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हिंदी दिवस सिर्फ एक फालतू कर्मकांड ही नहीं, राष्ट्रीय क्षति भी!

लंबे समय तक मैं हिंदी दिवस के कार्यक्रमों में जाया करता था। एक हिंदी पत्रकार होने के नाते मुझे इस मौके पर हर साल कभी कोई सरकारी संस्थान बुलाता, कभी किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग तो कभी किसी लोक उपक्रम का राजभाषा विभाग। उनमें ज्यादातर मेरे संबोधन के लिए कुछ पारिश्रमिक या सम्मान राशि भी देते। लेकिन बीते कुछ सालों से हिंदी दिवस के किसी भी आयोजन में अब मैं बिल्कुल नहीं जाता। एक हिंदी पत्रकार जो हिंदी में सोचता है, हिंदी में लिखता है और हिंदी में प्रसारण करता है, आखिर उसने ऐसा क्यों किया? इसे आप मेरा अनुभव-जन्य ज्ञान कहिये या एक तरह का प्रतिरोध! सोचता हूं तो अपने ऊपर गुस्सा भी आता है कि हिंदी दिवस के इन कार्यक्रमों में इतने लंबे समय तक जाता ही क्यों रहा! विश्व हिंदी सम्मेलनों का भी भौंडा नाटक देख चुका हूं।

दो दिन पहले भी एक प्रतिष्ठित मित्र ने आमंत्रण दिया, आन लाइन कार्यक्रम या वेबिनार में शरीक होने का। पर जैसे ही सुना ‘हिंदी दिवस’ का कार्यक्रम है, मैंने माफ़ी मांग ली।

मुझे ये ‘हिंदी दिवस’ जैसे सरकारी या गैर-सरकारी कार्यक्रम न सिर्फ़ कर्मकांडी लगते हैं अपितु राष्ट्रीय-क्षति भी लगते हैं। आर्थिक ही नहीं,  इससे वक्त और श्रम की भी बर्बादी होती है। हिंदी के विकास, उसे जीवंत, ज्ञान-विज्ञान, समझ, नये विचार और नवाचार की भाषा बनाने में क्या ऐसे आयोजनों से किसी तरह की मदद मिलती है? सच ये है कि सरकारी संस्थानों के ज्यादातर राजभाषा विभागों ने हिंदी को नये चिंतन और ज्ञान-विज्ञान की जीवंत भाषा बनाने की बजाय बेहद घटिया और भ्रष्ट किस्म के अनुवाद की भाषा बनाने में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाई है! इन्कार नहीं करता कि कुछेक उपक्रम या विभाग इसके अपवाद हो सकते हैं और हैं भी।

उदाहरण के लिए कुछ वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय ने हिंदी अध्ययन के एक निदेशालय के जरिये अच्छी परियोजना चलाई थी, जिसके तहत इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और अन्य समसामयिक विषयों पर अंग्रेजी में लिखी मशहूर किताबों का हिंदी में सहज और सुंदर अनुवाद कराया गया। काश, वह सिलसिला लंबा चला होता। पर अब उस संस्थान से हमने नये प्रकाशन नहीं देखे। एक दौर में बिहार में राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार ग्रंथ अकादमी, केंद्र की साहित्य अकादमी, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, मध्य प्रदेश और यहां तक कि पश्चिम बंगाल के कुछ सरकारी संस्थानों/प्रकाशनों ने भी हिंदी प्रकाशनों के क्षेत्र में अच्छे काम किये। पर इनमें ज्यादातर संस्थान स्वायत्त किस्म के रहे और उन दिनों उनमें कुछ योग्य लोगों की नियुक्तियां होती थीं। कम लोगों को याद होगा कि राहुल सांकृत्यायन की कुछ मशहूर किताबें बिहार के शासकीय संस्थानों से छपीं।

