विज्ञान में गाय मूत्र, स्वस्तिक और 108 नंबर की महिमा

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नई दिल्ली। भारतीय वैज्ञानिक परिदृश्य विचारों से भरा पड़ा है, चाहे 108 पंखुड़ियों वाले कमल के रहस्यों को जानने का प्रयास हो, या कैंसर के लिए “गाय विज्ञान” को “तंत्र उपचार” के साथ जोड़ना, या फिर प्राचीन स्वस्तिक प्रतीक और वेदों का आधुनिक भौतिकी के बीच संबंधों का पता लगाना हो।

हालांकि भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक चंद्र लैंडिंग मिशन और अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला पर काम कर रहे थे, अन्य लोग “गाय विज्ञान” पर केंद्रित परियोजनाओं में लगे हुए थे जो धार्मिक प्रतीकवाद से प्रेरित था, या फिर दोहन करने की कोशिश कर रहे थे- कुछ लोगों का कहना है कि बाजार का-  जो 21वीं सदी में प्राचीन इतिहास के ज्ञान के तौर पर मौजूद है।

एक आईआईटी निदेशक द्वारा मांस खाने को प्राकृतिक आपदाओं से जोड़ने के प्रयास ने वैज्ञानिकों के एक वर्ग के बीच इस बात को लेकर चिंता बढ़ा दी है और इसे वे उस सांस्कृतिक विचारधारा से जुड़े लोगों के नेतृत्व वाले अनुसंधान संस्थानों के बदलते स्वभाव के रूप में देखते हैं जिसका प्रतिनिधित्व नरेंद्र मोदी सरकार करती है।

पिछले महीने सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप शेयर किया जा रहा था जिसमें आईआईटी मंडी के निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा छात्रों को संबोधित कर रहे थे।

लक्ष्मीधर बेहरा छात्रों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि “आप उन्हें मार रहे हैं, जो निर्दोष जानवर हैं। इसका पर्यावरण के क्षरण के साथ सहजीवी संबंध है……भूस्खलन, बादल फटना आप बार-बार देख रहे हैं। ये सब इस क्रूरता का प्रभाव है।”

वीडियो में बातचीत का संदर्भ स्पष्ट नहीं है। लेकिन देश भर के संस्थानों के कई वैज्ञानिकों का कहना है कि वे मांस खाने के बारे में उनके संदेश की तुलना में आईआईटी के निदेशक के रूप में बेहरा की स्थिति को लेकर अधिक चिंतित हैं।

पिछले महीने चंद्रयान-3 की लैंडिंग और अंतरिक्ष आधारित सौर वेधशाला आदित्य-एल1 के प्रक्षेपण पर जश्न की पृष्ठभूमि में वैज्ञानिक संस्थानों में जारी गतिविधियों को लेकर कुछ वैज्ञानिक चिंतित हो गए हैं उनका कहना है कि वो एक दशक पहले इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

आलोचक इनमें से कुछ पहलों को शीर्ष संस्थागत ब्रांडों में छद्म विज्ञान को अनुमति देने के प्रयास के तौर पर देखते हैं।

कोलकाता स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) में भौतिकी के प्रोफेसर अयान बनर्जी ने कहा, “ वहां रोष की भावना जो प्रतिकार के डर के साथ मौजूद है।” “इसलिए, तकरीबन कोई भी सार्वजनिक रूप से ऐसी गतिविधियों पर सवाल नहीं उठाता है।”

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये गतिविधियां कुछ शोध संस्थानों में एक शोधकर्ता के मुताबिक एक तरह के “सांस्कृतिक कायापलट” का हिस्सा हैं। और जिसको रूढ़िवादी, दक्षिणपंथी हिंदुत्व विचारधारा या फिर जो इनके साथ जाने का दिखावा करते हैं, के साथ मिलकर संस्था के हेड द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। 

आईआईएसईआर के ही एक अन्य भौतिकी के प्रोफेसर और ब्रेकथ्रू साइंस सोसाइटी के सचिव सौमित्रो बनर्जी ने कहा, “शुरुआत में, हम लोगों ने इस तरह की चीजों को व्यक्तियों का पागलपन मानकर खारिज कर दिया था, लेकिन उनकी आवृत्ति बढ़ रही है।”

सौमित्रो बनर्जी ने आगे कहा कि “हम देख रहे हैं कि संस्था के प्रमुख ऐसे विचारों को संरक्षण दे रहे हैं। कुछ लोग शायद समझते हैं कि यह सत्ता में बैठे लोगों का ध्यान आकर्षित करने का एक तरीका है। इस परिवेश में तार्किकता, जो विज्ञान की पहचान है, पीछे छूटती जा रही है। हम इस प्रवृत्ति को नजरअंदाज नहीं कर सकते।”

