Friday, August 19, 2022

लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति अपनी संकीर्ण सोच के लिए याद किए जाएंगे जस्टिस खानविलकर

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जस्टिस एएम खानविलकर रिटायर हो गए हैं। पर रिटायर होने के पहले उन्होंने जिन कुछ मुकदमों का निस्तारण किया है, उनके फैसलों में आए कुछ निष्कर्ष ऐसे हैं, जिन्होंने, कानूनी जानकारों को न केवल हैरान किया है, बल्कि न्याय के मूलभूत सिद्धांतों का भी उल्लंघन किया है। वकीलों और कानून के जानकारों के बीच एक सवाल यह उठ रहा है कि, क्या कोई फैसला किसी जज के निजी विचार के आधार पर, दिया जाना चाहिए, या कानून और न्याय शास्त्र के आधार पर। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अक्सर न्यायिक समीक्षा होती रहती है, और ऐसी समीक्षा से ही, सुप्रीम कोर्ट के बारे में लोगों की धारणाएं बनती रहती हैं। यह भी एक तथ्य है कि, किसी जज की निजी सोच और दर्शन के आधार पर किसी भी मामले का परिणाम अलग हो सकता है और वह कभी कभी कानून की मूल भावना के विपरीत भी हो सकता है।

जस्टिस अजय मानिकराव खानविलकर ने जब, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की अनियंत्रित जांच शक्तियों और अधिकारों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर, अपना फैसला सुनाया तो, कानून के  टिप्पणीकारों को, जस्टिस खानविलकर के फैसले पर बहुत हैरानी नहीं हुई। ईडी के अधिकार और शक्ति को चुनौती देने वाली इन याचिकाओं पर, जस्टिस खानविलकर ने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक दो दिन पहले, अपना फैसला दिया था। हालांकि यह फैसला, सुप्रीम कोर्ट में उनके कार्यकाल के, छः वर्षों के दौरान दिए गए फैसलों में निहित, उनके एक खास पैटर्न के आधार पर थे।

उदाहरण के लिए  ‘आधार’ सिस्टम पर, गोपनीयता की चिंताओं को उजागर करती, दायर याचिका को, खारिज करने से लेकर, कुछ आपराधिक कानूनों में, जमानत के प्रावधान को, और अधिक जटिल बनाने तक, जस्टिस खानविलकर, राज्य की शक्ति और नागरिकों की स्वतंत्रता के बीच, राज्य की शक्ति की ओर बराबर झुकते हुये दिखे। उन्होंने, अपने द्वारा सुने गए मुकदमों में, लगातार राज्य का ही पक्ष लिया है। एक प्रकार से उनका झुकाव, राज्य की ओर रहा है और उनका यह दृष्टिकोण, साफ साफ दिखता भी रहा। 

हाल में, उनके द्वारा दिए गए तीन मुकदमों के फैसलों में, उनकी आलोचना हुई और उन फैसलों में निहित कानूनी बिंदुओं पर भी, कानून के जानकारों ने सवाल उठाया है। यहां तक संदेह व्यक्त किया जाने लगा कि, कहीं, सुप्रीम कोर्ट, कथित तौर पर केंद्र सरकार के दबाव और नियंत्रण में तो काम नहीं करने लगा है। इससे शीर्ष अदालत की विश्वसनीयता पर भी कई सवाल खड़े हुए हैं। विशेष रुप से, जस्टिस खानविलकर की अध्यक्षता में गठित तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा, धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के कई विवादास्पद धाराओं और प्रवर्तन निदेशालय की व्यापक जांच शक्तियों की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए, दिए गए निर्णय के संदर्भ में।आपराधिक कानून, पीएमएलए की अनेक धाराओं को चुनौती देते हुए कुल 200 से अधिक याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थीं। इनमें मुख्य बिंदु थे,

एक – आरोपी व्यक्ति को स्वचालित रूप से दोषी मानने का, 

दो – आरोपी की जमानत प्रक्रिया इतनी जटिल है, कि, जमानत लगभग असंभव है, 

तीन – प्रवर्तन निदेशालय, बिना किसी औपचारिक शिकायत के भी, घर, कार्यालय या कोई भी स्थान, जहां उसे संदेह हो, उसकी तलाशी ले सकता है, और 

चार – ईडी, संदिग्ध पाए जाने पर किसी वस्तु को जब्त कर सकता है। 

जस्टिस खानविलकर की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय की इन शक्तियों को, बरकरार रखा और इन प्रावधानों के विपरीत दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। यह याचिकाएं, इन आरोपों के बाद भी अदालत द्वारा खारिज कर दी गईं, कि, वर्तमान सरकार, राजनीतिक लाभ और विपक्षी दलों के नेताओं को, प्रताड़ित करने के लिए, ईडी के इन गंभीर और अनियंत्रित अधिकार का दुरुपयोग कर रही है। सरकार, ईडी की शक्तियों को, राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। लेकिन अदालत ने इन दलीलों को भी खारिज कर दिया। 