उस दौर के ऐसे सरकारी संस्थानों या प्रकाशनों को आज के विभागों के समतुल्य नहीं कहा जा सकता जो साल में एक बार 14 सितम्बर को हिंदी के विकास का भजन गाते हुए ‘हिंदी दिवस’ का कर्मकांडी आयोजन करते हैं। ‘हिंदी दिवस’ के सालाना कर्मकांड को सबसे बड़ा काम मानने वाले तमाम सरकारी-अर्द्धसरकारी संस्थाओं के मुकाबले हिंदी का बड़ा काम तो हिंदी के एक विद्वान संपादक-अरविंद कुमार ने कर दिखाया। अपनी पत्नी कुसुम कुमार के साथ मिलकर उन्होंने ‘समांतर कोश’ और ‘द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी एंड हिंदी—इंग्लिश थिसारस एंड डिक्शनरी’ सहित हिंदी के भाषायी विकास के लिए जरूरी कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। और भी बहुतेरे लेखक हिंदी-हिंदी या हिंदी दिवस का कर्मकांडी शोर किये बगैर हिंदी में अच्छा काम करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि हिंदी में सामाजिक-आर्थिक विषयों पर काम करने वाले गंभीर लेखकों, शोध छात्रों या अध्येताओं के लिए सरकारी या निजी संस्थानों की तरफ से किसी तरह की शोध वृत्ति या जरूरी सहायता योजना जैसी चीज नहीं है।

कुछ संस्थानों ने अपने-अपने यहां हिंदी में कुछ गंभीर काम किये हैं पर उनका काम बुनियादी तौर पर संस्थागत रहा है। एक स्वतंत्र लेखक या शोधकर्ता के लिए, जिसकी केंद्र या राज्यों के सत्ताधारी दलों से निकटता न हो, के लिए आज कहीं भी कोई शोध-प्रकल्प या शोधवृत्ति की सुविधा समूचे हिंदी क्षेत्र में शायद ही कहीं हो। कम से कम मुझे तो नहीं दिखाई पड़ती। इस तरह के जो कुछ संस्थान कार्यरत हैं, वो आमतौर पर एक ही सोच या विचार या वर्ण के लोगों द्वारा संचालित हैं। उनके लाभार्थी भी एक तरह के लोग होते हैं। फिर भारत जैसे विविधता भरे देश में की बड़ी आबादी में बोली जाने वाली एक भाषा में ज्ञान-विज्ञान, विचार और शोध की नई खिड़कियां कैसे खुलेंगी?  

खुले दिमाग से सोचिये, ‘हिंदी दिवस’ मनाने का औचित्य क्या है? क्या ब्रिटेन वाले ‘इंग्लिश दिवस’, फ्रांसीसी लोग ‘फ्रेंच दिवस’ या चीनी लोग ‘चाइनिज या मैंडरिन दिवस’ जैसा कोई आयोजन करते हैं? हम हिंदी के लिए ईमानदारी और समझदारी से काम करने की बजाय सिर्फ कर्मकांड क्यों करते हैं? अद्यतन और अधिकृत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 43.63 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा हिंदी है। लेकिन पहले की तरह आज गांव-कस्बे में हिंदी माध्यम वाले सरकारी स्कूल में पढ़ कर आज उच्च शिक्षा के स्तर पर पहुंचना या प्रोफेशनल स्तर पर उच्च पदों तक पहुंचना असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर हो गया है। अभी कुछ दिनों पहले देश की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का दस्तावेज जारी हुआ है।

मातृभाषाओं में पढ़ाई की बात कही गई है पर क्या हमारी सरकार बतायेगी कि राजस्थान, यूपी, बिहार, हरियाणा, छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश में बीते दस सालों में कितने नये बेसिक प्राइमरी पाठशालाएं या प्राथमिक विद्यालय, माध्यमिक विद्यालय या इंटरमीडिएट कालेज खोले गये हैं? क्या हिंदी के विद्वानों ने कभी सरकारों से सामूहिक स्वर में पूछा कि भाजपा-शासन के दौरान मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे हिंदी भाषी प्रदेशों में निजीकृत करने के नाम पर या विलय के नाम पर हिंदी माध्यम वाले हजारों स्कूल बंद क्यों किये गये? राजस्थान सहित कई सरकारी स्कूलों को तो निजी यानी पब्लिक स्कूल में भी तब्दील कर दिया गया। स्कूलों का निजीकरण/विनिवेशीकरण हो गया।

