Tuesday, November 29, 2022

मद्रास हाईकोर्ट के115 रुपये करोड़ जमा करने के आदेश की कॉपी से गायब कर दी गयी यह लाइन, सुप्रीम कोर्ट ने दिया जांच का आदेश

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लगभग चार दशक पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत आदेशों में फर्जीवाड़ा करके कतिपय अपराधी की रिहाई हुई पर मामला सामने आने पर कई वकीलों के वकालत लाईसेंस रद्द कर दिए गये और उन्हें जेल भेज दिया गया। इसी तरह लगभग पांच दशक पहले कई वकील ऐसे मामले में पकड़े गये जब दलालों ने उन्हें किसी दूसरे वकील के बीमार होने/न होने कि आड़ में मुवक्किलों की फाइलें दिला दीं और बाद में हाईकोर्ट परिसर में मूल वकील मिल गये। फर्जीवाड़े की एफआईआर हुई और जालसाज वकील जेल भेजे गये। ताजा मामला मद्रास हाईकोर्ट का है जहाँ हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी ही बदल दी गई है।  

क्या आप कभी सोच सकते हैं कि कोर्ट रूम में जज कुछ फैसला सुनाएं और वो वादी-प्रतिवादी के पास पहुंचते-पहुंचते कुछ और हो जाए? ऐसा हुआ है मद्रास हाईकोर्ट के ऑर्डर के साथ। हाईकोर्ट के ऑर्डर की जो प्रमाणित कॉपी मुकदमा लड़ रहे दोनों पक्षों को दी गई, वो असली ऑर्डर से अलग थी। सुप्रीमकोर्ट ने इस फर्जीवाड़े पर हैरानी जताई और बेहद गंभीरता से लिया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यह बिल्कुल असामान्य स्थिति है। उसने मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार से कहा है कि वो इस मामले की जांच करें और रिपोर्ट एक बंद लिफाफे में सौंपे। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बीवी नागरत्न की पीठ ने हाईकोर्ट रजिस्ट्रार को जांच का आदेश दिया है।

जे मोहम्मद नज़ीर बनाम महासेम ट्रस्ट , एसएलपी (सी) 16303/2022 मामले में पीठ ने शुक्रवार को एक विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मद्रास हाईकोर्ट द्वारा सुनाए गए और बाद में वेबसाइट पर अपलोड किए गए एक आदेश को बाद में एक अलग आदेश के जर‌िए बदल दिया गया था। हाईकोर्ट की एक खंडपीठ द्वारा 9 सितंबर, 2022 को आक्षेपित आदेश पारित किया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट के सुब्रमण्यम ने आरोप लगाया कि प्रारंभिक आदेश को बाद में हटा दिया गया और इसके स्थान पर एक संशोधित आदेश अपलोड किया गया। सुब्रमण्यन ने दावा किया कि इंडियन बैंक अन्नानगर, चेन्नई ट्रस्ट में 115 करोड़ रुपये जमा करने के लिए प्रतिवादी को जारी किए गए निर्देश वाले ऑपरेटिव हिस्से को हटा दिया गया था।

के सुब्रमण्यम ने बताया कि दो आदेश हैं। पहला आदेश खुली अदालत में सुनाया गया और एक सितंबर को विद्वान न्यायाधीश द्वारा हस्ताक्षरित किया गया। इसे 5 सितंबर को वेबसाइट पर अपलोड किया गया था। बाद में इसे हटा दिया गया था। अब उपलब्ध आदेश में, कुछ पैराग्राफ संशोधित किया गया है, और 115 करोड़ रुपये जमा करने के निर्देश को हटा दिया गया। सात सितंबर को हमें इस दूसरे आदेश की प्रमाणित प्रति दी गई थी। उन्होंने प्रार्थना की, “मामला एक सार्वजनिक विश्वास से संबंधित है। हम चाहते हैं कि हाईकोर्ट द्वारा मूल रूप से आदेशित यथास्थिति बहाल की जाए। अन्यथा, वे सभी राशि वापस ले लेंगे”।

पीठ, जिनके समक्ष वकील ने अपनी दलीलें दीं, चकित हो गए। मूल और संशोधित आदेश की प्रतियों की तुलना करने के बाद, पीठ ने आदेश दिया- “याचिकाकर्ता के वकील द्वारा एक बहुत ही असामान्य स्थिति को हमारे संज्ञान में लाया गया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 29 अगस्त, 2022 को सुनवाई समाप्त की। एक सितंबर को बेंच ने खुली अदालत में अपना आदेश सुनाया, जिस आदेश को हाईकोर्ट ने सुनाया था और जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट की वेबसाइट से डाउनलोड किया था दो दिनों के बाद, इस आदेश को बदल दिया गया और एक अलग आदेश अपलोड कर दिया गया। आदेश की एक प्रमाणित प्रति प्रस्तुत की गई है। हमने दोनों आदेशों का अध्ययन किया है। कुछ पैराग्राफ पूरी तरह से गायब हैं और आदेश से हटा दिए गए हैं, जो अब हाईकोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध है। मूल आदेश को वेबसाइट से हटा दिया गया था। इससे पहले कि हम इसके गुणों में जाएं, इस मामले में और जांच की आवश्यकता है।

