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कोरोना लॉकडाउन : मजदूर वर्ग के सामने मौजूद कार्यभार

आज जब देश का मजदूर वर्ग-खासकर प्रवासी या सीजनल मजदूर, दिहाड़ी मजदूर, ठेका मजदूर, ठेले खोमचे वाले, छोटे सर्विस दाता जैसे- नाई, धोबी, बिजली मैकेनिक, प्लम्बर इत्यादि और खेत मजदूर- केंद्र और राज्यों की अपनी चुनी हुई सरकारों की बेरहमी के शिकार हैं; इस अमानवीय और क्रूर शासन व्यवस्था- डीएम, एसडीएम, एसएचओ, थाना पुलिस और कोर्ट कचहरी के संवेदनशून्य रवैये, दमन और उत्पीड़न से जूझते हुए, सड़क-दुर्घटनाओं और भूख से जान गँवाते अपने घर पहुँचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं; देश का सत्ता-प्रतिष्ठान और हमारे ‘आका’ मोदी जी इस सबकी तरफ से आँखें मूंद कर खुद को दुनिया की महाशक्तियों के समकक्ष देखने की आत्ममुग्ध ख्वाहिश में 20 लाख करोड़ के फर्जी पैकेज का धारावाहिक ऐलान करवा रहे हैं- जिस पर किसी को भी यकीन है,

ऐसा नहीं लगता। मोदी भक्त लोग भले ही इन सरकारी घोषणाओं पर यकीन कर लें और भले ही गोदी मीडिया उन पर बहसें दिखाकर सरकार की दरियादिली से लोगों को कायल करने की कोशिश करे- लेकिन देश के आमजन, देश के मेहनतकशों और मजदूर वर्ग को पिछले 40 दिनों के अनुभव से सिखा दिया है कि सरकार और उसकी झूठी घोषणाओं पर यकीन करके बैठे रहने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर ही चुकानी पड़ेगी- इसलिए वे सड़कों पर हैं, अपने गाँव की ओर लौट रहे हैं।

उन्हीं गाँवों की ओर जहाँ से निकलकर बेहतर कल की तलाश में वे शहरों में आए थे। वही शहर जो कल तक भारतीय पूँजीवाद की बढ़ती ताकत के प्रतीक थे, जिन्हें रोजगार के अच्छे अवसरों के लिए और अच्छी सुविधाओं के लिए जाना जाता था। सामन्तवादी व्यवस्था के सताए हुए लोग वर्ण और जातिगत उत्पीड़न के शिकार लोग, भूमिहीन और बेसहारा लोगों ने शहरों में आकर कुछ हद तक ही सही, क्रूर सामन्ती निजाम से राहत पाई और एक तरह की आजाद फिजा में साँस ली। झुग्गी-झोपड़ियों में रहे, सड़कों पर, रैन बसेरों में रातें काटीं,  अमानवीय हालात में फैक्ट्रियों में काम किया- धीरे-धीरे उनमें से बहुत से निम्न मध्यवर्गीय और कुछ मध्यवर्गीय जिन्दगी हासिल कर सके और दूसरों के लिए उदाहरण बने। उनकी कामयाबी की दास्तानें लाखों दूसरे लोगों को शहरों की ओर खींचती रहीं।

1990 के दशक से शुरू हुआ खुले पूँजीवाद का दौर- निजीकरण वैश्वीकरण और उदारीकरण के नारों के साथ आया। शुरुआती मतभेदों के बाद देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों, नौकरशाहों और पूँजीपति वर्ग के विभिन्न हिस्सों के बीच 1994-95 तक इन नीतियों पर आम सहमति बन गई और देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह देशी-विदेशी पूँजी के लिए खोल दिया गया। 90 के दशक में उभरा ‘स्वदेशी’ आन्दोलन ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, डब्ल्यूटीओ और गैट समझौते को ‘गुलामी का दस्तावेज’ मानने वाले खामोश हो गए। पिछले 30 बरस में कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में तमाम छोटे दलों की गठबंधन सरकारें बनती रही हैं और उन्होंने एक-एक करके पूँजी निवेश और मुनाफाखोरी पर लगे तमाम प्रतिबंधों को हटाया है- देश की जमीनें और खनिज संसाधन कौड़ियों के मोल देशी-विदेशी पूँजीपतियों के हवाले की गई हैं, उन्हें टैक्सों और श्रम कानूनों में तरह-तरह की छूटें दी गई हैं, उस हर क्षेत्र में उनके लिए प्रवेश द्वार खोले गए हैं, जो पहले सरकारी नियन्त्रण में होता था। परिणामस्वरूप देश में शहरी अर्थव्यवस्था का- उद्योग धंधों और सेवाओं का निजी क्षेत्र में अभूतपूर्व तेजी से

