Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखना ‘लोकतंत्र में अविश्वास’ कैसे?

क्या कोई लोकतंत्र सवाल, बहस और सशक्त विपक्ष के बिना निष्पक्षता से काम कर सकता है?  अच्छाई के लिए होने वाले आंदोलनों में जनता और सरकार आमने-सामने होते हैं, लेकिन इस बार सरकार तो है लेकिन जागरूक जनता के कई धड़े बन चुके हैं और वो आपस में ही ‘ज्यादा बुद्धिजीवी कौन’ वाली लड़ाई लड़ने में व्यस्त हैं।

यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी को इस तरह देश की हस्तियों ने सामूहिक चिट्ठी लिखी हो। मोदी सरकार में 49 बनाम 61 के पहले भी चिट्ठी लिखने के कई प्रकरण सामने आए हैं पर इस चिट्ठी ने कब समाजहित से सियासत का रूप ले लिया यह समझना होगा। 4 अप्रैल 2019 यानी लोकसभा चुनाव के ठीक पहले नसीरुद्दीन शाह और गिरीश कर्नाड जैसी 600 हस्तियों ने पत्र लिखकर लोगों को बीजेपी के खिलाफ वोट देने को कहा था।

थियेटर और फि‍ल्‍मों से जुड़े इन लोगों का ये खत 12 भाषाओं में तैयार करके आर्टिस्ट यूनाइट इंडिया वेबसाइट पर डाला गया था। जिसमें कहा गया था कि आगामी लोकसभा चुनाव देश के इतिहास का सबसे अधिक गंभीर चुनाव है। आज नृत्य, हास्य,गीत सब खतरे में हैं। हमारा न्यारा संविधान खतरे में है। सरकार ने उन संस्थाओं का गला घोट दिया है जहां तर्क, बहस और असहमति का विकास होता है। इस पत्र पर शांता गोखले, महेश एलकुंचेवार, महेश दत्तानी, अरूंधति नाग, कीर्ति जैन, अभिषेक मजूमदार, कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, लिलेट दुबे, मीता वशिष्ठ, मकरंद देशपांडे और अनुराग कश्यप आदि के भी हस्ताक्षर थे। जिसके पलटवार में 10 अप्रैल 2019 को पंडित जसराज, अभिनेता विवेक ओबेराय और रीता गांगुली समेत 900 से अधिक कलाकारों ने एक बयान जारी करके लोगों से भाजपा के लिए वोट देने की अपील की थी और कहा कि देश को ‘मजबूत सरकार’ चाहिए, ना कि ‘मजबूर सरकार’। संयुक्त बयान जारी करने वालों में शंकर महादेवन, त्रिलोकी नाथ मिश्रा, कोयना मित्रा, अनुराधा पौड़वाल और हंसराज हंस भी शामिल थे। संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि पिछले पांच साल में भारत में ऐसी सरकार रही जिसने भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन और विकासोन्मुखी प्रशासन दिया।

लेकिन बुद्धिजीवियों के इस जवाबी कार्यवाही से पहले भी 100 से ज्यादा फिल्म मेकर्स ने 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को वोट नहीं देने की अपील की थी। इस लिस्ट में मलयालम निर्देशक आशिक बाबू, आनंद पटवर्धन, सुदेवन, दीपा धनराज, गुरविंदर सिंह, पुष्पेंद्र सिंह और प्रवीण मोरछले जैसे फिल्म निर्माता शामिल थे। वहीं कठुआ और उन्नाव गैंगरेप से सिर्फ देश भर में ही घमासान नहीं मचा बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी इस जघन्य मामले की गूंज सुनाई दी। जिस पर 22 अप्रैल 2018 में तमाम देशों के 600 से अधिक शिक्षाविदों व विद्वानों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुला पत्र लिख घटना की निंदा की थी।

इन शिक्षाविदों ने कठुआ और उन्नाव गैंगरेप को लेकर सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर की थी। यही नहीं उन्होंने पत्र में प्रधानमंत्री मोदी पर घटना के बाद देश में पैदा हुए असामान्य हालात पर चुप्पी साधने का आरोप भी लगाया था। इस पत्र में कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, ब्राउन यूनिवर्सिटी व विभिन्न आईआईटी से जुड़े शिक्षाविदों ने हस्ताक्षर किए थे।

