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Thursday, August 5, 2021

यूपी: चौतरफा घिरी बीजेपी को अब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ही सहारा

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यूपी में विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल बज चुका है। सभी पार्टियों ने चुनावी रणक्षेत्र में जाने के लिए कमर कस ली है। सपा, बसपा, काँग्रेस और आम आदमी पार्टी भाजपा सरकार की नाकामियों पर जमकर प्रहार कर रही हैं। भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार प्रतीकों और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में है। लेकिन सत्ता विरोधी लहर से भाजपा और संघ के भीतर बेचैनी है। यही कारण है कि संघ और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने दिल्ली और लखनऊ में कई बैठकों में चुनाव की रणनीति पर चर्चा की। इन बैठकों में योगी आदित्यनाथ को बदलने की भी चर्चा की गई। दरअसल, योगी आदित्यनाथ के तानाशाही रवैये से जनता ही नहीं हलकान है बल्कि पार्टी के विधायक और मंत्री भी नाराज हैं। योगी सरकार की नीतियों और कार्यशैली से पहले ही जनमानस क्षुब्ध था, रही सही कसर कोरोना आपदा ने पूरी कर दी है।

कोरोना से हुई मौतों, सरकारी बदइंतजामी, ढहती कानून व्यवस्था और बढ़ती गरीबी-बेरोजगारी के कारण यूपी सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है। योगी के हठधर्मी और निरंकुशतावादी रवैये के कारण पूरी प्रशासनिक मशीनरी ठप्प है। कोरोना आपदा ने योगी सरकार की पोल खोल दी है। दरअसल, अपने चार साल के कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों में कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया। पिछली यानी अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं और कार्यक्रमों को नाम बदलकर अपना बनाने की कोशिश की गई। लेकिन इस मद में ना तो कोई खास बजट दिया गया और ना ही स्वास्थ्य सेवाओं और साधनों का विकास किया गया। बल्कि गरीब मध्यवर्ग के हित की अनेक सेवाओं को बंद या कमजोर कर दिया गया।

जनहितकारी समाजवादी मूल्यों को खारिज करते हुए योगी आदित्यनाथ ने सीधे तौर पर एलान किया कि यूपी में समाजवाद नहीं चलेगा ,यहाँ रामराज्य है। यही कारण है कि आज गरीब और मध्यवर्ग बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, बीमारी और सरकारी नियमों की ठगी का शिकार है। पेट्रोल, डीजल, गैस से लेकर तेल, राशन और सब्जी, फल के दामों में आग लगी हुई है। कोरोना संकट काल में खाने के सामान से लेकर दवाई तक की जमाखोरी और कालाबाजारी हुई। लेकिन बड़े व्यापारियों की हितकारी योगी सरकार ने इन पर कोई कार्यवाही नहीं की। डॉ. राम मनोहर लोहिया इस बात को जानते थे कि व्यापारी और पूँजीपति, आपदा में भी गरीबों का शोषण करेंगे। इसलिए वे दाम बांधो नीति को लागू करने की बात करते थे। लेकिन गाँव गिरांव में रहने वाले मजदूरों, किसानों और दस्तकारों की इस सरकार को कोई चिंता नहीं है।

भाजपा सरकार की बेरहमी का आलम यह है कि जब देश-प्रदेश में लोग कोरोना से मर रहे थे, उस समय सरकार मोदी बड़े या योगी का नाटक खेल रही थी। यूपी सरकार की जिम्मेदारी तय करने के बजाय मूल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए हिन्दुत्व का असली झंडाबरदार कौन है; जैसे वाहियात मुद्दों को मीडिया के मार्फत आम आदमी के दिमाग में ठूँसने की साजिश की जा रही थी। चारों तरफ से चित्त हो चुकी भाजपा सरकार के पास धर्म और सांप्रदायिकता के अलावा कोई और मुद्दा नहीं है। आखिर भाजपा कब तक धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं से खेलती रहेगी? अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर के चंदे में घोटाले के आरोप लग रहे हैं।

समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री और अयोध्या से विधायक रहे पवन पांडे तथा आप के यूपी प्रभारी संजय सिंह ने पूरे दस्तावेजों के साथ राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा जमीन सौदों में किए गए भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है। निर्मोही अखाड़े द्वारा पहले भी विश्व हिन्दू परिषद पर 1400 करोड़ रुपए के गबन करने का आरोप लग चुका है। अब यह साबित हो चुका है कि हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ राम के नाम पर व्यापार और ठगी कर रही हैं। लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ करके हिन्दुत्ववादी, सत्ता और वर्चस्व की राजनीति कर रहे हैं। हिन्दू धर्म और राम के प्रति इनकी ना कोई आस्था है और ना कोई प्रतिबद्धता है। ये महज सत्ता के लालची लोग हैं, जो नफरत फैलाकर विभाजनकारी राजनीति कर रहे हैं। इससे देश की सुख शांति भंग हो रही है। बढ़ती असहिष्णुता और धर्मांधता के कारण दुनिया में भारत की बदनामी हो रही है।  

विपक्ष लगातार सरकार को आईना दिखा रहा है। यूपी में प्रशासनिक असफलता और कोरोना काल में सरकारी बदइंतजामी को लेकर काँग्रेस और समाजवादी पार्टी लगातार सवाल करती रही हैं। लेकिन सरकार गूँगी और बहरी बनकर बैठी है। इसका कारण योगी आदित्यनाथ का तानाशाहीपूर्ण रवैया है। गोरखपुर मठ के महंत प्रदेश को मठाधीशी अंदाज में चला रहे हैं। उन्होंने 4 साल में जनता के सरोकारों को कोई तवज्जो नहीं दी। योगी पहले मुख्यमंत्री हैं जिनके खिलाफ सत्तादल के 100 से अधिक विधायक विधानसभा में धरना प्रदर्शन कर चुके हैं। कुछ भाजपा विधायक और मंत्री कैमरे पर योगी की तानाशाही की आलोचना कर चुके हैं। हालिया मोदी बनाम योगी के घटनाक्रम में करीब 250 विधायकों ने योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए आलाकमान से नाराजगी जाहिर की है।

यूपी में सरकार की पोल खोलने वालों की खैर नहीं है। यहाँ माफिया और गुंडाराज चरम पर है। शराब माफिया के खिलाफ खबर करने वाले एबीपी के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की संदिग्ध परिस्थियों में प्रतापगढ़ में हुई मौत गहरे सवाल खड़े करती है। पिछले चार साल में सरकार और माफिया ठेकेदारों की मिलीभगत से यूपी की जनता बहुत प्रताड़ित हो रही है। लेकिन इस गठजोड़ का खुलासा करने वालों पर ही सरकार चाबुक चलाती है। गोरखपुर चिकित्सा केंद्र में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों के मरने की बात बेपर्दा करने वाले डा. कफील पर देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया। विदित है कि यूपी हाईकोर्ट ने कफील पर लगे देशद्रोह के मुकदमे को खारिज करते हुए इसे बदले की कार्रवाई बताया था। इसी प्रकार पिछले दो सालों में प्रशांत कनौजिया सहित दर्जनों पत्रकारों को जेल भेजा गया। इन पत्रकारों ने मिड डे मील में गड़बड़ी और घास खाते गरीबों जैसे जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग की थी। यूपी में सच कहना, लिखना और दिखाना अपराध हो गया है! कोरोना संकट में जिसने सरकारी खामियों को उजागर किया, उसे आपदा कानून के नाम पर जेल में ठूँस दिया गया।

पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगले साल फरवरी में यूपी सहित छह राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव भाजपा के लिए बहुत मुश्किल साबित होने जा रहे हैं। कोरोना आपदा से निपटने में नाकामी के कारण भाजपा के प्रति जनमानस में बहुत गुस्सा है। भाजपा के विधायक और मंत्री जमीन पर सुलगती इस नाराजगी को देख रहे हैं। वे हार की आशंका से तो परेशान हैं ही,  गुस्साए लोगों का सामना करने से भी डरे हुए हैं। इसलिए भाजपाई नेता- विधायक अपने क्षेत्रों में जाने से हिचक रहे हैं। लेकिन इसके उलट विपक्ष पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं।

यूपी में सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में समाजवादी पार्टी है। गोदी मीडिया में सपा की निष्क्रियता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वास्तव में, यह मीडिया द्वारा प्रायोजित एक प्रोपेगेंडा है। सपा नौजवानों की पार्टी है। नागरिकता विरोधी कानून और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सपा के नौजवान कार्यकर्ता लगातार आंदोलन करते रहे हैं। किसान आंदोलन के समर्थन में गाँव -कस्बों में होने वाले सपा के अभियान में इन नौजवानों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है। योगी सरकार की पुलिस ने उन पर बर्बरतापूर्वक लाठियां बरसाईं और जेल भेजा। लेकिन किसी अखबार और चैनल ने सपा की इन गतिविधियों को जगह नहीं दी।

