Fri. Dec 13th, 2019

कर्नाटक के रंगकर्मी एस रघुनंदन ने ठुकराया नाट्य अकादमी का पुरस्कार,कहा- मॉब लिंचिंग समर्थक शक्तियों से पुरस्कार लेना नाजायज

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(संगीत नाटक अकादमी ने अपने सालाना पुरस्कारों की घोषणा की है। उन्हीं पुरस्कृत शख्सियतों में से एक कर्नाटक के प्रमुख रंगकर्मी एस रघुनंदन ने इसे लेने से इंकार कर दिया है। उन्होंने इसके पीछे देश के मौजूदा हालात को जिम्मेदार ठहराया है। और उसमें खासतौर से मॉब लिंचिंग और धर्म के नाम पर जारी कई तरह की घृणित वारदातों का जिक्र किया है। इस प्रकरण पर दो प्रमुख टिप्पणियां सामने आयी हैं। जिन्हें यहां दिया जा रहा है-संपादक)

नाट्यकर्मी राजेश चंद्रा की टिप्पणी:

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कर्नाटक के प्रमुख रंगकर्मी, कवि और नाटककार एस. रघुनन्दन ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार को ठुकरा दिया है। एक दिन पहले ही उन्हें यह पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गयी थी।

एस.रघुनंदन ने देश में संवैधानिक मूल्यों एवं अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिये लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं बुद्धिजीवियों के प्रति नफ़रत की बढ़ती प्रवृत्ति और उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिशों का हवाला देते हुए यह पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया है।

अपने वक्तव्य में रघुनंदन ने लिखा, “आज ईश्वर और धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग की जा रही है और यहां तक ​​कि लोगों के भोजन के तौर-तरीक़ों के लिये भी उन्हें मारा जा रहा है। हत्या और हिंसा के इन भयावह कृत्यों के लिये प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सत्ताधारी शक्तियां ज़िम्मेदार हैं। वे उस घृणा अभियान का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रही हैं, जिसमें इंटरनेट सहित सभी साधनों का उपयोग किया जा रहा है।”

बात को आगे बढ़ाते हुए एस. रघुनन्दन ने लिखा है, “आज कन्हैया कुमार जैसे होनहार नौजवानों के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश रची जा रही है, जो हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं।” रघुनंदन ने कहा, “कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है। उनमें से अधिकांश को ज़मानत भी नहीं मिल रही है और वे जेल में समय बिता रहे हैं। ये वे लोग हैं जो हमारे देश और दुनिया के सबसे अधिक शोषित और वंचित लोगों और समुदायों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे हैं। शोषितों-वंचितों के दमन और उत्पीड़न को उजागर करने वाले लेख या किताबें लिखने और उन्हें अपने अधिकारों के लिये शान्तिपूर्ण संघर्ष करने की प्रेरणा देने के कारण इन बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है, जिसे किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता है।”

एस. रघुनन्दन का यह कदम उन कथित रंगकर्मियों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो एक फासिस्ट और हत्यारी सरकार से ग्रांट, पद और पुरस्कार लेने के लिये बेशर्मी के साथ तर्क देते हैं, लूट के सरकारी उत्सवों-महोत्सवों में बेहयाई के साथ शामिल होते हैं और सत्ता के दरबार में हाज़िरी लगाते रहते हैं। अपनी महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थ की पूर्ति के लिये जनविरोधी फासिस्ट सरकार की साज़िशों के बारे में मुंह न खोलने वाले हमारे कथित बड़े और सम्मानित रंगकर्मियों को एस. रघुनन्दन के साहस और विवेक को देख कर डूब मरना चाहिये। इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा कि जब देश जल रहा था, तब वे चन्द टुच्ची सुविधाओं के लिये खुलेआम अपने ज़मीर का सौदा कर रहे थे।

एस. रघुनन्दन जैसे सच्चे और साहसी रंगकर्मी को मेरा बार-बार सलाम!

धीरेश सैनी की टिप्पणी:

अभी कोई कहे, कर्नाटक में क्या हो रहा है तो आप एकदम अंदाज़ लगाएंगे कि यह बात वहां की ग़ैर भाजपाई सरकार के आखेट के सिलसिले में कही गई है। तभी आपको पता चले कि यह बात कर्नाटक की थियेटर शख़्सियत एस रघुनंदन के इंकार और उनके बयान के सिलसिले में है तो आप उस इंकार और उस बयान के बारे में जानना चाहेंगे। एस रघुनंदन ने भारतीय संगीत नाटक अकादमी के उस पुरस्कार को लेने से इंकार कर दिया है जिसकी बाट देखते बहुत से दिग्गज अपनी आंखों के किनारों पर तांगे वाले घोड़े की आंखों से परदे उतारकर टांग लेते हैं। बरसों-बरस कोई एक ज़िंदा शब्द नहीं बोलते या क़सीदे पढ़ने में शब्दों को खर्च कर देते हैं। एस रघुनंदन ने अपने इंकार के साथ जो परचा जारी किया है, उसमें मॉब लिंचिंग की घटनाओं, वंचितों की पक्षधर आवाज़ों के दमन और विवेकवान लोगों के प्रति असहिष्णुता का ज़िक्र किया है।

पॉपुलर मीडिया अक्सर टाइमिंग की बात करता है। एस रघुनंदन के इंकार और बयान के वक़्त इस टाइमिंग की बात वाक़ई बहुत महत्वपूर्ण है। वो वक़्त जो पूरी दुनिया पर और देश पर तारी है और वो वक़्त जो कर्नाटक की राज्य सरकार के पतन के लिए ज़ारी ऑपरेशन का गवाह है। एक ऑपरेशन जिसका संदेश कर्नाटक में ही नहीं, देश भर में हर ख़ास-ओ-आम जन या इंस्टीट्यूटशन समझता है, उस ऑपरेशन के वक़्त एक रंगकर्मी उसे समझने से इंकार कर देता है? नहीं, सब कुछ समझने का, विवेक का और उससे जुड़े साहस का ऐलान करता है। एक अदीब क्या-क्या कर सकता है!

कर्नाटक में क्या हो रहा है, इस वाक्य का अर्थ कर्नाटक के बुद्धिजीवियों के लिहाज से बड़ा ऐतिहासिक हो चुका है। एस रघुनंदन को देखिए। अभी दुनिया को विदा कह गए लेखक, नाटककार, रंगकर्मी गिरीश कर्नाड को देखिए। संगीतकार टीएम कृष्णा को देखिए। पत्रकार-बुद्धिजीवी गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी को याद कीजिए जो जनता के बीच तक पहुंचे और शहीद हुए।

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