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क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम: आखिर इस मर्ज की दवा क्या है?

विकास दुबे कानपुर के पास एक पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। यह मुठभेड़ फ़र्ज़ी है या सही, इस पर एक जनहित याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी है, और उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले की जांच के लिये एक एसआईटी का गठन भी अपर मुख्य सचिव संजय भूस रेड्डी की अध्यक्षता में कर दिया है। एनकाउंटर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के कई दिशा निर्देश हैं और सभी राज्य सरकारें उनका पालन भी करती हैं। लेकिन एक हैरान करने वाला पहलू यह है कि, विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधियों के खात्मे पर, यह खात्मा चाहे जिस प्रकार से हो, आम जनता प्रसन्न होती है और वह इस विवाद से दूर पुलिस की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करती है।

गाड़ी पलट मार्का मुठभेड़ों से जनता अक्सर खुश होती है, क्योंकि वह शांति से जीना चाहती है, गुंडों-बदमाशों से मुक्ति चाहती है, यह मुक्ति चाहे उसे न्यायिक रास्ते से मिले या न्याय के इतर मार्ग से। यह ऐसे ही है जैसे कोई बीमार, एलोपैथी से लेकर नेचुरोपैथी तक की तमाम दवाइयां अपने को स्वस्थ रखने के लिये इस उम्मीद में आजमाता है कि, न जाने कौन सी दवा कब, काम कर जाए। क्या ऐसी मुठभेड़ों पर हर्ष प्रदर्शन, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम पर जनता के बढ़ते अविश्वास का ही परिणाम नहीं है ? पुलिस की सामान्य रूप से उत्पीड़क छवि के विपरीत यह स्वागत सत्कार क्या यह संकेत नहीं देता है कि, जनता यह मान के चलती है कि, उसे हर दशा में अपराध और अपराधियों से मुक्ति चाहिए ही, चाहे इसके लिये कानून का उल्लंघन ही क्यों न करना पड़े ?

फिलहाल तो उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित एसआईटी को निम्न मुद्दों पर जांच करने के लिये कहा गया है।

● घटना के पीछे के कारणों जैसे- विकास दुबे पर जो भी मामले चल रहे हैं, उनमें अब तक क्या कार्रवाई हुई।

● विकास के साथियों को सजा दिलाने के लिए जरूरी कार्रवाई की गई या नहीं।

● इतने बड़े अपराधी की जमानत रद्द कराने के लिए क्या कार्रवाई की गई।

● विकास के खिलाफ कितनी शिकायतें आईं। क्या चौबेपुर थानाध्यक्ष और जिले के अन्य अधिकारियों ने उनकी जांच की।

● जांच में सामने आए फैक्ट्स के आधार पर क्या कार्रवाई की गई।

● विकास और उसके साथियों पर गैंग्स्टर एक्ट, गुंडा एक्ट, एनएसए के तहत क्या कार्रवाई की गई। कार्रवाई करने में की गई लापरवाही की भी जांच की जाएगी।

● विकास और उसके साथियों के पिछले एक साल के कॉल डीटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) की जांच करना। उसके संपर्क में आने वाले पुलिसकर्मियों की मिलीभगत के सबूत मिलने पर उन पर कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा करना।

● घटना के दिन पुलिस को आरोपियों के पास हथियारों और फायर पावर की जानकारी कैसे नहीं मिली। इसमें हुई लापरवाही की जांच करना। थाने को भी इसकी जानकारी नहीं थी, इसकी भी जांच करना।

● अपराधी होने के बावजूद भी विकास और उसके साथियों को हथियारों के लाइसेंस किसने और कैसे दिए। लगातार अपराध करने के बाद भी उसके पास लाइसेंस कैसे बना रहा।

