Saturday, December 4, 2021

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सामाजिक संघर्ष में तब्दील होता किसान आंदोलन

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हाड़ कंपाती ठंड में लगभग डेढ़ माह से दिल्ली सीमा पर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे किसानों का मोर्चा धीरे-धीरे सामाजिक संघर्ष में तब्दील होता जा रहा है। किसी भी लड़ाई का चरम बिंदु होता है जब वो पूरे समाज को स्वीकार्य होकर समाज की लड़ाई बन जाता है, समाज के हर वर्ग और  एक एक व्यक्ति का संघर्ष बन जाता है।

आजादी की लड़ाई से इस चरम को समझा जा सकता है। 1857 के बाद अनेक स्तर पर आजादी के लिए अलग-अलग क्षमताओं में  संघर्ष किए जाते रहे, मगर महात्मा गांधी ने स्वराज और आजादी के अहसास को धीरे-धीरे आम जन तक पहुंचाया और इसमें महिलाओं और निचले तबके के उपेक्षित लोगों को जोड़ा। आजादी की लड़ाई में यह एक इंकलाबी मोड़ साबित हुआ और उनकी यह कोशिश और सोच ने आजादी की लड़ाई को पूरे समाज, देश की अस्मिता और एक-एक व्यक्ति की अस्तित्व की लड़ाई में बदल डाला। व्यक्तिगत सत्याग्रह इसी एहसास के वृहत्तर संघर्ष में बदल जाने की परिणीति थी।

किसान आंदोलन भी धीरे-धीरे पूरे समाज की सहानुभूति अर्जित करता जा रहा है। जहां एक ओर पंजाब के गांव-गांव से बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक इस आंदोलन से जुड़ गए हैं वहीं देश-विदेश के लाखों युवा अपनी सामर्थ्य से आगे जाकर इन किसानों के साथ जुड़ते जा रहे हैं। अप्रवासी भारतीय लगातार विदेशों में भी किसान आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर निकल रहे हैं और विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों के सामने प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है जब किसानों का पूरा परिवार आंदोलन में सक्रिय भागीदीरी कर रहा है।

अब तक देखा गया कि विभिन्न आंदोलनों में अप्रवासी भारतीयों द्वारा आर्थिक सहायता तो की जाती रही, मगर ऐसा पहली बार हो रहा है जब आर्थिक के साथ-साथ सक्रिय रूप से भौतिक और नैतिक समर्थन में लोग घरों से निकल कर खुलकर सीधे तौर पर बाहर आ रहे हैं। यह उल्लेखनीय बदलाव और ट्रेंड स्पष्ट रूप से इस आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है। 

सबसे सुखद पहलू है इस आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी। लोग इस बात से अक्सर आंख मूंद लेते हैं, कृषि में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कम नहीं है। इस आंदोलन में महिलाएं सिर्फ महिला होने के नाते नहीं बल्कि एक कृषक के रूप में भाग ले रही हैं और आंदोलन स्थल के विभिन्न मंचों से अपनी बात रख रही हैं। देश में महिला कृषकों की तादाद बहुत ज्यादा है, मगर अफसोसनाक बात ये है कि आज तक इस पर न कोई ठोस आंकड़े एकत्रित किए गए और न ही इन्हें स्वतंत्र मान्यता ही दी गई। कृषक महिलाओं के साथ ही कॉलेज की युवतियां भी बढ़-चढ़ कर आंदोलन में भागीदारी कर रही हैं।

इस आंदोलन को लेकर शुरुआत से ही मीडिया की भूमिका असहयोगात्मक ही नहीं बल्कि नकारात्मक ही रही। लोकतंत्र में जनअभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम माना जाने वाला मीडिया अपनी भूमिका के विपरीत शासक और सरकार का पक्षधर हो जाए, इससे बड़े दुख और शर्म की कोई बात नहीं हो सकती। मगर इस आंदोलन में मीडिया के एक नए रूप का उदय हुआ। जब आंदोलनकारियों ने बिकाऊ मीडिया और सरकारी प्रचार तंत्र के खिलाफ खुद अपना मीडिया ट्रॉली टाइम्स, का प्रकाशन आंदोलन स्थल से ही प्रारंभ कर एक नई परंपरा की शुरुआत की।

इसके साथ ही इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी उन्होंने खुद का मीडिया शुरू कर दिया। यह एक क्रांतिकारी और अभिनव पहल कही जा सकती है। ये सब किसानों के साथ आम जन की भागीदारी का ही परिणाम है कि सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी के खिलाफ आंदोलनकारियों के साथ-साथ राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आम जनता ने भी करारा प्रतिवाद और प्रहार करना प्रारंभ किया, जिसके परिणाम स्वरूप किराए के पिट्ठू मुंह छुपाकर भाग खड़े होने पर मजबूर हो गए।