विस्तार हुआ। दूसरी ओर ग्रामीण अर्थव्यवस्था खेती और उससे जुड़े कामों की कुल अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी सिकुड़ती चली गई। आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कुल हिस्सेदारी घटकर 16 प्रतिशत से भी कम रह गई है जबकि अभी भी देश की दो-तिहाई के लगभग आबादी ग्रामीण इलाके में रहती है।

इस गैर बराबरी पूर्ण विकास ने गाँवों के गरीबों के ऊपर शहरों में पलायन के लिए दबाव बनाया है। खेती के पूँजीवादी पैमाने पर संगठन की सरकार की कोशिशों के कारण किसान साहूकारों और बैंकों के कर्जों में दबते चले गए और शहरों में आत्महत्या करने पर मजबूर हुए। शहरों में अच्छी कमाई के अवसर और खेती में पूँजी निवेश के लिए गाँव के छोटे और गरीब किसानों की भारी आबादी सीजनल लेबर के तौर पर शहरों में पलायन करने लगी। पिछले 30 सालों का दौर गाँवों से शहरों की ओर- रोजगार और बेहतर जिन्दगी की तलाश में बड़े पैमाने के पलायन का गवाह बना।

अरबपतियों के बढ़ने की खबरें सुर्खियाँ बनती रहीं और उन्हें देश के विकास का एक पैमाना बनाया गया। लेकिन यह गुमनाम पलायन आँखों से ओझल रहा- शहर के बाहरी इलाकों में गाँवों से लोगों का आना चुपचाप जारी रहा- वह छोटी-छोटी कोठरियों में ठुंस कर फ्लाईओवरों के नीचे, फुटपाथों पर, रेलवे स्टेशनों और पार्कों में अमानवीय परिस्थितियों में जीते रहे- एक बेहतर कल का सपना लिये दुश्वार जिन्दगी का सफर तय करते रहे। पिछले 30 वर्षों में हमने शहरों में आबादी की एक अभूतपूर्व वृद्धि देखी है।

हमारे देश की सरकारों और राजनीतिक पार्टियों ने इस प्रवासी आबादी के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया। हाँ सबने उन्हें अच्छा वोटबैंक समझा- उनके लिए आज भी सस्ता राशन, बिजली और पानी ही मुद्दे हैं लेकिन पार्टियाँ झूठे वायदे करती हैं और दूसरी तरफ पीठ फेरते ही खंजर से वार करती हैं। जो कुछ भी इन लोगों ने हासिल किया है, वह इन पार्टियों या सरकारों के कारण नहीं- अपनी मेहनत, अपने दम पर किया है।

लेकिन पिछले कुछ सालों में देश की अर्थव्यवस्था में ठहराव के साफ लक्षण उभरने लगे थे। देश के बड़े उद्योगों में तेजी की वह चमक गायब हो गई थी- उपभोक्ता सामानों की बिक्री घट रही थी, मकानों और फ्लैटों के खरीदार नहीं मिल पा रहे थे, कारों और ऑटोमोबाइल के बाजार में जबरदस्त मन्दी आई थी। बाजार में तेजी लाने के तमाम सरकारी प्रयास किसी काम नहीं आ रहे थे।

बैंकों और बीमा कम्पनियों के जरिए दिये गए भारी भरकम कर्ज भी पूँजीपतियों की कोई मदद नहीं कर पाये क्योंकि बाजार में हर चीज की माँग गिर गई थी और उन्होंने इन कर्जों को चुकाने के बजाय अपने को दिवालिया घोषित करना या भागना शुरू कर दिया। इससे बैंकों में बट्टे खाते (एनपीए) का बोझ बढ़ता गया और वे भी संकटग्रस्त होने लगे। सरकार एक वित्तीय संकट में फंसती दिखायी दे रही थी और आरबीआई से रिजर्व छीनने की कोशिश की गयी। हमारी अर्थव्यवस्था एक भयावह मंदी के दरवाजे पर खड़ी थी। देश में सब कुछ था- निजी कल-कारखाने, स्कूल-कालेज, अस्पताल, शॉपिंग माल, चमचमाते बाजार, गगनचुंबी अट्टालिकायें- पर खरीदार नहीं थे।

