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सांसद रंजन गोगोई और न्यायपालिका को शिकंजे में लेती कार्यपालिका

रंजन गोगोईं ने 18 मार्च को राज्यसभा की सदस्यता की शपथ ले ली। यह शपथ उन्हें राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने दिलाई। शपथ ग्रहण समारोह में भी हंगामा हुआ और शेम-शेम के नारे लगे। राज्यसभा में अपने मनोनयन पर रंजन गोगोई ने जो कहा था, उसे यहां पढ़ें….

“मैंने राज्यसभा की नामजदगी का प्रस्ताव इसलिए स्वीकार किया कि मैं दृढ़ निष्ठा से यह सोचता हूं कि विधायिका और न्यायपालिका को कुछ अवसरों पर राष्ट्र निर्माण के लिए मिल कर काम करना चाहिए। राज्यसभा में मेरी उपस्थिति से विधायिका के समक्ष न्यायपालिका की समस्याओं को उठाने में सुविधा होगी।”

रंजन गोगोई ने अपनी यह बात असमिया न्यूज़ एजेंसी प्रतिदिन टाइम्स को कही थी। उनके जीवन का एक अध्याय खत्म हुआ। वे न्यायपालिका के प्रमुख पद से उतर कर विधायिका के एक सदस्य बन गए। अब देखना यह है कि उनकी उपस्थिति से न्यायपालिका कितनी समृद्धि होती है।

उल्लेखनीय है कि वह निर्वाचित नहीं, बल्कि नामजद सांसद हैं। उन्हें सदन में अपनी बात कहने का अवसर तो मिलेगा पर वे सदन में मतदान नहीं कर पाएंगे, क्योंकि वे राज्यसभा में उस कोटे से हैं, जिसमें समाज के गैर राजनीतिक पेशेवर लोग लिए जाते हैं। यह नामांकन शुद्ध रूप से राज कृपा पर आधारित होता है। राजा की मर्ज़ी से मिलता है।

यह सवाल कि क्या रंजन गोगोई का राज्यसभा मे नामांकन संविधान के प्राविधानों के अनुरूप है या नहीं? अगर एक शब्द में इसका उत्तर देना हो तो उतर होगा ‘है’, लेकिन कानून की शंकाओं का उत्तर एक शब्द में नहीं जा सकता है और न दिया जाता है, क्योंकि अनेक प्रतिप्रश्न आगे उठते हैं। एक लंबा सिलसिला चलता है जो सवाल के कई पहलुओं को हल करते हुए जिज्ञासा का शमन करता है।

संविधान के अनुच्छेद 80 के अधीन राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकता है। जब संविधान में राष्ट्रपति की शक्तियों की बात की जाए तो इसे मंत्रिमंडल की शक्तियां समझी जानी चाहिए, क्योंकि मंत्रिमंडल की ही सलाह पर राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का उपयोग करता है।

आर्टिकल 80 के प्रावधान की उपधारा 3 के अंतर्गत, 12 लोगों को राष्ट्रपति राज्यसभा के लिए मनोनयन कर सकते हैं, लेकिन जिनको वे मनोनीत कर सकते हैं वे, साहित्य, विज्ञान, आर्ट, और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में विशेष जानकारी अथवा व्यवहारिक अनुभव रखने वाले अपने-अपने क्षेत्र के विशिष्ट महानुभाव हों।

अब न्यायाधीश इस श्रेणी में आते हैं या नहीं यह भी एक मतवैभिन्यता का मामला हो सकता है। संविधान निर्माताओं का इरादा, उपरोक्त श्रेणी के लोगों को मनोनीत करने के पीछे यह था कि, यह सब लोग, अपने-अपने क्षेत्र के नामचीन और अत्यंत प्रतिभावान लोग होते हैं और वे सक्रिय राजनीति से दूर रहते हैं, अतः उच्च सदन में उन्हें लाकर उनकी मेधा और प्रतिभा का उपयोग किया जा सके।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के अंतर्गत राज्य सभा की संरचना की गई है। इसका विवरण इस तरह है…
(1) राज्य सभा– (क) राष्ट्रपति द्वारा खंड (3) के उपबंधों के अनुसार नामनिर्देशित किए जाने वाले बारह सदस्यों, और

(ख) राज्यों के और संघ राज्यक्षेत्रों के दो सौ अड़तीस से अनधिक प्रतिनिधियों, से मिलकर बनेगी।
(2) राज्यसभा में राज्यों के और संघ राज्यक्षेत्रों के तिनिधियों द्वारा भरे जाने वाले स्थानों का आवंटन चौथी अनुसूची में इस निमित्त अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार होगा।
(3) राष्ट्रपति द्वारा खंड (1) के उपखंड (क) के अधीन नाम निर्देशित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें निम्नलिखित विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है, अर्थात्‌:

साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा।
(4) राज्य सभा में प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों का निर्वाचन उस राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाएगा।
(5) राज्य सभा में संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि ऐसी रीति से चुने जाएंगे जो संसद‌ विधि द्वारा विहित करे।

उपरोक्त अनुच्छेद में उप अनुच्छेद 3 में यह स्पष्तः अंकित है कि, उनको मनोनीत किया जाएगा, जो साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र के लोग हैं। इस प्राविधान के अंतर्गत इन क्षेत्रों के नामचीन लोगों को नामांकित किया गया है। कुछ महत्वपूर्ण नामांकित सज्जन यह हैं…
● डॉ. ज़ाकिर हुसैन, शिक्षाशास्त्री
● अल्लादि कृष्णास्वामी, न्यायविद्
● प्रो. सत्येंद्र नाथ बोस, वैज्ञानिक
● श्रीमती रुक्मिणी देवी अरुंडले, कला
● प्रो. एनआर मलकानी, शिक्षाशास्त्री,

और समाज सेवा…
● डॉ. कालिदास नाग, इतिहासकार
● डॉ. जेएम कुमारप्पा, स्कॉलर
● ककासाहब कालेलकर, स्कॉलर
● मैथिलीशरण गुप्त, साहित्य
● डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी, इतिहासकार
● मेजर जनरल साहिब सिंह सोखे, चिकित्सा वैज्ञानिक
● पृथ्वीराज कपूर, फ़िल्म अभिनेता, कला
● बनारसी दास चतुर्वेदी, साहित्य
● रामधारी सिंह दिनकर, साहित्य
● बीआर अम्बेडकर, कानूनविद्
● आचार्य नरेन्द्र देव, शिक्षा शास्त्री
● आर आर दिवाकर
● डॉ. रघुवीर
● डॉ. पट्टाभिसीतारमैया
● डॉ. कालू लाल श्रीमाली
● इंदिरा विद्यावाचस्पति
यह पूरी सूची नहीं है। आप इसे और समृद्ध कर सकते हैं।

सत्ता सदैव अपने हित, स्वार्थ और लाभ का मार्ग ढूंढ निकालती है। कानून कितना भी अच्छा और त्रुटिरहित हो, पर अगर उसे अपने हित के लिए तोड़ा-मरोड़ा जाएगा तो न केवल परंपराएं टूटेंगी बल्कि गलत परंपरा भी बनेगी। अनुच्छेद 80 (3) के उल्लंघन का सबसे पहला और दिलचस्प मामला है असम के सांसद और राज्यसभा के सदस्य बहरुल इस्लाम का।

राजनीति और न्यायपालिका में घालमेल के लिए असम के न्यायमूर्ति बहरूल इस्लाम को हमेशा याद किया जाता है। बहरूल इस्लाम, भारत के इतिहास में पहले राजनीतिक व्यक्ति थे जो संसद की सदस्यता से त्याग पत्र देकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने, फिर वह उच्चतम न्यायालय के भी न्यायाधीश बने और सेवानिवृत्त होने से करीब डेढ़ महीने पहले ही उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था।

वे 1962 में राज्यसभा में कांग्रेस के सदस्य बने और अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान ही, त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद, उन्हें 1972 में असम और नगालैंड उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया। जुलाई, 1979 में वह, गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी बने। इसके बाद चार दिसंबर, 1980 को उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया था, लेकिन यहां भी कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्होंने जनवरी, 1983 में त्यागपत्र दे दिया था। फिर उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा।

इसी प्रकार जस्टिस गुमानमल लोढा, राजस्थान उच्च न्यायालय में 1978 में न्यायाधीश नियुक्त होने से पहले वह 1972 से 1977 तक राजस्थान विधान सभा के सदस्य रह चुके थे। गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त होने के बाद जस्टिस गुमान मल लोढ़ा सक्रिय राजनीति में फिर आ गए, तीन बार लोकसभा के सदस्य रहे। वह 1989 में पहली बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे।

न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देकर राजनीति में आने वालों में विजय बहुगुणा को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। विजय बहुगुणा पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों में ही रह चुके हैं। वे यूपी के मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा के पुत्र हैं। विजय बहुगुणा पहले उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त हुए और फिर वह बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने, लेकिन अचानक ही उन्होंने 15 फरवरी, 1995 को न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे दिया।

