Friday, December 2, 2022

अब टूटने लगा है ममता का जादू!

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ममता बनर्जी का जादू तो पहले लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा था, पर अब यह टूटने लगा है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में जादू का असर था या खौफ ने कारगर भूमिका निभाई थी। इसका आकलन करने के लिए हमें कुछ पिछली घटनाओं पर नजर डालनी पड़ेगी।

इससे पहले यह याद दिला दें कि राज्य सरकार के हैवीवेट मंत्री पार्थ चटर्जी को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है और वे इन दिनों जेल हिरासत में हैं। इसके अलावा सीबीआई ने दक्षिण बंगाल के तृणमूल कांग्रेस के बाहुबली नेता अणुव्रत मंडल को भी गिरफ्तार किया है। पार्थ चटर्जी की सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के आवास से पचास करोड़ की नकदी मिली थी अणुव्रत मंडल की सैकड़ों करोड़ की संपत्ति का खुलासा हुआ है। अब लोग सवाल करने लगे हैं कि गिरफ्तारी की सूची में तीसरा नाम कौन है। हवा में कई भारी भरकम नाम तैर रहे हैं, जैसे मंत्री फिरहद हकीम, अरूप राय और मलय घटक आदि।

अब आइए एक नजर पिछली घटनाओं पर डालते हैं। पश्चिम मिदनापुर के गांव में कुछ लोग तृणमूल कांग्रेस के एक नेता को पेड़ से बांध कर पीट रहे थे। यह तस्वीर अखबारों में भी छपी थी और सोशल मीडिया पर वायरल भी हुई थी। नौकरी दिलाने के लिए जो रकम रिश्वत में ली गई थी उसे लोग वापस मांग रहे थे। इस तरह की घटना गांव-गांव में घट रही है। लोग तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के घरों पर धरना दे रहे हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं। पुलिस उन्हें बचा रही है।

सभी की एक ही मांग है कि नौकरी दिलाने के लिए रिश्वत के नाम पर जो रकम ली गई थी वह वापस की जाए। अणुव्रत मंडल की गिरफ्तारी के बाद लोग खुलकर मैदान में आ गए हैं। इससे पहले तो तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की तरफ आंख उठाकर देखने की हिमाकत भी कोई नहीं कर सकता था। खौफ दूर होने और लोगों में साहस वापस लौट आने का कयास इसी से लगाया जा सकता है कि जब अणुव्रत मंडल को पेशी के लिए अदालत में लाया जाता है तो लोग गोरू चोर का नारा लगाते हैं। अणुव्रत को गौ तस्करी के मामले में गिरफ्तार किया गया है। इससे पहले तो अणुव्रत के जलवे का आलम यह था कि तुम दिन को रात कहो तो हम रात कहेंगे, तुझको है जो पसंद हम वही बात कहेंगे।

कुछ ही महीनों बाद पंचायत चुनाव होने वाले हैं और ममता बनर्जी को इसी का खौफ सता रहा है। शायद इसीलिए ममता बनर्जी का भतीजा और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी बार-बार कह रहे हैं कि इस बार पंचायत चुनाव में हिंसा और जोर जबरदस्ती नहीं की जाएगी। हालांकि इससे पहले तो यही होता रहा है। गांवों पर तृणमूल कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ रही है, शायद इसीलिए ममता बनर्जी ने कहा है कि अणुव्रत के रिहा होने पर उनका स्वागत वीरों की तरह किया जाए। क्या अणुव्रत मंडल की जमानत पंचायत चुनाव से पहले हो पाएगी और अगर मिल भी गई तो क्या बेखौफ हो गए लोगों की जुबान पर पहले की तरह ही ताला लग पाएगा। 

एक तरफ तो आगे होने वाली गिरफ्तारी का खौफ सता रहा है तो दूसरी तरफ माकपा और कांग्रेस की जुगलबंदी उन्हें परेशान कर रही है। सितंबर में ही माकपा की डीवाईएफआई ने एक कोलकाता में प्रदर्शन किया था। पुलिस ने मेट्रो चैनल पर प्रदर्शन की अनुमति दी थी, लेकिन भीड़ इस कदर उमड़ी की सभा स्थल को बदलकर विक्टोरिया हाउस के सामने करना पड़ा। यह वही जगह है जहां ममता बनर्जी सभा किया करती हैं। एक और घटना से तृणमूल को तो छोड़िए अब माकपा के नेता भी हैरान हैं। माकपा ने पूरे राज्य में आम लोगों से एक से सवा करोड़ रुपए तक चंदा लेने का लक्ष्य तय कर रखा था।

राज्य की बात तो छोड़ ही दीजिए सिर्फ पूर्वी बर्दवान और हुगली जिले से ही इतनी वसूली हो गई है। इस हौसला अफजाई के बाद तो माकपा और कांग्रेस ने पूरे राज्य में टीचर नियुक्ति घोटाला और कोयला एवं गौ तस्करी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। भाजपा भी पीछे नहीं है। राज्य सचिवालय अभियान से लेकर गली और नुक्कड़ों पर सभाएं कर रही है। आगे के दो-तीन महीने तृणमूल के लिए निर्णायक साबित होंगे। पंचायत चुनाव में अगर हार का सामना करना पड़ा तो ममता बनर्जी के लिए आगे की राह बहुत मुश्किल हो जायेगी।

एक तरफ तो सीबीआई और ईडी का खौफ और भविष्य में होने वाले गिरफ्तारियों की आशंका और माकपा की उभरती हुई ताकत ने ममता बनर्जी के पीएम बनने के सपने को चकनाचूर कर दिया है। यही वजह थी कि उप राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने विपक्ष के उम्मीदवार मारग्रेट अल्वा के बजाय जगदीप धनखड़ का समर्थन किया। जबकि उनके और धनखड़ के बीच तकरार रोजाना अखबारों की सुर्खियां बनती रही थी।

शायद इसीलिए ममता बनर्जी ने कहा था कि मोदी जी तो अच्छे हैं पर सारी खुराफात की जड़ अमित शाह और भाजपा है। हरियाणा में हाल ही में विपक्ष की रैली में ममता बनर्जी ने किसी को नहीं भेजा था। पर भाजपा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। उसके नेता ममता बनर्जी पर पुरजोर हमला कर रहे हैं। अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा की सभी स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन के पद से तृणमूल कांग्रेस के सांसदों को हटा दिया है। पर हैरानी की बात तो यह है कि इस बाबत विपक्ष के एक नेता का भी बयान नहीं आया है। शायद ममता बनर्जी के अकेले पड़ जाने का यह एक संकेत है।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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