Sunday, May 22, 2022

अमरोहा से स्पेशल: महाराणा प्रताप की भव्य मूर्तियां लेकिन उनके वंशजों को दो वक्त की रोटी भी नहीं मयस्सर

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मूलकटा (अमरोहा)। वीर, मेरे बचपन का यार। मैं और वीर बचपन में प्राइमरी स्कूल में साथ-साथ पढ़ते थे। वीर बागड़ी लोहार जनजाति से ताल्लुक रखता था, पढ़ाई में ठीक-ठाक था। पश्चिम यूपी के अमरोहा में वीर का परिवार कब आकर बसा मुझे ठीक से याद नहीं लेकिन मैंने और मेरे परिजनों ने बचपन से इन लोगों को ब्लॉक गजरौला के आसपास के क्षेत्रों में देखा था। एक गांव से दूसरे गांव, एक शहर से दूसरे शहर पलायन करना् इनकी मजबूरी थी या व्यवहार मुझे नहीं पता। मैं और वीर चौथी कक्षा तक बलदाना के एक मोंटेसरी में साथ-साथ पढ़े। समय बदला लेकिन स्कूल में बुनियादी सुविधाओं का अभाव था जिसके कारण स्कूल बंद हो गया। मैं पास के ही एक अच्छे स्कूल में जाने लगा लेकिन वीर के घर वालों के पास पैसे नहीं थे इसलिए उसे मुबारकपुर के सरकारी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा। वीर मुझसे 5 साल बड़ा था, शाम को हम ढहर पर खेलने निकल जाते थे, वो मुझे आम खिलाता था और मैं उसे अमरूद।

आज खेत-खलिहानों पर जाना हुआ था कि अमरूद के पेड़ों को देखकर वीर की याद आयी। कुछ समय से अपने इलाके से बाहर रहा हूं इसलिए वीर अब कहां है इसका मुझे कुछ पता नहीं लेकिन उसके परिवार वालों को अपने क्षेत्र में देखता रहता हूं। उन्होंने बताया था, हम अब मूलकटा गांव में रहते हैं। मैं अगली सुबह उठा और बाइक लेकर निकल पड़ा अपने वीर की तलाश में। घर से 2 किमी दूर बलदाना गांव से निकलते ही मेरा‌ सामना खड्डों भरी सड़क से हुआ, बाइक पर लगने वाले खड्डों ने मेरी स्मृति को और ताजा कर दिया।

मैं चलता रहा और एक रेलवे पुल के नीचे पहुंच गया। इस पुल के नीचे पानी जमा था, कितना गहरा था मुझे क्या पता! जोखिम नहीं उठाना चाहता था। एक लड़की सामने से आ रही थी, लगा कि यहीं की रहने वाली है इसलिए मैंने उससे पूछा लिया “निकल तो जाऊंगा ना, डुबूगा तो नहीं!”

बस्ती के रास्ते में पड़ा रेलवे ओवरब्रिज जो इलाके की बदहाली बयां कर रहा है

मुस्कुराते हुए बोली इतना गहरा नहीं है, डूब भी गइले तो ठंड कोनी” हाहा! ये तो है। कुछ दूर चलकर मैं मूलकटा पहुंच ही गया। सरकारी स्कूल के पास इनकी झुग्गी-झोपड़ी गांव में घुसते ही दिखाई दे गयी। अच्छा तो झुग्गी-झोपड़ी डालकर ये लोग अब यहां रह रहे हैं। मैं इनके पास पहुंच गया और आवाज लगाई, वीर, वीर कहां है? एक युवक बाइक पर बैठा हुआ था, “बोला रे बताय दो कौण सा है वीर।”

