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Categories: बीच बहस

जानिए उस कवि को, जिससे डरती है सत्ता!

कौन हैं वरवर राव?

वारंगल के एक गांव में तेलुगू ब्राम्हण मध्यवर्गीय परिवार में उनका जन्म हुआ। साहित्य यात्रा कम उम्र में ही शुरू हो गयी थी। उन्होंने 17 साल की उम्र में ही कविता लिखना शुरू कर दिया था।

हैदराबाद में उस्मानिया विश्वविद्यालय से साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद वह तेलंगाना के एक प्राइवेट काॅलेज में पढ़ाने गये और इसके बाद महबूबनगर के एक प्राइवेट स्कूल में चले गये। इसी दौरान उन्होंने थोड़े समय के लिए राजधानी में सूचना और प्रसारण मंत्रालय में प्रकाशन विभाग में सहायक के बतौर भी काम किया। राव पर मार्क्सवादी दर्शन का गहरा असर पड़ा था। उनकी कविता और लेखन में जन पक्षधर भावना और नवउदारवाद का विरोध दिखने लगा था।

वरवर राव की राजनीति

1967 में बंगाल में हुए नक्सलबाड़ी विद्रोह का राव पर गहरा असर पड़ा। साठ के अंतिम और सत्तर के शुरूआती दिन आंध्र प्रदेश में भी काफी उथल-पुथल के थे। श्रीकाकुलम सशस्त्र किसान संघर्ष (1960-70) जो कहीं अधिक समान जमीन हक के लिए था, के साथ-साथ 1969 का तेलंगाना राज्य का आंदोलन भी आ जुड़ा। यह वह समय था जब तेलंगाना साहित्य समूह गहरे विभाजन के दौर में था।

पुराने दौर के लेखकों और कवियों का समूह अभ्युदय रचियतालु संघम (अरासम) के इन राजनीतिक उथल-पुथल में हिस्सेदारी की कमी से राव जैसे युवा कवियों ने आलोचनात्मक रुख अपनाया। 1969 में वारंगल में तिरुगुबातु कवुलु (विद्रोही कवियों का संघ) बना जिसकी स्थापना में राव ने निर्णायक भूमिका अदा किया। बाद में, 1970 में विप्लव रचियतातु संघम् (क्रांतिकारी लेखक संघ) जिसे आमतौर पर विरसम के नाम से जाना जाता है, के निर्माण में उपरोक्त संगठन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

इस संगठन ने विविध और राजनीति पर खुलकर बोलने वाले संगठन से जुड़े लेखकों को प्रकाशित करने का लक्ष्य रखा। बाद के दिनों में इस धारा में सी. कुटुम्ब राव और रावि शास्त्री जैसे कवि जुड़े। विरसम के पहले अध्यक्ष तेलुगू के माननीय कवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव थे जिन्हें लोग श्रीश्री के नाम से जानते हैं। ये दोनों ही संगठन खुलकर व्यवस्था-विरोधी थे। और यही था जिससे सत्तारुढ़ लोगों के साथ राव के संबंधों में आमूल बदलाव ला देने वाला बन गया।

विरसम का अगुवा बनकर राव पूरे आंध्र प्रदेश की यात्रा किये। वह किसानों से मिले और उनके साथ उनके अधिकारों को लेकर बात किया। इस पूरी अवधि में राव लगातार लिखते रहे। वह स्थापित क्रांतिकारी कवि और साहित्य आलोचक बनकर उभरे। विरसम के एक दशक बीतते बीतते कई संकलन प्रकाशित हुए (इस में राव की रचना भविष्यथु चित्रपटम भी था) और कई समयावधि तक प्रतिबंधित रहे और यह आरोप लगाया गया कि इन रचनाओं में माओवादी उद्देश्यों के प्रति सहानुभूति समाहित है।

राव पहली बार 1973 में गिरफ्तार हुए। आंध्र प्रदेश सरकार ने उन पर लेखन के द्वारा हिंसा भड़काने का आरोप लगाकर आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (मीसा) के तहत गिरफ्तार किया गया। 1975 में आपातकाल के दौरान भी इसी मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया। 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनने और इंदिरा गांधी की हार के बाद वह रिहा कर दिये गये। लेकिन उन्हें लगातार राजनीतिक नजर में रखा गया और बहुत सारे केस में कथित भागीदारी के आरोप में लगातार गिरफ्तार किया गया।