यह एक उचित अवसर है कि एसआईटी द्वारा 8 पुलिसजन की हत्या की रात और उसके पहले जो कुछ भी चौबेपुर थाने से लेकर सीओ बिल्हौर के कार्यालय से होते हुए एसएसपी ऑफिस तक हुआ है, उसकी जांच की जाए। एसटीएफ को जिस काम के लिये यह केस सौंपा गया था वह काम एसटीएफ ने लगभग पूरा कर दिया और अब उसकी भूमिका यहीं खत्म हो जाती है। विकास दुबे के अधिकतर नज़दीकी बदमाश मारे जा चुके हैं। जो थोड़े बहुत होंगे वे स्थानीय स्तर से देख लिए जाएंगे। अब ज़रूरी है कि उसके गिरोह का पुलिस, प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में जो घुसपैठ है उसका पर्दाफाश किया जाए जिससे यह गठजोड़ जो समाज में आपराधिक वातावरण का काफी हद तक जिम्मेदार है, टूटे। माफिया का जिस दिन आर्थिक साम्राज्य दरकने लगेगा उसी दिन से अपराधियों का मनोबल भी टूटने लगेगा। अपराध से यकायक बढ़ती हुई संपन्नता, और अफसरों एवं राज पुरुषों की नजदीकियां युवाओं को इस तरह का एडवेंचर करने के लिये बहुत ही ललचाती हैं। अब जब जांच रिपोर्ट आ जाए तभी कुछ कहना उचित होगा।

पुलिस सुधार पर चल रहे विवाद और उसे लंबित रखने के राजनीतिक कुचक्र का एक लंबा इतिहास है। यह इतिहास भी, पुलिस व्यवस्था पर चल रहे विवाद से कम दिलचस्प नहीं है। यदि इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो 1902 में ब्रिटिश भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा गठित पुलिस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में जो कहा था, उसे पढ़िये तो लगता है कि, आज तक भी कुछ नहीं बदला है। रिपोर्ट में अंकित है,

” जनता और समाज में, पुलिस को एक भ्रष्ट और दमनकारी संस्था के रूप में देखा जाता है और संपूर्ण देश में उसकी हालत अत्यंत असंतोषजनक है।”

यह टिप्पणी 118 साल पहले की है और आज भी प्रासंगिक नज़र आती है। लेशमात्र भी बदलाव इस टिप्पणी में नहीं आया है। 1902 के पुलिस कमीशन की रिपोर्ट से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस एएन मुल्ला की बहु उद्धृत टिप्पणी से होते हुए पूरा का पूरा तंत्र, आज भी, साख और भरोसे के संकट से जूझ रहा है।

1902 के पुलिस कमीशन ने यह भी कहा था कि पुलिस में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। लेकिन सरकार ने उक्त कमीशन की रिपोर्ट को नहीं माना। जन सरोकारों से प्रतिबद्ध पुलिस अंग्रेजों को चाहिये भी नहीं थी। वे एक विदेशी शासक थे और उनका उद्देश्य जनहित था भी नहीं। उनका प्रथम उद्देश्य यही था कि, देश में ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी न डूबे। उन्हें ऐसी पुलिस चाहिए थी कि, एक लाल झब्बे वाला सिपाही अगर गांव में घुस जाए तो गांव आतंकित हो, नतमस्तक हो जाए।

उसी समय देश का तब तक का सबसे बड़ा जन आंदोलन बंग-भंग आंदोलन शुरू हो गया था और पुलिस को बेहतर बनाने के सारे सुझाव सरकार की फाइलों में ही पड़े रहे। पुलिस राजनैतिक सत्ता का उपकरण बनी रही और आज़ादी के आंदोलन में इसका जो अशोभनीय, जन विरोधी और राजभक्त चेहरा सामने आया वही अक्स आज तक विद्यमान है जबकि आज ब्रिटिश राज को रुख़सत हुए 73 साल बीत चुके हैं।

1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो आईसीएस अफसर धर्मवीर की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय पुलिस कमीशन का गठन किया गया। इमरजेंसी के समय पुलिस ज्यादती की यादें लोगों के दिल दिमाग मे ताज़ी थीं। भुक्त भोगियों को लगा कि ‘ज़ालिम’ पुलिस का चेहरा अब बदलना चाहिए। उक्त राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने 1979 से 1981 के बीच आठ विस्तृत रिपोर्ट दीं।

पुलिस के कार्यकलाप और विभिन्न अंगों के बारे में, इतना विशद एवं समग्रता से, पहले कभी किसी आयोग ने परीक्षण नहीं किया था। हालांकि पुलिस प्रशिक्षण पर एक आयोग, गोरे कमीशन भी बैठ चुका था, पर उसकी रिपोर्ट इतनी बहुआयामी नहीं थी। लेकिन धर्मवीर पुलिस आयोग की रिपोर्ट और सिफारिशों का भी वही परिणाम लंबे समय तक हुआ जो लगभग अनेक महत्वपूर्ण आयोगों की रिपोर्ट और उनकी सिफारिशों का होता है। राष्ट्रीय पुलिस कमीशन की मुख्य मुख्य सिफारिशें इस प्रकार हैं।

