Friday, January 21, 2022

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कोर्ट में विवादित टिप्पणियां -5: जस्टिस नजीर ने न्यायिक व्यवस्था में मनु का नाम लेकर बर्रे के छत्ते में हाथ डाला

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वर्ष 2021 के जाते-जाते उच्चतम न्यायालय के जज जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने भी न्यायिक व्यवस्था के भारतीयकरण की अवधारणा में मनु, कौटिल्य जैसे प्राचीन भारतीय कानूनी दिग्गजों की उपेक्षा और औपनिवेशिक कानूनी व्यवस्था का अनुपालन संवैधानिक लक्ष्यों के लिए हानिकारक बताकर भारी विवाद पैदा कर दिया है। पिछले कुछ समय से चीफ जस्टिस एनवी रमना द्वारा न्यायिक व्यवस्था के भारतीयकरण की अवधारणा की पैरवी की जा रही है। हालांकि चीफ जस्टिस एनवी रमना ने न्यायिक व्यवस्था के भारतीयकरण को अभी तक परिभाषित नहीं किया है।

मनु का नाम लेना बर्रे के छत्ते में हाथ डालने के बराबर है क्योंकि पूरे देश में बहुसंख्य आबादी मनुवादी व्यवस्था के विरोध में है क्योंकि यह व्यवस्था जातिवाद, ऊँच-नीच को महिमामंडित करती है।  

अब इस दिशा में एक कदम आगे बढ़कर जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने लीगल सिस्टम के भारतीयकरण का अह्वान किया है। उन्होंने कहा कि हमें प्राचीन भारतीय कानूनी दर्शन से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है, साथ ही “औपनिवेशिक मानसिकता” से छुटकारा पाना आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि सभी भारतीय विश्वविद्यालयों को विधि पाठ्यक्रमों में भारतीय न्यायशास्त्र को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करना चाहिए। जस्टिस नजीर अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद की 16वीं राष्ट्रीय परिषद की बैठक में ‘भारतीय कानूनी प्रणाली के उपनिवेशीकरण’ विषय पर बोलते हुए यह टिप्पणी की।

अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वकीलों का संगठन है। उच्चतम न्यायालय के सिटिंग जज होते हुए संघ के कार्यक्रम में जाने से जस्टिस नजीर विवादों के घेरे में आ गये हैं। जस्टिस नजीर ने कहा कि महान वकील और न्यायाधीश पैदा नहीं होते हैं, ब‌ल्‍कि वे मनु, कौटिल्य, कात्यायन, बृहस्पति, नारद, याज्ञवल्क्य और प्राचीन भारत के अन्य कानूनी दिग्गजों के अनुसार तैयार उचित शिक्षा और महान कानूनी परंपराओं से बनते हैं। उन्होंने कहा, प्राचीन भारतीय कानूनी दिग्गजों के महान ज्ञान की निरंतर उपेक्षा और औपनिवेशिक कानूनी व्यवस्था का निरंतर अनुपालन हमारे संविधान के लक्ष्यों और हमारे राष्ट्रीय हित के लिए हानिकारक है।

जस्टिस नजीर ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि औपनिवेशिक कानूनी व्यवस्था भारतीय जन के लिए उपयुक्त नहीं है। कानूनी व्यवस्था का भारतीयकरण समय की मांग है। उन्होंने कहा, इस तरह की औपनिवेशिक मानसिकता के उन्मूलन में समय लग सकता है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि मेरे शब्द आप में से कुछ को इस मुद्दे पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करेंगे और भारतीय कानूनी व्यवस्था को खत्म करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर विचार करेंगे।

उन्होंने कहा कि हालांकि यह एक बहुत बड़ा और समय लेने वाला प्रयास हो सकता है, मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह ऐसा प्रयास होगा जो भारतीय कानूनी प्रणाली को पुनर्जीवित कर सकता है और इसे एक महान राष्ट्र के सांस्कृतिक, सामाजिक और विरासत से जोड़ सकता है।

जस्टिस नजीर ने कहा कि न्यायपालिका की व्यवस्था का भारतीकरण होने से इसमें कई बदलाव होंगे जो कागजी कार्रवाई को सरल बनाएंगे, प्रक्रियाओं को स्थानीय भाषाओं में सुलभ बनाया जाएगा और प्रक्रिया अब की तुलना में कम खर्चीली होगी।जस्टिस नजीर ने कहा शीर्ष अदालतों में जाने के लिए कानूनी शुल्क निषेधात्मक हैं, निर्णय अक्सर अंग्रेजी में दिए जाते हैं, जो सामान्य लोगों के समझने के लिए मुश्किल हो जाता है। इसलिए अक्सर मुकदमेबाजी सामान्य वर्ग के लिए एक डरा देने वाली परीक्षा बन जाती है। न्याय को अधिकार के मामले के रूप में ध्यान देने पर केंद्रित करना चाहिए न कि विवेक के मामले में।

भारतीय कानूनी प्रणाली का विघटन विषय पर अपनी बात रखते हुए जस्टिस नजीर ने भारत के गौरवशाली कानूनी इतिहास को कानून के पाठ्यक्रम में एकीकृत करने की आवश्यकता के बारे में भी बताया। उन्होंने भारत में प्राचीन काल की अनुकरणीय प्रथाओं की बात की, जैसे कि नागरिकों को न्याय मांगने का अधिकार और यह तथ्य कि राजा से भी कानून के सामने झुकने की उम्मीद की जाती थी।

इसके पहले से चीफ जस्टिस रमना ने देश की न्याय प्रणाली के भारतीयकरण की मांग करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि हमारी न्याय व्यवस्था मूल रूप से औपनिवेशिक होने के कारण भारतीय आबादी की जरूरतों के लिए उपयुक्त नहीं है।
उनका कहना है कि भारत की कानून व्यवस्था को देश के मुताबिक बदलने की ज़रूरत है। भारत में वर्तमान में मौजूद कानूनी व्यवस्था औपनिवेशिक है और भारतीय आबादी के अनुकूल नहीं है। न्याय वितरण प्रणाली का भारतीयकरण समय की मांग है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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