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Thursday, September 16, 2021

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घोड़े की गर्दन पर किसानों की गिरफ्त!

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प्रत्येक व्यवस्था की अपनी अन्तर्निहित गतिकी (डाइनामिक्स) होती है, जिसके सहारे वह अपना बचाव और मजबूती करते हुए आगे बढ़ती है। भारत में निजीकरण-निगमीकरण के ज़रिये आगे बढ़ने वाली नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था, जिसे नव-साम्राज्यवाद की परिघटना से जोड़ा जाता है, भी इसका अपवाद नहीं है। देश की स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई संवैधानिक व्यवस्था, जैसी भी भली-बुरी वह थी, के बरक्स 1991 के बाद से देश की नीतियों के केंद्र में नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था रही है। पिछले तीन दशकों के दौरान अधिकांश ‘राष्ट्रीय’ उद्यम उत्तरोत्तर इसी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में उन्मुख रहा है।

शुरुआत के 10  से 15 साल नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी विचारधारा के दबदबे के बावजूद उसका एक सशक्त विपक्ष मौजूद था। बल्कि, दरपेश नवसाम्राज्यवादी गुलामी के खतरे के बरक्स वैकल्पिक राजनीति के विचार और उसके मुताबिक राजनीतिक संगठन की जरूरत भी शिद्दत से रेखांकित की गई थी। इसके साथ वैकल्पिक राजनीति के विचार की रचना और राजनीतिक संगठन के निर्माण के प्रयास भी किए गए थे। लेकिन वैश्विक परिस्थितियों/कारकों सहित नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी विचारधारा/व्यवस्था के प्रछन्न समर्थकों के देश में बड़ी संख्या में मौजूद प्रकट समर्थकों के साथ मिल जाने के चलते वह विपक्ष/विकल्प धराशायी हो गया। इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के तत्वावधान में आयोजित ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’ में प्रकट और प्रछन्न समर्थकों का यह एका अपने प्रखरतम रूप में सामने आया था।

पिछले 15-20 साल मुख्यधारा की राजनीति और बौद्धिक विमर्श में इस व्यवस्था का सच्चा और टिकाऊ विपक्ष/विकल्प नहीं रहने की स्थिति में नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था की अपनी स्वतंत्र गतिकी विकसित हो चुकी है। नतीजतन, हर पासा नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में जाकर पड़ता है। जो मुट्ठी-भर राजनीतिक संगठन और व्यक्ति इस व्यवस्था का वास्तविक विरोध करते हैं, वे हाशिये पर रहते हैं। पूंजीवादी अश्वमेध का बेलगाम घोड़ा राष्ट्रीय संसाधनों/संपत्तियों/श्रम को लूटता हुआ, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों/संस्थानों को अपने मुनाफे की झोली में समेटता हुआ सरपट दौड़ रहा है।

उसके पीछे घिसटती संवैधानिक लोकतांत्रिक संस्थाएं न केवल अपनी ताकत खोती जा रही हैं, उनका रूप भी विकृत होता जा रहा है। कोई भी प्रतिरोध पूंजीवाद के बेलगाम घोड़े की गर्दन पर हाथ नहीं डाल पाया है। यह परिघटना केवल ज्यादातर आबादी की आर्थिक बदहाली और एक छोटे हिस्से की मालामाली तक सीमित नहीं है। प्राय: समस्त आयामों में हमारा राष्ट्रीय जीवन राष्ट्रीय नेतृत्व के तहत पाखंडी, झूठा, कुतर्की, अंधविश्वासी और कलही होता जा रहा है।

यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था देश की स्वतंत्रता के साथ हासिल की गई संवैधानिक संप्रभुता और, आजकल बुरी तरह बदनाम, संवैधानिक समाजवाद का प्रतिलोम है। शासक-वर्ग यह जानता है। वह स्वतंत्रता एवं संविधान के मूल्यों के साथ की जाने वाली खुली दगाबाजी को ढंकने के लिए ‘शाइनिंग इंडिया’, ‘सबका विकास’, ‘अच्छे दिन’ ‘नया भारत’ ‘विश्वगुरु भारत’ जैसे जुमले उछालता है, और उग्र राष्ट्रवादी फुफकारें मारता है। निस्संदेह, इस सबसे अपने को अलग और ऊपर मानने वालों की देश में एक सशक्त जमात है। लेकिन परिस्थितियों की वास्तविकता की कसौटी पर इस प्रबुद्ध जमात की प्रामाणिकता/ईमानदारी संदिग्ध है। कह सकते हैं कि उसकी संदिग्धता के चलते ही देश की यह दशा बनी है।