अब जस्टिस खानविलकर द्वारा सुने गए, कुछ पुराने मामलों की समीक्षा करते है। अप्रैल 2019 में, जस्टिस खानविलकर एक दो सदस्यीय पीठ के सदस्य थे, जिसने एक ऐसा फैसला दिया, जिसके कारण, भारत में, सत्ता के, राजनीतिक  विरोधियों के खिलाफ, अक्सर इस्तेमाल किए जाने वाले एक आतंक विरोधी कानून, गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यूएपीए के अंतर्गत, जमानत पाने की प्रक्रिया को, लगभग असंभव बना दिया। इस न्याय पीठ ने माना कि, गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के मामलों में जमानत पर फैसला सुनाते समय अदालतें, अभियोजन पक्ष के सबूतों की गंभीर जांच नहीं कर सकती हैं।

लेकिन, जमानत पर निर्णय लेते समय, अदालत को इसके बजाय एक व्यापक मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि, क्या किसी आरोपी व्यक्ति के खिलाफ, अभियोजन द्वारा लगाए गए, आरोप प्रथम दृष्ट्या सच हैं या नहीं। इस प्रकार, यह कहते हुए कि, अदालत को अभियोजन पक्ष के मामले को प्राथमिकता देनी चाहिए, मुक़दमे का फैसला किया। जेल, एक अपवाद है, और बेल, एक अधिकार, अब तक जमानत का यह मान्य सिद्धांत, इस मुकदमे के फैसले में नजर अंदाज कर दिया गया। अभियोजन तो, हर हाल में, जमानत का विरोध करेगा ही। पर इस फैसले ने, इस कानून में, जमानत के अधिकार पर अंकुश लगा दिया। जिसका खामियाजा राज्य और सरकार के खिलाफ मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले कुछ सजग और सचेत नागरिकों को आज तक भुगतना पड़ रहा है। 

इस फैसले की आलोचना करते हुए, विधि विशेषज्ञों ने, कहा भी था कि, इस फैसले ने “एक नया सिद्धांत गढ़ा” और व्यावहारिक रूप से यह, सुनिश्चित किया कि, एक आरोपी को पूरे मुकदमे की सुनवाई तक की अवधि के लिए, हिरासत में रहना चाहिए, भले ही “व्यक्ति के खिलाफ सबूत अस्वीकार्य हों।” इस प्रकार इस कानून की यह व्याख्या स्वाभाविक रूप से संविधान के मौलिक अधिकारों के विपरीत है। 

अब जिस मुकदमे को लेकर, लोकतांत्रिक और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में,  सबसे अधिक चिंता जताई जा रही है, वह मुकदमा है ज़किया जाफरी की याचिका, जिसमें, याचिकाकर्ताओं को ही निशाने पर लेकर अदालत ने, न्याय मांगने गए फरियादी को ही मुल्जिम बना दिया और नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली, तीस्ता सीतलवाड़ और  गुजरात दंगों के समय डीजी रहे आरबी श्रीकुमार के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कहा। यहां जजों की यह पीठ खुद ही एक वादी के रूप में, दिखती हुयी नजर आती है, जिसने अपने फैसले में साफ-साफ कहा है कि, इन लोगों ने एक साजिश के तहत इस पूरे मामले को जानबूझकर गरमाए रखा, और इनके खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए।

जस्टिस खानविलकर के इस निर्णय ने, न केवल राज्य की शक्तियों का विस्तार किया है, बल्कि, सचेत और सजग नागरिकों को, जो राज्य के दमन के खिलाफ जब न्याय मांगने न्याय के सर्वोच्च पीठ के सामने गए तो, उन्हें राहत देने के बजाय, उन्हें ही दोषी बता दिया, और बिना उनका पक्ष सुने, उन्हें, साजिश का जिम्मेदार ठहराने के प्रयास के लिए दंडित भी कर दिया।  

24 जून को, उन्होंने ज़किया जाफरी की याचिका, जो, 2002 के गुजरात दंगों के संबंध में नरेंद्र मोदी, जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, को, एसआईटी द्वारा, दी गई क्लीन चिट पर सवाल उठाने वाली याचिका थी, को खारिज कर दिया, साथ ही, याचिकाकर्ताओं के अदालत जाने की मंशा पर भी, सवाल खड़े किए और लिखा कि उन्हें “कठोर” दंड दिया जाना चाहिए। फैसले के एक दिन बाद ही, गुजरात पुलिस ने फैसले के हवाले से, एफआईआर दर्ज की और एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ और गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार भी कर लिया। दोनों अभी भी जेल में हैं। 

