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Categories: बीच बहस

महामारी के आईने में निगम-भारत

नंगी सच्चाई
पिछले साल 24-25 मार्च की रात से जब प्रधानमंत्री ने देश पर लॉकडाउन थोपा था तो प्रवासी मजदूरों के महापलायन के हृदय-विदारक दृश्यों से यह सच्चाई नंगी होकर सामने आ गई थी कि तीन दशकों से बनाया जा रहा निगम-भारत मेहनतकश जनता की पीठ पर लदा हुआ है। इस सच्चाई को ढंक-तोप कर रखा जाता है; क्योंकि निगम-भारत के निर्माण पर शासक-वर्ग के बीच सर्वानुमति है। उस समय इस सच्चाई पर बहस होती, और थोड़ा ठहर कर सोचा जाता कि क्या यह किसी भी आधार-स्वतंत्रता संघर्ष के मूल्य, संविधान के मूल्य, मानव मूल्य पर वाजिब है? लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पूरे देश के कच्चे-पक्के रास्तों पर निकल पड़े प्रवासी मजदूरों के हुजूम पर सत्ता, विपक्ष और नागरिक समाज के विमर्श में यह मान कर चला गया कि दिन-रात खटने के बावजूद इस विशाल खलकत का निपट गरीब और सुविधा-विहीन होना कोई गलत स्थिति नहीं है।

निगम-भारत और उसमें प्रचलित निगम राजनीति पर बनी सर्वानुमति का नतीजा है कि कोरोना महामारी का अगर तीसरा, चौथा, पांचवा विस्फोट भी होगा तो मेहनतकश देश और राज्यों की राजधानियों/नगरों से ऐसे ही पिदड़ते नजर आएंगे। कल्पना कीजिए निगम-भारत में सुरक्षित लोगों को इतनी बड़ी संख्या में बदहाल स्थिति में सड़कों पर निकलना पड़ जाता तो क्या किसी की हिम्मत थी, थाली-शंख-घड़ियाल बजाने, आसमान में हवाई जहाज नचाने, दीवाली मनाने की! महामारी के उपचार का यह ‘पवित्र’ जश्न अकेले संघियों और मोदी प्रेमियों ने ही नहीं मनाया था; प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेताओं/दलों ने भी मनाया था।

‘अच्छे दिन’ के हकदार पहले भी निगम-भारत के दावेदार थे, आज भी वे ही हैं, और कल भी वे ही रहेंगे। इस सच्चाई की लंबी-चौड़ी व्याख्या की जरूरत नहीं है। 22 अप्रैल को ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ और ‘फाइनांसियल टाइम्स’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अजेंडा सेटिंग डिबेट सीरीज में बोलते हुए देश की वित्तमंत्री ने घोषणा की है कि महामारी की दूसरी लहर के बावजूद सुधारों की रफ्तार, खास कर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश, मजबूती के साथ जारी रहेगी। निगम-भारत बन रहा है तो उसकी कीमत चुकाने वाले भी चाहिए, इसीलिए वित्तमंत्री ने कृपापूर्वक कीमत चुकाने वालों पर भी तात्कालिक रूप से ध्यान देने की आवश्यकता बताई है।

‘हिंदू-राष्ट्र’ बनाने वाले हों या भारत के विचार (आइडिया ऑफ इंडिया) की महीन कताई करने वाले, निगम-भारत में सबकी समान आस्था है। कोरोना महामारी ने इस आस्था को तनिक भी नहीं डिगाया है। नरेंद्र मोदी के लालबुझक्कड़ अर्थशास्त्रियों की बात जाने दें, प्रगतिशील अर्थशास्त्री भी यह नहीं कहते कि इस देश की अर्थव्यवस्था में यह मेहनतकश खलकत शामिल ही नहीं की जाती है। उनके लिए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और उनके प्रिय प्रतीक पुरुषों के नाम पर चलाई जाने वाली योजनाएं/कार्यक्रम काफी माने जाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों को नाम और रूपरेखा देने की देश से लेकर विदेश तक एक पूरी इंडस्ट्री है। निगम-भारत के पूर्व युग में जब कभी ऐसी योजनाएं/कार्यक्रम चलाए गए तो यह कहा गया कि गरीबी हटानी है। निगम-भारत में ‘गरीबी का रोना’ वर्जित है। गरीब हैं तो निगम-भारत के निर्माण के लिए सस्ता श्रम है; और निगम राजनीति को परवान चढ़ाने के लिए सस्ते वोट।

आपदा में उत्सव
हल्ला-बोल शैली में जो ‘शाइनिंग’, ‘नया’ ‘स्मार्ट’, ‘डिजिटल’ और साथ ही ‘आयुष्मान’ भारत बनाया जा रहा है, महामारी के आईने में उसकी हकीकत सामने है। बिस्तर, दवाई, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर के बगैर मरीज परिजनों के कंधों पर और गोदियों में दम तोड़ रहे हैं। कहीं अस्पताल में आग लगने से मरीज मारे जा रहे हैं, कहीं ऑक्सीजन रिसने से, कहीं ऑक्सीजन डिप होने से। मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार कर पाना दुष्कर कार्य हो गया है। दक्षिण एशियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के निवासियों में प्रतिरोधक क्षमता का कुदरती करिश्मा नहीं होता तो भारत में प्रभावी जन स्वास्थ्य व्यवस्था की अनुपस्थिति में लाशों के अंबार लग सकते थे।

