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Categories: बीच बहस

नए भारत में बदहाल किसान

सरकार कोविड-19 के कारण उत्पन्न स्वास्थ्य आपातकाल जैसी दशाओं के मध्य – जबकि संसद से बाहर और संसद में भी चर्चा, विमर्श, प्रतिरोध एवं जनांदोलन के लिए स्थान लगभग नगण्य है- कृषि सुधारों को अध्यादेशों के रूप में चोर दरवाजे से जून माह में लागू करती है, फिर संसद के मानसून सत्र में इन्हें विधेयकों के रूप में पेश किया जाता है और संसद के अंदर एवं बाहर जबरदस्त विरोध के बावजूद यह बिल पास कराए जाते हैं।

राज्यसभा में विपक्ष द्वारा मत विभाजन की माँग अस्वीकार कर दी जाती है और बिल को ध्वनि मत से पास करा दिया जाता है जबकि विपक्ष यह दावा कर रहा है कि यदि मत विभाजन होता तो सरकार की हार तय थी। बहरहाल जैसी इस सरकार की रणनीति रही है राज्य सभा में विपक्षी सदस्यों के हंगामे को आधार बनाकर राजनाथ सिंह के नेतृत्व में 6 मंत्रियों की प्रेस कांफ्रेंस होती है और रक्षात्मक होने के स्थान पर हमलावर तेवर दिखाए जाते हैं। सरकार की हड़बड़ी और हठधर्मिता संदेह उत्पन्न करने वाले हैं।

सरकार के यह कृषि सुधार किसानों के सहस्राधिक छोटे बड़े संगठनों द्वारा वांछित नहीं थे। किसी भी किसान संगठन ने इन सुधारों की न तो माँग की थी न ही इनके लिए कोई आंदोलन ही हुआ था।  कृषि और किसी राज्य के भीतर होने वाला व्यापार राज्य सूची के विषय हैं। केंद्र सरकार इनके विषय में बिना राज्यों से चर्चा किए और बिना उन्हें विश्वास में लिए कोई कानून कैसे बना सकती है? सरकार ने पहले इन सुधारों को कोविड-19 विषयक राहत पैकेज से जोड़ा और इन्हें कोविड-19 व लॉक डाउन के कारण बर्बाद हो गए किसानों की दशा सुधारने के आपात उपायों के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। किंतु यह सभी को पता था कि इन कृषि सुधारों का कोविड-19 और लॉक डाउन की मार झेल रहे बदहाल किसानों से कुछ भी लेना देना नहीं है, इसलिए सरकार का यह झूठ चल नहीं पाया और अब सरकार खोखली आक्रामकता के साथ यह कह रही है कि पिछले दो दशकों से जिन कृषि सुधारों की मांग की जा रही थी उन्हें हमने क्रियान्वित किया है ।

हमारे इरादे मजबूत हैं। हम निर्णय लेने वाली सरकार हैं जिसका नेतृत्व नरेन्द्र मोदी जी के हाथों में है जिनका आविर्भाव ही भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए हुआ है। इसके बाद सरकार के प्रवक्ता और मंत्रीगण अपनी स्मरण शक्ति और कल्पना शक्ति की सीमाओं के अनुसार मोदी जी के अलौकिक और दैवीय गुणों का बखान करने लगते हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इन कृषि सुधारों को लागू करने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यही है कि मोदी जी ने इनके लिए इच्छा की है।

कुल मिलाकर यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार किसी भी कीमत पर इन कृषि सुधारों को लागू करना चाहती है और इसके लिए वह अतिशय सतर्कता और चातुर्य का सहारा ले रही है। किंतु अनेक बार ऐसा लगता है कि सरकार अनावश्यक रूप से इतनी सावधानी बरत रही है। देश में किसान आंदोलन की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ताकतवर कहे जाने वाले किसान नेताओं में एक बड़ी संख्या छोटे पूंजीपतियों की है जिनके लिए कृषि एक व्यापार रही है और खेत में हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले असली किसान से जिनका रिश्ता स्वार्थी मालिक और मजबूर मजदूर का ही रहा है।

जिस प्रकार ट्रेड यूनियन आंदोलन को राजनीतिक दलों के प्रवेश ने छिन्न भिन्न कर दिया है उसी प्रकार किसान आंदोलन भी राजनीतिक दलों के प्रवेश के बाद एक लक्ष्य के लिए एकरैखिक संघर्ष कर पाने में असमर्थ सा हो गया है। आज किसान राजनीति करने वाले अनेक नेता किसानों के हित के लिए राजनीति नहीं करते बल्कि किसानों के बल पर अपना हित साधने की राजनीति करते हैं। आंदोलन को मूल लक्ष्य से भटकाने वाले समझौतापरस्त नेताओं की संख्या बढ़ी है जिनके लिए किसान हित के स्थान पर दलीय स्वार्थ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

