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Categories: बीच बहस

आम आदमी के लिए न्याय पाना “लोहे का चना चबाने” के समान

वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने उच्चतम न्यायालय में अमीरों को सुलभ न्याय और वंचितों को आसानी से न्याय न मिलने का मुद्दा उठाते हुए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता के कथन का समर्थन किया जिसमें जस्टिस गुप्ता ने कहा था कि अदालतों को गरीबों की आवाज जरूर सुननी चाहिए और सिस्टम का काम करना अमीरों और शक्तिशाली लोगों के पक्ष में अधिक लगता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) दीपक गुप्ता के विचारों साथ अपनी सहमति व्यक्त की कि उच्चतम न्यायालय के समक्ष मामलों की लिस्टिंग विशेषाधिकार का मामला है। नफाड़े ने कहा कि यदि इस मुद्दे पर एक अध्ययन किया गया जाय जिसमें इस बात पर ध्यान केंद्रित हो कि समाज के निचले सामाजिक-आर्थिक स्तर से संबंधित व्यक्तियों के कितने मामले उच्चतम न्यायालय के समक्ष सूचीबद्ध किए गए हैं, यह चौकाने वाले परिणाम सामने आयेंगे। उन्होंने कहा कि वह निश्चिंत हैं कि यही तथ्य सामने आएगा, भले ही अध्ययन अकेले रिपोर्टेड निर्णयों पर किया गया हो।

नफाड़े ने कहा कि न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने जो कहा है वह न्यायसंगत सिद्ध होगा। यह एक ऐसी बीमारी नहीं है जो अकेले उच्चतम न्यायालय को प्रभावित करती है। यह बीमारी पूरे समाज को प्रभावित करती है,चाहे वह अस्पताल हो, शैक्षणिक संस्थान या फिर वकील का कार्यालय। आम आदमी हो या छोटा आदमी, उसके पास न्याय की अदालतों तक पहुंचना में लोहे का चना चबाने के सामान है।

गौरतलब है कि जस्टिस दीपक गुप्ता ने अवकाशग्रहण के अवसर पर अपने विदाई भाषण में कहा था कि अदालतों को गरीबों की आवाज जरूर सुननी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को खुद ही अपना ईमान बचाना चाहिए। देश के लोगों को ज्यूडिशियरी में बहुत भरोसा है। गरीबों की आवाज नहीं सुनी जाती इसलिए उन्हें भुगतना पड़ता है। दीपक गुप्ता ने कहा था कि सिस्टम का काम करना अमीरों और शक्तिशाली लोगों के पक्ष में अधिक लगता है।यदि एक अमीर व्यक्ति सलाखों के पीछे है, तो सिस्टम तेजी से काम करता है। जब कोई किसी गरीब की आवाज उठाता है तो उच्चतम न्यायालय को उसे सुनना चाहिए और जो भी गरीबों के लिए किया जा सकता है वो करना चाहिए।

आरएमएनएलयू के पूर्व छात्रसंघ द्वारा आयोजित चर्चा में नफाड़े और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता, शोएब आलम के बीच, नफाड़े की पेशेवर यात्रा पर एक बातचीत के दौरान नफाड़े ने लिस्टिंग को लेकर अपनी व्यथा व्यक्त की। भारतीय न्याय प्रशासन प्रणाली में मामलों की लिस्टिंग में दुरावस्था को स्पष्ट करने के लिए नफाड़े ने एक ऐसे मामले का उदाहरण दिया, जिसमें मौत की सजा काट रहा आरोपी 16 साल की कैद के बाद दोषी नहीं पाया गया था। नफाड़े ने कहा कि न्याय का हमारा प्रशासन निराशा का एक स्रोत है। एक अन्य मामले का उदाहरण देते हुए नफाड़े ने कहा कि एक मौत की सजा के मामले में जहां एक एसएलपी को उच्चतम न्यायालय ने “खारिज कर दिया गया कह कर एक पंक्ति के साथ निपटा दिया था।लेकिन समीक्षा याचिका पर मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया।”

हालांकि केस-लिस्टिंग के ऐसे मुद्दों की परवाह किए बिना नफाड़े ने कहा कि एक बार मामला अदालत में आने के बाद, कई न्यायाधीश यदि उचित दृष्टिकोण अपनाया जाता है और कानून की सही स्थिति प्रस्तुत की जाती है तो मामले को देखने से बचते हैं।

सार्वजनिक धारणा है कि सनसनीखेज / हाई-प्रोफाइल मामलों से निपटते हुए कोर्ट का रुख कुछ और होता है, नफाड़े ने कहा कि हाई प्रोफाइल मामलों का प्रभाव पड़ता है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि छोटे आदमी की का मामला कोर्ट में आने के बाद अपना प्रभाव न डालें। उन्होंने कहा कि समस्या अक्सर इस तथ्य में निहित है कि गरीब लोगों को उच्चतम न्यायालय में अक्सर ठीक से प्रतिनिधित्व नहीं किया जाता है।नफाड़े ने कहा कि मुझे लगता है कि इन दिनों एसएलपी को यांत्रिक रूप से तैयार किया जाता है। वे सिर्फ उच्च न्यायालय के कागज की किताब और उच्च न्यायालय के सामने के आधार से कुछ लेते हैं और फिर वे इसे वहां डाल देते हैं। दोष का एक बड़ा हिस्सा हमारे कंधों पर भी है।

उन्होंने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय में बहस का एक मुद्दा अनावश्यक मुकदमा दायर है करने का भी है जिसमें उच्चतम न्यायालय के फैसले के लिए कोई कानूनी सवाल नहीं है। इस पृष्ठभूमि में नफाड़े ने टिप्पणी की कि अब न्यायाधीशों को सोमवार और शुक्रवार 50-60 ऐसे मामलों के लिए पढ़ना पड़ता है, जिनमें कानून का कोई अंश नहीं है तो आपको क्या उम्मीद है कि संस्था का क्या होगा? इससे अच्छे मामले प्रभावित होते हैं। जज भी इंसान हैं। कुछ मामलों पर तब न्यायाधीशों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है।हमें अपने घर को व्यवस्थित रखना सीखना चाहिए। हमें मुवक्किल को बताना चाहिए किइसमें कुछ होना नहीं है।फिर भी यदि वह मुकदमा दाखिल करने पर आमादा हो तो उसे दाखिल करें। आप असहाय हैं। लेकिन उसे ईमानदार सलाह दें।

एक सप्ताह में शेखर नफाड़े तीसरे वरिष्ठ अधिवक्ता हैं जिन्होंने उच्चतम न्यायालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांतभूषण और कपिल सिब्बल इसके पहले उच्चतम न्यायालय की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठा चुके हैं।

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This post was last modified on June 30, 2020 9:41 pm

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