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Friday, September 24, 2021

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हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा- एसपी के साथ हाथरस के डीएम का भी क्यों नहीं हुआ निलंबन?

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस राजन रॉय की खंडपीठ ने जब राज्य सरकार से सवाल किया कि हाथरस के एसपी को निलम्बित किया गया तो डीएम को वहां क्यों बनाए रखा गया है तो अदालत में मौजूद अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी बगले झांकने लगे और खंडपीठ को भरोसा दिलाया कि सरकार मामले के इस पहलू को भी देखेगी और इस पर निर्णय लेगी। खंडपीठ ने कहा कि हम राज्य सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह इस संबंध में एक निष्पक्ष और त्वरित निर्णय लेगी। खंडपीठ ने पीड़ित परिवार को कड़ी सुरक्षा देने का आदेश भी किया है। साथ ही मीडिया को जिम्मेदारी भरी रिपोर्टिंग करने की बात कही है। खंडपीठ ने हाथरस के निलंबित एसपी विक्रांत वीर को कोर्ट ने अगली पेशी 2 नवंबर को तलब किया है।

हाथरस कांड पर हाईकोर्ट में सोमवार को हुई सुनवाई का 11 पन्नों का आदेश मंगलवार देर शाम हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड हुआ। खंडपीठ ने कहा कि न्यायालय में मौजूद अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी से पूछा कि क्यों, अगर जिलाधिकारी द्वारा हाथरस में रात में पीड़िता का अंतिम संस्कार करने का निर्णय एक सामूहिक था, तो केवल पुलिस अधीक्षक को निलंबित कर दिया गया था जबकि जिला मजिस्ट्रेट को बने रखने की अनुमति दी गई थी और वह अभी भी हाथरस में तैनात हैं।

अवस्थी ने कहा कि एसआईटी की पहली रिपोर्ट में पुलिस अधीक्षक को दोषी ठहराया गया था। हालांकि यह पूछे जाने पर कि क्या एसआईटी ने जिला मजिस्ट्रेट को दोषमुक्त किया था और वास्तव में क्या जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका एसआईटी जांच का विषय थी, अवस्थी ने कहा कि नहीं ऐसा नहीं था। खंडपीठ ने कहा कि वह इस संबंध में कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके, क्योंकि दोनों अधिकारियों के साथ अलग-अलग स्टैंड क्यों लिया गया।

खंडपीठ ने कहा कि हमने तब अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी से पूछा कि वर्तमान परिस्थितियों में जबकि अंतिम संस्कार के मामले में डीएम की एक भूमिका थी, ऐसे में क्या उन्हें हाथरस में बनाए रखना उचित है। अवस्थी ने कहा कि सरकार मामले के इस पहलू पर गौर करेगी और निर्णय लेगी। हम इस संबंध में एक निष्पक्ष निर्णय की उम्मीद करते हैं, जो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द हो।

पीड़िता के परिवार, अपर मुख्य सचिव, डीजीपी, एडीजी कानून व्यवस्था तथा हाथरस के डीएम प्रवीण कुमार को विस्तारपूर्वक सुनने के बाद खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि तथ्यों से प्रतीत होता है कि मृतका का चेहरा दिखाने के परिवार के अनुरोध पर प्रशासन ने स्पष्ट रूप से इनकार नहीं किया होगा। हालांकि तथ्य यही है कि बार-बार के अनुरोध के बावजूद उनमें से किसी को भी चेहरा नहीं दिखाया गया। इस प्रकार गरिमापूर्ण ढंग से अंतिम संस्कार के अधिकार का उल्लंघन किया गया।

पीड़ित परिवार, वहां मौजूद लोगों और रिश्तेदारों की भावनाओं को भी आहत किया गया। इसलिए हमारे समक्ष महत्वपूर्ण मुद्दा है कि आधी रात में जल्द बाजी से अंतिम संस्कार करके, परिवार को मृतका का चेहरा न दिखाकर और आवश्यक धार्मिक क्रियाकलाप की अनुमति न देकर क्या संविधान में प्रदत्त जीवन के अधिकार व धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन किया गया है। यदि ऐसा है तो यह तय करना होगा कि इसका कौन जिम्मेदार है और पीड़िता के परिवार की क्षतिपूर्ति कैसे की जा सकती है।

लाश जलाने को लेकर खंडपीठ बेहद नाराज है। खंडपीठ ने डीएम हाथरस से पूछा बिना परिवार की मंजूरी के लाश क्यों जलाई? खंडपीठ के मुताबिक डीएम हाथरस का बयान विरोधाभासी है। डीएम ने अपने बयान में कहा है कि परिस्थिति का आकलन करते हुए जिलाधिकारी के रूप में मैंने हाथरस में मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह करके पीड़िता के परिवार को विश्वास में लेकर अपने स्तर पर रात्रि में दाह संस्कार कराने का निर्णय लिया। जिलाधिकारी के रूप में मैंने मौके की नजाकत समझते हुए कानून-व्यवस्था की दृष्टि से पीड़िता के शव का दाह-संस्कार कराना आवश्यक समझा।