सरकार अंततः कॉरपोरेट घरानों के लिए कार्य कर रही है और सरकार का विरोध कर रहे किसानों की असली लड़ाई इन्हीं से होनी है।  इस बात की पूरी आशंका है कि कृषि के कॉरपोरेटीकरण के विरोध में होने वाले किसान आंदोलन छोटे-बड़े स्थानीय पूंजीपतियों और दानवाकार कॉरपोरेट्स के मध्य हितों के टकराव में न बदल जाएं। यह दोनों ही समान आदर्शों द्वारा संचालित हैं, किसी भी कीमत पर अपने मुनाफे को बरकरार रखना और बढ़ाना इनका एकमात्र ध्येय है। अतः इनके बीच सौदे, समझौते और गठजोड़ की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी। बाजारवादी वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था उस आदिम सिद्धांत द्वारा संचालित होती रही है जिसके अनुसार छोटी मछली की नियति ही यह है कि बड़ी मछली द्वारा उसे खा लिया जाए किंतु यह तभी संभव हो सकता है जब छोटी मछलियों में एकता न हो, वे असंगठित हों और उनमें बड़ी मछली को मदद देने वाली छोटी मछलियां हों।

दुनिया के विकासशील देशों में बाजारवादी मुक्त अर्थव्यवस्था ने छोटे व मझोले उद्योग धंधों और कृषि को तबाह किया है। बाजारवाद अपने मंसूबों में कामयाब हुआ है, इसके पीछे एक बड़ा कारण यह रहा है कि छोटे पूंजीपतियों, संपन्न और ताकतवर किसानों तथा उच्च मध्यम वर्ग ने इसे प्रारंभ में समृद्धि के एक अवसर के रूप में समझने की गलती की है और इसकी बड़ी कीमत भी चुकाई है। यह देश का दुर्भाग्य होगा यदि यह किसान प्रतिरोध दो शोषकों की नूरा कुश्ती में बदल जाए जहाँ कॉर्पोरेट घराने तथा नए तेवर और कलेवर वाले जमींदारनुमा किसान नेता आम किसान का खून चूसने के अपने अपने हक के लिए दावे करते नजर आएं और कोई ऐसी दुरभि संधि हो जाए जिसमें आम किसान को मैनेज करने का ठेका इन आधुनिक जमींदारों को मिल जाए।

अभी तक किसानों ने अपने आंदोलन का स्वरूप अराजनीतिक बनाए रखा है किंतु जब उनके भाग्य का फैसला राजनीतिज्ञों को ही करना है तब यह अराजनीतिक स्वरूप लंबे समय तक बरकरार रह पाएगा ऐसा नहीं लगता। आंदोलन को महत्वहीन बनाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। इन कृषि सुधारों के समर्थन में आंदोलनरत किसानों के समाचार टीवी चैनलों पर आने लगे हैं। अब प्रायोजित समर्थन और प्रायोजित विरोध जैसे आरोपों और प्रत्यारोपों का विमर्श प्रारंभ हो जाएगा। किसानों के प्रतिरोध को हरियाणा और पंजाब के किसानों तक सीमित बताने और बनाने की कोशिश भी हो रही है जिससे इसे राष्ट्रव्यापी विस्तार न मिल सके।

सत्तारूढ़ भाजपा और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सिद्धांततः इन कृषि सुधारों के समर्थक हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी तब वही संवाद बोलती थी जो आज कांग्रेस बोल रही है और जब कांग्रेस सत्ता में थी तब वही संवाद अदा करती थी जो आज भाजपा द्वारा अदा किए जा रहे हैं। अभी तक  इन दोनों अदाकारों के ये संवाद जनता को पसंद आते रहे हैं और इसीलिए किसी तीसरे विकल्प को अवसर नहीं मिलता।

यह दुःखद  संयोग है कि अब भी जब इन कृषि सुधारों पर संसद में चर्चा हो रही थी तो कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व चर्चा में सम्मिलित नहीं हो सका।  संभवतः पुत्र राहुल अपनी रुग्ण माता सोनिया की चिकित्सा के लिए देश से बाहर हैं। राहुल उन जवाहरलाल नेहरू के वंशज हैं जिनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेलों में गुजरा।  अपनी अर्द्धांगिनी की गंभीर अस्वस्थता के दौरान भी नेहरू अंग्रेजों की कैद में थे। राहुल उस कांग्रेस के सदस्य हैं जिसके हजारों कार्यकर्ता स्वतंत्रता संग्राम में बहादुरी से लड़े और अपने परिवार की कीमत पर उन्होंने देश को आजादी दिलाई। राहुल उस कांग्रेस से जुड़े हैं जिसने गांधी जी के नेतृत्व में किसानों के हक की लड़ाई को देश की आजादी के महाभियान में बदल दिया था। इसीलिए उनसे यह अपेक्षा हमेशा रहती है कि वे प्राथमिकताओं का बेहतर चयन करेंगे और असाधारण साहस एवं समर्पण का परिचय देंगे।

