मज़दूरों के जख़्मों पर मरहम लगाना तो दूर, सरकारें नमक रगड़ने पर आमादा हैं

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ऐसे वक़्त में जब कोरोना संक्रमण से पैदा हुई चुनौतियाँ बेक़ाबू ही बनी हुई हैं, तभी हमारी राज्य सरकारों में एक नया संक्रमण बेहद तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है। बीते पाँच दिनों में छह राज्यों ने 40 से ज़्यादा केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को अपने प्रदेशों में तीन साल के लिए निलम्बित करने का असंवैधानिक और मज़दूर विरोधी फ़ैसला ले लिया।

पहले से ही तक़रीबन बेजान पड़े इन श्रम क़ानूनों को ताक़ पर रखने के संक्रमण की शुरुआत 5 मई को मध्य प्रदेश से हुई। दो दिन बाद इस संक्रमण ने उत्तर प्रदेश और गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया। फिर 10 मई को ओडिशा, महाराष्ट्र और गोवा की सरकारों ने भी पूँजीपतियों की मदद के नाम पर मज़दूरों के शोषण के लिए सारे रास्ते खोलने का ऐलान कर दिया। यही रफ़्तार रही तो इस मज़दूर विरोधी संक्रमण को राष्ट्रव्यापी बनने में देर नहीं लगेगी।

कोरोना संकट के दौरान मोदी सरकार ने एक से बढ़कर एक ग़रीब विरोधी और अदूरदर्शी फ़ैसले लिये। लॉकडाउन की आड़ में ग़रीबों पर ऐसे सितम हुए जो भारत में पहले कभी देखे या सुने नहीं गये। दिल दहलाने वाला सबसे बड़ा सितम तो ये रहा कि ग़रीबों की न सिर्फ़ रोज़ी-रोटी छिनी बल्कि जब वो सिर पर कफ़न बाँधकर बड़े-बड़े शहरों से अपने गाँवों को लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही सड़क नापने लगे तब उन पर पुलिसिया डंडे बरसाये गये। अब मुट्ठी भर ग़रीबों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने की रस्म अदायगी भी इसीलिए हुई है, ताकि इनकी देखा-देखी विदेश में फँसे सम्पन्न लोगों को विमानों और जहाज़ों से देश में वापस लाया जा सके। 

ट्रेनों के अनिश्चितकालीन इन्तज़ार से जिन ग़रीबों का ऐतबार उठ चुका था, उन्हें सड़कों-हज़ारों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल भी नहीं नापने दिया जा रहा। जबकि सम्पन्न वर्ग के बच्चों के लिए कोटा बसें भेजीं गयी, स्पेशल ट्रेन चली, हरिद्वार में फँसे गुजरातियों को बसों में भरकर उनके घर पहुँचाया गया तो नांदेड़ में फँसे सिख श्रद्धालुओं को कोरोना के साथ पंजाब पहुँचाया गया। दूसरी ओर, चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे सड़क नाप रहे ग़रीबों ने तो अपने मुँह पर मॉस्क या रुमाल या गमछा भी बाँध रखा है और वो सोशल डिस्टेंसिंग भी बरत रहे हैं।

जो प्रधानमंत्री ग़रीबों को रोना रोता रहा हो, जो ग़रीबों की सरकार होने और उनका मसीहा होने का जुमला बेचता रहा हो, उसकी नाक के नीचे बदनसीब ग़रीबों को सड़कों तो क्या रेल की पटरियों पर बिछे कंक्रीट पर भी नहीं चलने दिया जा रहा। ऐसा लग रहा है जैसे मोदी सरकार, ग़रीबों और मज़दूरों को जीते-जी मार डालने की किसी ख़ुफ़िया नीति पर काम कर रही है। एक हज़ार दिनों के लिए श्रम क़ानूनों का ख़ात्मा भी इसी साज़िश का हिस्सा है। वैसे भी भारत में ‘मज़दूरों के अधिकार’ सिर्फ़ क़ानून की किताबों तक ही सीमित थे, लेकिन अब कोरोना की आड़ में इन्हें किताबों से भी हटाया जा रहा है।

लॉकडाउन से पहले 130 करोड़ की भारतीय आबादी में क़रीब 31 करोड़ कामग़ार थे। इसमें से 92 फ़ीसदी असंगठित क्षेत्र से जुड़े थे। ये असंगठित सिर्फ़ इसीलिए कहलाये, क्योंकि इन्हें किताबी श्रम क़ानूनों ने कभी संरक्षण नहीं दिया। कुल कामगारों में से अब तक क़रीब 12 करोड़ लोग बेरोज़गार हो चुके हैं। दिहाड़ी मज़दूरों की तो कभी कोई पूछ रही ही नहीं, वेतन भोगी मज़दूरों को भी अप्रैल की तनख़्वाह नहीं मिली। बंगलुरू की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के मुताबिक, 90 फ़ीसदी मज़दूरों को उनके नियोक्ता यानी इम्पलायरों ने बक़ाया मज़दूरी नहीं दी।