खंडपीठ ने कहा है कि राज्य के अधिकारियों ने कानून और व्यवस्था की स्थिति के नाम पर जो किया वह मृत पीड़िता और उसके परिवार के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। वह अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार की हकदार थी जो अनिवार्य रूप से उसके परिवार द्वारा किया जाना था।खंडपीठ ने जिला प्रशासन पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि अधिकारी पीड़ित परिवार को मृतका का शव नहीं सौंपने का उचित कारण नहीं बता सके। खंडपीठ ने कहा कि अनुच्छेद 21 और 25 के प्रावधानों (मौलिक/मानवाधिकारों) का  घोर उल्लंघन किया गया।

खंडपीठ ने कहा है कि रात में अंतिम संस्कार करने के सम्बंध में डीएम हाथरस कोर्ट को संतुष्ट नहीं कर सके ।  

”The District Magistrate, however, as of now, could not satisfy us about observance of last rites while cremating the victim’s body as per traditions and customs of the family.”

खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की है कि आज़ादी के बाद शासन और प्रशासन का सिद्धांत ‘सेवा’ और ‘सुरक्षा’ होना चाहिए, न कि ‘राज’ और ‘नियंत्रण’ जैसा कि आज़ादी के पहले था। जिला स्तरीय अधिकारियों को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सरकार की ओर से समुचित प्रक्रिया व दिशानिर्देश मिलना चाहिए। भविष्य में ऐसा विवाद न उत्पन्न हो, इस बाबत भी खंडपीठ विचार करेगी। खंडपीठ ने अपने आदेश में अपर मुख्य सचिव के इस बयान को भी दर्ज किया कि सरकार जिला स्तरीय अधिकारियों के लिए ऐसी परिस्थितियों में अंतिम संस्कार को लेकर दिशानिर्देश जारी करेगी।

खंडपीठ ने सख्ती से यह भी आदेश दिया है कि जो अधिकारी इस मामले की विवेचना से नहीं जुड़े हैं, वे अपराध के बारे में अथवा साक्ष्य संकलन के बारे में बयान न दें क्योंकि यह भ्रम पैदा कर सकता है। न्यायालय व जांच एजेंसियां इस मामले को देख रही हैं इसलिए गैर जिम्मेदाराना बयान बाजी से परहेज किया जाए। खंडपीठ ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करने की मंशा रखते हुए हम मीडिया व राजनीतिक दलों से भी अनुरोध करते हैं कि वे ऐसा कोई विचार न व्यक्त करें जिससे सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचे व पीड़िता के परिवार व अभियुक्तों के अधिकारों का उल्लंघन हो। खंडपीठ ने कहा कि जिस प्रकार अभियुक्तों को ट्रायल पूर्ण होने से पहले दोषी नहीं ठहराना चाहिए, उसी प्रकार किसी को पीड़िता के चरित्र हनन में भी संलिप्त नहीं होना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि सरकार ने पीड़िता के परिवार के लिए मुआवजे की घोषणा की है लेकिन सम्भवतः वह उन्हें स्वीकार नहीं है क्योंकि परिवार के एक सदस्य ने कहा कि मुआवजा अब किसी काम का नहीं। फिर भी मुआवजे का प्रस्ताव परिवार को जल्द से जल्द दिया जाए और यदि वे लेने से इनकार करते हैं तो उसे जिलाधिकारी किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में ब्याज मिलने वाले खाते में जमा कर दें, जिसके उपयोग के बारे में हम आगे निर्देश दे सकते हैं।  

खंडपीठ ने कहा है कि सीबीआई अपनी जांच मीडिया से शेयर नहीं करेगी, वहीं जांच की प्रगति रिपोर्ट पब्लिक डोमेन में न रखें। आदेश में अपर मुख्य सचिव गृह को निर्देश दिया गया है कि महिला सुरक्षा को लेकर ठोस नीति बनाए।

आरोप है कि गत 14 सितंबर को हाथरस जिले के चंदपा थाना क्षेत्र में 19 साल की एक दलित लड़की से कथित अगड़ी जाति के चार युवकों ने सामूहिक बलात्कार किया था। इस घटना के बाद हालत खराब होने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहां गत 29 सितंबर को उसकी मृत्यु हो गई थी। इस घटना को लेकर विपक्ष ने राज्य सरकार पर जबरदस्त हमला बोला था। इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया है और सीबीआई टीम हाथरस में डेरा डाल चुकी है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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