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Categories: बीच बहस

अ-दीदी नि-र्ममता और बंगाल को गुजरात बनाने के “आव्हान”

ममता के पुनराभिषेक की शुरुआत जमालपुर की वामपंथी महिला नेत्री काकोली खेत्रपाल (52 वर्ष) की बलि के साथ हुयी। महिला सशक्तीकरण की स्वयंभू बड़ी अम्मा ममता की टीएमसी के शूरवीरों ने इस अकेली महिला को मारकर जश्न मनाया। काकोली वर्दमान के नबग्राम में सीपीएम की पोलिंग एजेंट थी। वे यहीं तक नहीं रुके ;

उत्तर चौबीस परगना जिले के देगंगा में उन्होंने इंडियन सेक्युलर फ्रंट के हसनुज्जमा को मार डाला। डायमंड हार्बर से संयुक्त मोर्चा – सीपीएम के उम्मीदवार और एसएफआई के प्रदेशाध्यक्ष प्रतीक उर रहमान के घर और चुनाव कार्यालय पर ममता की पार्टी के गुंडों ने हमला बोल दिया। यहां 100 अन्य घरों को भी निशाना बनाया गया – अनेक दुकाने भी लूट ली गयीं। दुकाने किनकी लूटी गयीं? यह जानना उन भले मानुषों के लिए अत्यंत आवश्यक है जो ममता को धर्मनिरपेक्षता की जॉन ऑफ़ आर्क मानते हैं।


जादवपुर में सीपीएम और संयुक्त मोर्चे के समर्थकों पर शुरू हुए हमलों की अगुआई वहां से जीता टीएमसी विधायक देबब्रत मजूमदार कर रहा है। यह देबब्रत चुनाव में टीएमसी की टिकिट मिलने से पहले तक इस इलाके में आरएसएस का मुख्य संगठनकर्ता था।


उत्तर दिनाजपुर में तो टीएमसी के सूरमा सीपीएम दफ्तरों पर जेसीबी लेकर पहुंचे और हमला बोल दिया। केन्या खमरपारा में 10 घर तोड़कर 51 लोगों को बेघर कर दिया। कोरोना पीड़ितों के लिए ऑक्सीजन, बेड और जरूरी दवाओं के इंतजाम में जुटे रेड वालंटियर्स को भी टीएमसी के गुंडों ने अपने हमले का निशाना बनाया। ये कुछ घटनाये हैं। ऐसी अनेक घटनाएं हैं जिनका ब्यौरा गणशक्ति की वेबसाइट पर जाकर देखा जा सकता है। जब मुख्य लड़ाई ममता-मोदी, भाजपा-टीएमसी के बीच थी तो फिर हमले का निशाना लेफ्ट और सीपीएम ही क्यों है? कहते हैं कि लेफ्ट तो इस चुनाव में खत्म ही हो गया। संयुक्त मोर्चा और वाम गठबंधन शायद की कहीं मुख्य मुकाबले में रहा हो, फिर लेफ्ट पर हमला क्यों ? यह सवाल ममता से नहीं है क्योंकि उनके बारे में वाम को कभी कोई गलतफहमी नहीं थी। संयुक्त मोर्चा और वामपंथ ने हमेशा ही कहा-
कि बंगाल में भाजपा को लाने और बिठाने वाली यही ममता बनर्जी हैं। इनके बूते धर्मनिरपेक्षता की रक्षा नहीं की जा सकती। क्योंकि नमक से नमक नहीं खाया जा सकता।


बर्बर हिंसा और टीएमसी की गुंडावाहिनी की अगुआ के भरोसे बंगाल में लोकतंत्र की बहाली नहीं हो सकती। क्योंकि लोमड़ी की अगुआई वाले भेड़ियों के दल को बच्चों और शिशुओं की हिफाजत का जिम्मा नहीं सौंपा जा सकता।

यह भूलना बहुत महँगा पडेगा कि ममता बनर्जी जैसी तानाशाह व्यक्तियों की अगुआई वाली पार्टियां क्षेत्रीय शासकवर्गों की आकांक्षाओं और राज चलाने की इच्छाओं की प्रतिनिधि नहीं होतीं। इनमें लोकतंत्र एक विजातीय चीज होती है। तानाशाही इनके डीएनए में होती है। उस पर कहीं अगुआई किसी मनोरोगी के हाथ में हो तो जनतंत्र  का कबाड़ा ही मानिये। इस तानाशाही को पिछली 10 वर्षों में बंगाल ने भुगता है और पूरे देश ने देखा है। ममता और भाजपा में एक ही अंतर है और वह तनिक सा मात्रात्मक अंतर यह है कि वे एक प्रदेश में वह सब कर रही हैं जो भाजपा पूरे देश में करना चाहती है। तीन साल पहले मार्च 2018 का  पहला पखवाड़ा याद कीजिये जब त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव परिणामों के बाद इसी भाजपा ने एक हत्यारी मुहिम छेड़ी थी और सीपीएम तथा मेहनतकश जनता के संगठनो के नेताओं, कार्यकर्ताओ को निशाना बनाया था। उनके दफ्तरों को दखल कर लिया था। आज भी तानाशाही का कहर त्रिपुरा में रुका नहीं है। बाकी राज्यों में भी जहां-जहां भाजपा जीती वहां-वहां थोड़ी बहुत कम तीव्रता के साथ यही हुआ। आज ठीक वही काम ममता और उनकी टीएमसी के गुंडे बंगाल में कर रहे हैं। इसलिए भाजपा के शहीद बनने के पाखण्ड का कोई अर्थ नहीं है।


