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भाजपा अरुणाचल जैसा ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ अब बिहार में भी करेगी!

बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में चौंकाने वाला बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। वजह यह है कि अभी तक कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के विधायकों-सांसदों को तोड़ कर अपने पाले में ला रही भारतीय जनता पार्टी ने अब यही खेल अपने सहयोगी दलों के साथ भी खेलना शुरू कर दिया है। इस सिलसिले में उसने पहला शिकार उस जनता दल (यू) को बनाया है, जिसके नेतृत्व में वह बिहार में सत्ता की साझेदार बनी हुई है। अपने इस सबसे बड़े और दो दशक पुराने सहयोगी दल को भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में तगड़ा झटका देते हुए उसके 7 में से 6 विधायकों को तोड़ लिया है।

बिहार के बाद अरुणाचल ही ऐसा राज्य है जहां पर जनता दल (यू) को अपने पैर जमाने में कामयाबी मिली थी। 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ ही अरुणाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में जनता दल (यू) को 7 सीटें मिली थीं, जबकि 60 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा ने 41 सीटें जीती थीं। अब राज्य विधानसभा में भाजपा के 48 सदस्य हो गए हैं, जबकि जनता दल (यू) का सिर्फ एक विधायक रह गया है। कांग्रेस और नेशनल पीपुल्स पार्टी के 4-4 विधायक हैं।

अरुणाचल का यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में चौंकाने वाली घटनाओं के साथ बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है। अरुणाचल में भाजपा की सरकार को दो तिहाई बहुमत पहले से ही हासिल था। जनता दल (यू) का भी समर्थन उसे हासिल था। ऐसे में उसे किसी अन्य पार्टी के विधायकों को तोड़ने की कतई जरुरत नहीं थी, लेकिन फिर भी उसने अपने ही सहयोगी दल के विधायकों से दलबदल कराया है तो इसका मतलब साफ है कि उसे अब जनता दल (यू) की राजी-नाराजी की कोई परवाह नहीं है।

उसे इस बात की भी परवाह नहीं है कि उसका यह पुराना और सबसे बड़ा सहयोगी एनडीए का हिस्सा बना रहता है या नहीं। इसलिए अगर आने वाले दिनों में वह बिहार में भी नीतीश कुमार पर सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए उनकी पार्टी के विधायकों को बड़ी संख्या में तोड़ती है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। वहां कांग्रेस के भी कुछ विधायक भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं।

दरअसल, समूचे उत्तर भारत में बिहार ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां भाजपा सत्ता में भागीदार तो कई बार रही है और आज भी है लेकिन वह अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है। हालांकि वहां हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा पहली बार अपने गठबंधन यानी एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। लेकिन इसके बावजूद कुछ मजबूरियों के चलते उसे मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार को स्वीकार करना पड़ा है, जिनकी पार्टी का प्रदर्शन इस बार बेहद खराब रहा है।

बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले तक एनडीए में जनता दल (यू) सबसे बड़ी पार्टी थी, इसलिए वहां नीतीश कुमार का ही सिक्का चलता था। वहां नीतीश अभी भी मुख्यमंत्री तो हैं लेकिन अब वे पूरी तरह भाजपा की दया और कृपा पर निर्भर हैं। भाजपा भी शुरू दिन से नीतीश कुमार को उनकी ‘हैसियत’ बता रही है।

उसने सबसे पहले तो नीतीश के न चाहते हुए भी अपनी पार्टी के नेता सुशील कुमार मोदी को बिहार की राजनीति से हटा कर दिल्ली भेजा। सुशील मोदी लंबे समय से नीतीश कुमार की सरकार में उप मुख्यमंत्री थे। उन्हें भाजपा में नीतीश का सबसे प्रबल समर्थक और भरोसेमंद माना जाता था। सुशील मोदी को दिल्ली भेजने के साथ ही भाजपा ने संघ पृष्ठभूमि वाले दो नेताओं को उप मुख्यमंत्री बनाया। उसने नीतीश के ही भरोसेमंद और पिछली सरकार में मंत्री रहे अपने दो अन्य नेताओं नंदकिशोर यादव और प्रेमकुमार को भी इस बार मंत्री नहीं बनाया। यही नहीं, जनता दल (यू) के कोटे से मंत्री बनाए गए कई मामलों के आरोपी मेवालाल आर्य से शपथ ग्रहण के एक सप्ताह के भीतर ही इस्तीफा दिलवाने के लिए भी नीतीश कुमार को मजबूर कर दिया। महत्वपूर्ण विभागों को लेकर भी दोनों दलों के बीच काफी खींचतान है, जिसकी वजह से नीतीश कुमार अपनी मंत्रिपरिषद का विस्तार भी नहीं कर पा रहे हैं।

विचारधारा के आधार पर भी कई मुद्दों पर जनता दल (यू) का रुख भाजपा से अलग रहा है। खासकर नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर एनआरसी के मुद्दे पर तो चुनाव प्रचार के दौरान भी भाजपा नेताओं के बयानों के खिलाफ नीतीश ने सख्त तेवर दिखाए थे। लेकिन अब वे ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं। तथाकथित ‘लव जिहाद’ के खिलाफ उत्तर प्रदेश जैसा कानून बनाने के लिए भी भाजपा के नेता नीतीश पर दबाव बना रहे हैं।

दरअसल बिहार में जनता दल (यू) और भाजपा के रिश्तों में खटास विधानसभा चुनाव के दौरान ही आ गई थी, जब चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने एनडीए से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। उन्होंने अपने ऐलान के मुताबिक अकेले चुनाव लड़ा भी लेकिन सिर्फ जनता दल (यू) के कोटे की सीटों पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए। चुनाव प्रचार के दौरान भी चिराग पासवान पूरे समय नीतीश कुमार पर ही गंभीर आरोपों के साथ निशाना साधते रहे और साथ ही खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान भी बताते रहे।

चिराग के इस पैंतरे को भी भाजपा की रणनीति का ही हिस्सा माना गया। खुद नीतीश कुमार भी भाजपा के इस दांव को महसूस कर रहे थे। लेकिन उनके सामने इसे बर्दाश्त करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। बहरहाल भाजपा की यह रणनीति कामयाब रही। करीब 30 सीटों पर लोक जनशक्ति पार्टी की वजह से जनता दल (यू) को हार का सामना करना पड़ा। इसी नुकसान की वजह से ही वह भाजपा से काफी पिछड़ गई।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अरुणाचल में भाजपा की ओर से मिले इस झटके का सामना बिहार में नीतीश कुमार किस तरह करते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपनी पार्टी के विधायकों को एकजुट रखना और अपनी पार्टी को भाजपा की ओर से हो सकने वाली तोड़फोड़ की कार्रवाई से बचाना। यह चुनौती आसान नहीं है। भाजपा अगर बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए वहां भी अरुणाचल का किस्सा दोहराती है तो उसे जनता दल (यू) के 43 में से कम से कम 29 और कांग्रेस के 19 में से 13 विधायकों को तोड़ना होगा।

ऐसा करने में अगर वह सफल रहती है तो उसके लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा। हालांकि जनता दल (यू) के महासचिव और प्रवक्ता केसी त्यागी ने अरुणाचल के घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है और साथ ही बिहार की राजनीति पर इसका असर पड़ने की संभावना से इंकार किया है। लेकिन उनकी यह उम्मीद कितनी भोली और बेचारगी भरी है, इसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अंदाज-ए-सियासत को देखते हुए आसानी से समझा जा सकता है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 26, 2020 7:12 pm

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