हमारी सामन्ती संस्कृति और इसी पर खड़े पूँजीवादी तंत्र ने देखते ही देखते ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ का ऐसा चरित्र-हनन किया जैसा अभी राहुल गाँधी और नेहरू का हो रहा है। पूँजीवादी मीडिया और समाज में सामाजिक सुरक्षाओं से सबसे ज़्यादा लाभान्वित सरकारी कर्मचारियों के तबक़े ने ‘ट्रेड यूनियन्स’ के प्रति ऐसी नफ़रत फैलायी कि आज सरकारों ने चुटकी बजाकर ‘मज़दूरों के अधिकारों’ को ख़त्म करने की हिम्मत दिखा दी। यही वजह है कि देश में ‘न्यूनतम मज़दूरी’ अब भी एक ख़्वाब ही है। बीते दशकों में ठेका प्रथा का ऐसे विस्तार हुआ, जैसा अभी तक कोरोना का भी नहीं हुआ।

ये आलम किसी से छिपा नहीं है कि मज़दूरों को उनके अधिकार सरकारी श्रम विभाग तो छोड़िए, अदालतें में नहीं दिला रही हैं। मज़दूरों के हक़ों के मामले हमारी अदालतों में दशकों तक इंसाफ़ का मुँह ही देखते रहते हैं। इसीलिए व्यवहारिक तौर पर देश के श्रम क़ानूनों दिखावटी या शो-पीस बने हुए मुद्दत हो गयी, हालाँकि ये मज़दूरों के सैकड़ों बरस के संघर्ष के बाद अस्तित्व में आये थे। अभी जिन क़ानूनों को ख़त्म किया गया है उनमें से कई तो आज़ादी से भी कहीं ज़्यादा पुराने हैं। जैसे 1883 का Factories Act, जिसने काम के लिए आठ घंटे की सीमा बनायी, बाल श्रम को निषेध बनाया, महिलाओं को रात की ड्यूटी पर नहीं लगाने का नियम बनाया। इसी तरह 1926 में बने Trade Union Act को संविधान में अनुच्छेद 19(1)(c) के रूप में मौलिक अधिकार की ताक़त से जोड़ा गया।

1936 के Payment of Wages Act से मज़दूरों को हर महीने वेतन पाने का हक़ मिला। कुछ श्रम क़ानून तो ऐसे हैं जो संविधान से भी पहले के हैं। जैसे 1947 का Industrial Dispute Act, 1948 का Minimum Wage Act. दिलचस्प बात ये भी है कि जिन उद्यमियों को ख़ुश करने के लिए अभी श्रम क़ानूनों की हत्या की गयी है, उनके बारे में कभी कोई ऐसा प्रमाणिक अध्ययन या शोध सामने नहीं आया कि इनकी वजह से ही भारतीय उद्योग पिछड़ा हुआ है। अलबत्ता, ये सही है कि इन क़ानूनों से जो इंस्पेक्टर राज पैदा होता था, उससे सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था। लिहाज़ा, ज़रूरत भ्रष्टाचारी तंत्र को सुधारने की थी, लेकिन इसकी जगह सरकारों ने उन क़ानूनों को सफ़ाया कर दिया जो मज़दूरों को झूठी दिलासा दिलाते रहते थे।

ये किससे छिपा है कि देश में सरकारें पूँजीपतियों की मुट्ठी में ही रही हैं। इसीलिए धन्ना सेठों को कर्ज़ के ज़रिये बैंकों को लूटने की छूट हर दौर में मिलती रही है। ये बात अलग है कि मोदी राज में ये काम बेहद बड़े और व्यापक पैमाने पर हो रहा है। इसीलिए सिर्फ़ इसी तबके ने ‘अच्छे दिन’ का पूरा मज़ा लूटा है। आगे भी इसी की लूट को आसान बनाया जा रहा है। दिलचस्प बात ये भी है कि राज्यों ने चुटकी बजाकर जिस ढंग से अध्यादेश जारी करके केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को निलम्बित करने का रास्ता थामा है, उसे संसद ने बरसों-बरस की मशक्कत और अनुभव से तैयार किया था। इसीलिए, राज्यों का फ़ैसला एकतरफ़ा नहीं हो सकता। उनके अध्यादेश को केन्द्र सरकार की रज़ामन्दी की बदौलत राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी चाहिए।