इस पृष्ठभूमि में तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले 6 महीनों से जारी किसान आंदोलन को देखें तो प्रतीत होता है कि किसानों ने पूंजीवाद के दुर्निवार घोड़े की गर्दन पर कस कर हाथ डाल दिया है। आंदोलन में निजीकरण-निगमीकरण के विरोध में वैचारिक स्पष्टता, और अपनी मांग के प्रति दृढ़ता है। इसका प्रमाण किसी भी किसान संगठन के नेता अथवा आंदोलन में शामिल किसानों/खेत-मजदूरों के वक्तव्यों, और सरकार के साथ होने वाली कई दौर की वार्ताओं से जग-जाहिर है। आंदोलन का स्वरूप लोकतांत्रिक है, जिसमें अलग-अलग विचारधारात्मक अथवा राजनीतिक प्रतिबद्धता वाले किसान संगठनों की समवेत भागीदारी है। वे सब कृषि कानूनों को रद्द कराने के संकल्प के साथ संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल हैं। हद दर्जे की प्रतिकूल परिस्थितियों और माहौल के बावजूद आंदोलनकारियों का संयम, अनुशासन और शालीनता भरोसा पैदा करते हैं कि भारत की सबसे बड़ी आबादी ने आधुनिक सभ्यता से प्राय: बहिष्कृत रहने के बावजूद अपना विवेक नहीं खोया है।

कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन का बीड़ा भले ही मुख्यत: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कुछ हद तक राजस्थान के किसानों की तरफ से उठाया गया हो, उसका चरित्र अखिल भारतीय बन गया है। दिल्ली की सीमाओं पर पिछले 45 से ज्यादा दिनों से, कोरोना महामारी के भयावह साये में दिन-रात कड़ी ठंड का मुकाबला करते हुए, किसान परिवारों की महिलाएं और बच्चे भी बड़ी संख्या में आंदोलन में हिस्सेदारी कर रहे हैं। आंदोलन को प्रशासन, व्यापार, खेल, कला आदि से जुड़े नागरिकों सहित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समर्थन और सहयोग मिला है। ज्यादातर लोगों की भागीदारी और समर्थन स्वत:स्फूर्त है। यह तभी संभव हुआ है जब विभिन्न किसान यूनियन के नेताओं ने समुचित समझदारी और एका बना कर आंदोलन को मजबूत और टिकाऊ बनाए रखा है।  

पंजाब ने सचमुच मिसाल कायम की है। आंदोलन ने पंजाब के बारे में प्रचलित सभी रूढ़िबद्ध धारणाएं – नशे की लत में डूबे पंजाब से लेकर अलगाववादी पंजाब तक – तोड़ दी हैं। गांव-गांव, घर-घर से बच्चे, जवान, बुजुर्ग आंदोलन में अपनी पारी देने के लिए ट्रैक्टरों, टेम्पुओं, बसों, कारों, तिपहिया-दोपहिया वाहनों में दिल्ली की सीमा पर आ-जा रहे हैं। रास्ते में अथवा धरना-स्थल पर कोई हंगामा या ड्रामा किए बगैर। 3 जनवरी को मैं चंडीगढ़ से दिल्ली आने वाली सड़क पर सफर कर रहा था। एक छोटे टेम्पो में परिवार के साथ तीन बच्चे – करीब 8 और 11 साल के दो लड़के और करीब 14 साल की एक लड़की – धरने में शामिल होने के लिए दिल्ली आ रहे थे। बच्चों की सुरक्षा के लिए टेम्पों के पिछले हिस्से में मजबूती से रस्सियां बांधी गई थीं। रस्सियों के जाल के पीछे बैठे वे देहाती बच्चे अपनी खेती को कारपोरेटीकरण से मुक्त कराने दिल्ली जा रहे थे!

