Friday, August 19, 2022

दिहाड़ी मजदूरों की जिंदगी के खाते में जहालत, अपमान और पल-पल की मौत

Janchowkhttps://janchowk.com/
Janchowk Official Journalists in Delhi

ज़रूर पढ़े

जी हां, यह वर्तनी की गलती नहीं है, बल्कि यही आज की कड़वी सच्चाई है। हम अक्सर देश और राष्ट्र के निर्माताओं को चंद नायकों-महानायकों में खोजते और उनके नामों पर तो बहसें करते रहते हैं लेकिन हमारे देश के असली निर्माता मजदूरों को मजबूर कहने के लिए आज मजबूर होना पड़ रहा है।

पश्चिमी दिल्ली के रघुबीर नगर में सड़क के किनारे काम कर रहे, मायापुरी इंडस्ट्रियल एरिया में कांस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे और तिलक नगर लेबर चौक पर काम की तलाश में खड़े हुए मजदूरों के चेहरे अलग-अलग हैं, लेकिन उनकी जिंदगियों की दास्तानें, मर्म और व्यथाओं में बहुत ज्यादा अंतर नहीं हैं। आइये इस भीड़ में से कुछ चेहरों से रूबरू होते हैं।

बंटी राजपूत दिल्ली नगर निगम द्वारा संचालित ईदगाह रोड के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। वे छठवीं कक्षा में थे, जब पिता की आकस्मिक मौत के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़कर परिवार के लिए रोटी जुटाने की जद्दोजहद में लगना पड़ा। उन्होंने पेंट-पॉलिश का काम किया, ट्रकें चलाईं, एक मॉल में सामान की ढुलाई किया और फिर उसी मॉल में सेल्समैन का काम किये। लेकिन पिछले साल लॉकडाउन में मॉल बंद हो जाने के बाद बेरोजगार हो गये।

आज 34 साल के बंटी ईदगाह रोड के उसी प्राइमरी स्कूल में बंट रहे मुफ्त राशन के लिए कतार में खड़े हैं। उन्होंने उस समय के अपने अध्यापक को पहचान लिया, जो उसी स्कूल में अब प्रिंसिपल हैं। बंटी के तीन सदस्यों वाले परिवार को 3 किलो चावल और 12 किलो गेहूं मिला है। इसी कतार में 40 साल के राम विलास उत्तर प्रदेश के हैं। वे रिक्शा चलाकर पैसे घर भेजते थे, लेकिन लॉकडाउन के कारण काम बंद हो गया है और वे फंस गये हैं। उनके पास राशन कार्ड नहीं है और आधार कार्ड पर उनके गांव का पता दर्ज है। मशीन में उनका पिन कोड फीड नहीं हो पा रहा है। जब तक फीड नहीं होगा, उन्हें राशन नहीं मिल पायेगा।

समस्तीपुर के इन्दर यादव 49 साल के हैं। वे रघुबीर नगर इलाक़े में राजगीर मिस्त्री का काम करते हैं। काम करते हुए उनका दाहिना हाथ एक दिन चोटिल हो गया, पत्थर उठाते हुए इस हाथ से पूरा जोर नहीं लग रहा, हाथ मुड़ जाता है। फिर भी काम तो करना ही है, नहीं तो उनकी जगह पर किसी और को रख लिया जाएगा। सामान्य दिनों में उन्हें 800 रुपये दिहाड़ी मिलती है, लेकिन लॉकडाउन की वजह से आधी मजदूरी पर काम करने को मजबूर हैं। नहीं करेंगे तो बच्चों को क्या खिलाएंगे? इन दिनों दूध-दही और साग-सब्जी तो उनके बच्चों के लिए विलासिता जैसी चीजें हो गयी हैं।

ज्यादा उधारी हो गयी है तो बच्चे गिडगिड़ाते रहे मगर दुकानदार ने सामान देने से बिल्कुल मना कर दिया। एक महीने तक तो पानी में आटा और हल्दी घोलकर बच्चों को कढ़ी बताकर रोटी के साथ खिलाना पड़ा। यह बताते हुए उनके आंसू रुक नहीं पाते। बड़ी उम्मीद से बच्चों का एडमिशन कराये थे। पिछले लॉकडाउन में उनकी ऑनलाइन पढ़ाई के लिए कर्ज लेकर स्मार्टफोन लेना पड़ा, इस बार उसे रिचार्ज के पैसे का भी बंदोबस्त नहीं हो पा रहा। उम्मीद कर रहे हैं कि क्या पता गर्मी के बाद नियमित कक्षाएं शुरू हो जाएं।

