Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

लॉक डॉउन खत्म करना एक बड़ी चुनौती

सारा विश्व कोरोना महामारी की भयंकर चपेट में है। जिंदगी और मौत की सबसे कठिन लड़ाई लड़ी जा रही है। विश्व की सारी सरकारें अपने तमाम संसाधनों के साथ इस भयंकर महामारी से मुकाबला करने में पूरी ताकत से जूझ रही है। सभी विशेषज्ञ और जानकार इस सामाजिक दूरी को ही कोरोना से बचने का अब तक सबसे बेहतर और कारगर उपाय बता रहे हैं।

विगत दो हफ्ते से पूरा देश लॉक डॉउन में है, हालांकि देश भर में फिलहाल संक्रमण के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं मगर यह भी सच है कि सामाजिक दूरी के चलते ये संख्या काफी कम हो गई है।

सबसे ज़रूरी कदम जो कोरोना से लड़ने में कारगर माना गया है वो है सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी। इसके लिए ही पूरे देश में लॉक डॉउन किया गया है और देश के काफी प्रदेशों और स्थानों में इस दिशा में काफी सराहनीय क्रियान्वयन किया गया है।

जिन स्थानों पर सामाजिक दूरी रखने की दिशा में सख्ती से क्रियान्वयन किया गया वहां इसके  सकारात्मक परिणाम भी देखने में सामने आए हैं और संक्रमण के फैलाव पर काफी हद तक काबू पाने में सफलता मिली है। इन सबके बावजूद अभी खतरा टल गया है ऐसा नहीं माना जा सकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों के मुताबिक संक्रमण के प्रभाव को खत्म करने में अभी एक लम्बा वक्त लगेगा। इस बीच पूरे विश्व में सामाजिक दूरी पर गंभीरता से लगातार अमल करने पर जोर दिया जा रहा है।

एम्स के डायरेक्टर ने हाल ही में चेतावनी दी है कि अब इसके आगे और ज्यादा सावधानी की जरूरत है। उनके अनुसार भारत में कोरोना का संक्रमण एक सरीखा का नहीं है। अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग प्रभाव देखने में आ रहा है। उनके अनुसार जिन राज्यों में सोशल डिस्टेंस पर सख्ती से अमल किया जा रहा है, वहां बेहतर परिणाम मिल रहे हैं।

राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल समेत कुछ और राज्यों में भी इसके सकारात्मक और उत्साहजनक परिणाम देखने को मिले हैं। केंद्र सरकार ने इस पर और कड़ाई बरतने का निर्देश जारी किया है। अभी 14 अप्रैल तक पूरे देश में परिस्थितियों का अवलोकन कर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

सवाल ये है कि क्या 14 तारीख के पश्चात लॉक डॉउन खत्म कर दिया जाना चाहिए? यह एक यक्ष प्रश्न है। लॉक डॉउन खोलने के सुझावों पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों की राय पर ही इन सुझावों पर अमल किया जाएगा।

कुछ जानकारों ने 21–5–28-5-18 दिन का फार्मूला दिया है। इसके अनुसार 21 दिन के पश्चात पांच दिन का ब्रेक फिर 28 दिन का लॉक डॉउन फिर पांच दिन का ब्रेक और फिर 18 दिन का लॉक डॉउन किया जाना चाहिए ।

इसमें एक शंका मन में उठती है कि इस तरह 21 दिन बाद पांच दिनों के लिए लॉक डॉउन खोल देने से जो अब तक थोड़ा बहुत भी संक्रमण पर काबू पाया गया है उसे कैसे रोककर रखा जा सकेगा। विभिन्न राज्यों की सीमाओं पर अभी लाखों पलायन किए लोग राहत शिविरों और अन्य स्थानों पर रह रहे हैं।