न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देने के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए और 2007 से 2012 तक लोकसभा में कांग्रेस के सदस्य बने और फिर 13 मार्च 2012 से 31 जनवरी 2014 तक वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने थे।

सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को राज्यपाल बनाने की परंपरा भी 1997 में शुरू हुई। उच्चतम न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त करने वाली न्यायमूर्ति एम फातिमा बीवी को सेवानिवृत्ति के बाद 25 जनवरी, 1997 को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया था। न्यायमूर्ति फातिमा बीवी ने राज्यपाल के रूप में राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों की मौत की सजा के मामले में दायर दया याचिकाएं खारिज की थीं।

एनडीए सरकार तो अपनी पूर्ववर्ती सरकार से भी एक कदम आगे निकल गई और उसने देश के प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम को अप्रैल, 2014 में सेवानिवृत्ति के बाद सितंबर, 2014 में केरल का राज्यपाल बना दिया। ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी पूर्व प्रधान न्यायाधीश को किसी राज्य का राज्यपाल बनाया गया हो।

रंजन गोगोई साहब की विधिक योग्यता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता और अगर कल किसी राजनीतिक दल के द्वारा वे भारत के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी बनाए जाएं तो भी विधिक रूप से यह गलत नहीं होगा मगर राज्यसभा में उन को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत करना आर्टिकल 80 के प्रावधानों के विपरीत लग रहा है।

हालांकि यह उल्लंघन पहली बार नहीं है। इसके पूर्व कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर राज्यसभा पहुंचने वाले पूर्व सीजेआई, रंगनाथ मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के 21वें चीफ जस्टिस थे जो 1998 से 2004 तक राज्यसभा सांसद रहे, लेकिन, रंजन गोगोई की तरह रंगनाथ मिश्रा को राष्ट्रपति ने नामित नहीं किया था।

उन्हें सीधे तौर पर कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ा कर, राज्यसभा भेजा था। जस्टिस मिश्रा 1983 में सुप्रीम कोर्ट जज बने। फिर 1990 में चीफ जस्टिस बने। फिर 1991 में रिटायरमेंट के सात साल बाद उन्होंने कांग्रेस जॉइन कर ली थी।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर जजों को सरकार या विधायिका में पुनर्नियुक्ति दी जाए या नहीं इस पर जस्टिस रंजन गोगोईं ने जो कहा था, उसे भी पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा था “यह एक मज़बूत धारणा है कि अवकाशग्रहण के बाद जजों की कहीं अन्यत्र नियुक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक धब्बा है।”

उनका यह कथन आज से डेढ़ साल पहले जब वे न्यायाधिकरण के अध्यक्षों के एक सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे तब का है। अब यह संयोग है या प्रयोग, कि जिस जज ने कभी जजों के पोस्ट रिटायरमेंट नियुक्तियों को, एक धब्बा कहा था, अब वही एक धब्बा के रूप में मूर्तिमान हो गए हैं। कुछ चीज़ें संविधानसम्मत और कानूनन सही होते हुए भी स्थापित नैतिक संस्थागत मानदंडों के विपरीत होती हैं।

इसी क्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने जो कहा वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। 2013 में जजों की पुनर्नियुक्ति के संबंध में बोलते हुए उन्होंने कहा था,

“दो तरह के जज होते हैं। एक जो क़ानून जानते हैं और दूसरे जो क़ानून मंत्री को जानते हैं। जज रिटायर नहीं होना चाहते हैं। रिटायर होने से पहले दिए फ़ैसले रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले काम से प्रभावित होते हैं।”

इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के अनेक भूतपूर्व जजों ने उनके नामज़दगी की आलोचना की है। कुछ की प्रतिक्रियाएं मैं नीचे दे दे रहा हूं।

12 जनवरी 2018 को जस्टिस चेलमेश्वर के साथ जब रंजन गोगोई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तो उनके साथ जस्टिस कुरियन जोसेफ भी थे। वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में न्यायपालिका पर सरकार के बढ़ते दबाव के संदर्भ में हुई थी। जज साहबान का वह जनता से संवाद था और लोगों को अपनी व्यथा बताने के लिए आयोजित की गई थी।

रंजन गोगोई की राजसभा में नामजदगी पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन बी लोकुर, जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने क्रमशः इंडियन एक्सप्रेस और हस्तक्षेप में लेख-लिख कर सरकार के इस कदम की निंदा की।

