Monday, January 24, 2022

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रिपोर्ट कार्ड: हेमंत सरकार के हो गए दो साल पूरे, पर अनेक वादे अभी भी अधूरे

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भाजपा सरकार के जन विरोधी रवैये के विरुद्ध झारखंडियों ने 2019 में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महागठबंधन सरकार को स्पष्ट जनादेश दिया था। सरकार के कार्यकाल के दो साल पूरे हो गए हैं जिनमें जन अपेक्षा अनुसार कई काम तो दिखे हैं, लेकिन सरकार कई अन्य मूल मुद्दों पर चुप्पी साधी हुई है और ज़मीनी स्तर पर नागरिकों के लिए कुछ ख़ास बदलाव नहीं दिख रहा है।

पिछली सरकार की तुलना में राज्य में सांप्रदायिक माहौल कुछ कम हुआ है एवं राज्य द्वारा लिंचिंग व भीड़ हिंसा के विरुद्ध हाल में पारित बिल सराहनीय पहल है। कोविड लॉकडाउन के दौरान एवं उसके बाद भी सरकार ने प्रवासी मज़दूरों के अधिकारों के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता दर्शायी है। साथ ही, जन वितरण प्रणाली का दायरा एवं पेंशन योजनाओं का कोटा बढ़ाना भी सही दिशा में कदम रहे।

लेकिन दमन एवं पुलिस व सुरक्षा बलों के जन विरोधी रवैये में कोई फर्क नहीं पड़ा है। आदिवासी-मूलवासियों, खास कर के वंचितों, के विरुद्ध विभिन्न तरीकों से प्रशासनिक और पुलिसिया दमन जारी है। अधिकांश मामलों में न तो पीड़ितों को मुआवज़ा मिला और न ही दोषियों पर कार्रवाई हुई है। नक्सल अभियान की आड़ में सुरक्षा बल द्वारा आदिवासियों पर अभी भी हिंसा हो रही है। उदाहरण के लिए, 12 जून, 2021 को लातेहार के पिरी गाँव में पारंपरिक शिकार पर निकले युवकों पर नक्सल अभियान पर निकले सुरक्षा बलों ने अन्धाधुन गोली चलाया और आदिवासी ब्रम्हदेव सिंह की गोली मार के हत्या कर दी। लेकिन इस के विरुद्ध आज तक मृतक के पत्नी के आवेदन पर एक महज़ प्राथमिकी तक दर्ज नहीं हुई। मानवाधिकारों के संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता की कमी इससे भी उजागर होती है कि राज्य मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग व सूचना आयोग ठप पड़े हुए हैं।

बताना जरूरी होगा कि 9 जून 2017 को गिरिडीह जिले के मधुबन के पारसनाथ पहाड़ की तलहटी में एक डोली मजदूर मोतीलाल बास्के की सीआरपीएफ ने नक्सली बताकर गोली मार दी थी। सीआरपीएफ की इस कार्रवाई के खिलाफ आन्दोलन हुआ जिसमें पूर्व मुख्यमन्त्री बाबूलाल मरांडी और शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन ने भी शिरकत की थी लेकिन उनकी सरकार बनने के दो साल बाद भी मोतीलाल के परिजन को इन्साफ नहीं मिल पाया है।

सभी पत्थलगड़ी मामलों की वापसी की सराहनीय घोषणा के दो साल बाद भी मामले वापस नहीं लिए गए हैं। हालाँकि सभी मामले एक ही प्रकार के हैं, लेकिन सरकार द्वारा कुल 30 प्राथमिकियों के केवल 60% मामलों की वापसी की ही अनुशंसा की गयी है। पिछली सरकार द्वारा व्यापक पैमाने पर राज्य में आदिवासियों, गरीबों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध फ़र्ज़ी आरोपों पर UAPA कानून व राजद्रोह धारा का इस्तेमाल किया गया था। अभी भी कई निर्दोष ग्रामीण ऐसे मामलों से जूझ रहे हैं। जैसे, बोकारो के गोमिया के कई मज़दूरों व किसानों पर, जो आदिवासी-मूलवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत रहे हैं, माओवाद के फ़र्ज़ी आरोप व UAPA के तहत मामले दर्ज किए गए हैं। वे अभी भी अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दुःख की बात है कि 2020 में भी राज्य में UAPA के 86 मामले दर्ज किए गए थे।

झामुमो और कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में विचाराधीन कैदियों (बिना दोषी ठहराए गए छोटे-छोटे मुकदमों में जेलों में बंद आदिवासी, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों) की रिहाई की दिशा में कार्यवाही का वादा किया था। लेकिन इस मुद्दे पर भी सरकार की ओर से पूर्ण चुप्पी है। हेमंत सोरेन सरकार ने स्टेन स्वामी की फ़र्ज़ी आरोपों पर अमानवीय गिरफ़्तारी के विरुद्ध आवाज़ तो उठाई और उनको उनके देहांत के बाद विनम्र श्रद्धांजलि दी, लेकिन स्टेन स्वामी द्वारा लगातार उठाए जा रहे मामलों पर मौन हैं।

रघुवर दास सरकार द्वारा भूमि कानूनों के संशोधन, लैंड बैंक नीति एवं जबरन भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध लोगों का आक्रोश चुनाव में दिखा। झामुमो एवं कांग्रेस ने पिछली सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 में किए गए संशोधन (सामाजिक व पर्यावरण असर अंकेक्षण को कमज़ोर करना) को रद्द करने का वादा किया था। लैंड बैंक नीति के विरुद्ध भी लगातार चुनावी वादे किए गए थे। यह भी घोषणा की गई थी कि पांच वर्षों तक उपयोग में नहीं लायी गयी अधिग्रहीत भूमि रैयतों को वापस की जाएगी। लेकिन जन अपेक्षा के विरुद्ध वर्तमान सरकार ने अभी तक इस ओर कुछ कार्यवाही नहीं की है।