पर हिंदी के बाबुओं को ‘हिंदी दिवस’ मनाने में ही मजा आ रहा है! शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘ए सोसायटी फार प्रमोशन आफ इन्क्लूसिव एंड रिलिवेंट एजूकेशन’(एएसपीआईआरए) के संचालक डॉ. दयाराम के मुताबिक ‘नीति आयोग की पहल और दिशा-निर्देश के तहत मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा में 40000 से अधिक प्राथमिक विद्यालयों को बंद किया गया या इनमें कुछ का बडे विद्यालयों में विलय किया गया।’ ओडिशा के अलावा सभी प्रदेश कमोबेश हिंदी भाषी हैं। राजस्थान ने पहले ही इस काम में जल्दबाजी दिखाई थी। तत्कालीन वसुंधरा राजे की सरकार ने ताबड़तोड़ फैसले लिये थे।

दिलचस्प बात कि पिछड़े वर्ग से आने वाले शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने भी ऐसे कदम उठाये, जिनका सर्वाधिक नुकसान दलित-ओबीसी, आदिवासी समुदाय और अन्य वर्गों के विपन्न लोगों के बच्चों को उठाना पड़ा। हिंदी माध्यम के जरिये प्राथमिक शिक्षा की बदहाली ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं। हमने यहां सिर्फ विद्यालयों की बंदी या विलय का एक उदाहरण भर दिया है।

कुछ अपवादों की छोड़ दें तो विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के हिंदी विभागों का हाल देख लीजिये। क्या पढ़ाई-लिखाई है और किस तरह के शोध हो रहे हैं? उनके पास विषय और पाठ्यक्रम के नाम पर कोई नया नजरिया नहीं दिखता। पत्रकारिता के कुछ ऐसे उच्च शिक्षण संस्थान खुले हैं, जहां पत्रकारिता पढ़ने वाले छात्रों को पढ़ाया जा रहा है कि दुनिया के सबसे पहले रिपोर्टर/पत्रकार महामुनि नारद थे! अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की छोड़िये, क्या भारत के ही किसी अंग्रेजी पत्रकारिता शिक्षण संस्थान में ऐसी प्रचंड अज्ञानता को शिक्षण कार्यक्रम, पाठ्यक्रम के किसी परिपत्र या अध्याय में शामिल किया जा सकता है? पर अपने हिंदी मे यह खुलेआम डंके की चोट पर चल रहा है।

आजादी की लड़ाई के दौरान हमारे कुछ दिग्गज नेताओं ने हिंदी को हिंदुस्तानी बनाकर पेश करना चाहा। लेकिन अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा और संविधान में देवनागरी लिपि के साथ हिंदी भाषा ही राजभाषा के रूप में स्वीकार हुई। शुरू के पंद्रह वर्षों के लिए अंग्रेजी को शासकीय भाषा या राजभाषा के रूप में मंजूर किया गया। लेकिन अंग्रेजी का रूतबा आज आजादी के 73 साल बाद भी कुछ कम नहीं हुआ है। अनेक क्षेत्रों में बढ़ा है। केंद्रीय नौकरशाही की वास्तविक भाषा अंग्रेजी ही है। हर महत्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज अंग्रेजी में सोचा और लिखा जाता है।

यहां तक हमारे उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक भाषा आज भी अंग्रेजी ही है। संविधान का अनुच्छेद 348-ए साफ-साफ इसका प्रावधान करता है। हमारे संविधान के इतने सारे संशोधन हो गये पर हमारी आई-गई सरकारें आज तक शीर्ष न्यायालयों की आधिकारिक भाषा सूची में हिंदी को शामिल नहीं कर सकीं! कल्पना की जा सकती है, भारतीय उच्च न्याय तंत्र और आम आदमी के बीच कितना बड़ी संवादहीनता है! हां, कुछेक राज्यों में स्थानीय स्तर की पहल से कतिपय उच्च न्यायालयों में बहस और फैसले भी स्थानीय भाषाओं(संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भारतीय भाषाओं में से कुछ) में होने लगे हैं।

