Friday, August 19, 2022

किसान आंदोलन : सरकार और सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी का क्या मतलब?

ज़रूर पढ़े

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में जारी किसानों के आंदोलन को छह महीने पूरे हो चुके हैं। यह आंदोलन न सिर्फ मोदी सरकार के कार्यकाल का बल्कि आजाद भारत का ऐसा सबसे बड़ा आंदोलन है जो इतने लंबे समय से जारी है। देश के कई राज्यों के किसान तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर सर्दी, गरमी और बरसात झेलते हुए छह महीने से दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे हैं।

इस दौरान आंदोलन में कई उतार-चढ़ाव आए। आंदोलन के रूप और तेवर में भी बदलाव आते गए लेकिन यह आंदोलन आज भी जारी है। हालांकि कोरोना वायरस के संक्रमण, गरमी की मार और खेती संबंधी जरूरी कामों में छोटे किसानों की व्यस्तता ने आंदोलन की धार को थोड़ा कमजोर किया है, लेकिन इस सबके बावजूद किसानों का हौसला अभी टूटा नहीं है।

आंदोलनकारी किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चा ने आंदोलन के छह महीने पूरे होने के मौके पर आज 26 मई को काला दिवस के रूप में मनाया है। इस मौके पर देश के अन्य हिस्सों में किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया है। देश के 12 प्रमुख विपक्षी दलों ने भी किसानों के काला दिवस मनाने के आह्वान को अपना समर्थन दिया है। संयुक्त किसान मोर्चा के अपील पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं पर आ जुटे हैं। जाहिर है कि किसान संगठन इस अवसर का इस्तेमाल करते हुए मंद पड़ते अपने आंदोलन को फिर से तेज करने के मूड में हैं।

तो क्या यह माना जाए कि कोरोना की विनाशकारी और दर्दनाक दूसरी लहर के बीच ही किसान आंदोलन की दूसरी लहर शुरू होने वाली है?

कोरोना की महामारी ने देशवासियों को कैसी भयावह स्थिति में डाला, यह हम सभी देख रहे हैं। बड़े शहरों में हालात थोड़े सुधरते दिख रहे हैं लेकिन गांवों में कोरोना के फैलते संक्रमण में कोई कमी नहीं आई है। ऐसे में देश के विभिन्न हिस्सों से आए किसानों के जत्थों का राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर जुटना या देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन करना बेहद खतरनाक हो सकता है।

गौरतलब है कि कोरोना की दूसरी लहर ने जो भयावह शक्ल अख्तियार की है, उसमें बड़ी भूमिका पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान हुई बड़ी-बड़ी रैलियों और रोड शो तथा उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनावों की भी रही है। जो कसर बाकी रह गई थी वह हरिद्वार में कुंभ के नाम पर करीब एक महीने तक लगातार जुटती रही लाखों लोगों की भीड़ ने पूरी कर दी। कहने की आवश्यकता नहीं कि चुनावी रैलियों के लिए जहां सरकार के इशारे पर काम करने वाला चुनाव आयोग और राजनीतिक दल जिम्मेदार रहे तो कुंभ में जुटी भीड़ के स्पष्ट तौर पर केंद्र और उत्तराखंड सरकार। अब ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर किसान आंदोलन फिर जोर पकड़ता है तो क्या होगा!

सवाल है कि केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों ही किसान आंदोलन के मामले में किस बात का इंतजार कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने आंदोलनकारी किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ आखिरी बार 22 जनवरी को बातचीत की थी। उसके बाद से बातचीत का सिलसिला पूरी तरह बंद है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर एक से ज्यादा बार कह चुके हैं कि सरकार किसानों के साथ खुले मन से बातचीत करने के लिए तैयार है पर बातचीत के लिए कृषि मंत्रालय की ओर से कोई पहल नहीं हुई है।

हैरानी की बात है कि जिस सुप्रीम कोर्ट ने उस समय कोरोना महामारी का हवाला देते हुए इस मसले पर आश्चर्यजनक सक्रियता दिखाई थी, वह भी अब इस मसले को लेकर पूरी तरह उदासीन बन कर फिलहाल गरमी की छुट्टियों पर है। जनवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश के जरिए केंद्र के बनाए तीनों कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाई थी और तीन सदस्यों की एक कमेटी बना कर इस मामले में सलाह-मशविरे की प्रक्रिया शुरू कराई थी। हालांकि आंदोलनकारी किसानों ने अपने को इस प्रक्रिया दूर रखा था, फिर भी देश के दूसरे कुछ किसान संगठनों और कृषि मामलों के जानकारों ने अपनी राय सुप्रीम कोर्ट की कमेटी को दी है। कमेटी भी अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप चुकी है।

अब स्थिति यह है कि न तो सुप्रीम कोर्ट उस रिपोर्ट के आधार कोई सुनवाई नहीं कर रहा है और न ही केंद्र सरकार तीनों कानूनों पर लगी रोक हटवाने के लिए प्रयास करती दिख रही है। सवाल है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट और सरकार दोनों किस बात का इंतजार कर रहे हैं? यह सही है कि धरने की जगहों पर पिछले दिनों किसानों की संख्या कम हो गई थी, मगर सवाल है क्या सरकार और अदालत का फैसला लोगों की भीड़ पर निर्भर करता है?