देश के लघु और सीमांत किसानों तथा कृषि मजदूरों को हमने 2018-19 के महाराष्ट्र के लांग मार्च के दौरान सड़कों पर अपने हक के लिए प्रदर्शन करते देखा था। यह असंतोष देश के अनेक प्रदेशों में व्याप्त था, उग्र धरने प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे थे। 2019 के लोकसभा चुनाव निकट थे और हम सब प्रसन्न एवं आश्वस्त थे कि पहली बार किसान कम से कम कुछ प्रदेशों में एक किसान के रूप में मतदान करेंगे। किंतु किसानों का यह असंतोष वोटों में बदल नहीं पाया। बहुतेरे किसानों ने जाति, धर्म और उग्र राष्ट्रवाद के आधार पर मतदान किया। अनेक किसान स्थानीय मुद्दों और प्रांतवाद के फेर में पड़ गए और भाजपा को फिर जीत मिली।

हरित क्रांति के जमाने से हमारे देश में अपनाई गई नीतियाँ कुछ ऐसी रही हैं कि कृषि की उन्नति और किसानों की समृद्धि में व्युत्क्रमानुपाती संबंध रहा है। कृषि जितनी ज्यादा उन्नत होती है, कृषि उत्पादन जितना ही अधिक बढ़ता है किसान उतना ही निर्धन और पराधीन होता जाता है। वर्तमान कृषि सुधार कोई अपवाद नहीं हैं। इन कृषि सुधारों से कृषि क्षेत्र का घाटा कम हो जाएगा। उन्नत तकनीक और यंत्रीकरण के कारण लागत में कमी आएगी। कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी। कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण और परिरक्षण की सुविधाएं बढ़ेंगी। कृषि में अधोसंरचना का विकास होगा। किंतु इन सारे क्रांतिकारी परिवर्तनों का लाभ छोटे,मझोले और सीमांत किसानों तथा कृषि मजदूरों को कभी नहीं मिल पाएगा।

यह कृषि सुधार देश की मिट्टी से सने असली किसान के लिए नहीं हैं बल्कि इन लाखों मेहनतकशों को जो थोड़ी बहुत आर्थिक आजादी या जमीन की मालकियत का जो खोखला सा अहसास मयस्सर था उसे भी उनसे छीना जा रहा है। इन कृषि सुधारों को लागू करने के पीछे जो तर्क दिया जा रहा है वह भी नया नहीं है। मंडी व्यवस्था में जबरन प्रविष्ट कराई गई असंख्य बुराइयों और इस व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार से हम सभी परिचित हैं। कहीं राजनीतिकरण तो कहीं लालफीताशाही किसानों को उनके हक से वंचित करती रही है। समर्थन मूल्य की अपर्याप्तता और उस अपर्याप्त समर्थन मूल्य पर भी खरीद न हो पाने तथा किसानों को खरीदी गई फसल का दाम न मिलने की शिकायतें आम रही हैं।

किंतु इन बुराइयों को दूर करने के स्थान पर अप्रत्यक्ष रूप से मंडी व्यवस्था को ही समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। कृषि के निजीकरण के लिए प्रयुक्त तरकीब पुरानी है और कारगर भी। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को भी पहले कुव्यवस्था, कुप्रबंधन, संसाधनों की कमी और भ्रष्टाचार का शिकार बनाया जाता है। इन बुराइयों को प्रश्रय देने वाली सरकार से इन्हें दूर करने की आशा तो कतई नहीं की जा सकती हाँ सरकार निजी क्षेत्र को जादुई चिराग के रूप में प्रस्तुत करने की बाजीगरी अवश्य दिखाती है।

प्रधानमंत्री जी ने कहा कि इन कृषि सुधारों का विरोध करने वाले दरअसल किसानों का हक मारने वाले बिचौलियों के लिए काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को इन बिचौलियों को परिभाषित करना चाहिए था। ये कोई परग्रही प्राणी नहीं हैं बल्कि व्यापार और राजनीति के अवसरवादी गठजोड़ की पैदाइश हैं, यह हर राजनीतिक दल की पसंद हैं और इनमें एक बड़ी संख्या भाजपा के पारंपरिक मतदाताओं की है। यह इसी देश के छोटे मझोले व्यापारी और आढ़तिये हैं जो ग्रामीण राजनीति में दखल रखते हैं। ग्रामीण शोषण तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद अंततः ये स्थानीय ही होते हैं और कागजों में सिमटी सरकारी योजनाओं के निकम्मेपन के बावजूद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चलायमान रखते हैं। स्थानीय ग्रामीणों से इनकी लव-हेट रिलेशनशिप होती है, यह ग्रामीणों का शोषण भी करते हैं किंतु जरूरत के वक्त यह उनके काम भी आते हैं।

