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अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सरकार के पास न दिशा है और न ही दृष्टि!

हाल ही में जारी, विश्व भूख सूचकांक या ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़ों में हमारी रैंकिंग 94 पर है। अन्नम ब्रह्म और अतिथि को कभी भी बिना भोजन कराए न जाने देने की परंपरा वाले महान देश की स्थिति भुखमरी के मामले में 94 पर गिर जाय तो यह देश की सरकार और सरकार की आर्थिक नीतियों पर एक गंभीर प्रश्न चिन्ह है। कंसर्न वर्ल्डवाइड और वेल्थ हंगर लाइफ द्वारा संयुक्त रूप से किये गए इस अध्ययन में दुनिया भर के देशों के बारे में भूख और पोषण से जुड़ी तरह-तरह की रपटें होती हैं। हंगर इंडेक्स के अध्ययन का उद्देश्य यह है कि 2030 तक दुनिया भूख के कारण होने वाली मौतों से मुक्त हो जाए। कोई व्यक्ति कितनी कैलोरी ग्रहण करता है यह हंगर या क्षुधा सूचकांक के अध्ययन का एक सामान्य आधार है। लेकिन ग्लोबल हंगर इंडेक्स किसी भी देश के बारे में अन्य चार मानदंडों पर भी अध्ययन करता है और कई स्तरों के परीक्षण के बाद तब अंतिम निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार 27.2 के अंकों के साथ भारत भूख के मामले में ‘गंभीर’ स्थिति में है। पिछली बार 117 देशों में भारत की रैंकिंग 102 पर थी और इस तुलना में भारत की रैंकिंग में ज़रूर कुछ सुधार हुआ है, लेकिन इस बार यह आंकड़ा 117 देशों के सापेक्ष नहीं बल्कि इससे कम देशों के अनुसार है। दुःखद और हैरान करने वाला एक तथ्य यह भी है कि भारत अपने पड़ोसी देशों नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश से भी इस इंडेक्स में नीचे है।

इस रिपोर्ट के अनुसार केवल 13 देश ऐसे हैं जो हंगर इंडेक्स में भारत से पीछे हैं जिनमें रवांडा (97), नाइजीरिया (98), अफगानिस्तान (99), लीबिया (102), मोजाम्बिक (103), चाड (107) जैसे देश शामिल हैं। रिपोर्ट में भारत की लगभग 14% जनसंख्या को कुपोषण का शिकार बताया गया है जिसका असर भावी पीढ़ी के शारीरिक विकास पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भारत के बच्चों में स्टंटिंग रेट 37.4 प्रतिशत है। स्टन्ड बच्चे वो कहलाते हैं जिनकी लंबाई उनकी उम्र की तुलना में कम होती है और यह गम्भीर कुपोषण के कारण होता है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स ही नहीं कुछ और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सूचकांक हैं जिनमें भारत की परफॉर्मेंस अच्छी नहीं कही जा सकती है। ऑक्सफैम इक्वलिटी इंडेक्स में 157 में 147 वें स्तर पर हम हैं तो जल शुद्धता के सूचकांक ( वाटर क्वालिटी इंडेक्स ) में 122 में 120, एयर क्वालिटी इंडेक्स में 180 में 179, संयुक्त राष्ट्र विश्व खुशहाली सूचकांक ( यूएन वर्ल्ड हैप्पिनेस इंडेक्स ) में 156 में 144, वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 में 140 और पर्यावरण परफॉर्मेंस इंडेक्स में 180 में 167 अंकों पर भारत है। 2025 तक 5 ट्रिलियन आर्थिकी की बात करने वाले हमारे नेता और सरकार इन महत्वपूर्ण आर्थिक सूचकांकों की इस गिरावट पर क्या कहेंगे यह मुझे नहीं मालूम पर यह तो अब निश्चित हो गया है पिछले 25 वर्षों से दुनिया की सबसे तेज गति से विकसित हो रही आर्थिकी अब 2016 के बाद सबसे तेज़ गति से अधोगामी अर्थव्यवस्था बन गयी है। आखिर इस का कारण क्या है? सरकार की आर्थिक नीतियां या कुछ और? फिर यह सवाल उठेगा कि आखिर सरकार की नीतियां क्या हैं?