प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखने के प्रकरण में देश के सिर्फ बॉलीवुड के बुद्धिजीवी ही नहीं बल्कि अन्य लोग भी शामिल हैं। 16 जनवरी 2019 को ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा में कोष की कमी के बारे में चिंता जाहिर करते हुए सांसदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत 250 लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखा था। प्रधानमंत्री को लिखे इस पत्र में 250 लोगों के हस्ताक्षर हैं और इसके माध्यम से प्रधानमंत्री से इस योजना को मजबूत करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर काम करने का आग्रह किया गया। पत्र लिखने वालों में संसद के लगभग 90 सदस्य और 160 प्रतिष्ठित नागरिक – जिनमें पूर्व नौकरशाह, प्रमुख अर्थशास्त्री, प्रमुख कार्यकर्ता और किसान आंदोलनों के नेता शामिल थे। पत्र में यह भी कहा गया था कि इसे वर्तमान ग्रामीण और कृषि संकट से निपटने के उपायों के हिस्से के रूप में शामिल किया जाए। इस साल एक जनवरी तक मौजूदा वित्त वर्ष के समाप्त होने से तीन महीने पहले ही मनरेगा योजना का 99 फीसदी से अधिक कोष खर्च हो चुका है। इसके बजट आवंटन पर अवैध तरीके से रोक, भुगतान में देरी और कम वेतन इस योजना को खराब कर रहा है और यह वंचित तबकों को उनके अति महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार से वंचित कर रहा है।

पत्र में यह भी कहा गया कि आपकी सरकार में देश के विकास को गति देने के लिए रोजगार और नौकरियों के सृजन का सार्वजनिक रूप से बार-बार वादा किए जाने के बावजूद देश की एकमात्र रोजगार गारंटी योजना को क्रमबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है। इस पत्र में दिग्विजय सिंह, अली अनवर अंसारी, पृथ्वीराज चाह्वाण, सैयद हामिद, जिग्नेश मेवानी, वृंदा करात, योगेंद्र यादव, सीताराम येचुरी, जयति घोष, हर्ष मंदर आदि जैसे लोगों के हस्ताक्षर थे।

अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या हमारे समाज ने आज़ादख़्याल और बुद्धिजीवी लोगों को बर्दाश्त करना नहीं सीखा। एक आंकड़े के अनुसार पिछले 4 सालों में मॉब लिंचिंग के 134 मामले सामने आ चुके हैं और एक वेबसाइट के मुताबिक इन मामलों में 2015 से अब तक 68 लोगों की जानें जा चुकी हैं। इनमें दलितों के साथ हुए अत्याचार भी शामिल हैं। मगर सिर्फ गोरक्षा के नाम पर हुई गुंडागर्दी की बात करें तो सरकारी आंकड़े कहते हैं-

साल 2014 में ऐसे 3 मामले आए और उनमें 11 लोग ज़ख्मी हुये।

जबकि 2015 में अचानक ये बढ़कर 12 हो गया। इन 12 मामलों में 10 लोगों की पीट-पीट कर मार डाला गया जबकि 48 लोग ज़ख्मी हुए।

2016 में गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्डी की वारदातें दोगुनी हो गई हैं। 24 ऐसे मामलों में 8 लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं जबकि 58 लोगों को पीट-पीट कर बदहाल कर दिया गया।

2017 में तो गोरक्षा के नाम पर गुंडई करने वाले बेकाबू ही हो गए। 37 ऐसे मामले हुए जिनमें 11 लोगों की मौत हुई। जबकि 152 लोग ज़ख्मी हुए।

साल 2018 में अब तक ऐसे 9 मामले सामने आ चुके हैं। जिनमें 5 लोग मारे गए और 16 लोग ज़ख्मी हुए।

कुल मिलाकर गोरक्षा के नाम पर अब तक कुल 85 गुंडागर्दी के मामले सामने आ चुके हैं जिनमें 34 लोग मरे गए और 289 लोगों को अधमरा कर दिया गया।