किसान आंदोलन से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती, नहीं की जानी चाहिए कि वह कृषि क्षेत्र के बाहर निजीकरण-निगमीकरण के खिलाफ झण्डा बुलंद करे। कृषि क्षेत्र अपने में अन्य सभी क्षेत्रों से बड़ा है। कारपोरेट घराने उसमें अकूत मुनाफे की संभावना से बेखबर नहीं हैं। इसीलिए उदारीकरण की शुरुआत से कृषि क्षेत्र पर उनकी नजर गड़ी है। उदारीकरण के पहले चरण में कई लाख किसानों ने आत्महत्या की थी। भारत का शासक-वर्ग इतने बड़े पैमाने पर होने वाली आत्महत्याओं से जरा भी विचलित नहीं हुआ था। नए कृषि कानूनों के चलते किसान आत्महत्याओं का एक और दौर आ सकता है। शासक-वर्ग को उसकी भी परवाह नहीं होगी। मौजूदा आंदोलन के दौरान धरना स्थलों पर चार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 

इस आंदोलन के चलते यह आशा करनी चाहिए कि उसके समर्थन में आने वाले विभिन्न क्षेत्रों के नागरिक नैतिक समर्थन से आगे बढ़ कर करपोरेटपरस्त नीतियों के निहितार्थों को समझने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। अंबानी-अडानी के कुछ उत्पादों का बहिष्कार रणनीतिक दृष्टि से सही हो सकता है, परंतु इसे बाजारवादी-उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के बहिष्कार से जोड़ने पर आंदोलन की चेतना का प्रसार होगा। बेहतर होगा कि आंदोलन के समर्थक जनांदोलनकारी और नागरिक समाज एक्टिविस्ट आंदोलन को किसानों का ही रहने दें; और उसे फासीवाद-ब्राह्मणवाद तथा संघवाद से मुक्ति का मंच बनाने का आह्वान न करें। किसानों को ही सुप्रीम कोर्ट सहित सभी पक्षों को यह समझाने देना चाहिए कि ये कानून संविधान सम्मत संघीय ढांचे के ही खिलाफ नहीं हैं, संविधान की मूल संकल्पना के ही खिलाफ हैं। समझदारी से ही बात आगे बढ़ेगी। बहस आंदोलन से जुड़े विषय पर केंद्रित रहेगी तो ज्यादा से ज्यादा नागरिकों का समर्थन बढ़ेगा। आंदोलन को लेकर सरकार और कारपोरेट की नीति/रणनीति का मुकाबला भी किसानों को ही करने देना चाहिए।   

पंजाब के किसानों ने शुरू में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वे लंबे संघर्ष की तैयारी के साथ दिल्ली आए हैं; और शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए प्रतिबद्ध हैं। आइए इसे समझते हैं। किसान सरकार के साथ बातचीत भी चला रहे हैं और सरकार पर दबाव बनाने के लिए संघर्ष के विविध कार्यक्रम भी आयोजित कर रहे हैं। 7 जनवरी को उन्होंने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के अंदर ट्रैक्टर परेड निकालने की रिहर्सल की। संघर्ष लंबा चलना है तो और भी कार्यक्रम उनकी सूची में होंगे। किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि आंदोलन मई 2024 तक चलेगा। जाहिर है, इस वक्तव्य के राजनीतिक निहितार्थ हैं। मैंने किसान आंदोलन पर अपनी पिछली टिप्पणी में एक सुझाव दिया था कि आंदोलनकारियों को सरकार के साथ विपक्ष पर भी दबाव बनाना चाहिए : विपक्षी पार्टियां/नेता वचन दें कि सत्ता में होने पर वे कृषि क्षेत्र का कारपोरेटीकरण नहीं करेंगे। ऐसा होने पर वर्तमान सरकार दबाव में आएगी, और विपक्ष सत्ता-स्वार्थ के लिए आंदोलन का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। तब निश्चित ही निजीकरण-निगमीकरण की स्वतंत्र गतिकी में अवरोध पैदा होगा। संघर्ष के नए मोर्चे और रास्ते खुलेंगे।  

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं।)       

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