लॉक डॉउन खुलते ही वो सीधे गावों-कस्बों की ओर अपने घरों का रुख करेंगे। गौरतलब है कि इन लोगों का बड़ी तादाद में न तो कोई टेस्ट हुआ है और न कोई सैंपल ही लिया जा सका है। इस स्थिति में इनके गावों-कस्बों में सीधे चला जाना कितना खतरनाक और नुकसानदेह हो सकता है इसकी कल्पना से ही रुह कांप जाती है।

दूसरी ओर कुछ का मानना है कि 14 तारीख के पश्चात बिना ब्रेक सीधे 49 दिन का एकमुश्त लॉक डाउन कर दिया जाना चाहिए। इससे सामाजिक दूरी के जरिए अभी तक हासिल उपलब्धि बाधित न हो और आगामी 49 दिनों में संक्रमण का खतरा लगभग नगण्य किया जा सके।

निश्चित रूप से लगातार लॉक डॉउन से काफी तेजी से संक्रमण पर काबू पाने में मदद मिलेगी। मगर वो ही लोग जो राज्य की सीमाओं पर रोक दिए गए हैं उनके भरण पोषण के साथ-साथ उनमें पनपते असंतोष, घर जाने की बेचैनी और बेघर-बार होकर सड़कों पर नकारा पड़े रहने के मानसिक उद्वेलन को संभाल पाना बड़ी चुनौती हो सकती है।

इसके दूसरे पहलू को देखें तो स्थिति की भयावहता सामने आती है। कॉर्पोरेट की वर्क फ्रॉम होम नीति भी एक बहुत छोटे तबके तक ही सीमित है। मंदी की मार से जूझ रहा कॉर्पोरेट अब छटनी की राह पकड़ रहा है। साथ ही विगत 21 दिनों से घरों में बंद लोगों की बड़ी तादाद में बड़े लोकल उद्योगपति, बड़े-छोटे व्यापारी एवं रोज कमाने खाने वालों की है। वो भी लगभग ठप्प से पड़े हुए हैं।

इन उद्योगों से बहुत बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार जुड़ा है। ये नियोक्ता और छोटे शहरों में मालिक के रूप में जाने जाते सेठ व्यापारी एक-दो माह तो अपने कर्मचारियों को खाली बैठाकर तन्ख्वाह दे सकते हैं, मगर मंदी के दौर में आय न होने से यहां भी छटनी की समस्या बढ़ जाएगी। ऐसी स्थिति में पहले से बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे देश में भुखमरी और बेकारी की समस्या विकराल रूप ले सकती है।

इन तमाम पहलुओं पर गौर करें तो एक ओर कोरोना की दहशत से पूरी तरह निजात पाए बिना आर्थिक हालात सुधरना मुश्किल लगता है तो वहीं दूसरी ओर देशव्यापी विस्थापन और ठप्प पड़े कामकाज से पनपते असंतोष को सामूहिक निराशा में तब्दील होने या अराजकता और हिंसा की हद तक पहुंचने से पहले ही रोकना भी एक बड़ी चुनौती है।

इसी भयावहता के अंदेशे को भांपते हुए प्रधानमंत्री ने बड़ी मुद्दत के पश्चात प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सहित अन्य सभी विपक्षी दलों के नेताओं से बातचीत की पहल की है। निश्चित रूप से यह एक सकारात्मक पहल है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।

इस मुश्किल घड़ी में ईगो और तमाम वैचारिक मतभेद भुलाकर सभी दलों के शीर्ष नेताओं को एक साथ मिलकर आपसी सहयोग और समन्वय से लोकहित में यथोचित संयुक्त रूप से फैसला लेना होगा।

इस विकराल परिस्थिति में जब इधर कुंआ उधर खाई हो तब पूरे देश को एकजुट होना होगा। कुछ समय के लिए राजनीति के साथ ही सामाजिक और सांप्रदायिक दोषारोपण और आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठ कर देशहित में लोकहित में एक साथ आना होगा, तभी इस संकट पर विजय पाई जा सकेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, कवि, कथाकार हैं और समसामयिक मुद्दों पर लगातार लिखते रहते हैं।

This post was last modified on April 7, 2020 9:54 am

Share