Sunday, October 17, 2021

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ग्राउंड रिपोर्ट चांद बाग़ः बेटियों को डिटेंशन कैंप में डालने की तैयारी है और बेटी बचाने का नारा देते हो

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बी ब्लॉक यमुना विहार बस स्टॉप के ठीक 100 मीटर आगे चांद बाग़, मुस्तफाबाद में दो तरह के मुल्क आपको मिल जाएंगे। पहला मुल्क न्यू इंडिया है। इसमें आपका स्वागत करने वाला गेटवे ऑफ इंडिया नहीं बल्कि ‘गेट ऑफ हेल’ है। इस न्यू इंडिया में आने वाले टूरिस्टों को देखने लिए डिटेंशन कैंप में यातना झेलते लोग हैं। और दूसरा मुल्क़ इससे चंद कदम आगे है। जहां गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने के लिए हजारों बूढ़ी, जवान महिलाएं अपने बच्चों को लेकर कड़ाके की ठंड में धरने पर बैठी हैं। धरना स्थल तिरंगे और गांधी, अंबेडकर, अशफाकउल्लाह, भगत सिंह, अबुल कलाम आजाद, चंद्र शेखर आजाद के पोस्टर टंगे हैं।

पूरा मोहल्ला संविधान की प्रस्तावना, तिरंगे और हिंदुस्तानियत के रंग से सराबोर है। ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद, मोदी-शाह मुर्दाबाद’ के नारे फिजाओं में गूंज-गूंजकर लोगों को आश्वस्त कर रहे हैं कि जब तक ये प्रतिरोधी आवाज़ें सलामत हैं देश का संविधान और मुल्क़ को कोई मोदी-शाह नहीं मिटा सकता।

मजाज की नौजवान ख़ातून अपने आंचल को परचम बनाकर मुल्क बचाने सड़कों पर निकली हैं। ऐसी ही एक नौजवान ख़ातून तैयब्बा कहती हैं, “आज हमारे मुल्क़ में तीन करोड़ से ज़्यादा लोग भूखे पेट सोते हैं। करोड़ों लोग बेरोजगार हैं और निराशा में आत्म हत्या कर रहे हैं। छोटी-छोटी बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं। इलाज का ये हाल है कि लोग बेइलाज तड़प तड़प कर मर रहे हैं। और आप इन सब पर खर्च करने के बजाय देश की संपत्ति को एनआरसी कराने और डिटेंशन कैंप बनवाने में खर्च कर रहे हो?”

उन्होंने कहा कि दरअसल ये मुद्दे कितने अहम और गंभीर हैं इसे एक पढ़ा-लिखा और संवेदनशील नेता ही समझ सकता है। अपराधी और अनपढ़ किस्म के लोग हैं जिन्होंने अवाम को धोखा देकर सत्ता हथिया ली है। इनके थोबड़े के विज्ञापन का बजट 50 करोड़ होता है। ये अपराधी और चोर किस्म के लोग हैं।

इनकी हरकतें देख लीजिए जो भी करते हैं रातों रात कर डालते हैं। मुल्क सोकर उठता है तो पता चलता है कि नोटंबंदी की आफत आ गई है। रातों-रात जीएसटी की आफ़त आ गई है। रातों रात सीएबी कानून बन गया। ऐसे तो चोर-डाकू करते हैं। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपना नाम बदलकर योगी कर लिया। योगी का मतलब पता भी है इनको। योगी वो होता है जो दीन-दुनिया की भलाई के लिए सोचता और कुर्बान हो जाता है। ये तो नफ़रत फैलाने वाले लोग हैं। उत्तर प्रदेश और मुल्क़ में आतंक मचा रखा है।

सिख भाई धरने पर बैठी मुस्लिम बहनों के लिए लगा रहे हैं लंगर
सुबह की चाय पूछने के बाद ‘तबस्सुम’ अपनी प्रतिक्रिया में ‘जनचौक’ से कहती हैं, “इस सरकार ने पूरे मुल्क को एनआरसी और सीएए में उलझा रखा है। वो सोचते थे कि मुस्लिम के सिवा कोई और चूं नहीं करेगा इस मसअले पर। लेकिन दलित और सिख भाई बहन भी इस मसअले पर हमारे साथ सड़कों पर हैं। शाहीन बाग़ से लेकर मुस्तफाबाद तक हर जगह सिख भाई धरने पर बैठी मुस्लिम बहनों के लिए लंगर लगा रहे हैं। ये सब मीडिया में नहीं दिखेगा, क्योंकि ये लोग मीडिया को भी सेंसर कर रहे हैं। मुल्क की जनतंत्रीय व्यवस्था को तानाशाही व्यवस्था में बदल रहे हैं।” 