इंदर के साथ ही दिहाड़ी मजदूर का काम कर रहे उत्तर प्रदेश के जगदीश और बब्लू की हालत और खराब है। दोनों 28 साल के हैं। सामान्य दिनों में 600 रुपये दिहाड़ी पाते थे, आज 300 रुपये पर काम कर रहे हैं। 15 दिनों पहले जगदीश की मां की मौत हो गयी। उनके पास अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं थे। मकान मालिक भले हैं, उन्होंने मदद किया, वे यह भी ध्यान रखते हैं कि उन्हें भूखे पेट न सोना पड़े। जगदीश की पत्नी को नौ महीने पहले बच्ची पैदा हुई, लेकिन जच्चा-बच्चा दोनों को पोषण नहीं मिल पा रहा है। भूख मिट जाए, यही बहुत है।

बब्लू पर पिछले लॉकडाउन में ही उनके मकान मालिक का 25 हजार रुपये कर्ज है। उसकी किश्त और 3500 रुपये कमरे का किराया, हर महीने उन्हें 5 हजार रुपये मकान मालिक को देने होते हैं। बब्लू सुबकते हुए कहते हैं कि “नहीं दूंगा तो ब्याज देना पड़ेगा, मेरी हालत समझने वाला कोई नहीं है।” जब भी कहीं मुफ्त खाना बंटता है तो वह लाइन में खड़े हो जाते हैं। हलांकि मुफ्त खाना पिछले साल बंटता था, इस साल वैसा नहीं है।

मायापुरी इंडस्ट्रियल एरिया में एक कांस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे 23 साल के धरमपाल की कहानी भी खास अलग नहीं है। वे अपनी पत्नी और 10 माह की बेटी के साथ हाल ही में उत्तर प्रदेश के अपने गांव से वापस आए हैं। वे साइट के पास की झुग्गियों में रहते हैं। काम न मिलने के कारण वे दो हफ्ते पहले अपने गांव चले गये थे। लेकिन फिर वापस आना पड़ा। काम न रहने पर ठेकेदार राशन के पैसे तो दे देता है, लेकिन बाद में दिहाड़ी में से काट लेता है। धरमपाल को पहले भी दिहाड़ी 400 रुपये ही मिलती थी, अब भी उतनी ही मिलती है।

तिलक नगर लेबर चौक पर दिहाड़ी मजदूरों का रेला लगा रहता है। ये लोग सुबह 8 बजे से अक्सर शाम 4 बजे तक काम की तलाश में खड़े रहते हैं। आने-जाने वाली हर कार को ताकते रहते हैं, उम्मीदें बनती-टूटती रहती हैं। यही हाल सभी लेबर चौराहों का है। 24 साल के रवि सुभाष नगर में एक शोरूम में काम करते थे, जहां 10 हजार रुपये महीने की पगार थी। लॉकडाउन के चलते पिछले साल शोरूम बंद हो गया तो काम छूट गया। अब वे पैसे के लिए कांस्ट्रक्शन साइटों पर मलबा हटाते हैं। उनके पास स्मार्टफोन न होने से बेटी की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। स्कूल वाले कहते हैं कि मकान मालिक से मांग कर पढ़ाई कराओ, लेकिन “इतनी देर के लिए बार-बार भला कौन मकान मालिक अपना फोन देगा?”

दिल्ली के अलावा देश के अन्य शहरों का भी लगभग एक जैसा हाल है। ओ. पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक्स स्टडीज’ द्वारा तीन महीने तक पुणे और लखनऊ के लेबर मार्केटों के 200 दिहाड़ी मजदूरों पर पड़े आर्थिक प्रभावों का गहन अध्ययन मार्च 2021 में प्रस्तुत किया गया। लखनऊ के आंकड़े बताते हैं कि रोजगार के अवसरों की गिरावट के कारण मजदूरों की मासिक आमदनी में महामारी के पहले की तुलना में 62% की गिरावट आ गई है। पहले की औसत मासिक आमदनी 9500 रुपये से घट कर नवंबर 2020 से फरवरी 2021 के बीच 3500 रुपये रह गयी है। पुणे में यह 54.5% गिरावट के साथ 10 हजार रुपये मासिक से घट कर 4500 रुपये मासिक हो गयी है।

लखनऊ में जहां एक मजदूर को महीने में औसतन 21 दिन काम मिल जाता था, वहां पहले चरण के लॉकडाउन के बाद महीने में मात्र 9 दिन काम मिलने लगा था। पुणे में महीने में काम मिल पाने वाले दिन 12 से घट कर 2 रह गये हैं। दूसरे चरण के लॉकडाउन के बाद इसमें और कमी आने की आशंका है। लखनऊ के राजगीर मोहम्मद हारून बताते हैं कि महामारी के पहले जहां हमारी दिहाड़ी 400 से 500 रुपये तक होती थी, वहीं अब काम के अवसर भी घटे हैं और दिहाड़ी भी 200 से 300 रुपये रह गयी है, जबकि इसी बीच उनके घरेलू खर्चों में 5000 रुपये प्रति माह की बढ़ोत्तरी हो गयी है। यह बढ़ोत्तरी कर्जों के भुगतान, बीमारियों के इलाज, किराया, और बच्चों की शिक्षा पर खर्च (स्मार्टफोन, रिचार्ज आदि) के कारण हुई है।