नेता, नौकरशाह, विशेषज्ञ दिन-रात बताने में लगे हैं कि न कहीं कोई कमी है, न किसी से कहीं कोई चूक हुई है। प्रधानमंत्री की छवि पर जरा भी आंच न आए, इसकी मुकम्मल पेशबंदी की गई है। अभी वे कुछ शमित नजर आ रहे हैं। इस बार लॉकडाउन को आखिरी विकल्प बताते हुए उन्होंने विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय और सामंजस्य का उपदेश दिया है। स्थिति में सुधार होते ही, या दो मई को बंगाल फतह होने पर, वे “महाभारत 18 दिन में जीता गया था, कोरोना के खिलाफ जंग’ 21 दिन में जीत ली जाएगी’’ जैसा कोई बड़ा बतोला मारते हुए आलोचकों के खिलाफ उग्र हुंकार भर सकते हैं। वे उत्सव-प्रिय हैं, लिहाजा, उन्होंने लोगों को आपदा में उत्सव मनाने की नसीहत दी है। उत्सव मनाने की नसीहत देते हुए प्रधानमंत्री को जरूर यह विश्वास रहा होगा कि लोग नाशुकरे नहीं होंगे, क्योंकि उन्हें भली-भांति समझा दिया गया है कि नरेंद्र मोदी बड़े काम करने आए हैं।

महामारी ने यह साफ कर दिया है कि निगम-भारत में उसके केंद्र पर काबिज लोगों को ही इलाज की निर्बाध सहूलत है। निगम-भारत के विविध उपकेंद्रों पर बसने वाले लोग, जो समझते थे पैसा फेंक कर महंगे से महंगा इलाज खरीद लेंगे, दिक्कत में आ गए हैं। निगम-भारत के हाशियों पर सबसे ज्यादा लोग बसते हैं। उन्हें पता चल गया होगा कि उनकी हैसियत निगम-भारत से बहिष्कृत लोगों से अच्छी नहीं है। महामारी ने यह सच्चाई भी अच्छी तरह बता दी है कि बहु-प्रशंसित निगम-भारत किस कदर बुरी तरह से धर्म, जाति, उपजाति, गोत्र, क्षेत्र, भाषा आदि के टुकड़ों में बंटा हुआ है। महामारी ने यह दिखाया है निगम-भारत में अपनी जगह बनाने और आगे बढ़ने के लिए आपका कोई शत्रु होना चाहिए। निगम-भारत में सक्रिय शत्रु-भाव के अनगिनत वृत्तों ने देश को एक कलह-खाने में तब्दील कर दिया है।

महामारी के संकट में संवाद की सच्ची प्रेरणाएं भी सामने आई हैं। व्यक्तिगत और संस्थागत रूप से बहुत से लोगों ने आंसू पोंछने और सौहार्द बनाने में भूमिका निभाई है। मानवता का यह धड़कता हुआ हृदय भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ा सहारा है। गुरुद्वारों ने पहले भी बड़ी जिम्मेदारी सम्हाली थी; जरूरतमंदों को ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की गाजियाबाद गुरुद्वारे की पहल से आशा बंधती है कि पूरे देश में यह पहल होगी।

शासन-विधि का सच
बीबीसी की रपट से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति कार्यालय समेत बिना किसी भी संबद्ध सरकारी विभाग/संस्था को सूचित किए लॉकडाउन की घोषणा की थी। उन्हें जवांमर्दी दिखाने का काफी शौक है। महामारी में भी उन्होंने उसका अवसर निकाल लिया। एक शोधकर्ता की यह रपट भी आई है कि सरकार के पास दूसरी लहर की काफी-कुछ तथ्यात्मक जानकारी होने के बावजूद उसे रोकने या उससे निपटने के उपाय नहीं किए गए। “कोरोना पर विजय पा ली गई है” यह कहते हुए सरकार चुनावों में विजय हासिल करने के अभियान में जुट गई। दूसरी लहर का विस्फोट हुआ तो शराब की दुकानों से लेकर रैलियों/कुम्भ मेले तक ज्यादा से ज्यादा भीड़ को आमंत्रित करने वालों ने फतवा दे दिया कि लोग दोषी हैं, वे नियमों का पालन नहीं करते!

जिस निगम-भारत की तारीफ में दिन-रात फू-फां की जाती है, महामारी ने उद्घाटित कर दिया है कि उसमें संरचनात्मक शासन-विधि (स्ट्रक्चरल गवर्नेंस) नाम की कोई चीज नहीं है। आरएसएस को यह श्रेय जाता है कि उसने देश को पहला छैला प्रधानमंत्री दिया है। प्रधानमंत्री के लिए नीति, योजना, शासन-विधि आदि का अर्थ फैशन और बातों जैसा ही है। शासकीय जिम्मेदारी और जवाबदेही का निर्वाह मीडिया में शोर मचाने से नहीं, समस्याओं और संकट को अंदरखाने गंभीरता और ईमानदारी से सुलझाने से होता है। जिम्मेदारी और जवाबदेही के जो कुछ अवशेष राजनीतिक पार्टियों और सरकारी संस्थाओं में बचे हुए हैं, निगम-भारत में उनका तेजी से ह्रास हो रहा है। क्योंकि हवाबाजी और विज्ञापनबाजी को अच्छी शासन-विधि का पर्याय बना दिया गया है। नतीजा लोगों के सामने है, महामारी की पहली लहर के समय मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर एक बहिष्कृत अबोध शिशु अपनी मृत मां का आंचल खींच रहा था; इस बार बड़ी संख्या में बड़े लोग इलाज से वंचित परिजनों के मृत शरीरों को झकझोर रहे हैं!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं।)

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This post was last modified on April 25, 2021 12:45 pm

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