हंगर इंडेक्स सहित अन्य सूचकांकों में दर्ज हुई गिरावट के बाद आईएमएफ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अध्ययन ग्रुप वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक (डब्ल्यूईओ) के एक अध्ययन रिपोर्ट ने हमारी आर्थिक नीतियों का ही नही बल्कि गवर्नेंस का खोखलापन भी उजागर कर दिया है। उक्त अध्ययन के अनुसार 2020 में हमारी प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से भी कम होगी। बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी, डॉलर के मूल्य के अनुसार 2020 में 4% बढ़ कर 1,888 डॉलर हो जाएगी।

भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10.5% नीचे गिर कर 1,877 डॉलर रह जायेगी। यह गिरावट पिछले चार साल में सबसे अधिक है। इन आंकड़ों के अनुसार भारत दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और नेपाल के बाद तीसरा सबसे गरीब देश हो जायेगा। जबकि बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका और मालदीव, आर्थिक क्षेत्र में भारत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन आंकड़ों के अनुसार कोरोना महामारी का असर श्रीलंका के बाद सबसे अधिक भारत पर पड़ा है। इस वित्तीय वर्ष में श्रीलंका की प्रति व्यक्ति जीडीपी भी 4 % से नीचे गिरेगी। इसकी तुलना में नेपाल और भूटान की अर्थव्यवस्था में इस साल सुधार आएगा।

हालांकि आईएमएफ ने 2021 में भारत की आर्थिकी में तेजी से वृद्धि की संभावना भी जताई है। 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से थोड़ी ऊपर हो सकती है। डॉलर के मूल्य के अनुसार 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी के 8.2% बढ़ सकने की संभावना है। इसी अवधि में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी के 5.4% होने की संभावना व्यक्त की गयी है। इस सम्भावित वृद्धि से भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,030 डॉलर होगी जबकि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1990 डॉलर रहेगी। आईएमएफ ने यह भी कहा है कि 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से भी नीचे जा सकती है। आईएमएफ की इस चेतावनी को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए।

उपरोक्त आंकड़े देश की ताजा आर्थिक स्थिति को बता रहे हैं और अब देश को उन सब सूचकांकों में ऊपर उठ कर अपनी पूर्व की स्थिति बहाल करनी है, ये सरकार कैसे करेगी, क्या सरकार के पास कोई ऐसा आइडिया है ? फिलहाल तो केवल बदहवासी भरे निजीकरण जिसे देश की सार्वजनिक संपत्ति को औने-पौने दाम पर बेंच-बाच कर, किसी तरह से सरकार का खर्च निकले, को छोड़ कर और कोई योजना तो, सरकार की दिख नहीं रही है। अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ने एक इंटरव्यू में बताया है कि, ” भारत की अर्थव्यवस्था दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से गिरने वाली अर्थव्यवस्था बन कर रह गयी है। सरकार इससे उबरने के लिये जो स्टिमुलस पैकेज यानी उठाने के लिये जो आर्थिक उपाय कर रही है, वह अर्थव्यवस्था के हालात को देखते हुए नाकाफी है। “

हालांकि उन्होंने यह उम्मीद भी जताई है कि हम इस संकट से अगले साल उबर सकने की स्थिति में होंगे।

इस गिरावट के लिये निश्चित रूप से कोरोना एक बड़ा और उचित कारण है और यह एक वैश्विक कारण भी है पर हमारी अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर कोरोना काल के पहले से है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में हमारी विकास दर 7% थी जो वर्ष 2018-19 में गिर कर 6.1% और फिर 2019-20 में और नीचे गिरते हुए 4.2% तक आ गयी। फिर तो कोरोना काल ही शुरू हो गया और अब यह दर माइनस 23.9% तक गिर गयी है। आखिर 2017-18 से आर्थिक विकास दर में गिरावट का दौर शुरू क्यों हुआ ?