जस्टिस कुरियन का कहना है, “जब 12 जनवरी 2018 को हम चार जज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे तो उस समय रंजन गोगोई ने कहा था कि हमने देश के प्रति अपने ऋण को उतारा है। मुझे हैरानी है कि जस्टिस गोगोई जिन्होंने एक समय न्यायपालिका की स्वतंत्रता के संकल्प के लिए अपने साहस का प्रदर्शन किया था, आज कैसे उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ, ऐसा समझौता कर लिया।”

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा, “पूर्व सीजेआई गोगोई ने ‘ज्यूडीश्यरी की आजादी, निष्पक्षता के सिद्धांतों से समझौता किया।”

जस्टिस जोसेफ ने कहा, “इस घड़ी में लोगों के विश्वास को झटका लगा है। इस पल में ऐसा समझा जा रहा है कि जजों में एक धड़ा किसी के प्रति झुका है या फिर आगे बढ़ना चाह रहा है।”

सबसे तीखी प्रतिक्रिया, जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की रही। उन्होंने कहा,

“मैं 20 वर्ष अधिवक्ता और 20 वर्ष जज रहा। मैं कई अच्छे जजों और कई बुरे जजों को जानता हूं, लेकिन मैंने कभी भी भारतीय न्यायपालिका में किसी भी जज को इस यौन विकृत रंजन गोगोई जैसा बेशर्म और लज्जास्पद नहीं पाया। शायद ही कोई ऐसा दुर्गुण है जो इस आदमी में नहीं था। और अब यह दुर्जन और धूर्त व्यक्ति भारतीय संसद की शोभा बढ़ाने वाला है। हरिओम।”

यह बात सही है कि कांग्रेस पार्टी के समय में भी न्यायपालिका को शिकंजे में लेने की कोशिश की गई थी। वह इंदिरा गांधी के समय की बात है। तब कोलेजियम सिस्टम नहीं था और सरकार जिसे चाहती थी जज बना देती थी। अधिकतर जज वकालत की पृष्ठभूमि से आते हैं तो वे राजनीतिक विचारधारा और दल से अप्रभावित रहें यह संभव भी नहीं है।

राजनीति में सरकार द्वारा की जा रही हर गलत परंपरा का विरोध होना चाहिए। कांग्रेस ने तो प्रतिबद्ध न्यायपालिका की भी बात की थी। मई 1973 को केंद्रीय मंत्री एस मोहन कुमारमंगलम का संसद में दिया गया बयान देखें। उन्होंने कहा था, “निश्चित तौर पर, सरकार के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम इस दर्शन को अपनाएं कि क्या अगला व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व करने लायक है या नहीं।”

बाद में, तीन जजों की वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ कर इंदिरा सरकार ने जस्टिस एएन रे को मुख्य न्यायाधीश बना दिया। जस्टिस एचआर खन्ना की बारी चीफ़ जस्टिस बनने की आई तो उनकी जगह इंदिरा सरकार ने एमएच बेग को सीजेआई बना दिया। इसी पर जस्टिस एचआर खन्ना ने त्यागपत्र दे दिया था।

संविधान ने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच जिस रिश्ते की अवधारणा की है वह चेक और बैलेंस पर आधारित है। एक्जीक्यूटिव जब मज़बूत होती है और स्वेच्छाचारिता की ओर बढ़ने लगती है तो विधायिका को अपने शिकंजे में कर ही लेती है फिर वह न्यायपालिका की ओर बढ़ती है और इसी प्रकार के निजी उपकारों द्वारा न्यायपालिका में सेंध भी लगाती है।

रंजन गोगोई का नामांकन संविधान के उद्देश्य और भावना के विपरीत है। कांग्रेस के समय के गलत और संविधान की भावना के विपरीत किए गए निर्णय के आधार पर आज जो उस तरह के निर्णय किए जा रहे हैं उनको औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता है।

जस्टिस गोगोइ के फैसलों, उनके खिलाफ उठे और फिर दब गए यौन उत्पीड़न के मामले भी चर्चा की जद में आएंगे, क्योंकि वे संसद में हैं और वहां किसी न किसी प्रकरण पर ऐसे विवादित प्रकरण उठ सकते हैं। अब इस समय न्यायपालिका को यह गंभीरता से यह देखना होगा कि वह कैसे कार्यपालिका के इस अतिक्रमण को जो चेक और बैलेंस को दरकिनार कर के स्वेच्छाचारिता से किया जा रहा है, खुद को अप्रभावित रखती है।
(लेखक रिटायर आईपीएस हैं।)

This post was last modified on March 20, 2020 9:59 am

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