निस्संदेह फासीवादी बढ़त के खिलाफ व्यापकतम संभव एकता चाहिए मगर हिटलर के खिलाफ मुसोलिनी और गोयबल्स और हिमलर और तोजो को जिताकर फासीवाद नहीं रोका जा सकता।


चुनावी तौर पर इतने कमजोर दिखने के बाद भी यदि हमले का निशाना सीपीएम-वाम और संयुक्त मोर्चा है तो इसलिए क्योंकि ममता और उनके सरपरस्त शासक वर्ग को पता है कि सिर्फ यही ताकत है जो उनकी और उनके जैसों की राजनीतिक कब्र का शिलालेख लिख सकती है।


बंगाल के जनादेश को समझने की जरूरत है। सदियों की परवरिश में सुसंस्कृत हुई बंगाल की स्वभाव से ही धर्मनिरपेक्ष जनता ने ममता को नहीं जिताया, भाजपा को हराया है। भाजपा इतनी बढ़ी भी है तो ममता की मेहरबानी से- इसलिए जो झाँझ-मंजीरे बजा रहे हैं उन्हें अपना यह बाल सुलभ कौतुक बंद करके और बंगाल की इस हिंसा के खिलाफ आवाज उठानी ही होगी। इन चुनाव नतीजों की साम्प्रदायिक व्याख्या कर अब भाजपा और आरएसएस जितनी धूर्तता के साथ बंगाल को साम्प्रदायिक टकरावों की ओर धकेल रहे हैं वह हाल के समय की सबसे गंभीर आशंका है। यह बंगाल की कई हजार वर्ष पुरानी मेलमिलाप और सद्भाव की जड़ों में एसिड डालने की तैयारी है। संघी आईटी सैल ने जहरीले अभियान के जरिये बंगाल की जनता पर विष-वर्षा शुरू कर दी है। मोदी और आरएसएस की जहरीली ब्रिगेड की कंगना राणावत की ट्वीट को इस महिला का निजी प्रलाप मानना गलत होगा। उनके द्वारा मोदी “जी” से सुपर गुण्डई दिखाने और 2002 के गुजरात नरसंहार की तरह अपना “विराट रूप” दिखाने का आव्हान अकेली कंगना का युध्दघोष नहीं है। भेड़िये निकल चुके हैं पश्चिम बंगाल को गुजरात बनाने। यह बंगाल के मेहनतकशों और भद्रलोक दोनों की परीक्षा की घड़ी है। चुनाव हो गया- उसमे जो होना था हो गया अब उन्हें बंगाल की हिफाजत के लिए एकजुट होना होगा।


यह लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के पहरुओं की परीक्षा का समय है। इस वक़्त में कौन कहाँ है यह देखना बहुत जरूरी होगा। एक कोई महुआ मोइत्रा जी हैं, सुनते हैं लोकतंत्र और सेक्युलरिज़्म पर बढ़ा धांसूं बोलती हैं!! कहाँ हैं इन दिनों- काकोली खेत्रपाल के लिए मुंह कब खोलेंगी? लोकतंत्र के इस टीएमसी उत्सव पर कुछ बोलेंगी? एक कोई आत्ममुग्ध प्रखर वाम हैं जिन्हे इस जनादेश में लोकतंत्र की बहाली की ढेर उम्मीदें नजर आ रही हैं, वे इन हमलों और हत्याओं पर चुप क्यों हैं?

साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई कारपोरेट के खिलाफ लड़े बिना न लड़ी जा सकती है, न जीती जा सकती है।  इटली के कम्युनिस्ट नेता तोगलियाती ने कहा था कि जो पूँजीवाद को नहीं जानते वे फांसीवाद की किस्मों के बारे में कुछ नहीं समझ सकते। वाम और सीपीएम इन दोनों- कारपोरेटी पूँजी और सांप्रदायिकता के विविध रूपों- के मेल की तासीर समझती है और उनसे लड़ना भी जानती है। इसलिए आख़िरी बात “अब का हुइये” पूछने वाले शुभचिंतक और सलाहकारों के लिए; और वह यह कि जनता को साथ लेकर इस हिंसा का मुकाबला दिया जाएगा। असली खेला तो अब शुरू हुआ है।

(बादल सरोज सम्पादक है लोकजतन के)

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This post was last modified on May 5, 2021 5:13 pm

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