बुजुर्गवार शाज़िया ख़ान कहती हैं, “मोदी जी तीन तलाक़ से मुक्ति दिलाने के नाम पर मुस्लिम बहनों के भाई क्या इसी दिन के लिए बने थे कि हमारी नागरिकता छीनकर हमें तुम डिटेंशन कैंप में डाल सको। आज वही मुस्लिम मां, बहनें, बेटियां कड़ाके की ठंड में दिन-रात यहां धरने पर बैठी हैं। क्या आपको हमें इस हालत में देखकर कुछ शर्म आती है?”

उन्होंने कहा कि तीन तालक़ के मसअले पर तो तुम मुस्लिम बहनों के बड़े हितैषी भाई बने फिरते थे। आज क्या हुआ तुम्हारा वो भाईपना। आज मुस्लिम बहनें सड़कों पर हैं, डिटेंशन कैंपों में हैं, उनसे तुम कागज दिखाकर अपनी नागरिकता साबित करने की बात कर रहे हो। क्या अब वो तुम्हारी बहनें नहीं रहीं? जीनत परवीन कहती हैं, “बहुत सी सरकारें आईं और चली गईं। सलतनत पर इन्हें हम जनता ने बिठाया है हम जनता ही इन्हें उतार फेंकेंगे।” 

शहाना कहती हैं, “मोदी जी ये कानून नहीं चलेगा। हम परेशान होंगे तो मुश्किल में आप भी आओगे।”  इशरत कहती हैं, “आप जनता के लिए प्रधानमंत्री बने हैं तो जनता के बारे में ही सोचिए। एनआरसी और सीएए तो आपको वापस लेना ही होगा। चाहे एक महीना बीते चाहे एक साल जब तक सीएए-एनआरसी रद्द नहीं होती हम यहीं बैठे मिलेंगे।”

मोहम्मद यासीन कहते हैं, “जो शाहीन बाग़ और मुस्तफाबाद में हो रहा है वही पूरे हिंदुस्तान में होगा। अगर एनआरसी और सीएए वापिस नहीं होगा। अगर मोदी शाह वापस नहीं हट सकते तो हम भी नहीं हटेंगे, नहीं झुकेंगे। मोदी-शाह आप से ऊपर भी कोई बैठा है वो इस मुल्क की पाक साफ आवाम के साथ है। आवाम के आगे तो अच्छे-अच्छे तानाशाह झुक गए आपकी क्या बिसात है।” अज़रा कहती हैं, “भारत के मुसलमानों ने अपने इस मुल्क के लिए इतनी कुर्बानी दी है कि उन्हें कोई एनआरसी-सीएए इस मुल्क से नहीं भगा सकता।”

मसरूर आलम कहते हैं, “सीएए लाकर उन्होंने संविधान को तार-तार कर दिया है। हम हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई कंधे से कंधा मिलाकर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं। हम अपने संविधान को हर्गिज न बदलने देंगे। अगर वो इसे वापिस नहीं लेंगे तो हम सड़कों पर उतरकर लड़ेंगे। ये हिंदू-हिंदू करते हैं और दलित के गरीब बच्चों को ये पढ़ने नहीं देते ताकि वो आगे न बढ़ पाएं। एनआरसी की मार दलित, आदिवासी, ओबीसी सब झेलेंगे हमने असम में ये होते हुए देखा है।” फहीमुद्दीन अंसारी कहते हैं, “हमारी मां-बहनें छोटे-छोटे बच्चे लेकर सड़कों पर बठी हैं। हमारे साथ नाइंसाफी हो रही है। साजिश हो रही है। हम चाहें मर जाएं पर हम यहीं सड़क पर रहेंगे। वापस नहीं जाएंगे इन्हें सीएए वापिस लेना ही पड़ेगा।”

एनआरसी देश के हर गरीब के खिलाफ़ है
तैय्यब कहते हैं, “एनआरसी-एनपीआर-सीएए को हम नकारते हैं। मुसलमानों के खिलाफ़, संविधान के खिलाफ ये साजिश कर रहे हैं। गरीब-गरीब होता है, वो हिंदू-मुसलमान नहीं होता। गरीबों के पास कागज़ कहां होता है। एनआरसी दरअसल मुल्क के हर गरीब के खिलाफ़ है। असम में बहुत से गैर-मुस्लिम डिटेंशन कैंप भेजे गए हैं।”