लापता सरकारी तंत्र के अदृश्य कल्याणकारी कार्यक्रम और ग्रामीणों की पहुंच से बाहर रहने वाली बैंकिंग व्यवस्था के कारण इनकी आवश्यकता और प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है। इनकी संख्या बहुत बड़ी है। इनकी व्यापारिक गतिविधियां ग्रामीण रोजगार का एक महत्वपूर्ण जरिया हैं। यह उतने ही भ्रष्ट या ईमानदार होते हैं जितने हम सब हैं। कम से कम यह कॉरपोरेट कंपनी की तरह अपराजेय तो कतई नहीं होते। इन्हें बदला जा सकता है, सुधारा जा सकता है, अनुशासित, नियमित, नियंत्रित और दंडित किया जा सकता है। अपनी तमाम अराजकता के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था को बचाने वाला असंगठित क्षेत्र गाँवों में कुछ ऐसे ही विद्यमान है।

कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट जगत की एंट्री और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के बाद क्या होगा? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए बहुत अनुसंधान की जरूरत नहीं है। भारत से पहले अनेक विकसित और विकासशील देशों में यह प्रयोग किया गया है और अनिवार्यतः किसानों के लिए विनाशकारी रहा है। किंतु हमारी अर्थनीति के कारण हमें सारे समाधान निजीकरण में नजर आते हैं।  हम जीडीपी में कृषि की घटती हिस्सेदारी को एक शुभ संकेत मानते हैं तथा यह विश्वास करते हैं कि यह अर्थव्यवस्था के बढ़ते आकार और सेवा एवं उद्योग आदि क्षेत्रों के विस्तार का परिणाम है।

इसी प्रकार हमारी कुल वर्क फोर्स के 50 प्रतिशत को रोजगार देने वाली खेती के बारे में हमारी मान्यता है कि इससे जरूरत से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं और बहुत कम लागत में बहुत कम मानव संसाधन के साथ हम विपुल कृषि उत्पादन कर सकते हैं। गांवों से लोग पलायन करेंगे तो शहरी कारखानों को सस्ते मजदूर मिलेंगे। जब मनुष्य के स्थान पर आंकड़े महत्वपूर्ण बन जाएं, मानव जीवन की गुणवत्ता के स्थान पर उत्पादन की मात्रा हमारी प्राथमिकता हो, संपन्नता के आकलन में हम वितरण की असमानता को नजरअंदाज करने लगें तथा मनुष्य को विकास के केंद्र में रखने के बजाए संसाधन का दर्जा देने लगें तो इन कृषि सुधारों के विरोध का कोई कारण शेष नहीं बचता।

कृषि सुधार तब सार्थक होते जब बटाई पर जमीन लेने वाले भूमिहीन किसानों और भूमि स्वामियों के बीच कोई न्यायोचित अनुबंध होता जिसमें अब तक दमन और शोषण के शिकार भूमिहीन किसानों के हितों को संरक्षण दिया जाता। कृषि सुधार तब ऐतिहासिक होते जब भूमि सुधारों को पूरी ईमानदारी से लागू करने के लिए कोई रणनीति बनती जिसके माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी खेतों में अपना खून-पसीना लगाने वाले इन असली किसानों को उन खेतों का मालिकाना हक मिलता।

आजादी के बाद भी बंधुआ मजदूरी जारी है और खेती से जुड़े बंधुआ मजदूरों की एक विशाल संख्या है जो नारकीय जीवन जीने को बाध्य हैं। कृषि सुधार तब महत्वपूर्ण होते जब इन बंधुआ कृषि मजदूरों की आजादी के लिए प्रावधान किया जाता। कृषि सुधार तब किसान हितैषी होते जब सीमांत, छोटे और मझोले किसानों के सार्थक सहकारिता समूह बनाने की पहल होती जो चकबंदी, जैविक खेती, प्रसंस्करण और परिरक्षण से संबंधित कार्यों को संपादित करती। फिलहाल तो खेती के निजीकरण के बाद देश के निर्धन  लोगों को मिलने वाली खाद्य सुरक्षा तक खतरे में नजर आ रही है।

(डॉ. राजू पाण्डेय लेखक और चिंतक हैं। आप आजकल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on September 22, 2020 10:42 am

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