निश्चित रूप से इसका एक बड़ा कारण नोटबन्दी और फिर जीएसटी का त्रुटिपूर्ण क्रियान्वयन रहा है। ऊपर से लॉकडाउन तो है ही। जब भी कोई आर्थिक योजना बिना उसके प्रभाव का गम्भीरता से अध्ययन किये  लागू की जाती है तो ऐसे ही दुष्परिणाम सामने आते हैं। 2017 के बाद ही अर्थव्यवस्था में मंदी की आहट मिलना शुरू हो गयी थी। सरकार ने इसे रोकने के लिये कुछ कदम उठाये पर उसका अधिकतम लाभ उद्योगपति उठा ले गए और निम्न तथा मध्यम वर्ग जिनसे बाजार में रौनक आती है या तो अपनी नौकरियां खोता रहा, या उसकी आय घटती रही, जिसका सीधा असर परंपरागत बाज़ार पर पड़ा।

जब वर्तमान वित्तीय वर्ष ( 2020 – 21 ) की आर्थिक विकास दर गिर कर माइनस 23.9% तक पहुंच गयी तो गोल्डमैन क्रेडिट रेटिंग संस्था ने 2020 – 21 में विकास दर के संकुचन को जहां पहले 10.5% पर माना था उसे और घटा कर 14.8% पर निर्धारित कर दिया। यानी सुधार की गुंजाइश जितनी की गयी थी, उतनी नहीं है। अभिजीत बनर्जी, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये सरकार द्वारा जिस स्टिमुलस पैकेज की घोषणा की है, को अपर्याप्त मानते हैं। उनके अनुसार अभी और स्टिमुलस पैकेज की ज़रूरत है। स्टिमुलस पैकेज और राहत पैकेज में अंतर होता है।

राहत पैकेज तो किसी कारण से यदि किसी स्थान या क्षेत्र में किसी आपदा जैसे बाढ़, सूखा या अकाल के कारण, अर्थव्यवस्था को हानि पहुंच रही हो तो उसे तात्कालिक राहत देकर संभाला जाता है जबकि स्टिमुलस पैकेज धराशायी आर्थिकी को पुनः खड़ा करने का एक उपचार है। आज भारत मे आर्थिक मंदी का दौर किसी एक क्षेत्र में नहीं है बल्कि देशव्यापी है। कृषि, बाजार, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, रीयल एस्टेट, निर्माण सेक्टर सहित लगभग सभी आर्थिक क्षेत्र इस समय मंदी से संक्रमित हैं और बाजार मांग की कमी से त्रस्त है तो ऐसे में अर्थचक्र के थम चुके पहिये को फिर गति कैसे दी जाए सरकार के सामने यह सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है, क्योंकि अब गति में संवेग भी नही रहा।

अभिजीत बनर्जी स्टिमुलस पैकेज की अपर्याप्तता पर अपने एक इंटरव्यू में कहते है कि, ‘सरकार द्वारा दिया गया स्टिमुलस पैकेज ने निम्न और मध्यम आय वर्ग की मांग में कोई वृद्धि नहीं की है। जबकि बाजार में मांग और रौनक तभी बढ़ेगी जब निम्न और माध्यम आय वर्ग के पास नकदी पहुंचेगी और मांग बढ़े इसलिए उनके हाथ में नकदी पहुंचानी पड़ेगी। “

बहुत ही तामझाम के साथ, सरकार ने कोरोना जन्य अर्थव्यवस्था में सुधार के लिये 20 लाख करोड़ के स्टिमुलस पैकेज की घोषणा की थी। लेकिन उसका क्या असर सुस्त और मंद पड़े बाजार पर पड़ा ? पैकेज की घोषणा के बाद भी जितनी वृद्धि अपेक्षित थी उतनी हुयी या नहीं ? इस पर सरकार खामोश है। इसे जीएसटी की वसूली से समझने की कोशिश करें तो आज सरकार का राजस्व गिरता जा रहा है। बाजार में उतनी चहल पहल नहीं है जितनी होनी चाहिए।

नवरात्रि के बाद दीपावली तक त्योहारों का महीना रहता है और शादी विवाह भी होने लगते हैं, ऐसी स्थिति में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग बाजार में उतरेंगे और खरीदारी बढ़ेगी। पर कैसे ? लोगों की नौकरियां जा रही हैं, महामारी के अंदेशे ने लोगों को एक अजीब सी आशंका में डाल दिया है। केवल खाने पीने और बेहद ज़रूरी चीजों पर लोग धन व्यय कर रहे हैं और बड़े खर्चे लोग भविष्य के लिये टाल रहे हैं। ऐसे में बाजार को 2017 के पहले की स्थिति में कैसे लाया जाए यह सरकार और अर्थ विशेषज्ञों के लिये एक बड़ी चुनौती है।