इसके बाद फिर ऐसे ही एक प्रकरण में, 14 जुलाई को, जस्टिस खानविलकर और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में 17 आदिवासियों की हत्याओं की जांच की मांग करने वाली याचिका को खारिज करते हुए, वही स्टैंड लिया जो उसने, ज़किया जाफरी मामले में लिया था। इस मामले में, याचिकाकर्ताओं ने, सुरक्षा बलों पर आदिवासियों की हत्या का आरोप लगाते हुए, एक एसआईटी गठित करके जांच करने की मांग शीर्ष अदालत से की थी। पर यह याचिका तो अदालत ने खारिज कर ही दी, साथ ही याचिकाकर्ता हिमांशु कुमार को ही दोषी ठहरा दिया और उन पर पांच लाख रुपए का जुर्माना की सजा दे दी।

इनका जुर्म, आदिवासियों की हत्या के लिए एसआईटी गठित कर के, जांच की मांग करना था। लेकिन, कोर्ट ने कहा कि, ‘सुरक्षा बलों पर संदेह करने के लिए कोई सबूत नहीं है और जांच एजेंसियां उन लोगों की पहचान करने और उन्हें दंडित करने के लिए एक जांच शुरू कर सकती हैं जिन्होंने “साजिश रची थी।’

यहां तक कि, जस्टिस खानविलकर ने, राज्य के खिलाफ अपनी याचिका दायर करने वाले सचेत नागरिकों की जांच का आदेश तो दिया ही, साथ ही राज्य के विरुद्ध आरोपों की जांच के लिए, याचिकाओं में किये गए अनुरोधों को अस्वीकार भी कर दिया। सितंबर 2018 में, उन्होंने महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में 2018 में हुई, हिंसा के संबंध में कई कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बारे में, स्वतंत्र जांच की मांग से इनकार कर दिया। तीन जजों की इस पीठ के अध्यक्ष जस्टिस खानविलकर थे। लेक़िन, इसी पीठ में शामिल एक अन्य जज, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपनी असहमति दर्ज कराई और अपनी अलग राय देते हुए कहा कि, ‘इस मामले में पुणे पुलिस के आचरण ने इसकी निष्पक्षता पर संदेह पैदा किया है।’ जस्टिस खानविलकर का रुख यहां भी, सरकार की तरफ और वादी विरोधी रहा है। 

यहां इस बात का भी उल्लेख करना समीचीन रहेगा कि, जस्टिस खानविलकर उस पीठ के भी हिस्सा थे, जिसने सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले के ट्रायल जज, स्पेशल जज सीबीआई, बीएच लोया की संदिग्ध मृत्यु की जांच के लिए, दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिसमें केंद्रीय मंत्री अमित शाह पर अब भी आरोप लगते हैं। 

अप्रैल 2022 में, तीन-न्यायाधीशों की पीठ के प्रमुख, खानविलकर ने एक निर्णय दिया, जिसमें उन्होंने कई संशोधनों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जो गैर-लाभकारी संगठनों की विदेशी फंडिंग को बढ़ाने और उपयोग करने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रतिबंधित करते थे। इन परिवर्तनों के लिए संगठनों को भारतीय स्टेट बैंक की एक विशिष्ट शाखा के साथ अनिवार्य रूप से एक खाता खोलने की आवश्यकता थी, उन्हें उप-अनुदान निधि से मना किया और प्रतिबंधित किया कि वे पैसे कैसे जुटा सकते हैं और उनका उपयोग कर सकते हैं।  कई टिप्पणीकारों ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को असमान रूप से प्रभावित करने के लिए इस फैसले की आलोचना की।

इससे पहले, अक्टूबर में, केंद्र द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के विरोध मे दायर एक याचिका पर निर्णय लेते हुए, दो न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता करते हुए, जस्टिस खानविलकर ने याचिकाकर्ताओं को, विरोध में याचिका दायर करने के लिए फटकार लगाई, फिर, उन्होंने आदेश दिया कि अदालत तय करेगी कि, क्या नागरिक, उन विषयों पर विरोध कर सकते हैं जिनमें मामले पहले से ही लंबित हैं। यह एक अजीबोगरीब दृष्टिकोण है कि, जिन मामलों में कोई अदालत विचार कर रही है या प्रकरण विचाराधीन न्यायालय है, उन मामलों में आंदोलन, धरना प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि, कोई भी आंदोलन, किसी अदालत के खिलाफ या उसके सामने होता भी नहीं है। पर यह फैसला, केंद्र सरकार की उस ज़िद और बौखलाहट, कि हर हाल में किसान आंदोलन खत्म हो, को एक राहत देता हुआ दिखा था कि, जब अदालत में किसान बिल की सुनवाई लंबित है तो, उन बिलों पर किसान आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है। जनता द्वारा विरोध करने के लोकतांत्रिक अधिकार को, प्रतिबंधित करने के प्रयास के, इस आदेश की व्यापक रूप से आलोचना की गई थी। 

