Sunday, November 27, 2022

सरकार की अक्षमता का प्रतीक है कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई ने आज सुनवाई करते हुए कहा कि, “हमें अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आपने (सरकार ने) बिना पर्याप्त विचार विमर्श किये एक कानून बना दिया है। जिसके कारण हड़ताल हो गयी है। अब इस आंदोलन से आप ही को निपटना है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को इन कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के लिये विचार करना चाहिए, जिससे आंदोलनकारियों और सरकार के बीच जो विवाद है वह सुलझ सके। सीजेआई एसए बोबडे ने कहा कि, जिस तरह से सरकार ने इस मामले को हैंडल किया है उससे वे बहुत निराश हैं। अदालत ने यह भी कहा कि, जिस तरह से सरकार और किसान संगठनों के बीच वार्ता चल रही है उससे कोई हल नहीं निकल रहा है। अब इस मामले का समाधान कोई कमेटी ही करे। 

सीजेआई ने कहा कि, हमें यह समझ में आ रहा है कि सरकार क्लॉज दर क्लॉज बातचीत करना चाहती है और  किसान चाहते हैं कि तीनों कृषि कानून ही रद्द हों। हम इन कानूनों के क्रियान्वयन को तब तक के लिये स्थगित कर देंगे, जब तक एक सक्षम कमेटी, उभय पक्षों से बात करके इसे हल न कर दे।”

chief justice

सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी के गठन का प्रस्ताव दिया है। और दोनों पक्षों से कहा है कि वे अपने अपने प्रतिनिधियों के नाम सुझाये। 

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि तीनों नए कृषि कानून बिना किसी गम्भीर विचार विमर्श के, आगा पीछा सोचे सरकार ने कुछ छंटे हुए पूंजीपति घरानों के हित के लिये बना दिये गए हैं। राज्यसभा में रविवार के दिन, जिस तरह से आनन-फानन में उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह द्वारा हंगामे के बावजूद बिना मतविभाजन के यह कानून पास घोषित किया गया, उससे सुप्रीम कोर्ट के कथन और दृष्टिकोण की ही पुष्टि होती है। 

इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया और परंपरागत मीडिया पर बहुत दिखते हैं जिनमें पत्रकार किसान नेताओं से पूछते हैं कि 

● सरकार जब बिल वापस लेने से इनकार कर रही है तो, वे बार-बार सरकार से बात क्या करने जा रहे हैं ?

● सरकार जब संशोधन करने को राजी है तो किसान संगठन क्यों सहमत नहीं हैं ? 

● कब तक यह धरना-प्रदर्शन चलता रहेगा। 

पर आज तक किसी पत्रकार ने, चाहे वह सरकार समर्थक पत्रकार हों या सरकार विरोधी, की इतनी हिम्मत नहीं हुयी कि वह सरकार से, ( प्रधानमंत्री तो खैर प्रेस वार्ता का साहस 6 साल से नहीं जुटा पाए हैं), पर कृषिमंत्री या उद्योग मंत्री से ही, जो सरकारी वार्ताकार हैं, से यह पूछ लें कि, 

● जब किसान कानून वापस लेने पर और सरकार कानून वापस न लेने पर अड़ी है तो फिर सरकार के पास इस समस्या के समाधान का और क्या उपाय है ? 

● सरकार, जिन संशोधनों की बात कर रही है, वे संशोधन किन-किन धाराओं में हैं और उन संशोधनों से किसानों को क्या लाभ होगा ? 

● सरकार समर्थक किसानों ने भी अपनी कुछ मांगें रखी हैं, तो वे कौन सी मांगें हैं?

● क्या सरकार वे मांगें जो सरकार समर्थक किसान संगठनों ने रखी हैं को सरकार मानने जा रही है ? 

सरकार के साथ किसान नेताओं की बैठक

कम से कम जनता को यह तो पता चले कि गतिरोध कहाँ है। सरकार जो संशोधन सुझा रही है उन्हें वह एक प्रेस वक्तव्य के द्वारा कम से कम सार्वजनिक तो करे और सरकार समर्थक किसानों की ही मांगों को स्वीकार करने की कार्यवाही करे। 

अब तक 9 राउंड की, यदि गृहमंत्री के साथ हुयी वार्ता को भी इसमें जोड़ लें तो, सरकार-किसान वार्ता हो चुकी है और अब 15 जनवरी की तारीख निर्धारित है। सरकार के जो मंत्री वार्ता में आते हैं वे तब तक इन किसान संगठनों और सरकार समर्थक किसान संगठनों की भी मांगों पर कोई विचार करने वाले नहीं हैं और न ही वे कोई स्पष्ट वादा करने वाले हैं। इसका कारण है वे उतने सशक्त नही हैं कि प्रधानमंत्री की स्थापित गिरोही पूंजीपति केंद्रित नीति को बदल दें। जब तक प्रधानमंत्री की तरफ से कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश नहीं मिलता है, यह तमाशा चलता रहेगा। यह एक प्रकार की नीतिगत विकलांगता की स्थिति है। आज के संचार और परिवहन क्रांति के युग में किसी भी जन आंदोलन को न तो अलग थलग किया जा सकता है और न ही उसे थका कर कुंठित किया जा सकता है। 

