेवाओं से आईएएस में भर्ती होने वाले औसतन 74 प्रतिशत अधिकारी उच्च जातियों से हैं,11 प्रतिशत ओबीसी और एससी के बीच से 4.3 प्रतिशत हैं।

क्रिस्टोफ़ जैफरलोट द्वारा मंडल दौर में अभी तक के परिवर्तन की पेश तस्वीर से स्पष्ट है कि मंडल दौर में सामाजिक न्याय के मोर्चे पर उपलब्धियां हैं। लेकिन, साफ है कि धन-धरती, ज्ञान व राजपाट में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी का सवाल आज भी बना हुआ है। यह भी सच है कि सीमित उपलब्धियां भी पिछड़ों की खास जातियों तक सीमित है। राजनीतिक ताकत हासिल करने के मामले में कुछ खास ओबीसी जातियों को छोड़कर अति पिछड़े-पसमांदा आज भी पीछे हैं। तमाम तथ्य व आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि आज भी भारत का सामाजिक- आर्थिक-राजनीतिक जीवन ब्राह्मणवादी वर्ण-जाति व्यवस्था के अनुरूप ही चल रहा है। बिहार भी कोई ऐसा टापू तो नहीं ही हो सकता है, जहां सामाजिक न्याय का प्रश्न महत्वहीन हो जाए। फिर भी सामाजिक न्याय को छोड़कर आर्थिक न्याय की बात सामाजिक न्याय विरोधी ही कर सकता है।

ब्राह्मणवाद व पूंजीवाद के गठजोड़ के परिदृश्य में सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय का प्रश्न अलग-थलग हल हो भी नहीं सकता है। बिहार चुनाव में सामाजिक न्याय के गायब होने के राजनीतिक मायने समझने के लिए सामाजिक न्याय के आईने में 2014 से शुरु ‘मोदी काल’ को देखना होगा।

चौतरफा बढ़ते ब्राह्मणवादी सवर्ण वर्चस्व के बीच संविधान के सामाजिक न्याय की बुनियाद पर सबसे बड़ा प्रहार करते हुए आर्थिक आधार पर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर वर्चस्व की गारंटी करने के साथ एससी-एसटी व ओबीसी आरक्षण पर लगातार हमला जारी है। राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल नामांकन में ओबीसी के सीटों की लूट चल रही है तो आरक्षण में आर्थिक आधार को घुसेड़ते हुए पूर्व में लागू किए अवैधानिक क्रीमी लेयर को पुनर्परिभाषित करने के जरिए ओबीसी आरक्षण को बेमतलब बनाने की साजिश हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ब्राह्मणवादी चरित्र को सामने लाते हुए आरक्षण के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। आरक्षण के मौलिक अधिकार नहीं होने से लेकर जरूरतमंदों तक फायदा नहीं पहुंचने के बहाने आरक्षण के समीक्षा की बात कर रही है। एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर लागू करने की साजिश हो रही है।

ब्राह्मणवादी जातीय हिंसा में भी उछाल आया है। संपूर्णता में सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक जीवन में ब्राह्मणवादी सवर्ण वर्चस्व आगे बढ़ रहा है। इस परिदृश्य में सामाजिक न्याय को छोड़कर आर्थिक न्याय पर बात करने और सामाजिक न्याय के एजेंडा के गायब होने का राजनीतिक मायने स्पष्ट हो जाता है। खासतौर से भाजपा-आरएसएस से लड़ने का दावा करने वाली मंडल राजनीति अंतिम तौर पर ब्राह्मणवादी सवर्ण शक्तियों के मातहत हो गई है। 90 के बाद राजनीति की धुरी सामाजिक न्याय रहा है, बहुजनों की ओर राजनीति झुकी रही है। लेकिन इस चुनाव ने साफ कर दिया है कि अब सत्ता के इर्द-गिर्द चलने वाली राजनीति सवर्णों की ओर निर्णायक तौर पर झुक गई है। इसी की अभिव्यक्ति है कि विधानसभा में सवर्ण प्रतिनिधित्व 2015 की अपेक्षा 5 प्रतिशत बढ़ गया है।

मंडल उभार के चार बड़े चेहरों में लालू यादव और रामविलास पासवान की ओर से इनकी संतानों ने राजनीति का मोर्चा संभाल लिया है। लेकिन,मंडल धारा का वारिस बनने से इंकार कर दिया है। तेजस्वी यादव ने खुले तौर पर ‘ए टू जेड’ की बात करते हुए चुनाव पूर्व ही ब्राह्मणवादी सवर्ण शक्तियों के समक्ष पूर्ण समर्पण का ही एलान किया था। इसलिए वे लालू-राबड़ी के 15 वर्षों की गलतियों के लिए बार-बार चुनाव पूर्व माफी मांग रहे थे। सामाजिक न्याय को पूरा हुआ मानकर लालू यादव के हिस्से में डालकर मंडल का लेबल और सामाजिक न्याय का आवरण राजद के ऊपर से हटाते हुए वे आगे बढ़ रहे हैं। मंडल राजनीति की धारा के बतौर राजद को आगे बढ़ाने से साफ तौर पर इंकार कर दिया है।

रामविलास पासवान की मृत्यु चुनाव की घोषणा के बाद हुई है, उन्होंने पहले ही बेटे चिराग पासवान को पार्टी की कमान सौंप दी थी। चुनाव में चिराग पासवान मोदी के ‘हनुमान’ के बतौर नीतीश कुमार के खिलाफ लड़ते हुए ‘बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट’ के साथ ‘बिहारी पहचान’ को बुलंद कर रहे थे। शरद यादव बीमार हैं, उनकी बेटी मंडल धारा की किसी पार्टी से नहीं, कांग्रेस से चुनाव में उतरी हुई थी। नीतीश कुमार खुद मैदान में हैं। लेकिन आरएसएस पृष्ठभूमि के एक वैश्य समुदाय के पुरुष तो दूसरी अति पिछड़ी जाति की महिला-दो उपमुख्यमंत्रियों के बीच उनका मुख्यमंत्री के बतौर चेहरा टांग दिया गया है।

बिहार-यूपी में लंबे समय से कहा जाता रहा है, कमंडल को मंडल ही रोकेगा। लेकिन अब कमंडल और मंडल के बीच अंतिम तौर पर सामाजिक न्याय की विभाजन रेखा मिट गई है। बिहार की राजनीति कमंडल के मैदान में सिमट गयी है।

(रिंकु यादव एक्टविस्ट हैं। और आजकल भागलपुर में रहते हैं।)

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