और ऐसे ही वक्त में कोरोना वायरस का आक्रमण हुआ। देश को लाकडाउन कर दिया गया। पहले से ही मन्दी के मुहाने पर खड़ी अर्थव्यवस्था के लिए यह लाकडाउन कहर बनकर टूटा। सरकार के एक तुगलकी फरमान ने पूरे देश को आग में झोंक दिया- जो थोड़ा बहुत काम चल रहा था, उसको भी ठप कर दिया। इस आफत की मार सबसे ज्यादा मजदूर वर्ग पर पड़ी। जहाँ मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के लोग अपने घरों में सुरक्षित रहे, रामायण, महाभारत देखकर देश की महानता के गीत गाते रहे, ताली, थाली और मोमबत्ती जलाकर अपने बचे रहने की खुशी का इजहार करते रहे, वहीं मजदूर वर्ग दर-बदर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गया। करोड़ों लोगों के रोजगार छिन गये और वे रातों-रात सड़क पर आ गये।

बेरहम शहरों ने मानो उन्हें उगल दिया है। बेरहमी से उनसे नाता तोड़ लिया है। मन्दी आते ही, तालाबन्दी होते ही मजदूर की अब पूँजीवाद के इन केन्द्रों को क्या जरूरत? पूँजीपति, मकान मालिक, ठेकेदार सबने उनसे पल्ला झाड़ लिया- क्योंकि पूँजीवादी व्यवस्था में मुनाफा ही सब कुछ होता है, सिर्फ पैसे की अहमियत होती है। आदमी का मोल दो कौड़ी का भी नहीं होता। लेकिन मालिक वर्ग को ये भी डर है कि अगर ये सब घर चले गये, गाँव लौट गये तो कारखानों- दुकानों-घरों के लिए लेबर मिलनी मुश्किल हो जाएगी इसलिए वे उन्हें घर भी नहीं आने देना चाहते- ना जीने की इजाजत है, न मर जाने की।

दूसरी ओर बेबस, लाचार मजदूर टूटे हुए दिल और सपने और भूखे पेट लेकर किसी तरह गाँव लौटना चाहते हैं- उसी सामन्तवादी, जातिवादी समाज व्यवस्था से उम्मीद कर रहे हैं जिसकी वजह से वह शहरों की ओर जाने के लिए बाध्य हुए थे। उन्हें लगता है कि वहाँ कम से कम वे भूखों तो नहीं मरेंगे या अगर मरेंगे तो कम से कम एक लावारिस की मौत नहीं। मजदूर वर्ग के सामने एक ओर कुंआ है तो दूसरी ओर खाई।

क्या मन्दी और कोरोना के इस अभूतपूर्व संकट से हम निकल सकेंगे? देश का पूँजीपति वर्ग और उसके समर्थक बुद्धिजीवी और राजनीतिक पार्टियाँ इस संकट का क्या समाधान सोच रहे हैं?

हमेशा की तरह पूँजीपति वर्ग को लग रहा है कि पूँजी निवेश और मुनाफाखोरी के रास्ते की, जो भी थोड़ी-बहुत अड़चनें बची रह गई हैं, उन्हें हटाया जाना चाहिए। उन्हें मजदूरों के हितों के खिलाफ तमाम अधिकार दिए जायें ताकि वे जब चाहें, जिन शर्तों पर चाहें, गरीब और बेबस मजदूरों को नौकरी पर रख सकें और जब चाहें उन्हें निकाल बाहर करें। कारखाना लगाने और खनिज के लिए उन्हें किसानों और आदिवासियों से छीनकर कौड़ियों के मोल जमीनें उपलब्ध करवाई जायें। सारे संसाधन उनकी सेवा में हों और उन्हें कोई टैक्स ना भरना पड़े। उनके ऊपर पर्यावरण सुरक्षा या संसाधनों के बुरी तरह दोहन को रोकने के लिए किसी तरह की बंदिशें न लगाई जायें। देश के बैंकों से उन्हें बिना गारंटी सस्ते लोन दिए जायें और उन्हें चुकाने के लिए वे बाध्य भी न हों-  अगर ये सब होगा तो वे फिर प्रतियोगिता में टिक सकेंगे। सस्ता माल बना सकेंगे और ज्यादा मुनाफे की अपनी हवस पूरी कर सकेंगे।