वीर मुझे कहीं दिखाई नहीं दिया। वीर के परिवार वाले सब यहीं रहते हैं, लेकिन वीर क्यों नहीं दिख रहा? बचपन से युवा अवस्था तक आते-आते चेहरे में खासा बदलाव हो जाते हैं मुझमें में भी बदलाव हुए शायद इसलिए वीर के घर वालों ने मुझे पहचाना नहीं, थोड़ी देर देखते रहे लेकिन वीर के साथ किस्सों की शुरुआत करते ही मुझे पहचान गए। “चाय-वाय पिलवइते हैं बैइठो, अरी लइये री कुछ दुद हो तो राखा हुवा” अरे नहीं, नहीं! तुम ये सब रहने दो वीर नहीं दिख रहा। उन्होंने बताया, “वीर यहां नी रहैता ओ तो मुरादाबाद में रह रा, थाना मझोली थाणा चौकी म”। यह पूछने पर कि वीर कब से मुरादाबाद में रह रहा है। उन्होंने कहा कि “5-6 साल हो लिये ओ तो वां ही रहै, उसके बालक बच्चे भी वईं रैरे लौए का काम करै है, महीणे दो महीणे में आना हो”। इस दौरान मेरी वीर से फोन पर बात हुई।

वीर नौवीं कक्षा तक ही पढ़ पाया, वीर की शादी को 6 साल हो चुके हैं, दो बालक अरमान 5 साल, लड़की धन्नो 3 साल की है। वीर जहां रहता है वहां भी 9-10 झुग्गी हैं। इतने में पीछे से एक बच्ची बोली, दुद नाय छोटा पी गया, ना चीणी है ना पत्ती काय की चाय पिलावै भाई साहब नु। संजय के मन में भरी पीड़ा जुबान पर आ गयी, “भाई साहब क्या बताय तुम्हें तीन-तीन चार-चार दिन रोटी खाय हो जात हैं म्हारे पास फूटी कौड़ी भी नी है, भौत बुरा लग रिया के तुम्हें चाय भी ना पिलाय सके।” आस-पास की झुग्गी-झोपड़ी से लल्लू, अशोक, विकास, बिन्दिया, राजू, संजय, वीर, ललू, बिक्की, भोलू भी बाहर निकल आते हैं और अपनी दर्द भरी जिंदगी की राम कहानी सुनाने लगते हैं।

चारपाई पर बैठे भोलू और साथ में नीचे बैठे संजय

सौगंध से बंधे हैं महाराणा प्रताप के वंशज

कहा जाता है जब महाराणा प्रताप का अकबर के साथ युद्ध हुआ तो इनके पूर्वज महाराणा प्रताप की सेना में थे, लेकिन जब मेवाड़ पराजित हो मुगलों के हाथ चला गया तो अपमान की ज्वाला में जलते हुए उन्होंने प्रण किया, जब तक संपूर्ण मेवाड़ को मुगलों से वापस नहीं छुड़ा लेंगे तब तक अपने घर मेवाड़ नहीं लौटेंगे, रास्ते में पड़ी कोई वस्तु नहीं उठाएंगे।

मेहनत की कमाई से परिवार का पालन पोषण करेंगे,किसी का खेत नहीं काटेंगे, मिट्टी के बर्तनों में भोजन करेंगे, गाड़ी में खटिया उल्टी रखकर यात्रा करेंगे। रात को दीया जलाना भी महाराणा प्रताप के फालोवर अपनी सौगंध के विरुद्ध समझते हैं।

मेवाड़ और चित्तौड़ से जब से आए हैं गाड़ी इन लोगों का घर है। लोहे का काम करते हैं इसलिए इन्हें ‘गड़िया लोहार’ कहा जाता है। पश्चिम यूपी में बसे ये लोग अपने को बागड़ी लोहार कहते हैं।

प्रतिज्ञा तोड़ने का समय

ये लोग जीवन-भर अपने पूर्वज महाराणा प्रताप के वंशजों की प्रतिज्ञा निभाते हुए आ रहे हैं। इन्हें लगता है कि समय के साथ-साथ अब जरूरतें और प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं, सौगंध खाकर घर-बार संभालना मुश्किल काम है। इनका कहना है यह समय खुले में रहने का नहीं है, आखिर हमारी भी बेटियां हैं, हमारी भी इज्जत है। हम भी समाज में अन्य तबकों की तरह सम्मान से जीना चाहते हैं।

आवास दिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने किये थे प्रयास

इन लोगों का अतीत वास्तव में गौरवशाली है लेकिन वर्तमान परेशान करने वाला है। मैं जब झुग्गी झोपड़ी से बाहर की तरफ निकल कर आया तो मुझे 85 वर्षीय लल्लू जी खाट पर लेटे हुए दिखाई दिए।