उपरोक्त आंकड़ों और बाजार की स्थिति देखते हुए भी इस निष्कर्ष पर पहुंचना कोई कठिन नहीं है कि हमारी आर्थिकी संकुचन की ओर बढ़ रही है। हम जीडीपी गिरने की बात तो कह रहे हैं पर हम संकुचन जिसे अर्थशास्त्री कांट्रैक्शन कहते हैं, शब्द का प्रयोग करने से बच रहे हैं। विकास दर के इतिहास की बात करें तो 1996 के बाद, जब से तिमाही जीडीपी के आंकड़े जारी होने की प्रथा शुरू हुयी है तब से वित्तीय वर्ष 2020 – 21 के जीडीपी का माइनस 23.9% का आंकड़ा सबसे कम है। ऐसी संकुचन की स्थितियां लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर मैत्रिश घटक के अनुसार वर्ष 1957 – 58, 1965 – 66, 1972 – 73 और 1979 – 80 में भी आ चुकी हैं। पर उन संकुचन से हम जल्दी उबर भी गए। अगर हम एक भयावह कल्पना करें ( जो लगभग असंभव है ) कि इसी वित्तीय वर्ष के शेष तीन तिमाही के भी आंकड़े यही रहेंगे तो,  इस वित्तीय वर्ष की संकुचन की स्थिति आज़ादी के बाद के सबसे बुरी हालत में रहेगी।

कोरोना आघात ने दुनियाभर की आर्थिकी को प्रभावित किया है। अब डॉ. घटक द्वारा दिये गए आईएमएफ के वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक के आंकड़ों के अनुसार, 2020 – 21 में दुनियाभर की जीडीपी 4.9%, विकासशील आर्थिकी में 3%  और निम्न आय वाली आर्थिकी में 1% रहेगी। लेकिन भारत के सम्बंध में इतनी भी जीडीपी रहे, इसकी संभावना कम ही दिखती है। भारत की जीडीपी में आधा योगदान अनौपचारिक सेक्टर का है जिसमें कृषि, निर्माण आदि सेक्टर आते हैं। इनके बारे में अक्सर आंकड़े मिलते नहीं हैं। अज़ीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी ने 12 राज्यों के स्वरोजगार, कैजुअल और दिहाड़ी कामगारों की अप्रैल-मई की स्थिति पर अध्ययन किया तो इनकी आय में 64% की गिरावट आयी है।

इसी प्रकार का एक अध्ययन लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सेंटर फॉर इकॉनोमिक परफॉर्मेंस ने किया तो उन्हें भी जनवरी-फरवरी की तुलना में अप्रैल मई में यह गिरावट 48% की मिली है। डॉ. घटक के अनुसार अगर अनौपचारिक क्षेत्र की स्थिति नहीं सुधरती है तो,जीडीपी में सुधार मुश्किल दिखता है।  माह दर माह बढ़ती बेरोजगारी इस मुश्किल को और बढ़ा सकती है। बेरोजगारी के आंकड़ों की स्थिति यह है कि 2016 के बाद सरकार ने नियमित आंकड़े जारी करने ही बंद कर दिये थे। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट से यह जानकारी मिली है, कि अगस्त 2020 में भारत में बेरोजगारी की दर 8.35 फीसदी दर्ज की गई, जबकि पिछले महीने जुलाई में इससे कम 7.43 फीसदी थी। बहरहाल हर अर्थ विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि बेरोजगारी एक बड़ा और आक्रोशित करने वाला मुद्दा है।

औद्योगिक क्षेत्र की गिरावट के आकलन का एक आधार, बिजली का उपभोग भी है। वर्ल्ड बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, 2020 – 21 की पहली तिमाही के महीने अप्रैल, मई, जून में बिजली के उपभोग में क्रमशः 24%,13.5% और 8.2% कमी आयी है। अनौपचारिक क्षेत्र में आय कम होने और औद्योगिक क्षेत्रों में इंडस्ट्री बंद रहने के कारण जीडीपी की दर में गिरावट तो आनी ही थी। बहरहाल, जीडीपी के मापदंड का जो भी आधार हो इस तिमाही की माइनस 23.9% की गिरी हुयी जीडीपी के आंकड़े से प्रोफेसर मैत्रिश घटक के अनुसार दो निष्कर्ष साफ साफ निकलते हैं।