पूँजीपति वर्ग की यह फितरत जगजाहिर है। मुनाफा ही उसका धर्म है और ईमान है। जब तक देश के सारे संसाधन, मेहनतकश और बाजार पूरी तरह उसके हाथ में नहीं आ जाते उसे चैन नहीं मिलेगा। देश की आम जनता द्वारा चुनी गई सरकार पूँजीपतियों की हर इच्छा पूरी करने को तैयार है। लाकडाउन-4 की पूर्वसंध्या पर अपने प्रवचन में मोदी जी कोरोना लाकडाउन और उसके बाद की अपनी सरकार की प्राथमिकतायें जाहिर कर चुके हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा इत्यादि राज्यों में श्रम कानूनों की पूँजीपतियों की इच्छा अनुसार रद्द करने वाले अध्यादेश लाये जा चुके हैं। पूँजी निवेश के ‘प्रोत्साहन’ की खातिर अब मजदूरों को न्यूनतम वेतन की भी गारंटी नहीं होगी, 8 की जगह 12 घंटे का कार्य दिवस होगा, ओवरटाइम की दरें डेढ़ गुना तक ही सीमित होंगी, मजदूरों को कभी भी काम से निकाला जा सकेगा… और उन्हें संगठित होने या यूनियन बनाने का भी अधिकार नहीं होगा।

दूसरी ओर, मजदूर वर्ग, उसके समर्थक बुद्धिजीवियों और राजनीतिक पार्टियों की क्या स्थिति है? मजदूर वर्ग बेबस और लाचार है, उसकी जीविका छिन चुकी है। बेरोजगारी की दर 27 प्रतिशत तक जा पहुँची है और विभिन्न अनुमानों के मुताबिक कम से कम 10 करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं। मजदूर वर्ग अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रहा है, पूँजीवादी केन्द्रों से महानगरों और औद्योगिक बस्तियों से निकलकर सामन्तवाद के गढ़ों की ओर, गाँव की ओर पलायन कर रहा है। गाँव की अर्थव्यवस्था में उन्हें संभाल सकने की ताकत नहीं है- वहाँ सिर्फ ठंडी मौत मरा जा सकता है- जातिवाद का दलदल वहाँ उनका इन्तजार कर रहा है। मजदूर वर्ग के सामने अपने भविष्य का कोई नक्शा नहीं है, उनकी सरकार या प्रशासन से कोई माँग नहीं है, सिवाय इसके कि उन्हें अपनों के बीच मरने या जीने के लिए गाँव लौटने दिया जाए।

मजदूर वर्ग के समर्थक बुद्धिजीवी और राजनीतिक पार्टियाँ इस वक्त उसे कोई रास्ता नहीं दिखा पा रहे हैं। हद से हद सोशल मीडिया, फेसबुक, व्हाट्सएप की दुनिया में उनकी बेबसी और पूँजीवादी व्यवस्था की क्रूरता को लेकर आँसू बहाए जा रहे हैं, पूँजीवाद के नाश की बद्दुआएं दी जा रही हैं या फिर मौजूदा सरकार और शासन व्यवस्था से कुछ करने की उम्मीदें बांधी जा रही हैं। कुछ लोग अपनी अंतरात्मा का बोझ कम करने के लिए कुछ लिख-पढ़कर मामले की इतिश्री कर दे रहे हैं। सच्चाई बहुत कड़वी है- मजदूर वर्ग की सेनाएं पलायन कर रही हैं जबकि पूँजीपति वर्ग के साथ मिलकर देश की चुनी हुई सरकार मजदूर वर्ग पर 1990 के बाद का दूसरा बड़ा हमला करने की तैयारी मुकम्मल कर चुकी है। यह अकारण ही नहीं है कि लाकडाउन 4 के मोदी के भाषण में मजदूर वर्ग के लिए, उसकी पीड़ाओं के बारे में बोलने के लिए दो शब्द भी नहीं थे। जिन पर हमला किया जाता है, उनके साथ नरमी नहीं बरती जाती।