लोहार बस्ती में घर के सामने एक बुजुर्ग जाड़े में धूप सेंकते हुए

लल्लू जी बताते हैं, महाराणा प्रताप के मेवाड़ और चितौड़ हारने के बाद सौगंध से बंधे हमारे पूर्वज दिल्ली आ गये थे। दिल्ली में दरियागंज, प्रताप बाग, पुरानी रोहतक रोड, शक्ति नगर, क्षेत्र में रहे। उन्होंने बताया कि “उस समय मद्दा जमाना था। पंडीजी जवाहर लाल नेहरू ने म्हारे पुरखों से उस समय कहया था, के जमीन चैये जमीन लो, बणे-बणाएं मकान चैये मकान लो अब दरियागंज में वो जमीन अरबों-खरबों की है। पंडीजी के अलावा किसी न म्हारी णा सुनी। लेकिन फिर भी हमै कलोनी नी मिली, जनकारी नी थी”।

85 वर्षीय लल्लू ने बताई कैसे पंडित नेहरू ने उन लोगों को रोकने की कोशिश की

अपने पूर्वजों की कहानी को आगे जारी रखते हुए उन्होंने बताया कि “घुमंतू जीवन था, 15-20 साल दिल्ली में रहे‌। फेर दिल्ली से गंगा नदी के तटीय इलाकों में आ गए। जद हम दिल्ली छोड़कर आ रे थे तो जवाहर लाल नेहरू ने हमसे कयी, के देखो तुम दिल्ली से जा तो रहे हो लेकिन कभी कांसी की थाली में मत खाना, कुएं पर मत चलना, सिर पर टोपी मत ओड़ना, उल्टी खाट करके मत चलना और चोरी मत करना। आज 60 साल हो लिये इस इलाके में कोई नु नी कह सकता है के किसी की सीख भी उठायी हो”।

सरकारी योजनाओं का नहीं मिला कोई लाभ

मैं जब वीर के साथ पढ़ता था तो ये लोग बलदाना गांव में रहते थे, लेकिन घुमंतू जीवन यहां भी था। बलदाना के बाद बांसली, मुबारकपुर, खेड़की, पचदेवला, आरगपुर के आस पास गांव में रहे और अब मूलकटा में 8-9 साल से रह रहे हैं। बागड़ी लोहार संजय बताते हैं, “हम जद से चित्तौड़ से निकले राणा प्रताप के वंश से हैं। हमें कोई जमीन मिली ना जायदाद, ना कोई कारोबार मिला। हम परदेसी आदमी हैं झुग्गी-झोपड़ी में रह रे हैं, हमै कोई सहारा देने वाला नहीं है। बारिश भी आती है, आंधी भी, तूफान भी हमारे बच्चे ऐसे ही रिलते रहते हैं मिट्टी में.. तीन-तीन चार-चार दिन तो रोटी खाय कू हो जां, हम पै खेती ना किसानी ना।”

नहीं नसीब हुआ जीवन में पक्का घर

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कोई भी सरकार का नुमाइंदा इनके पास नहीं आया। इन लोगों में से कुछ के राशनकार्ड बने हुए हैं। बताते हैं कि, 35 किलो राशन मिलै है जिसमें खाने वाले 20 जनै हैं, बालकों के सिवाय। मुश्किल से 8 दिन भी नहीं चलता। बिंदिया कहते हैं, “गजरौला में 35 साल से स्टेशन पर रहने वाले लोहारों को अब कलोनी मिल गी पर हम यहां 60 साल से बसे हुए हैं हमें कुछ नी मिला।”

आजीविका चलाने का संकट

ये लोग मूलतः लोहे का काम करते हैं लेकिन दूध पानी पत्ते के खर्च के लिए पशुपालन भी करते हैं। आजीविका चलाने के लिए चिमटा, हंसिया, खुरपी, कुल्हाड़ी, करछली, फावड़े, गंडासे, बनाते हैं और गांव-गांव में बेचने जाते हैं।

बस्ती के लोगों द्वारा बनाए जाने वाले औजार

इनके बनाए औजार शुद्ध लोहे के बने होते हैं। इनके औजारों में किसी तरह की मिलावट नहीं होती। इसलिए टिकाऊ होते हैं लेकिन पूंजीवाद के दौर में इनकी आजीविका संकट में पड़ गयी है‌। आज इन्हें बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों से बनने वाले आकर्षक लोहे के सामानों के सामने मात खानी पड़ रही है। हालांकि इनके बनाए हुए औजार फैक्ट्रियों के औजारों को पटखनी भी दे रहे हैं लेकिन विज्ञापन भरी दुनिया में इनकी पहुंच कहां हो पाती है!