इतना तो साफ़ दिख रहा है कि बग़ैर सोचे-समझे, बिना पर्याप्त तैयारी के नोटबन्दी और लॉकडाउन जैसे कड़े फ़ैसले लेने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ को ख़त्म करने के लिए बाक़ायदा अपनी सहमति दी होगी, वर्ना शिवराज सिंह चौहान, योगी आदित्य नाथ, विजय रूपाणी और प्रमोद सावंत जैसों की हिम्मत नहीं हो सकती थी कि वो अपनी मर्ज़ी से इतना बड़ा फ़ैसला ले लें। नवीन पटनायक भी बीजेपी की बी-टीम वाले नेता ही हैं। लेकिन ये बात समझ से परे है कि काँग्रेस और एनसीपी की बैसाखियों पर सवार उद्धव ठाकरे को बीजेपी जैसी मूर्खता करने की क्या पड़ी थी? इन्हें तो बहुत जल्द ही पछताना पड़ेगा।

मौजूदा राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द में इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वो छह राज्य सरकारों के असंवैधानिक अध्यादेश पर दस्तख़त करने से मना कर दें। क्योंकि देश ने उनकी स्वामि-भक्ति की शानदार लीला को 22 और 23 नवम्बर 2019 की उस ऐतिहासिक रात को देख लिया था, जब उन्होंने रातों-रात महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने की अनुमति दे दी थी, ताकि सुबह 7 बजे राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी चटपट देवेन्द्र फड़नवीस की ताजपोशी करवा सकें। पेशे से वकील रह चुके राष्ट्रपति कोविन्द की संवैधानिक समझ को जनता ने उस वक़्त भी देखा था जब उन्होंने विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पर दस्तख़त किये थे। 

वैसे जिन कोविन्द साहब से अभी श्रम क़ानूनों की परोक्ष रूप से हत्या करवायी जाएगी, उन्होंने ही 8 अगस्त 2019 को उस Code on Wages, 2019 पर दस्तख़त किये थे, जिसे मोदी सरकार ने अपने उद्यमी दोस्तों को ख़ुश करने के लिए श्रम सुधारों का नाम देकर संसद से पारित करवाया था। इस नये क़ानून की नौटंकी से भी कभी किसी का भला नहीं हुआ क्योंकि इसे लागू करने के लिए नियम (Rules) बनाने की सरकार को फ़ुर्सत ही नहीं थी। लिहाज़ा, कोविन्द के अब तक के अनुभव को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि वो 2013 वाले एपीजे अब्दुल कलाम की तरह मनमोहन सिंह सरकार को Office of Profit Bill को या 1987 वाले ज्ञानी जैल सिंह की तरह राजीव गाँधी सरकार को Indian Post Office Bill पुनर्विचार के लिए लौटा भी सकते हैं।

फ़िलहाल, ‘मोदी है तो मुमकिन है’ वाला दौर है। इसमें सरकार हर उस काम को अवश्य करती है, जिसकी ज़बरदस्त आलोचना हो रही हो। मोदी जी किसी की नहीं सुनते। तानाशाह की तरह जो जी में आता है, वही करते हैं। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ (BMS) ने श्रम क़ानूनों की हत्या को अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के उन सिद्धान्तों या conventions का सरासर उल्लंघन बताया है, जिन पर भारत ने भी दस्तख़त किये हैं। BMS अध्यक्ष शाजी नारायण का कहना है कि ‘श्रम क़ानूनों को ख़त्म किये जाने से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होंगी, जहाँ क़ानून के राज का नामोनिशान ही नहीं रहेगा।’

भारत ने अब तक ILO के 39 conventions पर दस्तख़त किये हैं। इसके आठ बुनियादी conventions को ही श्रम क़ानूनों में अपनाया गया है। मज़दूरों के हक़ का क़त्ल करने से दुनिया भर में भारत की ऐसी बेइज़्ज़ती होगी कि इसका प्रतिकूल असर उस काल्पनिक विदेशी निवेश पर भी पड़ेगा जिसकी उम्मीद में तमाम ऐतिहासिक मूर्खताएँ की जा रही हैं। इसीलिए ये साक्षात अन्धेर है। शर्मनाक है। पाग़लपन है। इससे सिर्फ़ इतना साबित हो रहा है कि कोरोना संकट के आगे हमारी सरकारें बदहवास हो चुकी हैं, अपनी सुध-बुध गवाँ चुकी हैं। इनकी मति मारी गयी है। इन पर सत्ता का ऐसा नशा सवार है कि इन्हें उचित-अनुचित का भी होश नहीं। ज़ाहिर है कि मोदीजी के सामने क़ानून के राज और संविधान की औक़ात ही क्या है!

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

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