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Thursday, September 23, 2021

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साजिश होने के सबूतों को न पेश करने के लिए हो सीबीआई अधिकारियों की जांचः पूर्व गृह सचिव

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पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले ने कहा है कि यह बेहद आश्चर्यजनक है कि सभी सबूत रिकॉर्ड पर होने और गवाहों द्वारा बयान देने के बावजूद बाबरी मस्जिद विध्वंस का फैसला आरोपियों के पक्ष में गया है। इस बात की जांच होनी चाहिए कि सीबीआई द्वारा साजिश होने के सबूतों को कोर्ट में पेश किया गया था या नहीं। यदि इन्हें पेश नहीं किया गया है तो दोषी सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

पूर्व गृह सचिव गोडबोले और उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज पीबी सावंत ने विशेष सीबीआई कोर्ट के उस फैसले पर हैरानी जताई है, जिसमें उसने बाबरी विध्वंस के 32 आरोपियों को बरी कर दिया और कहा कि मस्जिद गिराने के षड़यंत्र का आरोप साबित नहीं होता है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय केंद्रीय गृह सचिव रहे माधव गोडबोले ने कहा है कि मस्जिद गिराने की साज़िश रची गई थी और इसी आधार पर उन्होंने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार को बर्ख़ास्त करने की सिफ़ारिश की थी। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय में आईबी की वो रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें बाबरी मस्जिद को गिराने की साजिश के बारे में बताया गया था। फिर भी न्यायालय ने कहा कि कोई षड़यंत्र नहीं था।

गोडबोले ने कहा कि मैं नहीं मानता कि इतने विशाल ढांचे को पांच-छह घंटे के भीतर ध्वस्त किया जा सकता है। मैं नहीं मानता कि कुछ हजार लोग गुंबद (मस्जिद के) पर चढ़े और उसने गिराने की कोशिश की और इसकी वजह से वह ध्वस्त हो गया। इसकी पहले जरूर कुछ तैयारी रही होगी। उन्होंने कहा, मैं यह नहीं कहूंगा कि यह साजिश थी, लेकिन इससे पहले जरूर कुछ तैयारी की गई होगी। बिना तैयारी, वह संभव नहीं था।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार गोडबोले ने कहा कि जब मैंने सुना कि सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया गया है तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि हमने उच्चतम न्यायालय के सामने सभी तथ्य रखे थे, जो कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले से सुनवाई कर रहा था। प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई हो रही थी और हम उन्हें हर दिन के बारे में बता रहे थे कि ग्राउंड पर क्या चल रहा है।

गोडबोले ने बताया कि उच्चतम न्यायालय ने इस शर्त पर कारसेवा की इजाजत दी थी कि बाबरी मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। माधव गोडबोले ने कहा कि उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण से उत्तर प्रदेश सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश करने के लिए कहा था, क्योंकि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने की साजिश रची जा रही थी। उन्होंने कहा कि केंद्र में तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा उनकी सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया गया था, जिसके तीन महीने बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

पूर्व गृह सचिव ने कहा कि मेरी नौकरी समाप्त होने के 18 महीने पहले मैंने सेवानिवृत्ति ले ली थी। कारण काफी स्पष्ट था, तत्कालीन कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली यूपी सरकार को बर्खास्त करने की मेरी सिफारिश स्वीकार नहीं की गई थी। गोडबोले ने कहा कि इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जानी चाहिए और सीबीआई की भी भूमिका की जांच होनी चाहिए। गोडबोले ने कहा कि उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराने के क्रियाकलापों का विस्तार से अपनी किताब ‘अनफिनिश्ड इनिंग्स’ में वर्णन किया है, जो कि 1996 में प्रकाशित हुई थी।