2019 में झारखंड के साथ कई अन्य राज्य मॉब लिंचिंग का जैसे गढ़ बन गए हैं। सरकार इन घटनाओं का जवाब देने की बजाए सियासी बयान देती है और हमेशा कहती है कि सबसे बड़ी लिंचिंग की घटना तो देश में 1984 में हुई थी। क्या हर बात में सियासत करना इनकी नियति बन चुकी है। उधर, देश के प्रधान सेवक संसद में बयान देते हुए कहते हैं कि लोकतंत्र में मॉब लिंचिंग के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो। मोदी सरकार में मॉब लिंचिंग का बढ़ता आंकड़ा भी हुकूमत को इस मसले पर गम्भीर क्यों नहीं कर पा रहा है? अन्याय करने वाली इस भीड़ को आखिर इकट्ठा कौन करता है? उन्हें उकसाता-भड़काता कौन है? शायद जवाब हम सब जानते हैं। पर फिर भी सब खामोश हैं। डर इस बात का है कि अगर कानून हर हाथ का खिलौना हो जाएगा तो फिर पुलिस, अदालत और इंसाफ सिर्फ शब्द बन कर रह जाएंगे।

उधर मोदी सरकार में सामाजिक कार्यकर्ताओं की लगातार गिरफ्तारी की चौतरफा निंदा भी हो रही है और  सरकार पर भय का माहौल पैदा करने का आरोप भी लगता रहता है।

महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने अगस्त 2018 में देश के कई शहरों में एक साथ कई लेखकों, विचारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों के घरों-दफ्तरों पर छापेमारी की। इन छापेमारियों और गिरफ्तारियों का चौतरफा विरोध हुआ। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की इस गिरफ्तारी पर आरजेडी ने विरोध करते हुए कहा था, “देश के अलग-अलग हिस्सों में जो लोग भी मानवाधिकार की रक्षा और दलितों के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं, बीजेपी की हुकूमत में उनके घरों पर छापेमारी हो रही है, यह निंदनीय है।” भीमा-कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में देश के अलग-अलग हिस्सों से पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं की अगस्त 2018 में की गई गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद पुणे पुलिस के सूत्रों ने दावा किया कि गिरफ्तारियां ऐसे सबूतों के आधार पर की गई हैं, जिनसे पता चलता है कि आरोपी ‘बड़ी साज़िश’ रच रहे थे। हालांकि यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि वह साज़िश क्या थी। पुलिस सूत्रों का दावा है कि इन कार्यकर्ताओं पर पुणे पुलिस लगभग एक हफ्ते से करीबी नज़र रखे हुए थी। इनके घरों पर छापे मारे जाने से पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को ‘नए सबूतों’ की जानकारी दे दी गई थी। हालांकि यह नहीं बताया गया कि नए सबूत क्या थे।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश रची गई है, लेकिन पुलिस ने यह भी कहा कि इस सिलसिले से जुड़ाव की कोई नई जानकारी सामने नहीं आई है।

इस मामले में एक ही दिन 10 कार्यकर्ताओं के घरों की तलाशी ली गई थी और पांच – माओवादी विचारक वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा व वरनॉन गोन्सालवेज़ – को एक ही समय पर छापे मारकर गिरफ्तार किया गया था। सरकार हत्यारी भीड़ को तैयार करने और दिनदहाड़े हत्या करने वालों की गिरफ्तारी के बजाय वकीलों,कवियों, लेखकों, पत्रकारों, दलित अधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के घरों पर छापोमारी कर रही है, जो बहुत साफ तौर पर बताता है कि भारत किस ओर जा रहा है।ऐसा भी नहीं है कि सरकार के पास मॉब लीचिंग के आंकड़े नहीं है, डिसमैंटलिंग इंडिया (विखंडित भारत ) रिपोर्ट, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछली सरकार के चार साल का लेखा-जोखा पेश किया गया था, उसमें मुसलमानों-आदिवासियों-दलितों और ईसाइयों के खिलाफ की गई हिंसा का सिलसिलेवार-तारीखवार ब्यौरा मौजूद है।

लेकिन ये कड़ी निंदा भी बड़ा अजीब लफ्ज़ है। अगर ये हिंदी डिक्शनरी में ना होता तो पता नहीं हमारे राजनेता किसकी आड़ में अपनी नाकामयाबी छुपाते। जो लोग प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने वालों की मुखालफत कर कुतर्क दे रहे हैं, वो खुद क्या स्वयं भू नेता नहीं बन रहे हैं। यह सोचना कितना उचित है कि सरकार इनकी अभिव्यक्ति की रक्षा करे पर दूसरे अपने प्रधानमंत्री को खत तक न लिखें! किसी ने सही ही कहा है यूं ही नहीं बुझ गया चराग कई घरों का, गद्दारों की भीड़ में कोई अपना जरूर होगा।

(शोभा अक्षर युवा पत्रकार हैं।)

This post was last modified on July 31, 2019 10:35 pm

Share