Sunday, May 22, 2022

सांप्रदायिकता के धुर विरोधी थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस

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सुभाष बाबू 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। उनके अध्यक्ष बनने के बाद ही कांग्रेस में वैचारिक संघर्ष भी छिड़ गया था। वे 1921 से 1940 तक कांग्रेस में रहे। फिर उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया। 1939 में उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक दल का गठन किया जो प्रगतिशील विचारों का था। यह दल आज भी है और वामपंथी दलों के संयुक्त मोर्चे में है। अध्यक्ष का चुनाव उन्होंने 1939 में भी लड़ा था। पर 1939 में विश्वयुद्ध के समय उनकी राय युद्ध के मसले पर गांधी जी से अलग थी। अतः 1939 के कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष का पद जीतने के बाद भी उन्होंने गांधी जी की सहमति न होने पर त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैय्या को हराया था, जिनकी हार को गांधी जी ने अपनी हार कहा था। लेकिन जब वे 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो उन्हें गांधी सहित सबका व्यापक समर्थन प्राप्त था। 1938 में जवाहरलाल नेहरू भी अध्यक्ष पद के दावेदार थे, पर गांधी जी की सहमति से सुभाष बाबू कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

1937 के चुनावों में देश साम्प्रदायिक आधार पर कुछ-कुछ बंटना शुरू हो गया था। जो दबा छुपा साम्प्रदायिक बिखराव था, वह अब सतह पर आ चुका था। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के रूप में एक नए मुस्लिम राज्य की कल्पना को मूर्त रूप देना तय कर लिया था, पर उसने उसका आकार, इलाका और नाम तय नहीं किया था और न ही औपचारिक प्रस्ताव ही पारित किया था। 1937 में ही एक और महत्वपूर्ण घटना घटी, जिसमें विनायक दामोदर सावरकर हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने। उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं का यह सिद्धांत दे दिया था। अब इन दोनों धार्मिक आधार पर, राष्ट्र की मांग करने वाले, सावरकर और जिन्ना ने खुद को , हिन्दू और मुस्लिम समाज का मुखिया और प्रवक्ता मान लिया। जिन्ना का प्रभाव तो मुसलमानों में बहुत था और लेकिन सावरकर की हिन्दू महासभा का प्रभाव कांग्रेस के मुक़ाबले हिंदुओं में नगण्य था। 1938 में जब सुभाष बाबू अध्यक्ष बने तो कांग्रेस को तीन प्रतिद्वंद्वियों से एक साथ लोहा लेना था। एक तो ब्रिटिश राज था ही दूसरे थे, सवारकर और जिन्ना के धर्मांध नेतृत्व। कांग्रेस के लिये बड़ी चुनौती जिन्ना थे जो बेहद जिद्दी, शातिर, मेधावी, अंग्रेज़ों के नज़दीक और मुस्लिमों के एक तबके में खासे लोकप्रिय थे। जब कि सावरकर की हिंदुओं पर बहुत अधिक पकड़ नहीं थी पर उन पर अंग्रेज़ मेहरबान थे। बाद में जब भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में 9 अगस्त को शुरू हुआ तो, एक समय ऐसा आया कि दोनों धर्मांध द्विराष्ट्रवादी अंग्रेज़ों के कंधे पर बैठ गए और कांग्रेस व्यापक जनाधार रहते हुये भी कुछ समय के लिये नेपथ्य में चली गयी। ऐसे ही समय जब साम्प्रदायिकता का उभार सतह पर दिखने लगा था तो, सुभाष बाबू ने कांग्रेस का नेतृत्व 1938 में ग्रहण किया।

2014 में जब एनडीए सरकार सत्ता में आयी तो, तब सुभाष बाबू से जुड़ी सीक्रेट फाइल्स का मुद्दा बहुत तूल पकड़ा था। तब दक्षिणपंथी ताक़तों ने सुभाष को गांधी नेहरू विरोधी और दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक के रूप में पेश करने का षड्यंत्र किया। पर सुभाष दिल, दिमाग, परवरिश से लेश मात्र भी न तो साम्प्रदायिक थे और न ही दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। उनके लेखों के संग्रह में एक भी ऐसा लेख नहीं मिलता जिससे वे धर्मान्धता से संक्रमित नज़र आयें । हिन्दू महासभा से उनका विरोध जग जाहिर था। उनका मतभेद गांधी, नेहरू से भी था, पर यह विरोध सांप्रदायिक मुद्दे पर नहीं बल्कि द्वीतीय महायुद्ध में अंग्रेज़ों के खिलाफ क्या रणनीति अपनाई जाय इस पर था।

सुभाष बोस ने अपने भाषणों और लेखों में कांग्रेस के हिंदुओं को राष्ट्रवादी हिन्दू और हिन्दू महासभा से जुड़े हिंदुओं को सांप्रदायिक हिन्दू बार बार कहा है। उन्होंने ऐसा क्यों विभाजन किया ? यह सवाल उठ सकता है। ऐसा करने का आधार, बंगाल की परिस्थितियां थीं। बंगाल में मुस्लिम लीग का अच्छा खासा प्रभाव पहले से था और उसकी प्रतिक्रिया में वहां हिन्दू महासभा का भी प्रभाव बढ़ने लगा था। 1905 के बंग भंग और 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद बंगाल का साम्प्रदायीकरण होना शुरू हो गया था। लेकिन कांग्रेस का प्रभाव जनता पर कम नहीं हुआ था। 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद सुभाष बोस ने पहला काम यह किया कि उन्होंने कांग्रेस के सदस्यों को हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की सदस्यता ग्रहण करने पर रोक लगा दी। दोहरी सदस्यता के खिलाफ प्रतिबंध का यह पहला मामला था। वे हिन्दू महासभा को मुस्लिम लीग के बरक्स रख कर ही देखते थे। ‘ हिन्दू महासभा इन कोलोनियल नार्थ इंडिया’ नामक पुस्तक जो प्रभु बापू द्वारा लिखी गयी है के पृष्ठ 40 पर लिखा यह अंश पढ़ें,

“सुभाष बोस की अध्यक्षता में कांग्रेस ने 16 दिसम्बर 1938 को एक प्रस्ताव पास किया जिसमें कांग्रेस के सदस्यों को हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के सदस्य होने पर रोक लगा दी गयी।”

1939 में कांग्रेस छोड़ने के बाद, उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक ( अग्रगामी दल ) का गठन किया। यह दल साम्राज्यवाद के विरोध में गठित हुआ था, और वामपंथी विचारों का था। सुभाष यह चाहते थे 1939 में विश्वयुद्ध की शुरुआत होते ही अंग्रेज़ों को यह चेतावनी दे दी जाय कि 6 माह में वे भारत को आज़ाद करें। ब्रिटेन के समक्ष धुरी राष्ट्रों की चुनौती का वह राजनीतिक रणनीति के रूप में दोहन करना चाहते थे। हरिपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में ब्रिटेन को चुनौती पर जो प्रस्ताव उन्होंने पारित कराया, उसमें यह कहा गया कि, “हरिपुरा कांग्रेस ने जो प्रस्ताव पारित किया था उसमें ब्रिटेन को 6 माह का अल्टीमेटम, भारत को आज़ाद करने के संबंध में निर्णय लेने के लिये दिया गया था। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर विद्रोह होगा। लेकिन गांधी जी इस से सहमत नहीं हुए। सुभाष ने अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते को भी , ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने के लक्ष्य प्राप्ति हेतु, स्वीकार नहीं किया था। यही वह मुख्य कारण था कि सुभाष और गांधी जी के बीच मतभेद हो गए।”

यह प्रकरण मिहिर बोस द्वारा लिखी, द लॉस्ट हीरो और डॉ पट्टाभि सीतारमैया द्वारा लिखे गए कांग्रेस का इतिहास, पुस्तकों में विस्तार से दिया गया है।

सुभाष का रास्ता तभी अलग होने लगा था। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा का पथ तो छोड़ दिया पर वे कांग्रेस के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर अंत तक अडिग रहे। उनके लिये साम्प्रदायिकता देश की एकता, अखंडता और प्रगति की सबसे बड़ी शत्रु थी और प्रगति की राह में, बाधक थी। उधर कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों ने, बिना कांग्रेस सरकार की सहमति के, भारत को युद्ध मे शामिल करने के ब्रिटिश राज के  निर्णय के विरुद्ध सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया था और सरकारें गिर गयीं। अंततः कांग्रेस सुभाष की ही नीतियों, कि, विश्वयुद्ध के समय, ब्रिटिश राज पर आज़ादी के लिये दबाव डाला जाय, उन्ही पर आयीं।

सुभाष बाबू ने अपने दल फारवर्ड ब्लॉक के नाम से एक साप्ताहिक पत्र भी निकाला था। जिसके संपादकीय लेख ” कांग्रेस एंड कम्युनल ऑर्गेनाइजेशन ” में , वे हिन्दू महासभा के बारे में लिखते हैं, “बहुत समय से कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे साम्प्रदायिक दलों के सदस्य हो सकते थे। लेकिन वर्तमान समय मे ये दोंनों दल और अधिक साम्प्रदायिक हो गए हैं। इसके फलस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर के अपने संविधान में संशोधन कर दिया कि कोई भी व्यक्ति जो हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का सदस्य न हो कांग्रेस का सदस्य हो सकता है।”

(संदर्भ – नेताजी कलेक्टेड वर्क्स, खंड 10, पृष्ठ 98 )

यह सुभाष बोस का हिन्दू महासभा के प्रति दृष्टिकोण था। उन्होंने दोनों ही दलों हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग को अपने लेखों और भाषणों में साम्प्रदायिक कहा और माना है।

राजनीति संभावनाओं का खेल है। एक दिलचस्प प्रकरण भी मिलता है जब सुभाष बाबू ने कलकत्ता कॉरपोरेशन के चुनाव में ब्रिटिश वर्चस्व को चुनौती देने के लिये हिन्दू महासभा के साथ स्थानीय स्तर पर तालमेल का भी प्रयास किया। पर हिन्दू महासभा ने सुभाष बोस के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। यह बात उन्होंने 1940 में ही अपने पत्र फारवर्ड ब्लॉक में लिखा था। सुभाष यह चाहते थे कि हिन्दू महासभा का साथ ले कर कलकत्ता कॉरपोरेशन में वे ब्रिटिश वर्चस्व को तोड़ सकेंगे। पर हिन्दू महासभ ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। बोस ने हिन्दू महासभा के इस कदम पर कहा था, “महासभा, कांग्रेस के साथ लड़ने में अधिक रुचि दिखा रही थी बनिस्बत की ब्रिटिश का विरोध करने के।”

संपादकीय का यह अंश पढ़ें।

“हिन्दू महासभा के कुछ नेताओं जिनके प्रति मेरे मन में व्यक्तिगत रूप से बहुत सम्मान था, साथ ही हिन्दू महासभा के कुछ कार्यकर्ताओं ने चुनाव के समय हमें बहुत निराश और व्यथित किया। हिन्दू महासभा ने नीतिगत रूप से चुनाव नहीं लड़ा।”

आगे वे लिखते हैं, “इतना ही नहीं, हिन्दू महासभा के प्रत्याशियों में वे तत्व अधिक थे, जिन्होंने म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में कांग्रेस को तोड़ने का काम किया और अंत में उन्होंने ब्रिटिश पार्षदों और कुछ नामांकित सदस्यों के साथ मिल कर एक मोर्चा बना लिया। उनका यह कदम बताता है कि भविष्य में वे क्या कदम उठाएंगे।”

वे यह भी लिखते हैं, “ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे यह प्रमाणित होता है कि हिन्दू महासभा ने हर उस अवसर का लाभ उठाया है जिससे कांग्रेस को नीचा देखना पड़े और कॉर्पोरेशन में ब्रिटिश वर्चस्व बना रहे”।

(संदर्भ – नेताजी कलेक्टेड वर्क्स, खंड 10, पृष्ठ 88-9)

(Reference : Netaji Collected Works, Volume 10, Pg 88–90)

यहां यह ध्यान में रखने की बात है कि हिन्दू महासभा के अध्यक्ष ( 1937 – 43 ) वीडी सावरकर थे। सावरकर का ब्रिटिश आकाओं की तरफ झुकाव जग जाहिर था। जब डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा में आये तो उन्होंने अपनी डायरी में एक रोचक प्रसंग प्रस्तुत किया है। डॉ मुखर्जी भी बंगाल के बड़े प्रतिष्ठित और प्रबुद्ध परिवार के थे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे। पर सुभाष बोस से उनका साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर बहुत टकराव था। अपनी डायरी में डॉ मुखर्जी लिखते हैं, “एक बार बोस उनसे मिले थे, और यह कहा था कि, यदि आप हिन्दू महासभा को एक राजनीतिक दल के रूप में गठित करते हैं तो मैं देखूंगा , ( कैसे गठित करते हैं ) यदि आवश्यकता पड़ी तो बल प्रयोग से भी यदि यह सच मे गठित होती है तो इसे तोड़ डालूंगा।”

हिन्दू महासभा के 1937 में सावरकर के अध्यक्ष बनने के बाद इसे कांग्रेस के समानांतर एक राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करने के प्रयास के संदर्भ में दिया गया यह उद्धरण है। डॉ शयमा प्रसाद मुखर्जी महासभा को बंगाल में, एक मजबूत राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करना चाहते थे। बंगाल की राजनैतिक परिस्थितियों में सांप्रदायिकता का जहर अधिक फैल गया था। वहां यह हिन्दू समाज मे ध्रुवीकरण करने की एक साजिश थी। सुभाष इस तथ्य को समझ गए थे। वे कांग्रेस से बाहर ज़रूर थे और अपनी एक नयी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक उन्होंने बना भी लिया था पर वे यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि मुस्लिम लीग के समानांतर हिन्दू महासभा स्थापित हो और बंगाल का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो। वे मुस्लिम लीग और सावरकर दोनों की धर्म केंद्रित नीतियों के विरोधी थे।

डॉ मुखर्जी के इस कथन कि, सुभाष बोस ने हिन्दू महासभा को रोकने के लिये बल प्रयोग करने की बात कही है को सुभाष बोस ने स्वीकार भी किया है। इसी संदर्भ में बलराज मधोक , जो स्वयं उस समय हिन्दू महासभा के एक नेता थे, के लिखे इस अंश को पढ़ें, “सुभाष चन्द्र बोस, ने हिन्दू महासभा की सभी जन सभाओं में व्यवधान डालने की अपने समर्थकों की सहायता से योजना बनाई। उन्होंने कहा कि उनके समर्थक महासभा की सभाएं नहीं होने देंगे और महासभा को सभा नहीं करने देंगे और ज़रूरत पड़ी तो पीटेंगे भी। डॉ मुखर्जी इसे सहन नहीं कर पाए और उन्होंने एक सभा का आयोजन किया जिसमें उन्हें भाषण देना था। जैसे ही डॉ मुखर्जी सभा में भाषण देने के लिये खड़े हुए तभी एक पत्थर उन्हें भीड़ से आ लगा और उनके माथे से खून निकलने लगा।”

यह प्रसंग बलराज मधोक जो डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे की आत्मकथा में है।

नेताजी, वीडी सावरकर की हिंदू महासभा और एमए जिन्ना की मुस्लिम लीग के साम्प्रदायिक और विभाजनकारी चाल, चरित्र चेहरे को समझ गए थे। यह दोनों दल, किसी धार्मिक उद्देश्य से नहीं बने थे, बल्कि धर्म के नाम पर एक ऐसी राजनीति कर रहे थे, जिसका परिणाम घातक हो सकता था और परिणाम, घातक ही नहीं, विनाशकारी सिद्ध हुआ। यह एक प्रकार से, दोहरी सदस्यता पर पहला ऐतराज था। सुभाष भारत की बहुलतावादी संस्कृति से परिचित थे और सांप्रदायिक राजनीति का क्या दुष्परिणाम हो सकता है इस से वे अच्छी तरह से समझते थे। आज जब देश में साम्प्रदायिकता का जहरीला वातावरण जानबूझकर बनाया जा रहा है, तो सुभाष के सेक्युलर मूल्य स्वाभाविक रूप से प्रासंगिक हो गए हैं”।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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