● हर राज्य में एक प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए।

● जाँच कार्यों को शांति व्यवस्था संबंधी कामकाज से अलग किया जाए।

● पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिये एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए।

● पुलिस प्रमुख का कार्यकाल तय किया जाए।

● एक नया पुलिस अधिनियम बनाया जाए।

अभी जो पुलिस अधिनियम लागू है वह 1861 का बना हुआ है। यह अधिनियम 1857 के विप्लव के बाद जब भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अंतर्गत आया तो 1857 के झटके से सीख लेते हुए यह अधिनियम लागू किया गया।

इसी बीच, उत्तर प्रदेश और सीमा सुरक्षा बल के डीजी रह चुके, देश के सम्मानित आईपीएस अफसर, प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पुलिस सुधारों को लागू करने के लिये, 1996 में एक जनहित याचिका दाखिल की। दस वर्ष बाद 22 सितंबर 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। देश की सर्वोच्च अदालत ने जब इस संबंध में निर्देश दिए थे तो, लगा था कि जल्द ही पुलिस की कार्यशैली बदल जाएगी और उसके चलते उसकी छवि भी सुधर जाएगी। 2006 के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो निर्देश जारी किए जा रहे हैं वे तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक केंद्र और राज्य सरकारें इस विषय पर अपना अधिनियम नहीं बना लेतीं। यह निर्देश अनुच्छेद 141 के अंतर्गत दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख गाइड लाइंस इस प्रकार थीं,

● स्टेट सिक्योरिटी कमीशन ( राज्य सुरक्षा आयोग ) का गठन किया जाए, ताकि पुलिस बिना दबाव के काम कर सके।

● पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी बनाई जाए, जो पुलिस के खिलाफ आने वाली गंभीर शिकायतों की जाँच कर सके।

● थाना प्रभारी से लेकर पुलिस प्रमुख तक की एक स्थान पर कार्यावधि 2 वर्ष के लिये सुनिश्चित की जाए।

● नया पुलिस अधिनियम लागू किया जाए।

● अपराध की विवेचना और कानून व्यवस्था के लिये अलग-अलग पुलिस की व्यवस्था की जाए।

यह सारी संस्तुतियां राष्ट्रीय पुलिस कमीशन ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में दी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे बस सरकारों को लागू करने के लिये कहा है।

दुर्भाग्य से आज तक जैसा कि आयोग, याचिकाकर्ता और सुप्रीम कोर्ट की मंशा थी, वैसा कुछ भी नहीं हुआ। सच तो यह है कि पुलिस के काम में और गिरावट आती चली गयी। बीते दस वर्षों में पुलिस में राजनीतिक हस्तक्षेप और बढ़ा है। इसके साथ ही पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की आपराधिक तत्वों से गठजोड़ में भी वृद्धि हुई है। इस गठजोड़ के बारे में वोहरा समिति ने 1993 में ही आगाह करते हुए एक विस्तृत रिपोर्ट दी थी, पर आज तक न तो वह सार्वजनिक हुई और न ही रिपोर्ट की सिफारिशों पर कुछ किया गया । हालांकि, पुलिस सुधारों के लिये सरकार द्वारा अन्य समितियाँ भी समय-समय पर गठित की गयीं, पर इन समितियों की संस्तुतियां भी अभी तक फाइलों में बंद हैं। इनका विवरण भी पढ़ें।

● 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने देश के सभी राज्यों के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को पत्र लिखकर पुलिस व्यवस्था में सुधार किये जाने की कुछ सिफारिशें की थी।

● 1998 में मुंबई के पुलिस कमिश्नर और गुजरात तथा पंजाब के डीजीपी रहे आईपीएस अफसर, जेएफ रिबेरो की अध्यक्षता में एक अन्य समिति का गठन किया गया।

● वर्ष 2000 में गठित पद्मनाभैया समिति ने भी केंद्र सरकार को सुधारों से संबंधित सिफारिशें सौंपी थीं।