देश आज फिर 1990 की तरह ही एक दोराहे पर खड़ा है। देश का भविष्य क्या होगा यह इस पर निर्भर करेगा कि मजदूर वर्ग और उसके समर्थक बुद्धिजीवी और राजनीतिक पार्टियाँ क्या रास्ता अख्तियार करते हैं। हमला हो चुका है- यह कोई हवाई बात नहीं है, हकीकत में हमला है। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में नहीं मजदूरों की ठोस जिन्दगियों पर, उनके बीबी-बच्चों, उनके रोजगार, भविष्य के उनके सपनों पर बेरहमी से हमला बोल दिया गया है। इसलिए इसके खिलाफ संघर्ष भी हकीकत की जमीन पर होगा, तभी उसे जीता जा सकेगा।

सीएए और एनआरसी के खिलाफ आम जनता के संघर्षों ने यह दिखा दिया है कि देश की चुनी हुई सरकार जनता की, अपने नागरिकों की आवाज को सुनने से हठधर्मी से इंकार कर रही है। लोकतांत्रिक तरीके से भी आंदोलन करने की इजाजत नहीं दी जा रही है। देशद्रोह, आतंकवाद निरोधक या गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानूनों में उसमें झूठे मुकदमे कायम करके विरोध करने वाली लोकतांत्रिक आवाजें कुचली जा रही हैं। आम जनता को विरोध करने की सजा देने के लिए दंगे करवाये जाते हैं और फिर उनकी तफ्तीश के नाम पर उसे ही जेलों में ठँसा जाता है। ‘अर्बन नक्सल’ या ‘बौद्धिक आतंकवादी’ जैसे शब्द गढ़कर जनता का साथ देने वाले बुद्धिजीवियों को खामोश करने की कोशिश की जा रही है। यह शासन व्यवस्था औपनिवेशिक शासन व्यवस्था जैसी ही ‘गूंगी और बहरी’ हो चुकी है। देश के मजदूर वर्ग और आम जनता से किनाराकशी करके यह पूँजीपति वर्ग के हित में हमलावर है।

पूँजीपति वर्ग, उसकी समर्थक राजनीतिक पार्टियों और शासन-सत्ता का दिवालियापन, उसकी संवेदनहीनता और अमानवीयता सबके सामने हैं। वे मौजूदा संकट का समाधान करने में अक्षम हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत समाधान- ‘राहत पैकेज’ और श्रम कानूनों और देश के संसाधनों पर हमला, देश की आम जनता को और ज्यादा मोहताज बनाने वाला है। समाज को पूँजी और मुनाफाखोरी के इस अभिशाप से मजदूर वर्ग ही बचा सकता है। पर वह नेतृत्वहीन और बिखरा हुआ है।

मजदूर वर्ग का संगठन और संघर्ष ही इस देश को और खुद मजदूर वर्ग को बेबसी और लाचारी से, अमानवीय पूँजीवादी व्यवस्था से मुक्ति दिला सकता है। जब तक पूँजीपति वर्ग के पक्ष में हो रहे इस हमले का ठोस जमीन पर मुकाबला नहीं किया जाता- इसे रोकना असंभव होगा। मजदूर वर्ग और उसके समर्थक बुद्धिजीवियों को अपना ऐतिहासिक उत्तरदायित्व समझना होगा। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से बाहर निकलकर एक बेसुकून जिन्दगी जीने के लिए खुद को तैयार करना होगा।

हर गाँव, शहर, कस्बे में, स्कूल-कालेजों और कारखानों में इस लड़ाई को लड़ने वाले सिपाही तैयार करने होंगे। देश की आजादी से मिली उपलब्धियाँ, सैकड़ों वर्षों के मजदूर वर्ग के खून से सने सालों के संघर्षों के फल छिनने को हैं। यही वह वक्त है जब हरेक को इस लंबी और कठिन लड़ाई में अपनी भूमिका तय करनी होगी। यह देश एक और गुलामी की लंबी अंधेरी सुरंग में जाएगा या फिर कठिन संघर्षों से भरी उजाले की उम्मीद जगाती डगर पर- यह इस देश के मजदूर वर्ग और उसके समर्थक बुद्धिजीवियों-कार्यकर्ताओं को आज ही तय करना होगा। वरना कल बहुत देर हो चुकी हो चुकी होगी।

( ज्ञानेंद्र सिंह सामाजिक-राजनीतिक विचारक हैं।)

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Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi