Saturday, July 2, 2022

नेताजी सुभाष: काबुल से यूरोप का सफर

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31 जनवरी 1941 की रात तक सुभाष मुहम्मद ज़ियाउद्दीन के वेश में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंच गए थे। 16/17 जनवरी की रात कलकत्ता के एल्गिन रोड से उनका यह सफ़र शुरू हुआ था, और 31 जनवरी से वे काबुल में थे। आगे क्या करना है, इसकी रूपरेखा सुभाष के दिमाग मे पहले से तैयार थी। काबुल उनकी मंज़िल नहीं थी, एक पड़ाव था। वे इस शहर से, विराट युद्धक्षेत्र में तब्दील हो चुके यूरोप की ओर जाना चाहते थे। उनके सामने तीन विकल्प थे। या तो वे रूस चले जाएं, जो फिलहाल इस युद्ध से अलग था। रूस का जर्मनी से युद्ध न करने का समझौता था। यह समझौता हिलटर और स्टालिन के बीच हुआ था। दूसरा विकल्प जर्मनी था। जहां का तनाशह एडोल्फ हिटलर था, जो विभिन्न राष्ट्रों के बीच एक मज़बूत धुरी था। तीसरा विकल्प इटली था।

नेताजी सुभाष ने सोचा कि रूस सबसे बेहतर रहेगा और उन्होंने रूस जाने की योजना बनाई। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में अंतरराष्ट्रीय जासूसी का केंद्र बन चुके काबुल में, सुभाष चंद्र बोस को यूरोप पहुंचने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिये एक कष्टप्रद प्रतीक्षा भी करनी पड़ी। मियां अकबर शाह से उनकी बस यही उम्मीद थी कि वे किसी तरह सुभाष को निरापद रूप से काबुल पहुंचा दें, और अकबर शाह ने सुभाष की यह उम्मीद पूरी भी कर दी थी। सुभाष ने सोचा था कि, रूसी दूतावास उन्हें शरण दे देगा और उन्हें मास्को सुरक्षित पहुंचाने में मदद कर देगा। रूस विश्वयुद्ध में शामिल भी नहीं था तो ऐसे में उन्हें कोई दिक्कत भी नहीं होने वाली थी। पर यह इतना आसान भी नहीं था।

31 जनवरी को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंचने पर, रहमत खान और उनके मूक-बधिर रिश्तेदार जियाउद्दीन उर्फ सुभाष को काबुल शहर के लाहौरी गेट के पास एक सराय में ठहरने की जगह मिल गई। 17 दिन की लगातार यात्रा, जगह-जगह प्रवास, पश्चिमी पहाड़ों की ठंड, विपरीत खानपान ने उन्हें शारिरिक रूप से थोड़ा अस्वस्थ भी कर दिया था। पर उनका उत्साह और उनकी ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का दृढ़ संकल्प, जस का तस बना हुआ था।

गोमो रेलवे स्टेशन से सुभाष को विदा करने के बाद जब, अशोक, शिशिर और मीरा अपने घर बरारी पहुंचे तो रात में आपस मे बातचीत करते हुए अशोक ने शिशिर से कहा था कि, काकू शायद रूस निकल जाएं। अशोक बोस का यह अनुमान, रूस की अफ़ग़ानिस्तान से सटी सीमा और रूस में कम्युनिस्ट शासन होने के कारण था। शिशिर ने रूस में क्रांतिकारी शासन होने के तर्क की बात तो मानी, पर उनका अनुमान था कि, सुभाष भले ही रूस के रास्ते से जाएं, पर वे जर्मनी ही जाएंगे। शिशिर इस पूरी योजना के सबसे बड़े राजदार थे और नेताजी सुभाष के सबसे प्रिय भतीजे भी वे थे। उधर, काबुल में पहले कुछ दिनों के दौरान, भगत राम उर्फ ​​रहमत खान ने सोवियत रूस के दूतावास से संपर्क स्थापित करने के लिए कुछ प्रयास किये पर वे सफल नहीं हो सके। नेताजी कब तक सराय में पड़े-पड़े, दिन काटते। आखिर उन्होंने, भगत राम उर्फ रहमत अली के बजाय खुद ही अपने स्तर से, यूरोप जाने के मिशन पर लग जाने का निश्चय किया।

सुभाष बाबू का उद्देश्य रूस में डेरा जमाना नहीं था, बल्कि रूस की सहायता से जर्मनी पहुंचना था। सुभाष अपने मिशन के बारे में स्पष्ट थे कि, उन्हें उन भारतीय युद्धबंदियों को धुरी राष्ट्रों की सैनिक जेल से छुड़वा कर एक सैन्य अभियान ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ छेड़ना है। ब्रिटेन के साथ तो जर्मन और इटैलियन युद्ध लड़ रहे थे, न कि सोवियत रूस। युद्ध मे जैसा कि, खबरें आ रही थीं, ब्रिटिश हार रहे थे तो, वे युद्धबंदी भी या तो जर्मन जेल में होंगे या इटालियन। जब जर्मनी ही जाना है तो क्यों न जर्मन दूतावास से ही संपर्क किया जाय। यह सोचकर सुभाष अचानक, एक सुबह काबुल स्थित जर्मन दूतावास पहुंच गए। जर्मनी और रूस के रिश्ते दोनों देशों के बीच, हो रखी अनाक्रमण संधि के कारण, फिलहाल दोस्ताना थे। काबुल के जर्मन दूतावास में वहां नियुक्त मंत्री हैंस पिगर ने 5 फरवरी को सुभाष से मुलाकात की और सुभाष ने अपने आने का उद्देश्य उन्हें बताया।

यूरोपियन के लिये सुभाष का नाम न तो अनजाना था, और न ही सुभाष के लिये यूरोप के देश अनजाने थे। सुभाष इस दौरे के पहले भी अपना अच्छा-खासा समय यूरोप में बिता चुके थे। जब अंग्रेज़-सरकार ने सुभाष को 1934 में देश से निर्वासित किया था तो वियना पहुंचे थे। वहां उनका इरादा अपनी आत्मकथा लिखने का था। यूरोप में ही, उन्होंने अपने एक मित्र डॉक्टर माथुर से कहा कि, “उन्हें एक ऐसा स्टेनो चाहिए, जो अंग्रेज़ी समझता हो और टाइपिंग में तेज़ हो, ताकि वह वियना में अपने समय का उपयोग आत्मकथा लिखने में कर सकें.” डॉक्टर माथुर वियना में ही डॉक्टर थे। वह एमिली शेंकल को जानते थे, जो जर्मन के साथ अंग्रेज़ी भाषा की भी जानकार थी और स्टेनोग्राफ़र का कोर्स कर चुकी थी। यही एमिली, सुभाष बाबू की स्टेनोग्राफर बनीं और सुभाष की पुस्तक ‘द इंडियन स्ट्रगल’ वहीं लिखी गयी। 1937 में, सुभाष बाबू ने, एमिली से विवाह भी कर लिया था, पर इसे कुछ कारणों से सार्वजनिक नहीं किया गया। इस प्रकार, सुभाष के लिये, यूरोप और वहां की परिस्थितियां अपरिचित नहीं थीं।

काबुल के जर्मन दूतावास के मंत्री, हेंस पिंगर ने सुभाष के जर्मन दूतावास में आने, उनके उद्देश्य और उनसे मुलाकात का पूरा विवरण, जर्मनी के विदेशमंत्री को फोन पर बताया और एक लिखित रिपोर्ट तार से भेज दी। सुभाष को, हेंस पिंगर ने कहा कि, ‘वे अपनी सुरक्षा पर ध्यान दें और काबुल में जो उनके भारतीय दोस्त हैं, उनके बीच मे ही रहें और जर्मन सरकार की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करें।’ सुभाष इस मुलाकात की पहली प्रतिक्रिया से संतुष्ट थे और वे वापस अपने ठिकाने पर आ गए।

उधर, जर्मन दूतावास ने रूसी दूतावास से सम्पर्क कर, सुभाष के बारे में बताया और उन्हें यूरोप पहुंचने के लिये सहयोग करने के लिये समझाया। पहले तो रूसी राजदूत थोड़ा सशंकित हुआ और एक विचित्र संदेह व्यक्त किया कि, “रूस के माध्यम से यूरोप की तरफ यात्रा करने की सुभाष बोस की इच्छा के पीछे कोई ब्रिटिश साजिश भी हो सकती है। कहीं यह रूस और अफगानिस्तान के बीच संघर्ष पैदा करने की कोई योजना तो नहीं है?” लेकिन फिर हेंस पिंगर ने रूसी राजदूत को भारत के स्वाधीनता संग्राम की भूमिका और सुभाष के बारे में विस्तार से समझाया और जानकारी दी। यह भी कहा कि, ” सुभाष की यूरोप यात्रा को संभव बनाने के लिए आगे की कार्रवाई के रूप में मास्को स्थित, सोवियत रूस की सरकार को यह मामला भेजा जाए और जर्मनी भी इस विषय पर रूसी सरकार से बात करेगा।”

हेंस पिंगर ने काबुल स्थित इतालवी राजदूत को पहले ही यह सारी जानकारी दे दी थी, और इतालवी राजदूत ने इन सब गतिविधियों और सुभाष के बारे मे सारी सूचनाएं, अपनी सरकार के संज्ञान में ला दी थीं। 8 फरवरी  1941 को बर्लिन में इतालवी चार्ज डी’एफ़ेयर ने, जर्मनी के विदेश विभाग के बड़े अफसर, अर्नस्ट वोरमैन से बात की और कहा, “जर्मन विदेश मंत्रालय, रूस के रास्ते से सुभाष बोस की जर्मनी यात्रा सम्पन्न कराने के लिये, यदि जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने अपनी सहमति दी तो, इटली की सरकार भी, मास्को से, अपने बेहतर संबंधों के चलते, सहयोग का अनुरोध कर सकती है।” इस पर अर्नेस्ट वोरमैन ने इटली के चार्ज डी’अफेयर को उत्तर दिया कि “इतालवी राजदूत को मास्को में जर्मन राजदूत,” काउंट शुलेन बर्ग के संपर्क में रहना चाहिए।” अब सुभाष को जर्मनी के साथ साथ इटली का भी सहयोग मिल गया। अब सोवियत रूस का सहयोग लेने की जिम्मेदारी, जर्मनी के साथ साथ इटली की भी हो गयी। सुभाष बाबू के मिशन के लिये यह एक बेहद सकारात्मक कदम था। सुभाष अब निश्चिंत होने लगे थे।

जब तक, बर्लिन  और मॉस्को में उच्चतम स्तर से, सुभाष की यूरोप यात्रा की अनुमति नहीं मिल जाती, तब तक सुभाष बोस को, प्रतीक्षा करने के लिये कहा गया। उन्हें यह भी कहा गया कि, वे जर्मन और इतालवी दूतावास में खुद न आएं, बल्कि उन्हें संपर्क बनाए रखने के लिये जर्मन दूतावास ने एक संपर्क सूत्र भी दिया। वह व्यक्ति था, जर्मनी के मशीनरी उद्योग की प्रमुख कम्पनी, सीमेंस के एक अधिकारी, हेर थॉमस। हेर थॉमस के माध्यम से काबुल में जर्मनों के संपर्क में सुभाष को अब रहना था। लेकिन, सुभाष और भगत राम अब भी मुहम्मद ज़ियाउद्दीन और रहमत अली के छद्म रूप और नाम से, सराय में ही रुके हुए थे। पर सराय में मुहम्मद जियाउद्दीन और रहमत खान के लिए, अब अधिक दिनों तक रुकना खतरनाक होता जा रहा था। एक अफगानी पुलिसकर्मी जो सराय में ख़ुफ़िया सूचनाओं की तलाश में नियमित रूप से आता रहता था, उसे इन दोनों पर संदेह होने लगा था। यह बात नेताजी सुभाष और भगत राम दोनों ही भांप गए थे। उसे शांत करने के लिये रिश्वत देनी पड़ी। पहले उसे कुछ पैसे दिए गए बाद में उसने सुभाष बाबू से उनकी सोने की कलाई घड़ी मांग ली, जो उनके पिता ने उन्हें उपहार में दी थी। सुभाष को उसकी खुफियागिरी से बचने के लिये कलाई घड़ी दे देनी पड़ी।

अब उन्हें लगा कि सराय में रुकना निरापद नहीं है तो, फरवरी के दूसरे सप्ताह में भगत राम ने पेशावर में अपने  एक पुराने परिचित उत्तम चंद मल्होत्रा ​​की तलाश की, जो काबुल के भारतीय इलाके में एक दुकान के मालिक थे। भगत राम ने सुभाष बोस को उत्तम चन्द्र मल्होत्रा के घर में शरण देने के लिए तैयार किया और वे राजी भी हो गए। पर वहां भी उत्तम चंद्र मल्होत्रा के एक पड़ोसी को कुछ संदेह होने लगा। उत्तम चंद इससे घबरा गया। सुभाष, उत्तम चंद्र की घबराहट देखकर कहीं और ठिकाना बनाना चाहते थे, लेकिन कोई और सुरक्षित ठिकाना मिल भी नही रहा था और वे उस समय कुछ अस्वस्थ भी हो गए थे। जर्मनी से स्पष्ट संकेत मिलने में देरी के कारण भगत राम ने पेशावर के एक भगोड़े की सहायता से सुभाष बोस को सोवियत रूस की सीमा में अवैध रूप से भेजने पर भी विचार किया। वह भगोड़ा, भगत राम का दोस्त था और अफगानिस्तान सोवियत सीमा पर ही स्थित एक गांव में रहता था। लेकिन इसमें और भी जोखिम थे। सुभाष को, अब केवल जर्मन दूतावास से आने वाली अच्छी खबर का इंतजार था।

उहापोह के इस कठिन काल में, अचानक सुभाष बाबू को एक अच्छी खबर मिली। उन्हें सीमेंस कम्पनी के हेर थॉमस, जो उनके और जर्मन दूतावास के बीच एक संपर्क सूत्र थे, द्वारा एक संदेश प्राप्त हुआ कि सुभाष चंद्र बोस को, ‘यदि वे अपनी कार्ययोजना को लेकर गम्भीर हैं तो, उन्हें काबुल स्थित इटली के दूतावास में जाकर, इतालवी राजदूत पिएत्रो क्वारोनी से मिलना चाहिए।’ सुभाष के लिये इससे उत्साहवर्धक खबर, दूसरी हो ही नहीं सकती थी। 22 फरवरी, 1941 की शाम को सुभाष बोस इतालवी राजदूत और उनके सहयोगियों से मिलने इतालवी दूतावास पहुंचे।

सुभाष की वह रात, दूतावास में ही बीती। इतालवी राजदूत से, सुभाष की विस्तार से चर्चा हुयी और रात्रि भोज के बाद भी सुभाष, क्वारोनी से रात भर तरह-तरह की संभावनाओं और समस्याओं पर चर्चा करते रहे। क्वारोनी, सुभाष से मिलकर, सुभाष के मिशन, कार्य-योजना, देश की आज़ादी के प्रति उनके निष्ठापूर्ण समर्पण से गहरे प्रभावित हुए। ‘हिज मैजेस्टीज ओप्पोनेंट’ में सुगता बोस लिखते हैं कि, क्वारोनी की सुभाष के प्रति धारणा बनी कि, “वे बुद्धिमान, सक्षम, जुनून से भरे हुए और निस्संदेह सबसे यथार्थवादी, भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं में एकमात्र यथार्थवादी हो सकते हैं।” दोनों ने, अफगानिस्तान से बाहर निकलने के वैकल्पिक तरीकों और रास्तों पर विचार किया। क्वारोनी अभी अपनी सरकार से कुछ और निर्दशों की प्रतीक्षा में थे। उन्होने इस आत्मीय और विस्तृत मुलाकात का विवरण, इटली के विदेश मंत्री को भेज दिया और वे इसकी प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे।

क्वारोनी ने एक विकल्प यह सुझाया कि, “सुभाष को यूरोप तक की यात्रा के लिये इतालवी डिप्लोमेटिक पासपोर्ट भी दिया जा सकता है, अगर सोवियत रूस, उन्हें ट्रांजिट वीजा जारी करने के लिए सहमत हो जाय तब। एक विकल्प यह सोचा गया कि, सुभाष, ईरान और इराक के रास्ते होकर यूरोप की यात्रा कर सकते हैं। पर यह विचार कि सुभाष बोस अपने दम पर ही अफगान-सोवियत सीमा पार करने की कोशिश कर सकते हैं, को अव्यवहारिक और जोखिम भरा मानते हुए, सिरे से खारिज कर दिया गया था।” कुल मिला कर सुबह हो रही थी और सुभाष इस मुलाकात से खुश नजर आए। अब निर्णय इटली सरकार को करना था, और सुभाष बाबू को उत्तम चंद्र मल्होत्रा के यहां रुक कर एक अच्छी खबर का इंतजार था।

इटालियंस, बोस की मदद करने की कोशिश कर रहे थे। सुभाष की इतालवी राजदूत से चर्चा के बाद सबकुछ सकारात्मक हो रहा था। इसी बीच एक और महत्वपूर्ण घटना घट गई। 27 फरवरी 1941 को, अंग्रेजों ने 23 फरवरी का एक इतालवी टेलीग्राम इंटरसेप्ट किया और उसे जब डिकोड किया, तो उन्हें पता चला कि उनका सबसे प्रखर दुश्मन यानी सुभाष, काबुल में हो सकता है। ब्रिटेन के स्पेशल ऑपरेशंस एक्जीक्यूटिव (एसओई) ने इस्तांबुल और काहिरा में अपने प्रतिनिधियों को सूचित किया कि सुभाष, “अफ़ग़ानिस्तान से ईरान और तुर्की के रास्ते, जर्मनी के लिए एक महत्वपूर्ण गोपनीय जानकारी के साथ यात्रा कर रहे है।” इसके बाद, इसी सन्देश में पूछा गया कि, “वे उनकी हत्या के लिए वे क्या व्यवस्था कर सकते हैं।” सुभाष के यूरोप मार्ग का यह भी एक वैकल्पिक रूट था। पर सुभाष तो उस रूट पर गए ही नहीं। उन्होंने मध्य पूर्वी मार्ग का विकल्प अभी तो चुना ही नहीं था।

सच तो यह है कि वे अभी काबुल में ही थे, और वे किस रास्ते से यूरोप पहुंचेंगे, यह अभी तय भी नहीं था। इसे सुभाष को तय करना भी नहीं था, बल्कि सुभाष को किस रास्ते से भेजना है यह तय तो इटली और जर्मनी को करना था। अब यह तार, ब्रिटिश इंटेलिजेंस एजेंसी को भ्रम में रखने के लिये भेजा गया था या यह कोई और षडयंत्र था, यह साफ नहीं हो सका। बहरहाल, सुभाष सुरक्षित थे और काबुल में थे। 3 मार्च को, जर्मन राजदूत काउंट शुलेनबर्ग ने मास्को से बर्लिन को फोन किया: “विदेशी मामलों के लिए कमिश्रिएट ने सूचित किया कि सोवियत सरकार सुभाष बोस को वीजा देने के लिए तैयार है। अफगानिस्तान से जर्मनी की यात्रा के लिए कमिश्रिएट से अनुरोध किया गया है कि वह तदनुसार काबुल में सोवियत दूतावास को निर्देश दे।”

अब तक जो गतिविधियां सुभाष को यूरोप भेजने के लिये की जा रही थी, उससे सुभाष कुछ कुछ निश्चिंत हो चले थे। जर्मन, रूसी और इटालियंस ने मिलकर सुभाष बाबू के अफगानिस्तान से बाहर निकालने और यूरोप तक पहुंचाने का इंतजाम कर दिया था। ईरान और तुर्की का रास्ता नहीं चुना गया था, जहां ब्रिटिश सरकार ने उनकी हत्या की साज़िश रच रखी थी। अचानक 10 मार्च, 1941 को इतालवी राजदूत की पत्नी, जो रूसी थीं, सुभाष चंद्र बोस के लिए, इटली सरकार का एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर उत्तम चंद मल्होत्रा की दुकान पर आईं। सुभाष से उनकी मुलाकात हुयी। उन्होंने सुभाष के फोटो खिंचवाये और उनके लिये नए यूरोपियन परिधान की व्यवस्था की। सुभाष की नयी पासपोर्ट फ़ोटो, एक इतालवी  राजनयिक कूरियर ऑरलैंडो माज़ोट्टा के पासपोर्ट पर चिपकाई जाएगी, और मुहम्मद ज़ियाउद्दीन, उर्फ सुभाष को एक नया नाम और पहचान प्राप्त होगी। वे अब ऑरलैंडो माज़ोट्टा के नए रूप में सबके सामने आने वाले थे। यह सब इतना गोपनीय था कि, राजदूत क्वारोनी को, इस काम के लिये अपनी कुलीन पत्नी को भेजना पड़ा। 17 मार्च 1941 को कलकत्ता छोड़ने के ठीक दो माह बाद वे, ऑरलैंडो माज़ोट्टा के रूप में, एक अन्य इतालवी राजनयिक, सिग्नोर क्रेस्किनी के घर में स्थानांतरित कर दिये  गये थे।