● देश में आपातकाल के दौरान हुई ज़्यादतियों की जांच के लिये गठित शाह आयोग ने भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिये पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करने की बात कही थी।

● इसके अलावा राज्य स्तर पर गठित कई पुलिस आयोगों ने भी पुलिस को बाहरी दबावों से बचाने की सिफारिशें की थीं।

● इन समितियों ने राज्यों में पुलिस बल की संख्या बढ़ाने और महिला कांस्टेबलों की भर्ती करने की भी सिफारिश की थी।

एक नया पुलिस अधिनियम बनाने के लिये, भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 20 सितंबर, 2005 को विधि विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट,  सोली सोराबजी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसने 30 अक्तूबर 2006 को मॉडल पुलिस एक्ट, 2006 का प्रारूप केंद्र सरकार को सौंपा। उन्होंने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि, देश में विभिन्न राज्यों के पुलिस विभागों में संख्या बल की भारी कमी है और औसतन 732 व्यक्तियों पर एक पुलिस कर्मी की व्यवस्था है, जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ के मानक के अनुसार, हर 450 व्यक्तियों पर एक पुलिसकर्मी की नियुक्ति होनी चाहिए। वर्तमान में कार्य निर्वहन के दौरान पुलिस के सामने अनेक समस्याएँ आती हैं, उसका उन्होंने इस प्रकार से वर्गीकरण किया,

● पुलिस बल के काम करने की परिस्थितियाँ

● पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति

● पुलिसकर्मियों पर काम का अतिरिक्त दबाव

● पुलिस की नौकरी से जुड़े अन्य मानवीय पक्ष

● पुलिस पर पड़ने वाला राजनीतिक दबाव

जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों के फॉलोअप के लिये अनेक कमेटियों का गठन किया तो राज्य सरकारों ने भी अपने-अपने अधिनियम बनाये पर उनमें भी जो प्रावधान रखे गए हैं वे इन निर्देशों और आयोग की संस्तुतियों की भावना के अनुरूप नहीं हैं। देश के 17 राज्यों ने अपने नए पुलिस अधिनियम बना लिए हैं, लेकिन यह अधिनियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन करने के लिए नहीं, बल्कि उनसे बचने के लिए बनाए गए हैं। असल समस्या पुलिस तंत्र को राजनीतिक दखलंदाजी से दूर रखने की है पर उसका समाधान न तो इन अधिनियमों में हुआ और न ही राजनीतिक सत्ता, इस दखलंदाजी के लोभ से मुक्त ही होना चाहती है।

चतुर नेताओं ने इस फैसले से बचने के लिए ऐसे अधिनियम बनाए जो वर्तमान व्यवस्था को ही कानूनी जामा पहनाने के समान हैं। अन्य राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन का दिखावा करते हुए जो शासनादेश पारित किए उनसे यही स्पष्ट होता है कि या तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश को संशोधित किया गया या उसे तोड़ मरोड़कर उसके प्रभाव को कम किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने फीड बैक के लिये जो समितियां गठित की, उनका हश्र देखें,

● वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने, अपने निर्देशों पर फीड बैक लेने और अनुपालन की समीक्षा के लिये जस्टिस थॉमस समिति का गठन किया और उसे यह दायित्व दिया गया कि समिति सुप्रीम कोर्ट के पुलिस सुधार संबंधी निर्देशों के अनुपालन पर अपनी आख्या दे। इस समिति ने 2010 में अपनी रिपोर्ट में हैरत प्रकट करते हुए कहा कि सभी राज्यों में पुलिस सुधारों के प्रति उदासीनता है।

● 2013 में पुलिस सुधारों को लेकर जस्टिस जेएस वर्मा समिति ने भी विस्तृत टिप्पणी की। इस समिति का गठन दिल्ली में निर्भया कांड के बाद महिलाओं के प्रति अपराध संबंधी कानूनों को सख्त बनाने के लिए किया गया था। समिति ने स्पष्ट कहा था कि पुलिस में बुनियादी सुधारों के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अनुपालन अत्यंत आवश्यक है।