गोडबोले ने कहा कि वह बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में अलग नतीजे की उम्मीद कर रहे थे। गोडबोले ने कहा कि अयोध्या में रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के मालिकाना हक को लेकर विचारों में कुछ अंतर हो सकता है, लेकिन इस (बाबरी विध्वंस) मामले में जहां आपराधिक मामला दर्ज किया गया था, मेरा विचार था कि अदालत फैसला सुनाने से पहले सही तरीके से सत्यापन करेगी। सैकड़ों गवाहों और हजारों दस्तावेजों की जांच की गई और अब अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि पर्याप्त सबूत नहीं हैं। यह ऐसा है, जिसे स्वीकार करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जानी चाहिए और मामले को उच्चतम न्यायालय में ले जाना चाहिए।

गोडबोले वर्ष 1992 में केंद्रीय गृह सचिव थे, जब बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया था। अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत ने भाजपा के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत सभी 32 अभियुक्तों को ठोस सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है।

इस बीच लालकृष्ण आडवाणी के क़रीबी सलाहकार रहे सुधींद्र कुलकर्णी ने कहा है कि उनका मानना है बाबरी विध्वंस मामले में साजिश ज़रूर हुई थी, लेकिन उसमें लालकृष्ण आडवाणी शामिल नहीं थे। सीबीआई कोर्ट के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी ने राम जन्मभूमि मुहिम का नेतृत्व ज़रूर किया था, लेकिन वो सांप्रदायिक सोच से प्रेरित नहीं थे।

उन्होंने कहा कि सभी लोगों को तो बरी कर दिया है, तो सवाल उठता है कि आख़िर ये किसने किया, कैसे किया, क्या केवल अचानक घटना हो गई। मेरा मानना है कि इसमें बिल्कुल कुछ साजिश थी, पूर्व नियोजित योजना के तहत ये हुआ है, लेकिन उस योजना में कौन शामिल था, योजना कैसे बनाई गई, इसकी सच्चाई सीबीआई द्वारा बाहर नहीं लाई गई। अब सवाल उठता है कि क्या लालकृष्ण आडवाणी इस साजिश में शामिल थे, मेरा मानना है कि लालकृष्ण आडवाणी जी इसमें शामिल नहीं थे।

प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की सुनवाई करने वाली विशेष अदालत के फ़ैसले को उच्चतम न्यायालय के निर्णय और संविधान की परिपाटी से परे क़रार दिया है। कांग्रेस महासचिव और मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक बयान जारी कर कहा कि उच्चतम न्यायालय के  पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ के नौ नवंबर, 2019 के निर्णय के मुताबिक़ बाबरी मस्जिद को गिराया जाना एक ग़ैर-क़ानूनी अपराध था। पर विशेष अदालत ने सब दोषियों को बरी कर दिया। विशेष अदालत का निर्णय साफ़ तौर से उच्चतम न्यायालय के निर्णय के भी प्रतिकूल है।

सुरजेवाला ने कहा कि पूरा देश जानता है कि भाजपा-आरएएस और उनके नेताओं ने राजनीतिक फ़ायदे के लिए देश और समाज के सांप्रदायिक सौहार्द को तोड़ने का एक घिनौना षडयंत्र किया था। उस समय की उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार सांप्रदायिक सौहार्द को भंग करने की इस साज़िश में शामिल थी। यहां तक कि उस समय झूठा शपथ पत्र देकर उच्चतम न्यायालय तक को बरगलाया गया। इन सब पहलुओं, तथ्यों और साक्ष्यों को परखने के बाद ही उच्चतम न्यायालय ने मस्जिद को गिराया जाना ग़ैर-क़ानूनी अपराध ठहराया था।

सुरजेवाला ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने की मांग करते हुए कहा कि संविधान, सामाजिक सौहार्द और भाईचारे में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति उम्मीद और अपेक्षा करता है कि विशेष अदालत के इस तर्कविहीन निर्णय के विरुद्ध प्रांतीय और केंद्रीय सरकारें उच्च अदालत में अपील दायर करेंगी तथा बग़ैर किसी पक्षपात और पूर्वाग्रह के देश के संविधान और क़ानून का अनुपालन करेंगी। यही संविधान और क़ानून की सच्ची परिपाटी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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