Monday, January 24, 2022

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कैसा होगा सीपीसी का ‘आधुनिक समाजवाद’

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चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी अपने इतिहास के सौ साल पूरे कर चुकी है। कुछ महीने पहले यह शताब्दी समारोह मना लेने के बाद उसकी मौजूदा केंद्रीय समिति का छठां पूर्णाधिवेशन सत्र- प्लेनम या प्लेनरी सेशन- बीते बृहस्पतिवार, 10 नवंबर को एक घोषणापत्र जारी होने के साथ संपन्न हुआ। केंद्रीय समिति, सेंट्रल कमेटी किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी की नीति निर्धारक इकाई होती है। करीब साढ़े नौ करोड़ सदस्यों वाली चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी भी काफी बड़ी है। इसमें 205 नियमित सदस्य हैं और 171 सदस्यों को इसकी बैठकों में तब बुलाया जाता है जब उनके विभाग से संबंधित कोई मामला बैठक के एजेंडा में शामिल हो।

सेंट्रल कमेटी का प्लेनम साल में कम से कम एक बार जरूर आयोजित होता है। सेंट्रल कमेटी के सभी 376 सदस्य इसमें शामिल होते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय महत्व की भूमिका निभाने वाले और भी कई राजनेता और अधिकारी इसमें बुलाए जाते हैं। पांच साल पर आयोजित होने वाली पार्टी कांग्रेस हर कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे बड़ा आयोजन हुआ करता है, जहां से उसकी दिशा निर्धारित होती है। लेकिन दैनंदिन जीवन में पार्टी का नेतृत्व उसका पॉलित ब्यूरो करता है और उसकी नीतियों पर मुहर आम तौर पर उसकी केंद्रीय समिति के पूर्णाधिवेशनों में ही लगाई जाती है।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने हाल में समाप्त हुए अपनी 19वीं सेंट्रल कमेटी के छठे प्लेनम को अपने इतिहास की पहली सदी पूरी कर लेने के बाद इसकी दूसरी सदी की वैचारिक तैयारी के धुरी आयोजन के रूप में प्रस्तुत किया है। कुल मिलाकर देखना हो तो यह चार दिवसीय आयोजन सौ साल से चली आ रही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति का 420वां प्लेनम था। बैठक में दक्षिणी चीन सागर को लेकर अधिक आक्रामक रुख अपनाने और ताइवान को चीन में मिलाने जैसे प्रस्तावों के कयास गलत साबित हुए। मौके को देखते हुए इसका स्वरूप सैद्धांतिक ही होना था।

प्लेनम के बाद जारी घोषणापत्र में कहा गया है कि 1921 में अपनी स्थापना के समय पार्टी ने चीन को एक स्वतंत्र, स्वाभिमानी, खुशहाल राष्ट्र बनाने का वचन चीनी जनता को दिया था, जो उसने 1949 में पूरा किया। सामंतवादी और साम्राज्यवादी शक्तियों से टकराव को ध्यान में रखते हुए उस समय इसे नव-जनवादी क्रांति का नाम दिया गया था। मामूली तौर पर समृद्ध- मॉडरेटली प्रॉस्परस- राष्ट्र और उसी स्तर पर जनता की समृद्धि इस संकल्प का ही एक हिस्सा था जो पूरा किया जा चुका है। अगली सदी के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) का लक्ष्य चीन को एक आधुनिक समाजवादी राष्ट्र बनाने का है, जिसके कुछ पहलुओं का खाका प्लेनम से पारित घोषणापत्र में मौजूद है।

सबसे बड़ी बात यह कि अपने शासनकाल और नेतृत्व के नौ साल पूरे कर चुके शी जिनपिंग को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इस सबसे बड़े नीति निर्धारक निकाय ने पार्टी के लिए रीढ़ की हड्डी जितना महत्वपूर्ण बताया है और उन्हें ‘कोर लीडर’ का दर्जा दिया है। ऐसा दर्जा जो 1945 में माओ त्सेतुंग और 1978 में देंग शियाओपेंग को दिया था। यह हैसियत वहां ऐसे नेताओं को ही बख्शी जाती रही है, जिनका कद उनके सरकार या पार्टी के नेतृत्व में होने या न होने पर निर्भर नहीं करता।

चीन के मुक्ति संघर्ष में हिस्सा लिए बगैर, यूं कहें कि चीनी लोक गणराज्य (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) की स्थापना के बाद जन्मे राजनेताओं में यह दर्जा पाने वाले शी जिनपिंग अकेले हैं। हालांकि इस फैसले में भी कुछ नया नहीं है। चीनी राष्ट्रपति के कार्यकाल को दो तक सीमित रखने की संवैधानिक बाधा चार साल पहले हटाई जा चुकी है। सत्ता हस्तांतरण की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए पांचवें और दसवें साल में उत्तराधिकारी तैयार करने की जो व्यवस्था देंग शियाओपेंग ने बना रखी थी, उसको चीन में भ्रष्टाचार की जड़ बताते हुए उसका सारा खेल ही खत्म किया जा चुका है।

इसलिए शी जिनपिंग आजीवन नहीं तो कम से कम तीसरे कार्यकाल में चीन के सत्ताशीर्ष पर ही रहने वाले हैं, यह बात दुनिया पिछले कई वर्षों से जानती है। जो बात किसी ने नहीं सोची होगी, वह यह कि सीपीसी एक दिन उन्हें माओ त्सेतुंग और देंग शियाओपेंग की पांत में ला बिठाएगी।
उनकी किस युगांतरकारी उपलब्धि या किस ऐतिहासिक संकट के समाधान के लिए ऐसा किया गया, यह सीपीसी सेंट्रल कमेटी के लोग ही बेहतर जानते होंगे।