अभी हरियाणा में करनाल में मुख्यमंत्री खट्टर को आना था और वहां उनका विरोध हुआ, पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन और लाठी चार्ज किया और यह सब गोदी मीडिया भले ही सेंसर कर दे पर हम सबके हांथों में पड़े मोबाइल की स्क्रीन पर जो कुछ करनाल में हुआ है, वह लाइव दिख रहा है। बल प्रयोग कितना भी औचित्यपूर्ण हो, उसकी सदैव विपरीत प्रतिक्रिया होती है, फिर यह विरोध-प्रदर्शन तो एक व्यापक जन आंदोलन का ही भाग है। भाजपा और संघ के लोगों ने एक तो पहले ही इस आंदोलन को खालिस्तानी, विभाजनकारी आदि शब्दों से नवाज़ कर जनता और किसानों के प्रति अपनी शत्रुता पूर्ण मनोवृत्ति उजागर कर दी है, दूसरी ओर सरकार के वादाखिलाफी, झूठ बोलने, और जुमलेबाजी के इतिहास को देखते हुए सरकार की विश्वसनीयता पहले से ही संकट में है। 

farmer front

सरकार को चाहिए कि, खेती सेक्टर में कॉरपोरेट के प्रवेश को नियंत्रित रखा जाए, सरकार उनकी सर्वग्रासी मनोवृत्ति पर अंकुश लगाए, असीमित भंडारण, जमाखोरी पर रोक लगाए, एमएसपी से कम कीमत पर फसल बेचने को दंडनीय अपराध बनाये, किसानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में कोई धोखा न हो इसके लिये सक्षम कानून बनाये और सरकार किसान की तरफ न केवल खड़ा नज़र आये बल्कि खड़ा हो भी। 

कृषि कानून पर किसानों से होने वाली बातचीत में, सरकार ने कहा कि किसान सुप्रीम कोर्ट जाएं। इससे गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य नहीं हो सकता है। कुछ दिन पहले सरकार ने कहा कि कानून वापस लेना सम्भव नहीं है पर कुछ संशोधन किए जा सकते हैं। इन संशोधनों पर सरकार ने कोई लिखित प्रस्ताव रखा या नहीं यह तो नहीं पता पर यह संकेत मीडिया से मिला कि सरकार, 

● निजी मंडियों पर टैक्स लगा सकती है।

● निजी खरीदारी करने वाले लोगों के लिये रजिस्ट्रेशन का प्रावधान कर सकती है।

● कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में एसडीएम के बजाए सिविल अदालत का विकल्प दे सकती है। 

● जमाखोरी तब तक कानूनन वैध रहेगी जब तक कीमतें दुगुनी न हो जाएं। जब कीमतें दुगुनी पहुंच जाय तब सरकार महंगाई पर सचेत होगी और कोई कार्यवाही करेगी।

● असीमित, अनियंत्रित और अनैतिक जमाखोरी जमाखोरों का वैध कानून बना रहेगा।

भारतीय संविधान में कृषि राज्य सूची में दर्ज है तो केन्द्र  सरकार ने उस पर क़ानून कैसे बना दिया? यह तो राज्य सरकारों का अधिकार क्षेत्र है। क्या यह एक  असंवैधानिक कानून है? दरअसल, यह कानून बना तो, संविधान के दायरे में ही है, लेकिन यह कानून ट्रेड एंड कॉमर्स जिसमें संघीय सरकार क़ानून बना सकती है, बनाया गया है । लेकिन इस संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट बाद में विस्तार से चर्चा करेगी। 

सरकार ने हाल में जितने भी कानून बनाये हैं लगभग सभी में कमियां हैं और अधिकतर बनाये कानून संसदीय समिति से परीक्षण कराये बिना बनाये गए हैं। यह सरकार के कानून बनाने की जिम्मेदारी की अक्षमता है। 

सरकार इन तीनों कानूनों को रद्द करे और कृषि सुधार के लिये एक एक्सपर्ट कमेटी जिसमें किसान संगठन के भी कुछ प्रतिनिधि रहें, के साथ विचार-विमर्श कर के तब यदि ज़रूरत हो तो क़ानून लाये या इसे राज्यों पर छोड़ दे। वैसे भी यह कानून ट्रेड एंड कॉमर्स विषय के अंतर्गत लाये गए हैं, और कॉरपोरेट का भला करने की नीयत से बने हैं। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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