काम के अवसर दूर-दूर मिलने की वजह से और सस्ते सार्वजनिक परिवहन के बंद होने के कारण कार्य-स्थल पर आने-जाने का खर्च भी काफी बढ़ गया है। ज्यादातर मजदूर अपने बच्चों को इस गुरबत से बाहर निकालने की तमन्ना के साथ उनकी पढ़ाई पर जोर दे रहे थे। अब इनमें से बहुत सारे बच्चों की पढ़ाई और साथ ही इन मां-बाप के सपने भी टूटने लगे हैं। परिवारों में इलाज का खर्च भी बढ़ गया। सरकारी चिकित्सा केंद्रों पर कोविड से इतर अन्य समस्याओं के लिए नियमित देखरेख और इलाज की सुविधाएं बंद हो जाने के कारण निजी चिकित्सा केंद्रों पर निर्भर होना पड़ा। इस वजह से गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं, जच्चा-बच्चा, शिशुओं और बुजुर्गों की देखभाल और इलाज पर होने वाला खर्च काफी बढ़ गया।

आमदनी गिरने और खर्च बढ़ने के कारण ज्यादातर मजदूरों के परिवार साहूकारों और ठेकेदारों से कर्ज लेने को मजबूर हो गये हैं और उनके चंगुल में फंस गये हैं, क्योंकि बैंकों से कर्ज के लिए जरूरी दस्तावेजों और औपचारिकताओं को पूरा करना कभी भी उनके लिए आसान नहीं होता है। ऐसे कर्जों पर ब्याज ज्यादातर 5% मासिक होता है, जो उसी माह चुकाना होता है। ये मजदूर बुरी तरह से कर्ज के जाल में फंस चुके हैं जिसने इनका जीना दूभर कर दिया है। ऐसे अधिकांश मजदूर अपने पैतृक निवासों से दूर रहने और जरूरी कागजात के अभाव में प्रायः सरकारी मुफ्त अनाज योजना से भी वंचित हो जाते हैं।

महामारी ने मालिकों के बरक्श मजदूरों की सौदेबाजी की ताक़त को और भी ज्यादा घटा दिया है, बल्कि उनके रहमो-करम पर छोड़ दिया है। मजदूर यूनियनें भी नदारद हैं और राज्य भी कुछ नहीं कर रहा है। अब तो मालिक और ठेकेदार छोटे-छोटे कारण दिखाकर मजदूरी में कटौती कर लेते हैं और मजदूर मजबूरी में स्वीकार कर लेते हैं।

इन मजदूरों के प्रति सरकार की बेरुखी तो पहले से ही स्पष्ट है। उसने इनकी कोई भी जिम्मेदारी लेने से बचने के लिए इन्हें ठेकेदारों के हवाले करने का रास्ता पहले से ही अख्तियार कर रखा है। सरकारी रुख से लगता है कि मजदूरों को दिया गया छोटा सा भी अधिकार पूंजीपतियों को पूंजी निवेश करने में बाधा बन जाएगा। इसीलिए श्रम कानूनों को संशोधित करके बेअसर कर देने के रास्ते पर तो देश दशकों से चल रहा है। जिस तरह से पिछले साल उत्तर प्रदेश और उसके बाद मध्य प्रदेश और गुजरात ने भी लॉकडाउन के बाद अपने यहां पूंजी निवेश को आकर्षित करने के नाम पर एक ही झटके में लगभग सभी श्रम कानूनों को खत्म कर दिया उससे सरकारों की प्राथमिकताएं और अपने देश के सबसे निरीह और अकिंचन बना दिये गये देश के इन असली निर्माताओं की अपनी और अपने बच्चों की जिंदगी को बेहतर बनाने की उम्मीदें धूमिल पड़ती हुई दिख रही हैं।

(‘द हिंदू’ में हिमानी भंडारी, ‘स्क्रॉल.इन’ में दीपांशु मोहन, जिग्नेश मिस्त्री, अद्वैत सिंह और स्नेहल श्रीधर तथा ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में अश्ना बूटानी की रिपोर्टों पर आधारित)

(शैलेश स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

ताज़ियादारी में विवाद और मुस्लिम समाज के ख़तरे

अभी हाल में मुहर्रम बीत गया, कुछ घटनाओं को छोड़कर पूरे मुल्क से मुहर्रम ठीक ठाक मनाए जाने की...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This