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान के प्रतिष्ठित प्रोफेसर सुभाष लखोटिया ऐसी चिंताओं से सहमत हैं। उन्होंने कहा कि “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ शैक्षणिक संस्थान ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा दे रहे हैं जो विशिष्ट प्रश्न पूछने या किसी परिकल्पना का परीक्षण करने की जगह वो कुछ धारणाओं के साथ जुड़ी हैं।”

विवादास्पद परियोजनाओं में शामिल वैज्ञानिक अपनी गतिविधियों का बचाव कर रहे हैं। कुछ उनकी नियमित अनुसंधान प्रयासों के तौर पर व्याख्या कर रहे हैं, दूसरे अपने आलोचकों पर वैध अनुसंधान का राजनीतिकरण करने की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं।

108 पंखुड़ियों वाला नमोह

लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) ने चार साल पहले जीनोम अनुक्रमण के लिए 108 पंखुड़ियों वाला एक कमल का फूल चुना था। एनबीआरआई के निदेशक अजीत शासनी ने कहा कि इस जीनोटाइप को चुनने के पीछे एक कारण हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के लिए 108 का “धार्मिक महत्व” वाली संख्या होना था।

शासनी ने द टेलीग्राफ को बताया कि “लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं था।” “जीनोटाइप में पोटैशियम, फास्फोरस, कैल्शियम और अमीनो एसिड के साथ उच्च पोषण मूल्य होता है। यह उच्च गुणवत्ता वाले फाइबर का एक स्रोत है जिसका उपयोग पोषक सामग्री के लिए किया जा सकता है, और हमने इससे एक इत्र बनाया है। यह जीनोटाइप आय-सृजक बन सकता है।”

एनबीआरआई ने कमल का नाम “नमोह 108” रखा है, जिस पर केंद्रीय विज्ञान मंत्री जितेंद्र सिंह ने पिछले महीने कहा था कि यह “नरेंद्र मोदी के अथक उत्साह और सहज सुंदरता के लिए एक भव्य उपहार है, जो प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दसवें वर्ष में आया है।”

जबकि “नमोह” का अर्थ है ‘मैं झुकता हूं’ और यह संस्कृत प्रार्थनाओं में एक सर्वव्यापी शब्द है, यह नमो का एक होमोफोन भी है, जो नरेंद्र मोदी का संक्षिप्त रूप है।

गाय विज्ञानऔर तंत्र

इस वर्ष की शुरुआत में आईआईटी गुवाहाटी द्वारा आयोजित “गाय विज्ञान” पर एक सम्मेलन में “स्वदेशी गाय पालन और मट्ठा प्रोटीन उत्पादन योजना को लागू करके कैंसर रोगियों के लिए जीव उपकारा तंत्र-आधारित जैव-सामाजिक उपचार” शीर्षक पर एक पेपर स्वीकार किया गया।

कुछ अन्य पत्रों ने पंचगव्य- दही, गोबर, घी, दूध और मूत्र का मिश्रित पदार्थ, को स्त्री रोग संबंधी विकार, हृदय रोग, मोटापा, त्वचा रोग और कुष्ठ रोग सहित कई स्वास्थ्य विकारों के संभावित उपचार के रूप में वर्णित किया है।

आईआईटी गुवाहाटी के दो फैकल्टी सदस्यों और सम्मेलन आयोजकों ने टेलीग्राफ को एक ईमेल में बताया कि “सम्मेलन में कोई बड़े दावे नहीं किए गए थे।”

जीव उपकार तंत्र प्रथाओं की अवधारणा को सम्मेलन में “पारंपरिक ज्ञान के हिस्से के रूप में” प्रस्तुत किया गया था। उन्होंने मेल में लिखा, जबकि इस बात पर जोर दिया गया कि गायों से औषधीय उत्पादों के बारे में दावों को नैदानिक परीक्षणों के माध्यम से मूल्यांकन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि “छद्म विज्ञान की आलोचनात्मक जांच के लिए सामूहिक वैज्ञानिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।”

स्वस्तिक, वेद

आईआईटी खड़गपुर में, वास्तुकला और क्षेत्रीय योजना विभाग के पास पूर्ण धर्म की अवधारणा (ओसीसीआर) का एक दफ्तर है जहां से संकाय और प्रशिक्षु छात्रों ने 2016 से कई रिपोर्ट प्रकाशित की हैं, उन्हीं में प्रतीक के “स्वस्तिक ” को छूते हुए एक प्रदर्शनी भी शामिल है जो प्रकृति के नियम और विकास की सुंदरता के साथ जुड़ाव को प्रदर्शित करता है।