● जस्टिस थॉमस समिति द्वारा निराशा व्यक्त करने और जस्टिस वर्मा समिति द्वारा कोर्ट के आदेशों के अनुपालन को जरूरी बताने का राज्यों पर कोई असर नहीं हुआ। इसकी एक बानगी यह रही कि उत्तर प्रदेश में मनमाने ढंग से महानिदेशकों की नियुक्ति अल्प अवधि और यहां तक कि दो-तीन महीने के लिए की गई।

विकास दुबे के एनकाउंटर पर देश के वरिष्ठ और चर्चित पुलिस अफसरों के लेख और इंटरव्यू मीडिया में आ रहे हैं। एनकाउंटर फर्जी है या असली यह तो जब जांच होगी तो सत्य सामने आ ही जाएगा लेकिन 1990 में एक मार पीट के मुक़दमे का लफ़ंगा अभियुक्त 2020 में अपने गांव में ही 8 पुलिस अफसरों को कैसे योजनाबद्ध तरीके से एक प्रशिक्षित आतंकी गिरोह की तरह घेर कर मार देता है, और उसके अपराध कर्म, राजनीतिक पहुंच और पैठ लगातार बढ़ती रहती है ? क्या एक सामान्य फुंसी से कैंसर के थर्ड या फोर्थ स्टेज तक पहुंचने की यह अपराध कथा सबको हैरान नहीं करती है ? यह किसी को हैरान नहीं करती है। यूपी ही नहीं अन्य प्रदेशों में भी माफिया साम्राज्य ऐसे ही फुंसी से शुरू हुए हैं और कुछ माफिया सरगना तो, सरकार में भी पहुंच गए हैं। फुंसी का इलाज नहीं किया गया और उसे इग्नोर किया गया और जब अपराधी ने सियासत का लबादा ओढ़ लिया तो वह खुद को सुरक्षित समझने लगा और फिर माफिया डॉन बन गया।

इस एनकाउंटर के बाद प्रकाश सिंह एक इंटरव्यू में कहते हैं कि,

” राजनीति और अपराधी तंत्र के बीच गठजोड़ लंबे समय से है। मैं जब यूपी का डीजी बना तो, अपने कार्यकाल में मैंने भी इसे तोड़ने की कोशिश की। तब इन माफिया सरगनाओं के खिलाफ कार्रवाई हुई और उन्हें जेल भेजा गया और उनके आर्थिक साम्राज्य को चोट पहुंचाई गयी। ”

लेकिन माफिया सरगनाओं का संजाल तोड़ना इतना आसान नहीं है। यह केवल पुलिस के बस की बात नहीं है बल्कि इसके लिए एक दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत होती है। जो सरकार और सत्तारूढ़ दल की सक्रिय सहमति के बिना संभव नहीं है। राजनैतिक दलों की अलग मजबूरियां होती हैं और वे इन अपराधी और माफियाओं के सहयोग और समर्थन के बगैर कितना जी सकते हैं यह भी तो उन्हें ही देखना और तय करना है। अक्सर पंजाब में आतंकवाद के खात्मे के लिये वहां के डीजीपी रहे केपीएस गिल के उल्लेखनीय योगदान की चर्चा की जाती है। गिल साहब को यह सम्मान दिया जाना चाहिए।

निश्चित ही आज़ाद भारत के बाद अलगाववाद की सबसे बड़ी चुनौती का उन्होंने, बेहद कुशलता और बहादुरी से सामना किया था। लेकिन गिल साहब और पंजाब पुलिस के पीछे पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और उनकी सरकार की जो दृढ़ इच्छाशक्ति थी उसे नज़रअंदाज़ कर जाना अनुचित होगा। अंत मे बेअंत सिंह की भी हत्या आतंकवादी कर देते हैं। यह याद रखा जाना चाहिए कि, पुलिस केवल एक विभाग है, जो अनेक नियमों और उपनियमों से बंधा है । वह सरकार नहीं है।

उतर प्रदेश की विधानसभा में, एडीआर, ( एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ) के आंकड़ों के अनुसार, 36 % विधायक ऐसे हैं जो आपराधिक पृष्ठभूमि से आते हैं। इनमें से 26 % के खिलाफ तो संगीन अपराधों के मुक़दमे दर्ज हैं। क्या इन विधायकों का संरक्षण उनके अपने अपने क्षेत्रों के छुटभैये बदमाशों को मिलता नहीं होगा ? बिल्कुल मिलता है और सबको पता भी है। यही संरक्षण विकास दुबे को भी समय-समय पर प्राप्त था। समस्या केवल, राजनीति के अपराधीकरण की ही नहीं है बल्कि पुलिसजन में राजनीतिक पैठ की भी है। यूपी में जब से क्षेत्रीय दलों, की सरकारें सत्ता में आयीं, तब से पुलिस का न केवल राजनीतिकरण बढ़ा बल्कि पुलिस का विभाजन भी जातिगत आधार पर होने लगा।

