Saturday, October 16, 2021

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नॉर्थ ईस्ट डायरी: शांति वार्ता की प्रक्रिया से हताश होकर जंगल की तरफ लौट रहे हैं असम के उग्रवादी

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असम के उग्रवादी संगठन उल्फ़ा सहित 14 उग्रवादी संगठनों के साथ वर्षों से केंद्र सरकार की तरफ से शांति वार्ता चल रही है, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आने से हताश होकर हथियार डालने वाले उग्रवादी फिर जंगल की तरफ लौटने लगे हैं। केंद्र की मोदी सरकार इस मामले में जिस तरह उदासीनता का रुख अपना रही है, उससे वार्ता प्रक्रिया में साफ गतिरोध नजर आने लगा है।

नवम्बर 2011 में उल्फ़ा के वार्ता समर्थक गुट के साथ केंद्र सरकार की पहली वार्ता आयोजित हुई थी। इस गुट की अगुवाई उल्फ़ा के अध्यक्ष अरविंद राजखोवा कर रहे हैं, जिनको बांग्लादेश सरकार ने पकड़कर भारत के हवाले किया था और जिन्होंने हथियार डालकर वार्ता प्रक्रिया में शामिल होने का फैसला किया था। पीसी हालदार केंद्र और उल्फ़ा के बीच 24 नवम्बर 2015 तक मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे थे। हालदार जब सेवानिवृत्त हो गए तब केंद्र की तरफ से खुफिया विभाग के निदेशक दिनेश्वर शर्मा को उल्फ़ा और बोडो उग्रवादी संगठन एनडीएफबी के साथ वार्ता प्रक्रिया के लिए मध्यस्थ नियुक्त किया। शर्मा के मध्यस्थ बनाए जाने के बाद आज तक सरकार और उग्रवादियों के बीच कोई वार्ता आयोजित नहीं हो पाई है।

केंद्र के साथ वार्ता प्रक्रिया में भाग ले रहे उग्रवादी संगठनों के नाम हैं—उल्फ़ा,एनडीएफबी,आदिवासी कोबरा फोर्स,आदिवासी आर्मी, ऑल आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी, बिरसा कमांडो फोर्स, मार पीपुल्स कन्वेन्शन डेमोक्रेसी, कुकी लिबरेशन आर्मी, कार्बी लंगरी नॉर्थ कछार हिल्स लिबरेशन फ्रंट, कुकी रिवोल्यूशनरी आर्मी, नेशनल सौताल लिबरेशन आर्मी, सौताल टाइगर्स फोर्स, यूनाइटेड कुकी ग्राम डिफेंस आर्मी आदि। इन तमाम उग्रवादी संगठनों में उल्फ़ा को सबसे अधिक ताकतवर संगठन माना जाता है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक असम में कुल 37 उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं। इन संगठनों में से महज छह उग्रवादी संगठन ही वर्तमान में हिंसक गतिविधियां संचालित कर रहे हैं।

पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू अक्सर बयान देते रहते हैं कि पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों से वार्ता कर जल्द समझौते पर दस्तखत कर लिए जाएंगे, लेकिन हकीकत में केंद्र का रवैया टालमटोल वाला ही नजर आता है।

उल्फ़ा की तरह बोडो उग्रवादी संगठन एनडीएफबी के साथ केंद्र सरकार शांति वार्ता की प्रक्रिया चला रही है। लेकिन अभी तक कोई प्रगति दिखाई नहीं दे रही है। इस संगठन के रंजन दैमारी गुट ने 29 नवम्बर 2013 को हथियार डालते हुए शांति समझौता किया था, लेकिन इस गुट के साथ भी वार्ता प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं हुई है। दूसरी तरफ एक और उग्रवादी संगठन केएलएनएफ ने 1 फरवरी 2010 को आत्मसमर्पण किया था। केंद्र ने आज तक उसके साथ कोई शांति वार्ता आयोजित नहीं की है। इसी तरह 24 जनवरी 2012 को असम के 9 आदिवासी उग्रवादी संगठनों ने एक साथ आत्मसमर्पण किया था। इन संगठनों के साथ भी किसी तरह की शांति वार्ता आज तक आयोजित नहीं की गई है।

गौरतलब है कि नब्बे के दशक से ही असम में हथियार डालने वाले उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए सरकार कुछ योजनाएं क्रियान्वित करती रही है। उग्रवादियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया जब तक पूरी नहीं हो जाती, तब तक उनके रहने के लिए डेजिनेटेड कैंप बनाए गए हैं। उग्रवादियों के लिए एक मुश्त आर्थिक मदद और मासिक भत्ते की व्यवस्था की गई है। इसके बावजूद उग्रवादियों का भविष्य सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है और उनमें से कई वापस जंगल की तरफ लौट गए हैं। डेजिनेटेड कैंपों पर सरकार की तरफ से निगरानी का कोई इंतजाम नहीं है। इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं कि इन कैंपों से पूर्व उग्रवादी आपराधिक गतिविधियों को संचालित करते रहे हैं। इन कैंपों में वार्ता समर्थक और वार्ता विरोधी जैसे दो गुटों के होने से जटिलता की स्थिति पैदा होती रही है। कुछ उग्रवादी नेता इन कैंपों में रहते हुए ही जबरन धन वसूली अभियान चलाते रहे हैं। दूसरी तरफ सामान्य कैडरों के सामने जीविका का सवाल गंभीर होता गया है। ये कैडर सामान्य सामाजिक जीवन गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन सरकार की तरफ से उनके लिए रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। उग्रवादी नेताओं को हर महीने 80 हजार रुपए भत्ते मिलते हैं,जबकि सामान्य कैडरों को सिर्फ तीन हजार रुपए मासिक भत्ते मिलते हैं। इतनी कम रकम से उनका गुजारा नहीं हो पाता और वे वापस जंगल लौटना ही बेहतर विकल्प समझते हैं।

नाम नहीं बताने की शर्त पर राज्य के एक सेवा निवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया—हथियार डालने वाले उग्रवादियों को मुख्यधारा का अंग बनाए रखने के लिए पुनर्वास की ठोस व्यावहारिक नीति बनाने की जरूरत है। पूर्व उग्रवादियों के प्रति सरकार को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। एक तरफ इन पूर्व उग्रवादियों के लिए रोजगार का इंतजाम होना चाहिए तो दूसरी तरफ उग्रवाद और अलगाववाद के खिलाफ नई पीढ़ी के बीच जागरूकता का माहौल बनाया जाना चाहिए।

सरकारी आंकड़े के मुताबिक लगभग दस हजार उग्रवादी अब तक हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं। इन उग्रवादियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं की गई है और वार्ता की प्रक्रिया को अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित रखा गया है। इतना ही नहीं, इन उग्रवादियों को विभिन्न मामलों में फंसाकर उनका राजनीतिक इस्तेमाल किए जाने का आरोप भी लगाया जाता रहा है।

(दिनकर कुमार “दि सेंटिनेल” के संपादक रहे हैं और आजकल गुवाहाटी में रहते हैं।)    

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