इसी में एक सिकंदराबाद षड्यंत्र केस भी है जिसमें लगभग 50 लोगों पर आंध्र प्रदेश सरकार उखाड़ फेंकने का आरोप था। यह 1985 की बात है। इसके अगले साल ही रामनगर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आरोप था कि वह आंध्र प्रदेश के पुलिस कांस्टेबल सम्बईयाह और इंस्पेक्टर यादागिरी रेड्डी को मार डालने की योजना में हुई मीटिंग में शामिल थे। इस केस में वह 17 साल बाद 2003 में बरी कर दिये गये।

2005 में पीपुल्स वाॅर ग्रुप की ओर से राज्य और माओवादी संगठन के बीच शांति स्थापना में प्रतिनिधि की तरह काम किया। इस वार्ता के टूट जाने से राव को एक बार फिर जनसुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और विरसम को भी कुछ महीनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया।

वरवर राव की साहित्यिक गतिविधि

वरवर राव का 15 से अधिक साहित्य संकलन आ चुका है जिसका अनुवाद भारत की विभिन्न भाषाओं में हो चुका है। शुरूआती 40 साल के लंबे अध्यापन कार्य के दौरान ही उन्होंने तेलुगू साहित्यिक पत्रिका सृजना को 1966 में स्थापित किया। शुरू में यह त्रैमासिक था लेकिन सृजना की लोकप्रियता ने राव को इसे मासिक बना देने के लिए प्रेरित किया। यह पत्रिका 1966 से लेकर 1990 के शुरूआती सालों तक निकलती रही और समसामयिक क्षेत्र के कवियों को प्रकाशित किया। 1983 में तेलंगाना मुक्ति संघर्ष और साथ ही तेलुगू उपन्यास- समाज और साहित्य के अंतर्संबंधों का अध्ययन पुस्तक का प्रकाशन हुआ। आलोचनात्मक अध्ययन में ये प्रकाशन मील का पत्थर साबित हुआ।

अपनी कैद के दौरान उन्होंने जेल डायरी ‘सहचरालु’ (1990) लिखा जो 2010 में अंग्रेजी में ‘कैप्टिव इमैजिनेशन’ के नाम से छपी। उन्होंने कीनिया के महान साहित्यकार न्गुगी वा थियांगो जो कई मायनों में उन्हीं जैसे दौरों से गुजरते रहे हैं, की जेल डायरी डीटैन्ड(1981) और उनके उपन्यास डेविल ऑन द क्राॅस(1980) का तेलुगू में अनुवाद किया।

वरवर राव की हाल में हुई गिरफ्तारी और एलगार परिषद केस

अगस्त, 2018 में राव की हैदराबाद के आवास से गिरफ्तारी हुई। 1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगांव हिंसा में कथित भागीदारी के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया। पुणे में एक एफआईआर दर्ज हुई जिसमें आरोप लगाया गया कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर एलगार परिषद की ओर से शाम को एक कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें प्रख्यात वामपंथी कार्यकर्ता और भूमिगत नक्सलाइट ग्रुपों ने हिस्सेदारी किया। पुलिस का दावा है कि 31 दिसम्बर, 2017 की शाम को भाषण दिये गये। ये अगले दिन भड़कने वाली हिंसा में कुछ हद तक जिम्मेदार थे।

एलगार परिषद केस में यूएपीए के तहत जो कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए हैं उनमें प्रमुख रूप से रोना विल्सन, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे शामिल हैं। पिछले 22 महीनों में तबियत के लगातार बिगड़ते जाने के आधार पर कोर्ट में दायर की गयी राव की जमानत अर्जी लगातार खारिज होती आ रही है।

नोटः यहां कुछ नाम लेखक से छूट गया है- महेश राउत, सुरेंद्र गडलिंग, सुधीर ढवाले।-

(इंडियन एक्सप्रेस में 19 जुलाई को प्रकाशित परोमिता चक्रवर्ती के इस अग्रेंजी लेख का अनुवाद अंजनी कुमार ने किया है।)

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This post was last modified on July 20, 2020 1:47 pm

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