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Categories: बीच बहस

इतनी निर्लज्जता कहां से लाते हो महारथी?

यह भारत का दूसरा विभाजन है। यह पहले से भी त्रासदपूर्ण है। क्योंकि यह आंतरिक है। बस अंतर केवल इतना है कि पहले में लोग अपने घरों से निकल कर हज़ारों हज़ार किलोमीटर के अनजाने गंतव्यों के लिए निकले थे। इसमें लोगों की कोशिश अपने सुरक्षित ठिकानों तक पहुँच जाने की थी। पहले का आधार धार्मिक था। दूसरा आर्थिक है। सत्ता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वह साधन-संपन्न तबकों के साथ ही खड़ी होती है। और व्यवस्था के नाम पर अगर देश में कोई चीज है तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी वर्ग के लिए सुरक्षित है। इन संपन्न वर्गों के कुछ लोगों की सुरक्षा तथा उनकी ज़रूरत को पूरा करने के लिए सत्ता पूरे देश तक को संकट में डाल सकती है। इस पूरे प्रकरण ने इस को साबित कर दिया। वरना सिर्फ़ एक बार रुककर दो घड़ी के लिए सोचिए कि जिस महामारी के चलते पूरी दुनिया परेशान है।

यह जानते हुए भी कि उसके संक्रमित लोगों को लाने से पूरा देश ख़तरे में पड़ जाएगा। उन्हें ले आया जाता है। क्या सत्ता का यही सहयोगात्मक रवैया बीमारी से संक्रमित गरीबों के साथ भी होता? इसका जवाब है नहीं? इसके लिए दूर जाने की ज़रूरत नहीं है।बीमार और संक्रमित लोगों की बात तो दूर स्वस्थ गरीब लोगों को प्लेन तो क्या सरकार एक बस भी नहीं मुहैया करा पा रही है। और ये प्रवासी मज़दूर देश के अलग-अलग हिस्सों में मारे-मारे फिर रहे हैं। नतीजा यह है कि अपनी मेहनत पर विश्वास करने वाला यह तबका दूसरों के रहमोकरम पर ज़िंदा रहने के लिए मजबूर है।

अपने ही देश में बेगानों की तरह घूम रहे इन प्रवासी मज़दूरों की पीठ पर कहीं पुलिस लाठियां बरसा रही है। तो कहीं मुर्ग़ा बनाकर और कहीं घुटनों के बल चला कर उन्हें अपमानित किया जा रहा है। जिन लोगों ने बीमारियों को इस देश में लाने का काम किया अब प्रधानमंत्री उनको योग का गुण सिखा रहे हैं। देश के जिस सूचना और प्रसारण मंत्री को कोरोना से संबंधित तैयारियों और उससे जुड़ी सारी सूचनाएँ जनता को देनी थी वह रामायण देखने की सलाह और सूचना दे रहा है।

देश का स्वास्थ्य मंत्री जिसे महामारी के इस महा संकट के मौक़े पर कमांडर के रूप में कोरोना के ख़िलाफ़ युद्ध के मोर्चे पर होना चाहिए था वह घर में बैठकर मटर छील रहा है। यह जब सब कुछ दिखाया जा रहा था या फिर हो रहा था उसी समय लाखों लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर बेहाल मारे-मारे फिर रहे थे। सत्ता के प्रभुओं के इस चेहरे को देखकर शर्म भी शर्मिंदा होने लगे।बेशर्मी के इन शिरोमणियों को जर्मनी के उस वित्त मंत्री से सबक़ लेना चाहिए जिसने अपनी बदहाल जनता के लिए कुछ न कर पाने के चलते आत्महत्या कर ली।

दरअसल यह पूरा प्रोजेक्ट ही अलग क़िस्म का है। यहां सत्ता पक्ष एक फासीवादी निज़ाम और उसके लायक समाज व्यवस्था क़ायम करना चाहता है। जिसमें समाज के उच्च और मध्य वर्ग को अपने साथ खड़ा करना उसका लक्ष्य है। लिहाज़ा उसके हर सुख-दुख और ज़रूरत में वह उसके साथ है। यहाँ तक कि उसके मनोरंजन के लिए भी वह हर चीज मुहैया कराएगा जिसकी उसे ज़रूरत है। और इस प्रक्रिया में उसे अपनी तरह से बिल्कुल संवेदनहीन बना देगा।