उन्होंने कहा कि सीएए आने के बावजूद वो डिटेंशन कैंप में हैं। तुमने 370, तीन तलाक़, बाबरी मस्जिद सब कर लिया हम नहीं बोले। लेकिन आप अगर चाहें कि इस मुल्क़ को बर्बाद कर लें तो मुआफ़ कीजिए लेकिन हम आपको ये नहीं करने देंगे। आप हमारे जीते जी इस मुल्क को बर्बाद नहीं कर सकते।” जफ़र कहते हैं, “एनआरसी तो हम नहीं चलने देंगे। हम काले कानून के मसअले पर चुप नहीं रहेंगे।

वहां मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि जिस आधार कार्ड और वोटर कार्ड के जरिए ये सत्ता में आए हैं आज ये उसी को नकार रहे हैं। उसे वैलिडिटी नहीं दे रहे, पहचान का, नागरिकता का आधार नहीं मान रहे हैं। आप वोटर कार्ड के आधार पर ही हमसे वोट लेकर सत्ता में आए हैं और आज उसे ही नकार रहे हैं। अगर ये कागज हमारी नागरिकता का आधार नहीं हो सकते तो इन कागजों के आधार पर आप इस मुल्क़ के प्रधानमंत्री कैसे हो सकते हैं।

जामिया और जेएनयू में पिछड़ी और वंचित समाजों के बच्चे पढ़ते हैं। उन्हें अपने और अपने मुल्क के नफे-नुकसान पर सब पता होता है। तभी वो हर गलत बात के खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो आप उन पर लाठियां चलवाते हो। आप जेएनयू और जामिया बंद करना चाहते हो ताकि वहां से पिछड़े और वंचित समाज के बच्चे पढ़कर आईएएस-पीसीएस डॉक्टर, इंजीनियर और नेता न बन सकें। 

किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है
सलमान सिद्दीक़ी कहते हैं, “मेरे दादा फ्रीडम फाइटर थे। उन्होंने इस मुल्क को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने की लड़ाई लड़ी और आज उनके नाती पोतों से नागरिकता का सुबूत मांगा जा रहा है। एनआरसी-सीएए के जरिए उन्होंने पूरे देश में अराजकता का माहौल बना रखा है। पढ़े-लिखे लोग बेरोजगार हैं। छात्र यूनिवर्सिटीज में लाठी-डंडे खा रहे हैं और तड़ीपार सत्ता में हैं।”

उन्होंने कहा कि अपराधी सत्ता में होंगे तो इस मुल्क में कुछ अच्छा हो ही कैसे सकता है। आरएसएस पुलिस की वर्दी पहनकर घूम रही है। हिटलरशाही बना रखी है और ये चाहते हैं कि इनकी सत्ता बनी रहे इसीलिए देश के स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी को बर्बाद कर रहे हैं ताकि इस देश में लोग पढ़ लिखकर इनकी बदमाशियों का विरोध न करें।”

उन्होंने कहा कि आप हमसे 70 साल पहले के कागजात मांग रहे हैं और खुद तीन महीने पुराने राफेल के कागजात तक नहीं सम्हाल सके। ये लोग नया संविधान बनाने की सोच रहे हैं, जिसमें ब्राह्मण पहले दर्जे का नागरिक होगा, बाकी सिख, बौद्ध, मुस्लिम चौथे दर्जे के नागरिक बन जाएगें। हम ऐसा होने नहीं देंगे। हिंदू-मुस्लिम सिख ईसाई सब मिलकर संविधान को बचाएंगे। 

उबैद ख़ान राहत इंदौरी के शेर से अपने दिल की बात कहते हैं, 
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है 
सभी का ख़ून है शामिल यहां की मिट्टी में 
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है