हाल के कुछ वर्षों में हिंदी के ‘उन्नयन और विकास’ के नाम पर दो खास प्रवृत्तियां देखी गई हैं। पहली तो ये कि बड़े संगठित ढंग से इसे संस्कृतीकरण की तरफ ले जाया जा रहा है और संविधान सभा में सुझाये विचारों को नजरंदाज किया जा रहा है। सभा ने स्थानीय भाषाओं और बोलियों से शब्दों को हिंदी में लेने पर जोर दिया था। दूसरी प्रवृत्ति जो सामने आई है, वह है, इसको अज्ञानता, अहमन्यता, अमानवीय व्यवहारों, सामंती मूल्यों और एक खास किस्म के लंपटीकरण की तरफ ढकेलने के। लगता है, मानो हमारी हिंदी को प्रेमचंद, गणेश शंकर विद्यार्थी, राहुल सांकृत्यायन, महादेवी वर्मा, शैलेंद्र, फणीश्वर नाथ रेणु, यशपाल, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, राजेंद्र यादव, राजेंद्र माथुर, देवकीनंदन पांडेय और अमीन सयानी सरीखे बड़े लेखकों, कवियों, पत्रकारों और प्रसारकों की महान् विरासत से छीनने की संगठित और संस्थागत कोशिश हो रही है।

सबसे अधिक बिकने वाले हिंदी के अखबारों और सबसे अधिक देखे जाने वाले हिंदी चैनलों की हिंदी भाषा पर नजर डालिये और सड़क-बाजार-गली-मोहल्ले में भड़कती हिंसा, लंपटता और सांप्रदायिक उन्माद की भाषा और लहजे से उसकी तुलना कीजिये। हमारे सबसे देखे जाने वाले न्यूज चैनलों के प्राइमटाइम चर्चा और विमर्श के नाम पर आयोजित कार्यक्रमों के नाम देखियेः ‘ताल ठोक के’, ‘हल्ला बोल’ और ‘दंगल!’ यह महज संयोग नहीं कि कई न्यूज चैनलों के समाचार या विचार कार्यक्रम में भाषिक अभिव्यक्ति की जगह शारीरिक स्तर पर शक्ति प्रयोग तक होने लगा है।

टीवी चर्चा में थप्पड़ चल चुके हैं, गालियों की बौछार हो चुकी है और चर्चा के तुरंत बाद एक पार्टी प्रवक्ता की ह्रदय के अचानक आघात से मौत भी हो चुकी है। हिंदी मीडिया की भाषा में वह सामंत और उसका लंपट कारिंदा भी नजर आता है, जिनकी आदत में शुमार रहा है-गरीब किसान, खेत मजदूर या उसके बीवी-बच्चों पर हमलावर होकर पेश आना।

क्या आपको ऐसी हिंदी में कोविड-19 जैसे जटिल और खतरनाक वायरस से मनुष्यता को राहत दिलाने वाले टीके के आविष्कार सम्बन्धी शोध और पड़ताल की संभावना दूर-दूर तक नजर आती है? गांव और छोटे-मझोले कस्बों के जिन स्कूलों में आज भी हिंदी में पढ़ाई हो रही है, कुछ अचरज भरे अपवादों को छोड़ दें तो वहां अब पठन-पाठन की कोई गुंजायश नहीं दिख रही है। यह बात मैं हिंदी भाषी क्षेत्र के ज्यादातर स्कूलों के बारे में कह रहा हूं।

हिंदी का सिर्फ एक अखबार पढ़कर क्या कोई देश-दुनिया की खबरों पर एक नजर डाल सकता है? वह समाचारों से पूरी तरह अवगत हो सकता है? हिंदी के चैनलों(कमोबेश अंग्रेजी वालों का भी वही हाल है) को नियमित और ज्यादा वक्त देखने वाला कोई बच्चा या किशोर या युवक क्या आज सहज, समझदार, जानकार और संवेदनशील छात्र बना रह सकता है? क्या वह हिंदी अखबारों या चैनलों को देखकर यूपीएससी या किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के सामान्य ज्ञान वाले पेपर की अपनी तैयारी कर सकता है?