यह जातिगत विभाजन सरकार को रास आता था क्योंकि क्षेत्रीय दल जातीय ध्रुवीकरण के आधार पर पल्लवित होते हैं और उनका राजनीतिक एजेंडा जाति और क्षेत्र को देख कर तय होता है । जब राम मंदिर आंदोलन चला तो पुलिस का साम्प्रदायिक रूप भी सामने आया, जो और भी खतरनाक है। कहने का आशय यह है कि समाज का जैसे जैसे स्वरूप बनता गया पुलिस का रंग वैसे वैसे ही बदरंग होता गया। पुलिस एक पेशेवर विधि तन्त्र बनी न रह सकी और इससे पुलिस की साख और भरोसे का और भी क्षरण हुआ।

इसीलिए पुलिस सुधार का सबसे महत्वपूर्ण अंग है पुलिस को, राजनीतिक आकाओं के स्वार्थ पूर्ति से दूर रखना और एक प्रोफेशनल लॉ इंफोर्समेंट एजेंसी के रूप में बनाये रखना। यह मुश्किल ज़रूर है पर समाज, देश और जनहित के लिये अनिवार्य भी है। राज्य सुरक्षा आयोग के गठन के पीछे यह मंशा है कि राज्य सरकार पुलिस के दिन प्रतिदिन के काम मे दखल न दे। जो भी दखल हो वह यह आयोग करे।

पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायतें हों तो, उसे कम्प्लेंट अथॉरिटी जांच करे। सनक और हनक, ज़िद और राजनीतिक तुष्टीकरण के लिये तबादले न हों और ट्रांसफर पोस्टिंग में नेताओं की मनमर्जी जैसे, मैं हटवा दूंगा, मैं वहां ले चलूंगा जैसी भौकाली फरमान बंद हो। हालांकि कुछ राज्यों में ऐसे आयोग गठित हैं लेकिन उन्हें मजबूती से खड़े होने में अभी समय लगेगा। यह निर्णय राजनीतिक नेतृत्व को लेना है, न कि डीजीपी को। चाहे वह डीजीपी कितना भी सक्षम, समर्थ और साफ सुथरा क़ाम करने वाला हो वह राजनीतिक नीति नियंता नहीं होता है बल्कि वह सरकार के अधीन एक अधिकारी ही है, जिसकी अपनी सीमाएं भी हैं।

मैंने पुलिस आयोग की सिफारिशें, प्रकाश सिंह की याचिका, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, और उस पर की गयी कार्यवाहियों का एक संक्षिप्त विवरण इस लिये प्रस्तुत किया है जिससे यह स्पष्ट हो जाए कि पुलिस सुधार के प्रति राजनीतिक इच्छाशक्ति की क्या स्थिति है और सरकारें इन सुधारों के प्रति कितनी गम्भीर हैं, इसका आभास पाठकों को हो जाए। पुलिस एक कानून के अंतर्गत कानून को लागू करने की संस्था के रूप में अवधारित है न कि सत्ता को बनाये रखने और सत्ता के हित साधक उपकरण के रूप में।

राज्य सरकारों और साथ ही देश के राजनैतिक नेतृत्व को भी यह समझना होगा कि आधुनिक एवं प्रगतिशील भारत के निर्माण और विधि के शासन के लिए पुलिस सुधार आवश्यक ही नहीं, बल्कि यह अपरिहार्य हैं। इन सुधारों से पुलिस की कार्यशैली स्वच्छ और प्रभावी होगी, अधिकारियों की नियुक्ति में पारदर्शिता होगी, मानवाधिकारों का संरक्षण होगा और देश में कानून का राज होगा। आज हम एक सामंतवादी पुलिस की जकड़ में हैं। आवश्यकता है एक ऐसे पुलिस की जो जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझे और प्रतिदिन के कार्यों में कानून को लागू करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on July 14, 2020 10:04 am

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