सरकार और उसके समर्थक आर्थिक विशेषज्ञों का कहना रहा है कि अगर इन कानूनों पर अमल नहीं हुआ तो 2022 तक किसानों की आय दोगुनी का करने लक्ष्य पूरा नहीं हो सकेगा। अगर सरकार अपने तय किए गए इस लक्ष्य के प्रति वाकई गंभीर है तो उसे अदालत में जाकर अपील करनी चाहिए कि इन कानूनों के अमल पर लगाई गई रोक हटाई जाए। लेकिन सरकार न रोक हटवाने जा रही है और न किसानों का आंदोलन खत्म कराने की दिशा में कोई पहल करती नजर आ रही है।

अगर केंद्र सरकार कोई फैसला नहीं करती है तो उसका कारण तो समझ में आता है। उसका राजनीतिक मकसद है और जिस कारोबारी मकसद के लिए उसने ये कानून बनाए हैं, उसे भी पूरा करना है। कुछ चुनिंदा कारोबारियों के हितों के आगे किसानों के हित उसके लिए ज्यादा मायने नहीं रखते। वैसे किसान आंदोलन के प्रति सरकार के बेपरवाह होने की एक अहम वजह पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली हार भी है। इस चुनाव में किसान संगठनों के नेताओं ने भी बंगाल जाकर वहां सभाएं की थी और लोगों से भाजपा को हराने की अपील की थी। किसान नेताओं ने कहा था कि भाजपा बंगाल में हारेगी तभी वह दिल्ली में किसानों की बात सुनेगी

तब ऐसा माना भी जा रहा था कि अगर बंगाल सहित पांचों राज्यों के चुनाव नतीजे भाजपा के अनुकूल नहीं आए तो सरकार को किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ेगा। पांचों राज्यों खासकर पश्चिम बंगाल में तो प्रधानमंत्री ने स्पष्ट तौर पर अपनी प्रतिष्ठा ही दांव पर लगा दी थी। इसके बावजूद नतीजे भाजपा की उम्मीदों के मुताबिक आए भी नहीं है, लेकिन सरकार जरा भी झुकती नहीं दिख रही है।

जाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा किसान नेताओं के बंगाल जाकर भाजपा को हराने की अपील करने को लेकर नाराज है। उन्होंने इस प्रचार को भी अपने लिए एक चुनौती के रूप में लिया है कि बंगाल मे भाजपा हारेगी तो ही किसानों की बात दिल्ली में सुनी जाएगी। ऐसा लग रहा है कि अब सरकार ने जिद ठान ली है कि हम हार गए तब भी किसानों की बात नहीं सुनेंगे। यही वजह है कि सरकार और किसानों के बीच गतिरोध खत्म नहीं हो रहा है।
इस प्रकार एक तरफ सरकार किसानों के प्रति दुश्मनी का भाव रखते हुए चुपचाप बैठी है तो दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी बनाई कमेटी की रिपोर्ट आ जाने के बाद भी कोई पहल नहीं दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट की यह चुप्पी हैरान करने वाली है। सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने भी ऐसी क्या मजबूरी है, जो वह रिपोर्ट पर सुनवाई कर मामले का निबटारा नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट जब तक कोई फैसला नहीं करता तब तक यथास्थिति बनी रहेगी। अदालत ने कानूनों के अमल पर रोक लगाई है और किसान आंदोलन पर बैठे है। उन्हें और उनकी खेती को तीनों कानूनों से नुकसान होने का मुद्दा तो अपनी जगह है ही, कोरोना के बढते संक्रमण की वजह से उनकी सेहत और जान खतरे में है।

विपक्षी दलों के नेताओं ने ही नहीं, भाजपा के अपने सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी कहा है कि सरकार किसानों से बात करे और आंदोलन खत्म कराए। उन्होंने तो अपनी पार्टी की सरकार को यह भी बताया है कि कैसे आंदोलन खत्म कराया जा सकता है। स्वामी ने कहा कि सरकार किसानों से वादा करे कि जो भी राज्य इस कानून को लागू नहीं करना चाहते हैं, वे इसे लागू नहीं करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं दिख रहा है। इसके उलट वह तो मामले को और ज्यादा उलझाने और किसानों को चिढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। इस सिलसिले में उसने पंजाब और हरियाणा में किसानों को सीधा भुगतान शुरू कर दिया है, जिससे नाराजगी ही बढ़ रही है। जाहिर है कि सरकार का इरादा मामले का निबटारा कर आंदोलन खत्म कराने का नहीं बल्कि किसानों से टकराव बढ़ाने का है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

ताज़ियादारी में विवाद और मुस्लिम समाज के ख़तरे

अभी हाल में मुहर्रम बीत गया, कुछ घटनाओं को छोड़कर पूरे मुल्क से मुहर्रम ठीक ठाक मनाए जाने की...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This