पहला अर्थव्यवस्था के इस अधोगामी ग्राफ से यह स्पष्ट है कि भारत एक गम्भीर आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है।

दूसरा मैक्रो इकनॉमिक्स ( जिसमें राष्ट्रीय आय, उत्पादन, रोजगार/बेरोजगारी , व्यापार चक्र, सामान्य कीमत स्तर, मुद्रा संकुचन, आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आदि का विश्लेषण किया जाता है ) के अनुसार निकाले गये जीडीपी के आंकड़ों की गिरावट से देश के अनौपचारिक क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है। इसका कारण एक बहुत बड़ी आबादी का उक्त क्षेत्र में होना और उनके आंकड़ों का अभाव भी है। अनौपचारिक क्षेत्र को अगर इसमें गंभीरता से जोड़ा जाएगा तो हो सकता है आर्थिक स्थिति की तस्वीर और चिंताजनक हो।

अब इस स्थिति से उबरा कैसे जाए, और मांग बढ़े कैसे इसके लिये विशेषज्ञों का सुझाव है कि जनता को सीधे धन दिया जाए। यह धन ज़रूरतमंद को दिया जाए जो इसे व्यय करें और पैसा बाजार में आये और फिर अर्थचक्र चल पड़े। विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर शोध कर चुके अभिजीत बनर्जी और ज्यां द्रेज जैसे अर्थशास्त्री इस बात पर एकमत हैं कि निम्न और मध्यवर्ग के लोगों को सरकार नक़द सहायता पहुंचाए। यह कैसे किया जाय इसे पूछने पर अभिजीत बनर्जी इसके एक उपाय के रूप में मोनिटाइजेशन स्कीम का उल्लेख करते हैं। मोनिटाइजेशन यानी मुद्रीकरण से आर्थिकी को ऊर्जीकृत किया जा सकता है। यह नोटबन्दी का प्रतिलोम है यानी नोटबन्दी जहां नक़दी के प्रवाह को बाधित करता है वहीं मुद्रीकरण बाजार में मांग को बढ़ाने के लिये लोगों के पास अधिकतम धन देने और उन्हें व्यय करने के लिये प्रोत्साहित करता है।

इसलिए अभी हाल ही में सरकार एलटीसी अग्रिम की एक योजना लेकर आयी है जिसमें एलटीए यानी अग्रिम यानी एडवांस के साथ जो शर्तें जुड़ी हैं उन्हें भी देखिये,

● यात्री को विमान / रेल किराया के तीन गुने का सामान और सेवाएं खरीदना होगा।

● यह खरीद 31 मार्च, 2021 से पहले होनी चाहिए।

● उन्हें जीएसटी पंजीकृत विक्रेता से 12 प्रतिशत या उससे अधिक जीएसटी वाला सामान खरीदना है या ऐसी ही सेवा पर खर्च करना है।

● इसका भुगतान केवल डिजिटल मोड से होना चाहिए ।

यानी,  25,000 रुपए के एलटीसी एडवांस के लिए, किसी को भी कम से कम 75,000 रुपए डिजिटली खर्च करने होंगे। करीब 10,000 रुपए बतौर जीएसटी चुकाना होगा और 25000 के अग्रिम भुगतान को बाद में लौटाना होगा या एडजस्ट होगा।

यह योजना उसी समस्या के समाधान के लिये लायी गयी है, जिससे बाजार जूझ रहा है। अब कितना सफल होती है यह तो बाद में ही बताया जा सकता है।

सरकार को बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के प्रोफेशनल अर्थविशेषज्ञों की टीम गठित कर के इस समस्या का समाधान ढूंढना होगा। अभी तो यही लगता है कि, सरकार अपने आर्थिक नीतियों की सोच और क्रियान्वयन में विफल हो रही है। न तो कोई स्पष्ट आर्थिक सोच दिख रही है और न ही, भविष्य की कोई योजना। हर आर्थिक दुरवस्था का एक ही उपाय सरकार की समझ मे आता है, निजीकरण यानी देश की संपदा को अपने चहेते गिरोही पूंजीपतियों को औने पौने दाम बेच देना और जब विरोध के स्वर उठें तो विभाजनकारी एजेंडे पर आ जाना।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 19, 2020 9:13 pm

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