संजय बताते हैं, “दिन भर यही सोचते रहते हैं कोई काम आ जाए, जिससे चाय-नाश्ते का इंतजाम हो जा पर कई दिनों से कोई काम ही ना आ रिया। कई दिनों से चाय भी ना मिली, गाय आधा लीटर दूध दे री है उसे हमारा छोटा पी जा है। हमें तो कोई गांव वाला पिला दे है तो पी लें… ढोर-डंगरो के लिए कुट्टी गांव वालों से मांगकर लाते हैं उसमें भी कुछ दे दे हैं कुछ मना कर दें हैं। म्हारे पास जमीन ना ज़ायदाद ना, कारोबार ना, धेल्ला नहीं है पास में…गरीब गुरबे हैं। चटनी से रोटी खाय लिये। पशु को मिल गयी तो गेर देंगे नहीं मिली तो कोई बात नहीं। शाम को रोटी बन जा तो ठीक है ना मिले तो ठीक है।”

बागड़ी लोहार अशोक, फिर से विचार करने का समय

खलिहानों में तब्दील हो गये रेलवे के क्वार्टर

बागड़ी लोहारों से मुलाकात करके मैं मूलकटा गांव से घर की तरफ लौट रहा था, बीच में एक स्टेशन पड़ता है, महेशरा। कुछ सालों पहले यहां भी बागड़ी लोहार रहा करते थे लेकिन आज वो यहां नहीं हैं। स्थानीय लोगों का कहना है वो अब कहीं और चले गए हैं। मैं स्टेशन पर पहुंचा लेकिन फाटक बंद मिला फिर पुल के नीचे से होकर गुजर रहा था कि मेरी निगाह रेलवे के क्वार्टरों पर पड़ी।

रेलवे क्वार्टर जिसमें दी जा सकती है बागड़ी समुदाय के लोगों को पनाह

रेलवे के 7-8 क्वार्टर हैं, बचपन से इन क्वार्टरों को आते-जाते देखता रहा हूं, लंबी-लंबी घास और धूल फांकने वाले अड़ाए के सिवा यहां कुछ नहीं मिलता, यहां 8 क्वार्टर हैं जिसमें से केवल एक क्वार्टर में कुछ कर्मचारी रहते हैं, बाकी की संदिग्धावस्था प्रागैतिहासिक काल के जैसी है। वहां एक रेलवे कर्मचारी मुंशीराम थे, मैंने उनसे पूछा कि ये सभी क्वार्टर खाली पड़े हैं क्यों ना इन्हें बागड़ी लोहारों को दे दिया जाए, तो बोले, “अरे नहीं साहब सारी जिम्मेदारी हमारी होती है आज यदि उसमें ये लोग रहने लगें और कल कोई दुर्घटना हो जाए तो सारी जिम्मेदारी हमारी ही होगी।”

बस्ती के बच्चों के साथ प्रत्यक्ष

आज वीर से तो मुलाकात नहीं हो पाई लेकिन उनके परिवार वालों के साथ कुछ समय बिताया, इस दौरान वीर के घर वालों ने अपने मन की अनंत पीड़ा निकालकर मेरे सामने रख दी, आज मुझे आभास हुआ जिस महाराणा प्रताप ने अपने स्वाभिमान के लिए मुगलों की स्वाधीनता स्वीकार नहीं की उनकी तो चौराहे पर बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं लग रही हैं लेकिन उनके सहयोगियों के वंशजों के सिर के लिए पक्की छत और पेट पालने के लिए अन्न तक मयस्सर नहीं है। शायद ‘राष्ट्रवाद’ का यही असली चरित्र है।

(अमरोहा के मूलकटा से स्वतंत्र पत्रकार प्रत्यक्ष मिश्रा की रिपोर्ट।)

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