अगर वह छात्र अंग्रेजी नहीं जानता तो हिंदी मीडियम से अपनी परीक्षा की तैयारी भी नहीं कर पायेगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक विषय हों या इतिहास और कला, इनकी अच्छी किताबें अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं। जो अनुवाद हैं, उनमें ज्यादातर कितने घटिया और भ्रष्ट हैं, बाहर वालों की इसकी कल्पना भी नहीं होगी। कम से कम इन बुरे दिनों में भारत में कम से कम चार-पांच अपेक्षाकृत बेहतर अंग्रेजी अखबार तो छप ही रहे हैं। कुछ क्षेत्रीय/ प्रांतीय  भाषाओं में भी अच्छे अखबार निकल रहे हैं। अखबारी-संकट हिंदी में ही ज्यादा है।

हमारा संविधान अंग्रेजी में सोचा और लिखा गया था। उसका हिंदी अनुवाद पढ़कर संविधान के ज्यादातर अनुच्छेदों और संशोधनों को समझने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। डा भीमराव अम्बेडकर के संपूर्ण लेखन का भारत सरकार की एक संस्था ने हिंदी अनुवाद छापा है। उन खंडों का अनुवाद इतना बुरा और असहनीय है कि मूल अंग्रेजी लेखन को पढ़े बगैर सिर्फ इस हिंदी अनुवाद को पढ़कर कोई पाठक डा अम्बेडकर की महान् प्रतिभा का एहसास शायद ही पूरी तरह कर सकेगा।

कोर्ट के फैसलों का जो अनुवाद होता है या जो विभिन्न सरकारी दस्तावेजों का हिंदी अनुवाद होता है, उनके फिर से सहज हिंदी में अनुवाद की जरूरत महसूस होती है। हिंदी में काफी मात्रा में साहित्य रचा जा रहा है, इनमें कुछ गुणात्मक स्तर पर भी अच्छा है। कुछ अच्छे पत्रकार भी काम कर रहे हैं, कुछ गंभीर विचारक और प्रसारक भी सक्रिय हैं। पर यकीनन, यह भारत जैसे एक विशाल राष्ट्र की राजभाषा होने का दावा करने वाली भाषा और उसके ध्वजवाहकों के लिए यह कुछ उपलब्धियां बहुत सीमित और नाकाफी हैं।

फिर किस बात का ‘हिंदी दिवस’ मना रहे हैं आप? हिंदी दिवस पर मैं तो यही कहूंगा कि जब तक हमारे शासक और हुक्मरान भाषा के मामले में गंभीर होकर हिंदी के वास्तविक उन्नयन के लिए ठोस कदम नहीं उठाते(फिलहाल तो वे संस्कृत के उन्नयन में जुटे दिख रहे हैं। हिंदी से ज्यादा खर्च संस्कृत के लिए होता दिख रहा है) तब तक हिंदी क्षेत्र के छात्रों-युवाओं, खासकर गरीब घरों, दलितों-पिछड़ों-उत्पीड़ितों के बच्चों को हिंदी के साथ अंग्रेजी जरूर पढ़नी चाहिए। इससे उन्हें ज्ञान और सूचना का नया संसार मिलेगा। मौजूदा हिंदी लेखन और मीडिया के मुकाबले यह उन्हें उन्मुक्त, सशक्त और बेहतर बनने का कुछ रास्ता भी सुझायेगा।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं। आप राज्यसभा के संस्थापक एग्जीक्यूटिव एडिटर रह चुके हैं।)

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This post was last modified on September 14, 2020 10:40 pm

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