दूसरी तरफ़ ग़रीबों का महा समुद्र है। जिससे वह उसके नागरिक के दर्जे को भी छीन लेना चाहती है। उसे एक ऐसे दास में तब्दील कर देना चाहती है जिसके पास न कोई मान होता है, न सम्मान और न ही अधिकार। और उसका लक्ष्य एक प्रक्रिया में पूरे समाज को एक भीड़ में तब्दील कर देना है। जो पूरी तरह से सत्ता के रहमोकरम और उसके इशारे पर काम करेगा। और इस कड़ी में उसकी रही-सही चेतना को भी वह छीन लेना चाहता है। जो अपने अधिकार भी जानते थे उन्हें भुलवा देना है। इस तरह से नागरिक समाज की पूरी व्यवस्था को ही ध्वस्त कर उसी पुरानी वर्णवादी व्यवस्था में देश को धकेल देना है।

उस पर भी काम बेहद व्यवस्थित तरीक़े से किया जा रहा है। कोरोना से निपटने के क्रम में सरकारी संचालन की जो पूरी व्यवस्था है उसको देखकर कोई भी इसका अंदाज़ा लगा सकता है। सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली को देखकर कोई भी यह समझ सकता है कि इस समय देश किसी संविधान और व्यवस्था के तहत नहीं बल्कि एक शख़्स के निर्देश और इशारे पर चल रहा है। देश में राजनीतिक दलों की पूरी एक व्यवस्था है। देश पर आए इतने बड़े संकट के लिए क्या पीएम को उनके नेताओं से विचार-विमर्श नहीं करनी चाहिए थे। इतने बड़े संकट के मौक़े पर जब पूरी कैबिनेट सक्रिय दिखनी चाहिए थी तब वह अपनी भूमिका से नदारद है।

मोदी के अलावा क्या किसी और मंत्री का नाम इस समय सामने आ रहा है? मोदी के साथ जिस अकेले शख़्स का अभी तक नाम लिया जाता था और गृहमंत्री के तौर पर आंतरिक मामलों में इस समय उसकी सबसे बड़ी भूमिका होती है। वह पूरी सीन से नदारद है। पूरी व्यवस्था जैसे एक व्यक्ति चला रहा हो। यहाँ तक कि सरकार की प्रेस विज्ञप्तियाँ जिन्हें पहले भारत सरकार या फिर इंडियन गवर्नमेंट की तरफ़ से आती थीं उसमें भी सरकार को मोदी गवर्नमेंट लिखा जा रहा है।

लोगों को दी जाने वाली राहत सामग्रियों में मोदी किट, मोटी टिफिन और मोदी भोजन दिया जा रहा है। यहाँ तक कि कोरोना के नाम पर लिए जाने वाले दान के लिए पीएम रिलीफ़ फंड से अलग एक पीएम केयर्स फंड बना लिया गया है। जो हर तरीक़े से संदिग्ध है। उसकी ऑडिटिंग होगी या नहीं वह आरटीआई के दायरे में आता है या नहीं सब कुछ अस्पष्ट है। जबकि पीएम रिलीफ़ फंड का पूरा पैसा आरटीआई के तहत है और उसके किसी भी खर्च को जनता देख और जान सकती है।

इस पूरी प्रक्रिया में मोदी को एक राजा के तौर पर पेश किया जा रहा है। मानो जिसकी इच्छा ही क़ानून है। वरना मोदी जी को यह ज़रूर बताना चाहिए कि लॉक डाउन संविधान के किस अनुच्छेद में लिखा है। जो उन्होंने एक दिन अचानक टीवी के पर्दे पर आकर घोषित कर दिया और सबको अपने कमरों में क़ैद कर दिया। ऐसे मौक़ों के लिए बनाए गए डिज़ास्टर मैनेजमेंट और उसके पूरे महकमे की क्या भूमिका है? ये तमाम सवाल है जिन्हें उत्तर की दरकार है।

दरअसल यह भ्रष्ट पूंजीवाद और सड़ते ब्राह्मणवाद के बीच का गठजोड़ है। जिसमें पूँजीपतियों की संरक्षा और सुरक्षा के साथ सवर्णों के अहंकार और वर्चस्व की रक्षा सरकार का प्राथमिक कार्यभार हो गया है। इसमें समाज का वह तबका भी शामिल है जिसके हित कारपोरेट के साथ जुड़े हुए हैं। ऊपर के दोनों हिस्सों के साथ जुड़कर यह अजीब क़िस्म के कॉकटेल का निर्माण करता है।