उल्टा वह केंद्र सरकार की कॉर्पोरेट पक्षीय प्रॉपर्टी कार्ड योजना को जोरशोर से लागू करने में लगी हुई है। यह भी सोचने की बात है कि एक तरफ राज्य सरकार ने तीनों कृषि कानून के विरुद्ध आन्दोलन का समर्थन किया लेकिन दूसरी ओर फलों व सब्जियों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने के अपने चुनावी वादे पर कार्यवाही नहीं कर रही है।

इस रवैये को देखते हुए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि ईचा-खरकई डैम, मंडल डैम एवं अडानी पावर परियोजना जैसी जन विरोधी व गैर-क़ानूनी तरीके से कार्यान्वित परियोजनाओं को निरस्त करने के चुनावी वादे पर सरकार एक शब्द नहीं बोल रही है। इससे यह स्पष्ट है कि कॉर्पोरेट घरानों की झारखंड सरकार पर पकड़ जस-की-तस है। रघुवर दास सरकार के रवैये के समान वर्तमान सरकार भी बोकारो के लुगूबुरु पहाड़ में सैकड़ों स्थानीय आदिवासियों के विरोध के बावज़ूद हाईडेल पावर प्लांट लगाने एवं इसके लिए जबरन भूमि अधिग्रहण करने के लिए तत्पर है।

हालाँकि सरकार ने पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुरूप आदिवासी सलाहकार परिषद का गठन किया है, लेकिन अभी तक समिति ने न तो सक्रियता से पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के अनुरूप केंद्रीय कानूनों के संशोधन की अनुशंसा की है और न ही आदिवासियों के अधिकारों के उल्लंघन पर कोई कार्यवाही की है। यह भी चिंताजनक है कि सरकार बनने के दो साल बाद भी पेसा नियमावली बनने की ओर पहल नहीं दिख रही है।

इस वर्ष राज्य सरकार द्वारा मनरेगा मज़दूरी दर को 27 रुपये बढ़ाना स्वागत योग्य पहल थी। चुनावी अभियान में भी खुद मुख्यमंत्री ने कई बार मनरेगा को दुरुस्त करने की बात की थी। लेकिन दुःख की बात है कि पहले जैसी ही मनरेगा ठेकेदारों व भ्रष्ट पदाधिकारियों के भेंट चढ़ी हुई है एवं इस व्यापक भ्रष्टाचार को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। अगर सरकार सही में मनरेगा द्वारा ग्रामीण मज़दूरों को रोज़गार देना चाहती है, तो इससे पार्टी कैडर की ठेकेदारी एवं पदाधिकारियों के भ्रष्टाचार को बंद करना पड़ेगा। यही स्थिति कई अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों की भी है। राज्य में व्यापक कुपोषण के बावज़ूद आंगनवाड़ी सेवाएं दो वर्षों से लगभग ठप पड़ी हैं। न नियमित रूप से पका भोजन मिलता है, न टेक होम राशन और न ही अंडे।

दो साल के बाद भी शिक्षा व स्वास्थ्य की लचर व्यवस्था को सुधारने की ओर कोई कार्यवाही शुरू नहीं हुई है। सत्तारूढ़ दलों ने विलय किए गए विद्यालयों को खोलने का वादा किया था। यह भी अत्यंत चिंताजनक है कि कोविड की दूसरी वेव के बाद मॉल, सिनेमा घर, जिम, धार्मिक स्थल आदि तो पूर्णतः खोल दिए गए हैं, लेकिन प्राथमिक विद्यालय अभी भी बंद पड़े हैं। कांग्रेस और झामुमो ने प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली को दुरुस्त करने का वादा किया था, लेकिन राज्य में सैकड़ों निष्क्रिय स्वास्थ्य उप-केंद्र व प्राथमिक केंद्र वर्तमान स्थिति स्पष्ट करते हैं।

जनता ने इस सरकार को झारखंडी अस्तित्व व हित के संरक्षण के लिए चुना था। निजी क्षेत्र की नौकरियों में स्थानीय के लिए 75% आरक्षण सही दिशा में पहल है। लेकिन सबसे पहले पिछली सरकार की झारखंड-विरोधी स्थानीय नीति को निरस्त कर जन अपेक्षा अनुरूप नीति बनाने की ज़रूरत है। इस अहम मुद्दे पर सरकार बचती नज़र आ रही है। साथ ही, नियोजन परीक्षाओं में स्थानीय भाषा में मगही ,भोजपुरी, अंगिका व मैथिली को शामिल करने के निर्णय की समीक्षा की आवश्यकता है एवं नियोजन के लिए प्रखंड/पंचायत को इकाई बनाया जाए।

तमाम मुद्दों पर झारखंड जनाधिकार महासभा का मानना है कि सांप्रदायिक व फासीवादी भाजपा की तुलना में वर्तमान सरकार ने झारखंडी हित व जन अधिकारों के संरक्षण के पक्ष में कुछ काम किया है, लेकिन कई मुद्दों पर सरकार बिल्कुल निष्क्रिय है, एवं उसकी कुछ नीतियां जन विरोधी भी हैं। लगातार मांग के बावज़ूद सरकार सामाजिक कार्यकर्ताओं व जन संगठनों से नियमित वार्ता की प्रक्रिया स्थापित नहीं कर रही है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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