शाहीन बाग़ की महिलाओं पर 500 रुपये लेकर प्रोटेस्ट में बैठने के भाजपा आईटी सेल के पोपगंडा पर चांद बाग़ की महिलाएं नाखुश और गुस्से में हैं। जरीना कहती हैं, “मोदी और शाह अपनी बेटियों-बहनों को भेजों इस कड़ाके की ठंड में दिन-रात हमारे साथ धरने पर बैठने के लिए। हम उन्हें पांच हजार रुपये देंगे। है दम? तुम हमें बिकने वाली औरतें कहते हो, ये तुम्हारी भाषा है। अरे देश को तुम बेच रहे हो, आज देश की जिन चीजों को तुम बेच रहे हो वो हमारे पुरखों की बनाई है। तुमने लाला किला बेच दिया। तुमने सरकारी कंपनियां बेंच दीं। रेलवे बेच दिया। पूंजीपतियों के हाथों अपना ईमान-धर्म-दीन सब तुमने बेचा और तुम्हारे लोग हमें बिकने वाली औरतें कहते हैं। उन्हें बताओ बिकना क्या होता है।” 

डायबिटीज, हर्ट, रक्तचाप और गठिया की बीमारी है फिर भी अनशन पर
चांद बाग़ मुस्तफाबाद में धरने पर बैठी कई महिलाओं को गंभीर बीमारियां हैं। कोई हर्ट का मरीज है तो किसी को मधुमेह है। कोई रक्तचाप तो कोई गठिया की बीमारी लिए धरने पर बैठा है। वो कहती हैं कि देश को जो बीमारी लगी है उसके आगे शारीरिक बीमारी कुछ नहीं। हम अपनी बीमारी देखें कि देश की बीमारी। वो तो देश को भाड़ में झोंककर गर्म कमरे में नर्म बिस्तर पर रात बिता रहे हैं। हम यहां कड़ाके की ठंड में बिना बिस्तर, बिना चारपाई के नम जमीन पर रात बिता रहे हैं। मोदी बताएं कि हमारी क्या गलती है जो हमें ये सजा काटनी पड़ रही है। आज उनकी औलादें होतीं तो वो भी रोड पर होते। 

जमीला बताती हैं, “मेरी उम्र 70 साल है। दिल का ऑपरेशन हुआ है। 13 साल से दवा खा रही हूं। डॉक्टरों ने ठंड से बचकर रहने को कहा है, लेकिन क्या करूं आज हालत ये है कि डॉक्टरों की सलाह और सेहत को ताख पर रखकर यहां बैठी हूं। अपने परिवार, अपने देश और आईन के लिए यहां बैठी हूं। बड़े, बूढ़ों , बीमारों का दिल दुखाना अच्छी बात नहीं है।”

हम महिलाएं जीती जागती कागज़ हैं
हम आसमान से नहीं टपके। हमें भी हमारे-मां बाप ने पैदा किया है। आज 65-70 साल हमारी उम्र है। हमारे समय में जन्म दिन नहीं मनाया जाता था। हम अस्पताल में भी नहीं पैदा हुए। पढ़े-लिखे भी नहीं हैं कि जन्म तिथि के लिए स्कूली सर्टिफिकेट ही हो। हमें अपनी जन्म तिथि तक तो पता नहीं, मां-बाप की जन्म तिथि कहां से लाएं।  

हम महिलाएं जीती जागती कागज़ हैं। हमें किसी कागजात की ज़रूरत नहीं हैं। हमारी जाने कितनी पुश्तें यहां पैदा हुईं और यहां दफ़्न हो गईं। तुम्हारे मां-बाप होंगे तो वो बताएंगे कि उनके पास कितने कागज़ात हैं। अपनी बूढ़ी मां से पूछें कि कितने कागजों पर उनके नाम हैं। बेटियों को डिटेंशन कैंप में डालने की तैयारी किए बैठे हो और बेटी बचाने का नारा देते हो।

जीनत कहती हैं, “बेटियों को डिटेंशन कैंप में डालने की तैयारी है। बेटियों को सड़कों पर आने को विवश कर दिया है और बेटी बचाने का नारा देते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। बेटियां आज पढ़ाई छोड़कर सड़कों पर उतर रही हैं, तुम उनके खिलाफ़ एफआईआर दर्ज कराते हो और बेटियों को पढ़ाने का नारा देते हो। तुहें शर्म नहीं आती। जिसके पास बीबी, बेटी, बहन होती हैं, वही उनका दर्द समझते हैं। जिसने घर गृहस्थी देखा ही नहीं वो क्या जाने महिलाओं की तकलीफ। उन्होंने कहा कि हम महिलाएं ईंधन, रोटी जुटाने में खप जाती हैं, हमने कभी कागज जुटाना सीखा ही नहीं।”

(सुशील मानव पत्रकार और लेखक हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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