कोरोना के पहले फेज के सुस्त होते ही अखिलेश यादव जनवरी में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने कई जिलों में जनसंपर्क किया,  प्रशिक्षण शिविर लगाए। हाँ, यह जरूर है कि अपने पिता मुलायम सिंह यादव की तरह अखिलेश यादव सड़क पर संघर्ष करते हुए नहीं दिखाई दिए। उनके जनसंपर्क का एक खास देसी अंदाज है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज की यूपी में भाजपा से लड़ने के लिए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह मेहनती और संघर्षशील नेता की जरूरत है। अपने पिता मुलायम सिंह यादव के संघर्ष को आगे बढ़ाने वाले अखिलेश यादव जाहिर तौर पर ममता बनर्जी से अलग हैं। जो लोग अखिलेश यादव पर निष्क्रिय होने के आरोप लगा रहे हैं, वे शायद भूल गए हैं कि 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती सरकार के खिलाफ अखिलेश यादव ने ढेरों धरने प्रदर्शन किए थे। पूरे प्रदेश में होने वाली उनकी साइकिल यात्राओं ने सपा की जीत में सबसे बड़ी भूमिका अदा की थी।

तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की राय में समाजवादी पार्टी भाजपा से मुकाबला करने में सबसे ज्यादा सक्षम है। उसके पास संगठन है। नौजवान कार्यकर्ताओं का बड़ा हुजूम है। स्थानीय अनुभवी क्षत्रप हैं। अगर नौजवानों और वरिष्ठों के बीच बेहतर तालमेल हो, बूथों पर नौजवानों का बेहतर इस्तेमाल हो तो यूपी में भाजपा को पराजित किया जा सकता है। अखिलेश यादव की साफ-सुथरी और विकास करने वाली छवि से भी सपा को लाभ मिल सकता है। सपा अध्यक्ष ने अपने पिछले कार्यकाल में स्वास्थ्य, पुलिस प्रशासन, नौजवानों की शिक्षा और गरीबों को पेंशन जैसे उल्लेखनीय काम किए थे। साथ ही लखनऊ में इकाना अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे, लखनऊ मेट्रो उनके कार्यकाल के चमकदार सितारे हैं।

सपा किसानों और नौजवानों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी मानी जाती है। दिल्ली की सीमाओं पर सात महीने से चलने वाले किसान आंदोलन से भी भाजपा की स्थिति खराब है। खासकर पश्चिमी यूपी के जाट किसान भाजपा से एकदम नाराज बताए जा रहे हैं। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जो सांप्रदायिक विभाजन हुआ था, अब नफरत की दीवारें ढह गई हैं। जाट मुस्लिम एकता फिर से स्थापित हो चुकी है। अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी में लोकदल के वर्तमान अध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ किसान पंचायतों में शामिल हो चुके हैं। लोकदल और सपा का गठबंधन यहाँ मजबूत है। किसानों की नाराजगी भाजपा के लिए बहुत भारी पड़ती हुई दिख रही है।

कोरोना काल में सरकार की बदइंतजामी पर ट्वीट के जरिए अखिलेश यादव सरकार को घेरते रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने पिछले साल सरकार के अविवेकपूर्ण तरीके से लगाए गए लाक डाउन में हताहत होने वाले लोगों के परिवारों को एक एक लाख की अनुग्रह राशि प्रदान की है।

दूसरी लहर में भी सपा के कार्यकर्ता लगातार लोगों की मदद करते रहे हैं। पेशे से डाक्टर सपा प्रवक्ता आशुतोष वर्मा ने निशुल्क सैकड़ों लोगों का उपचार किया है। स्वयं अखिलेश यादव ने पार्टी की ओर से लोगों के इलाज के लिए खर्च का वहन किया है। सरकारी नाकामी से मरने वालों के परिजनों की आर्थिक मदद की है। यही कारण है कि किसान, मजदूर, नौजवान, छोटे दुकानदार और सरकारी कर्मचारी सपा और अखिलेश यादव की ओर उम्मीद से देख रहे हैं।

(डॉ. रविकान्त लखनऊ विश्वविद्यालय अध्यापक हैं।)

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