अगर ऐसा नहीं है तो सरकार को यह ज़रूर बताना चाहिए कि पूँजीपतियों के हर छोटे-बड़े संकट पर सरकार बेल आउट पैकेज लिए खड़ी रही। कभी उसने आर.बी.आई के इमरजेंसी फंड से लिया। तो कभी उनके एनपीए माफ़ करवाए। और कभी क़र्ज़ में डूबे मोदियों और माल्याओं को बाहर जाने का रास्ता दिखा कर। और अब जब देश के सामने इतना बड़ा संकट आया है तो पैसे की अपने स्तर पर व्यवस्था करने की जगह सरकार जनता के सामने झोली फैला रही है।

सरकार किसी कदर कारपोरेट परस्ती में पागल है उसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि संकट के इस दौर में भी उसे उसी हिस्से के लाभ की फिक्र है। संकट के नाम पर घोषित किए गए पैकेज का बड़ा हिस्सा इंश्योरेंस के बहाने इन्हीं निजी कंपनियों को जाना है। और जनता के लिए उसमें सर्फ़ लॉलीपाप है। देने के नाम पर 20 रुपये की मनरेगा में वृद्धि है जो काम करने के बाद मिलेगी न कि संकट के इन तीन महीनों में। जन धन वाली महिलाओं को 500 रुपये की किस्त है। जिनको वह इस समय बैंक से निकाल नहीं सकती हैं। और बजट का 2000 रुपये किसानों को देकर उसे पैकेज का हिस्सा बता दिया गया है। जो सरकार विपत्ति के इस मौक़े पर अपनी जनता के प्रति इतनी बेईमान हो उससे कोई क्या उम्मीद कर सकता है?

और हां एक बात किए बग़ैर यह बात अधूरी रह जाएगी। मोदी के इस पूरे फासीवादी अभियान का सबसे बड़ा हथियार सांप्रदायिकता रही है। लिहाज़ा वह उसे किसी भी तरीक़े से नहीं छोड़ सकते हैं। कोरोना ने जब मंदिर, मस्जिद और गिरिजा घरों की भूमिका को अप्रासंगिक कर दिया है और मानवता को बचाने के लिए धर्म की इन तमाम दीवारों को तोड़ते हुए सामूहिक एकजुटता और प्रयास ही एक मात्र ज़रिया रह गया है।ऐसे में धर्म की लौ जलती रहे और हिंदू मुस्लिम का तड़का भी इस कोरोना की आग में लगता रहे। सरकार उसकी पूरी कोशिश कर रही है।

इसके तहत पहले दूरदर्शन के ज़रिये रामायण के प्रसारण का फ़ैसला हुआ और अब जगह-जगह मुस्लिम पक्ष से हुई ग़लतियों पर निगाह रखी जा रही है। कुछ दिनों पहले पटना की किसी एक मस्जिद से मामला सामने आया था लेकिन वह उतना बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया। ताज़ा मामला दिल्ली के निज़ामुद्दीन का है। जहां तबलीगी के मरकज पर सैकड़ों लोगों को एक साथ पाया गया है जिसमें कुछ विदेशी नागरिक भी हैं। जो 13-14 मार्च को किसी इज्तिमा में शामिल होने के लिए आए थे। इस बात में कोई शक नहीं कि ऐसे मौक़े पर इस आयोजन को रद्द कर दिया जाना चाहिए था।

और ऐसा न करके आयोजकों ने गुनाह किया है। लेकिन वह सरकार और उसका पुलिस-प्रशासन क्या कर रहा था जिसने पूरे देश में धारा 144 लगा रखी है। वह अगर शाहीन बाग़ को उजाड़ सकता है तो बग़ल में आयोजित इतने बड़े जलसे की उसे ख़बर नहीं थी यह कैसे माना जाए। और अगर यह सब कुछ जानने सुनने के बाद भी करने दिया गया तो फिर सवाल और ज़्यादा गंभीर हो जाता है। जिसमें यह बात उसके साज़िश के तौर पर भविष्य में इस्तेमाल करने के संदेह की तरफ़ इशारा करती है। जो मौजूदा दौर में कोरोना की कड़ाही में हिंदू-मुस्लिम चासनी के तौर पर सामने आ गयी है। और यह मौजूदा सत्ता की हमेशा से सबसे बड़ी जरूरत रही है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on March 31, 2020 5:07 pm

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