एक अन्य रिपोर्ट में और सभी बातों के अलावा, वेदों की अवधारणाओं को “गैर-रैखिकता” के सिद्धांत से जोड़ने का प्रयास करती है, एक वैज्ञानिक विचार जिसमें अप्रत्याशित घटनाएं शामिल हैं।

ओसीसीआर से जुड़े आईआईटी खड़गपुर के एक संकाय सदस्य ने कहा कि 20 से अधिक नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों और क्वांटम भौतिकी के बीच संबंधों के बारे में बात की थी।

आईआईटी खड़गपुर के वास्तुकला और योजना विभाग के प्रोफेसर और केंद्र के अध्यक्ष जॉय सेन ने कहा, “पोस्ट-मोडर्न विज्ञान, नॉन-लिनियर विज्ञान, क्वांटम विज्ञान, हरित और समावेशी विज्ञान भारतीय ज्ञान प्रणालियों के सदियों पुराने ज्ञान को पहचान रहे हैं।”

जब साथी वैज्ञानिकों द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए कहा गया तो सेन ने कहा, “पुराने क्रम के अदूरदर्शी, न्यूनीकरणवादी वैज्ञानिकों को खुद को अपडेट करने की आवश्यकता है। उन्हें मन की चेतना की आंतरिक ध्यान प्रयोगशाला में भारतीय ब्रह्मांड विज्ञान की आंतरिक मानसिक संरचनाओं और आधुनिक भौतिकी में प्रगति के बीच बढ़ते ओवरलैप को समझने की आवश्यकता है।”

चिकित्सा में अध्यात्म

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने हाल के महीनों में अपने फैकल्टी और छात्रों को “चिकित्सा विज्ञान और भारतीय शास्त्र, ” “आशा, उपचार और स्वास्थ्य” और “चिकित्सा में भारतीय मूल्य और आध्यात्मिकता” शीर्षक पर वार्ता में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है।

अशोक विश्वविद्यालय, सोनीपत में भौतिकी और जीव विज्ञान के प्रोफेसर और डीन गौतम मेनन ने कहा, “ऐसे घटनाक्रम दुखद हैं, वे सुझाव देते हैं कि वैज्ञानिक संस्थानों की महत्वपूर्ण नियुक्तियों में वैज्ञानिक कठोरता, वैज्ञानिक स्वभाव और नैतिकता का कोई महत्व नहीं है।”

हालांकि, कुछ लोगों का कहना है कि मोदी सरकार से पहले विज्ञान शिक्षा में अपर्याप्तताओं ने वर्तमान स्थिति में योगदान दिया है।

सौमित्रो बनर्जी ने कहा, “हमारी शिक्षा प्रणाली विज्ञान पढ़ाती है लेकिन छात्रों को यह नहीं बताती कि विज्ञान कैसे काम करता है।” “एक छात्र को कभी नहीं बताया जाता है कि विज्ञान में केंद्रीय हठधर्मिता है: जब तक सबूत न हो तब तक किसी भी चीज़ पर विश्वास न करें।”

अन्य लोगों ने उन सुझावों को चुनौती दी है जिसमें उनका कहना है कि संस्थागत प्रमुखों की नियुक्तियां अब पिछली प्रथाओं में बड़े स्तर पर बदलाव को दर्शाती हैं।

भारतीय गणितीय विज्ञान संस्थान, चेन्नई के कम्प्यूटेशनल बायोफिजिसिस्ट राहुल सिद्धार्थन ने कहा कि “औसत दर्जे और पक्षपात का आविष्कार 2014 में नहीं हुआ था।”

होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन, मुंबई के खगोल भौतिकीविद अनिकेत सुले का मानना है कि खेल में एक और कारक है जो मौजूदा रुझानों के लिए जिम्मेदार हो सकता है।

सुले ने कहा, “वास्तविक वैज्ञानिकों के किसी (हठधर्मी) विचारधारा से जुड़े होने की संभावना नहीं है।” पहले, जब विचारधारा अप्रासंगिक थी, यह मानते हुए भी कि पक्षपात काम कर रहा था, उम्मीदवारों की पसंद व्यापक थी। सुले ने कहा, “लेकिन अगर आप एक निश्चित विचारधारा वाले लोगों की तलाश कर रहे हैं, तो आपको तह तक जाने की जरूरत होगी।”

(द टेलीग्राफ की खबर पर आधारित)

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