जस्टिस खानविलकर के फैसलों ने कई विवादास्पद सरकारी परियोजनाओं को भी अदालत की सहमति दी। 2018 में, वह उस बेंच का हिस्सा थे जिसने आधार की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा – एक अद्वितीय 12-अंकीय बायोमेट्रिक-लिंक्ड पहचान संख्या – यह बनाए रखते हुए कि यह निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है।  इसने राज्य सब्सिडी और लाभों के लिए आधार को अनिवार्य करने की भी अनुमति दी।  यहां भी जस्टिस चंद्रचूड़ ने आधार को असंवैधानिक बताते हुए असहमतिपूर्ण फैसला सुनाया था।

जनवरी 2021 में, खानविलकर ने सेंट्रल विस्टा परियोजना की चुनौती को खारिज करते हुए एक निर्णय लिखा – एक पहल जिसे मोदी सरकार ने 2020 में संसद और उसके आस-पास के क्षेत्र में सुधार के लिए शुरू किया था। इस परियोजना को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि इसमें पर्याप्त सार्वजनिक परामर्श की कमी थी और पर्यावरण और भूमि उपयोग नियमों का उल्लंघन किया गया था।

फैसले के अलावा, कानूनी टिप्पणीकारों ने भी, जिस तरह से यह मामला पहली बार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, उसकी आलोचना की थी। फरवरी 2020 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक आदेश पारित किया जिसमें कहा गया था कि निर्माण योजनाओं के लिए अदालत की मंजूरी की आवश्यकता होगी। इसी कोर्ट की दो जजों की बेंच ने इस पर रोक लगा दी थी। जब इसे खानविलकर की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष चुनौती दी गई, तो स्थगन पर निर्णय लेने के बजाय, एक चौंकाने वाले कदम में, अदालत ने पूरी याचिका को अपने आप में स्थानांतरित कर दिया, एक आदेश जो वकीलों का तर्क है कि स्थानान्तरण की संवैधानिक शक्तियों का उल्लंघन है।

जस्टिस खानविलकर, 2018 में मासिक धर्म वाली महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति देने वाली पीठ के भी एक जज थे, लेकिन, एक साल बाद ही उन्होंने, अपना दृष्टिकोण बदल दिया और कहा कि, सबरीमाला मुद्दे पर एक बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार किया जाना चाहिए। बड़ी पीठ को संदर्भित करने की अनुमति देने में उनका दृष्टिकोण महत्वपूर्ण था, क्योंकि 2018 बेंच के दो अन्य न्यायाधीशों ने माना था कि उनके फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं थी जिसके परिणामस्वरूप 3: 2 का विभाजन हुआ। हालांकि, उन्होंने यह भी माना था कि, निर्णय में कोई नई सामग्री या कोई स्पष्ट गलती नहीं थी जो कि समीक्षा के योग्य हो। सबरीमाला फैसले पर पुनर्विचार करने के इस आदेश की, इस आधार पर भारी आलोचना की गई कि इसने निर्णयों की समीक्षा करने का निर्णय, स्थापित कानून का पूरी तरह से उल्लंघन है। 

जज साहबान भी मनुष्य होते हैं, प्रबुद्ध होते हैं, और वे भी किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा के प्रति सहानुभूति रख सकते हैं। पर जब वे न्याय पीठ पर आसीन होते हैं और उनके सामने कोई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु सुनवाई के लिए आया है तो, उन्हें बिना किसी पक्षपात और दबाव के, उन कानूनी बिंदुओं का परीक्षण करना होता है। सुप्रीम कोर्ट को, अनुच्छेद 142 के अंतर्गत, जो असीमित शक्तियां, संविधान ने दी हैं, उसका एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि संसद द्वारा पारित कोई कानून यदि संविधान के विपरीत दिखता है तो उसे संसद की सर्वोच्चता के बावजूद रद्द कर दिया जायेगा, क्योंकि संविधान सर्वोच्च है और संविधान की सर्वोच्चता, गरिमा और उसके मूल ढांचे को बनाए रखना, सुप्रीम कोर्ट का दायित्व और कर्तव्य है।

संविधान का अनुच्छेद 13 इसे स्पष्ट तौर पर कहता भी है। यह तथ्य सदैव ध्यान में रखा जाना चाहिए कि, हमारा संविधान, लोक कल्याणकारी राज्य की बात करता है और मौलिक अधिकारों को प्रमुखता से परिभाषित भी करता है, संविधान की इस भावना को बनाए रखना हम सबका दायित्व और कर्तव्य दोनों है। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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