बाहरी दुनिया के लिए तो शी जिनपिंग के सत्ता में आने के साल 2012 में भी चीन उसी लौह नियंत्रण वाली शांति और खुशहाली के साथ आगे बढ़ रहा था, जैसे वह 1989 में थ्येनआनमन चौक पर आंदोलनकारी छात्रों के दमन के बाद से बढ़ता आ रहा था। बल्कि शी जिनपिंग के दूसरे कार्यकाल में बाकी दुनिया के साथ कई बिंदुओं पर उसका टकराव देखने को मिला और जिस आर्थिक खुलेपन और वैचारिक उदारता के लिए देंग शियाओपेंग के बाद का चीन जाना जाता रहा है, उसमें भी गिरावट दर्ज की गई।

महामारी से लेकर पर्यावरण तक, और अन्य मामलों में भी चीन का इतना अलग-थलग पड़ना पांच साल पहले तक कभी नहीं देखने को मिला था। शुरू में लोग इसे डॉनल्ड ट्रंप की आक्रामकता के खाते में डाल देते थे। उनके उथलेपन के मुकाबले चीनी नेता हमेशा गहरे ही नजर आते थे, लेकिन अभी की बात अलग है। अच्छे पहलुओं पर गौर करें तो ज्यादातर मामलों में चीन पूरी दुनिया में पहले या दूसरे नंबर पर गिना जा रहा है। सरकार घरेलू बाजार के विकास पर ज्यादा ध्यान दे रही है और विज्ञान-तकनीकी से लेकर रणनीतिक महत्व के पूंजीगत सामानों के क्षेत्र में शानदार खबरें सुनने में आ रही हैं। शीर्ष स्तर के भ्रष्टाचार के मामले भी अब वहां कम चर्चा में आते हैं। 2010-11 में जहां-तहां ऐसा पढ़ने को मिलता था कि कम्युनिस्ट नेताओं का भ्रष्टाचार जल्द ही चीन में उनकी सत्ता को ले डूबेगा। लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में ‘मक्खी और बाघ, दोनों पर कार्रवाई’ ने शी को पॉपुलर बनाया है।

प्लेनम के घोषणापत्र में मौजूद भविष्य दृष्टि पर बात करें तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की दूसरी सदी में चीन को ‘आधुनिक समाजवादी देश’ बनाने का संकल्प मौजूद है। इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है, इसे समझने में समय लगेगा। पिछले एक साल में हमने इस तरह की तीन पहलकदमियां देखी हैं जो वैसे तो पारंपरिक समाजवादी बंदिशों की ही याद दिलाती हैं लेकिन बहुसंख्यक चीनी निम्न और मध्यवर्गीय समाज में इसे सकारात्मक ढंग से लिया गया है।

इनमें एक है देश की सबसे बड़ी रीयल एस्टेट कंपनी एवरग्रैंड पर कार्रवाई। नए कर्जे लेकर दिवालिएपन से उबरने की इसकी कोशिशें कामयाब नहीं होने दी गईं और बिकने के बगैर पड़ा इसका हाउसिंग और ऑफिस स्पेस सस्ते दर पर चीन की दूसरी कंपनियों ने खरीद लिया। दूसरा, अरबों डॉलर की कोचिंग और ट्यूशन इंडस्ट्री में आ रही देसी और विदेशी, दोनों तरह की पूंजी पर ताला मार दिया गया। तीसरा, समृद्धि में न्यायसंगत साझेदारी के नारे के तहत कई बड़ी निजी कंपनियों की भारी रकम किसी पिछड़े इलाके या समुदाय के विकास में लगवाई गई। इससे मिलती-जुलती पॉपुलिस्ट पहलकदमियां हम और देशों में भी देखते हैं लेकिन ये काम अगर चीन को एक आधुनिक समाजवादी देश बनाने के इरादे से किए गए हैं तो इनका परिप्रेक्ष्य बेहतर तरीके से सामने आना चाहिए।

इस प्लेनम की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें काफी ज्यादा फुटेज पार्टी के इतिहास के इर्दगिर्द खाया गया है और विडंबना यह कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की तमाम धरतीधकेल बहसों को इसके घोषणापत्र में इस तरह कालीन के नीचे खिसका दिया गया है, जैसे नेताओं की नजरबंदी और उनके सफाये जैसा यहां कुछ कभी हुआ ही न हो।

इसका स्वरूप कुछ ऐसा है जैसे माओ त्सेतुंग, देंग शियाओपेंग, जियांग जेमिन और हू जिंताओ- संक्षेप में कहें तो दस साल या इससे ज्यादा समय तक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का शीर्ष नेतृत्व संभालने वाले सभी राजनेताओं को शी जिनपिंग ने अपनी चाय पार्टी में बुला रखा हो और आपस के सारे मतभेदों को एक तरफ रखकर ये इस पार्टी को एंजॉय कर रहे हों। शायद इसके जरिये चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया को यह संदेश देना चाहती है कि उसके भीतरी विवाद अब इतिहास की बात हो चुके हैं और आगे वे कभी उभरेंगे भी तो बाहरी दुनिया को उनकी भनक नहीं लगने दी जाएगी।
सीपीसी की अगली कांग्रेस अगले साल होगी। इस अवधि में उसके ‘आधुनिक समाजवाद’ के मायने और स्पष्ट होंगे। तब तक भारत समेत पूरी दुनिया की नजर और चीजों से ज्यादा इस बात पर रहेगी कि सीमाओं पर जाहिर हो रही चीन की आक्रामकता में कुछ कमी आती है, या इसको भी कोई वैचारिक जामा पहना दिया जाता है।

(चंद्रभूषण वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनका यह लेख उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

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