उन्होंने 22 मार्च को अपनी राजनीतिक थीसिस तैयार की, साथ ही, अपने देशवासियों के लिये अपना संदेश लिखा और भेजने का स्थान लिखा, “यूरोप में कहीं से”, तथा, बांग्ला में एक निजी पत्र अपने बड़े भाई शरत चंद बोस के नाम लिख कर भगत राम को दिया और कहा कि, यह सब उनके काबुल से निकल जाने के बाद डाक से भेजा जाए। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थी। वे उत्तम चंद्र और भगत राम का आभार व्यक्त करके इतालवी दूतावास में आ गये थे। ऑरलैंडो माज़ोट्टा के पासपोर्ट पर, सुभाष दो दिन बाद, जब कार से काबुल छोड़ रहे थे, तो भोर होने वाली थी और ठंड भी पड़ रही थी। उनके साथ वेंगर नामक एक जर्मन इंजीनियर और दो अन्य सज्जन थे।  ऐतिहासिक शहर समरकंद पहुंचने से पहले, उन्होंने हिंदुकुश रेंज के पहाड़ी दर्रों को पार किया और ऑक्सस नदी को पार करके अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से वे बाहर आ गए। अब वे सोवियत रूस की सीमा में थे। रूस की सीमा से सुभाष और उनके सहयात्रियों ने कार छोड़ दी और ट्रेन से मास्को के लिये रवाना हो गए। मास्को के जर्मन राजदूत, काउंट शुलेनबर्ग ने मास्को से 31 मार्च 1941 को, बर्लिन को यह संदेश भेजा कि, “सुभाष चंद्र बोस, जिनके पास ऑरलैंडो माज़ोट्टा के नाम से एक इतालवी पासपोर्ट है, वह दूतावास में आ गए हैं।” साथ ही यह भी उस संदेश में जोड़ा कि, उन्हें बता दिया गया है कि जैसे ही वे बर्लिन पहुंचें, तत्काल जर्मनी के विदेश मंत्रालय से संपर्क करें।

अब यह एडवेंचर यात्रा समाप्त होने वाली थी। 2 अप्रैल की सुबह, वे अपनी मंज़िल बर्लिन पहुंच गए थे। बर्लिन पहुंचते ही सबसे पहला पत्र उन्होंने अपनी पत्नी एमिली को लिखा और अपने बर्लिन पहुंचने की सूचना दी। सुभाष का कठिन यात्रागत प्रवास फिलहाल खत्म हुआ। “तुम मेरा यह पत्र पाकर हैरान होगी। और उससे अधिक आश्चर्य तुम्हें यह जानकर होगा कि, मैं यह पत्र बर्लिन से लिख  रहा हूं।” सुभाष के पत्र की यह शुरुआती पंक्तियां थीं, जो उन्होंने एमिली को लिखी थी। उन्हें जर्मनी के विदेश मंत्रालय में जाकर अपने आगमन की सूचना देनी थी। भविष्य की योजनाएं बनानी थीं और फिर उन योजनाओं को धरातल पर लाना भी था। पूरे ढाई महीने हो गए थे, सुभाष को कलकत्ता छोड़े। सुभाष से मुहम्मद ज़ियाउद्दीन, फिर ऑरलैंडो माज़ोट्टा होते हुए फिर से वे सुभाष चंद्र बोस के अपने असली रूप में आ गए थे। यूरोप में दूसरा विश्वयुद्ध जारी था। धुरी राष्ट्र जर्मनी और इटली का यूरोप में और जापान का पूर्व में सैनिक अभियान प्रगति पर था। ब्रिटिश साम्राज्य अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर में था, और नेताजी, बर्लिन से सिंगापुर जाने की योजना बना रहे थे।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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