मुख्यधारा का मीडिया हालांकि बेशर्मी की तमाम हदें पार कर आज भी सरकारी भोंपू की तरह ही काम कर रहा है, मगर इसका खामियाजा भी ऐसे मीडिया को भुगतना पड़ रहा है। आज ऐसे मीडिया की विश्वसनीयता आम जन की नज़रों में लगभग खत्म हो चुकी है और सम्मान की कहीं कोई जगह नहीं रही।

आंदोलन की शुरुआत से ही सरकार का पूरा जोर आंदोलन को राजनीतिक षड़यंत्र के रूप में स्थापित करने पर ही रहा है। इस बात के लिए किसान संगठनों की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपने आंदोलन को किसी भी राजनीतिक दल के नेतृत्व के शरणागत होने से बचाए रखा है। हालांकि लगभग सभी विपक्षी दल इस आंदोलन से लाभ लेने की कोशिश में हैं, जिसके चलते वे बाहर से किसानों का समर्थन कर रहे हैं। यह भी गौरतलब है कि गैरराजनैतिक होने की वजह से ही जमीनी स्तर पर जनभागीदारी और व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है। इसके चलते ही लगातार दिन ब दिन जन सहानुभूति, जन भावना और जन समर्थन किसानों के साथ बढ़ता जा रहा है।

सबसे दुखद पहलू सरकार का असंवेदनशील रवैया है। अपनी ट्रोल आर्मी के माध्यम से सोशल मीडिया के जरिए आंदोलनकारियों को खलिस्तानी और आतंकी जैसे विश्लेषणों का घृणित उपयोग करने के साथ-साथ मुख्यधारा के अधिकांश मीडिया को मैनेज कर पूरे आंदोलन को बदनाम करने की असफल कोशिशों से सरकार की छवि धूमिल ही हुई है। सूचना के मुताबिक अब तक 56 किसान अपनी जान गंवा चुके हैं, मगर सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। सरकार अपनी जिद पर अड़ी हुई है और किसानों की बात गंभीरता से सुनने के बजाय किसानों को खालिस्तानी, आतंकी नाम से संबोधित कर अपनी ट्रोल आर्मी के जरिए आमजन में किसानों के प्रति नफरत फैलाने की कोशिशों पर ज्यादा मेहनत करती रही।

नफरत कोरोना की तरह एक बहुत खतरनाक वायरस है जो बहुत तेजी से फैलता है, इसके संक्रमण का दायरा इतना तीव्र और विशाल होता है कि यह सीधे मस्तिष्क पर हमला कर व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति को कुंद करता है और एक दिन पूरे समाज को और सामाजिक समरसता सौजन्यता को संक्रमित कर खत्म कर देता है। इसका इलाज सिर्फ और सिर्फ प्रेम रूपी वैक्सीन ही है।

सरकार के तमाम षड़यंत्रों और बिकाऊ मीडिया से जूझता-लड़ता किसानों का यह आंदोलन एक बेहद सुनियोजित एवं संगठित रूप से लगातार मजबूत होता जा रहा है। यही इस आंदोलन का महत्वपूर्ण हासिल है। ऊपरी तौर पर ये कानून किसानों को प्रभावित करते लगते हैं, मगर व्यापकता में इन कानूनों का परिणाम आमजन को ही प्रभावित करेगा। इसी के मद्देनजर आमजन भी सक्रिय होकर किसानों का साथ दे रहे हैं। अतः इसे महज किसानों के आंदोलन तक सीमित रखना उचित नहीं होगा।

गौरतलब है कि ऐसे अन्य कई मुद्दे या कानून अस्तित्व में आए जो आमजन को सीधे प्रभावित करते रहे हैं मगर उन पर ऐसा सशक्त आंदोलन संभव नहीं हो पाया। बहुत अरसे के बाद किसी आंदोलन में सामाजिक भागीदीरी हुई है, सरकार इसीलिए बैकफुट पर है। इसकी सफलता संभवतः आंदोलनों की नई दिशा तय करने में महत्वपूर्म कदम साबित होगी। आज मेहनतकश अपना हिस्सा मांग रहा है, वो भी सिर्फ अपना बाग अपना खेत, आज अगर सत्ताधारी नहीं सुने तो बहुत जल्द वो सारी दुनिया छीन लेगा।

(जीवेश चौबे कवि और कथाकार हैं।)

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