आगे की जांच की आवश्यकता पर जोर देते हुए, पीठ ने प्रतिवादी के साथ-साथ मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार-जनरल से जवाब मांगा। रजिस्ट्रार-जनरल को स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए चार सप्ताह की समय सीमा निर्धारित की गई। इसके अलावा, पीठ ने निर्देश दिया कि इस बीच हाईकोर्ट द्वारा पारित एक पूर्व आदेश के संदर्भ में यथास्थिति बनाए रखी जाएगी।

अंत में जस्टिस रस्तोगी ने टिप्पणी की कि यह बहुत अजीब है। सीनियर एडवोकेट ने सहमति व्यक्त की कि “हां, मेरी 50 वर्षों की प्रैक्टिस में, मैंने कभी ऐसा कुछ नहीं देखा है। जस्टिस रस्तोगी ने कहा कि और हमारे 40 वर्षों में भी, हमने ऐसा कुछ नहीं देखा है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि वकील के कार्यालय का कोई व्यक्ति भी शामिल है। इस तरह की चीजें सहयोग के बिना नहीं हो सकती हैं।

ऐसा खेल केवल मद्रास हाईकोर्ट या अन्य हाईकोर्ट में ही नहीं हुआ बल्कि सुप्रीम कोर्ट में भी हो चुका है । मई 2019 में बहुचर्चित आम्रपाली मामले में अपने आदेश में दुर्भाग्यपूर्ण ‘हेराफेरी’ से हैरान सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री के कर्मचारियों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि संस्थान को ध्वस्त करने की इन हरकतों को लेकर कुछ और लोगों पर कार्रवाई हो सकती है ।

सुप्रीम कोर्ट ने उसके आदेशों में गड़बड़ी पर गंभीरता से संज्ञान लेते हुये कहा, कि अदालत के कर्मचारियों को प्रभाव में लेकर लोग आदेश बदलवाने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह की हरकतों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह मामला तब सामने आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके आदेश में फारेंसिक ऑडिटर का नाम बदल दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले फरवरी 19 में अपने दो कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था। यह मामला एरिक्सन मामले में उद्योगपति अनिल अंबानी को अदालत में उपस्थित होने के बारे में था। इसमें अदालत के आदेश में इस तरह छेड़छाड़ की गई कि जिससे यह आभास मिलता है कि अनिल अंबानी को अदालत में स्वयं उपस्थति होने से छूट दी गई है। अदालत के आदेश में छेड़छाड़ को लेकर मामला दर्ज किया गया था।

जस्टिस अरुण मिश्रा और यूयू ललित की पीठ ने अपने पहले के आदेश में सुधार करते हुए जोतिंद्र स्टील एण्ड ट्यूब्स लिमिटेड सहित आम्रपाली समूह की विभिन्न आपूर्तिकर्ता कंपनियों के निदेशकों को नौ मई से तीन दिन तक फॉरेंसिक ऑडिटर पवन अग्रवाल के समक्ष उपस्थित होने को कहा था। अदालत ने कहा था कि आदेश का पालन नहीं होने पर उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा।

पीठ ने कहा था कि अदालत के आदेश में जब विभिन्न कंपनियों के निदेशकों को पवन अग्रवाल के समक्ष उपस्थित होने को कहा गया तो फिर आदेश में दूसरे फारेंसिक ऑडिटर रविंद्र भाटिया का नाम कैसे आ गया, क्योंकि जोतिन्द्र स्टील एण्ड ट्यूब्स के मामले की जांच पवन अग्रवाल कर रहे हैं।

पीठ ने कहा था कि यह दुर्भाग्यपूर्ण, हैरान और चकित करने वाला है कि इस अदालत के आदेशों में हेराफेरी और उन्हें प्रभावित करने की कोशिशें हो रही हैं। यह सुप्रीम कोर्ट के लिहाज से काफी निराशाजनक है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। इससे कुछ दिन पहले भी इसी तरह का मामला जस्टिस आरएफ नरीमन की अदालत में हुआ और अब फिर से यह हुआ है।

पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा था उस समय दो लोगों को हटाया गया। लगता है कि यह काफी नहीं था कुछ और लोगों को बाहर करने की जरूरत है। इस तरह से संस्थान को ध्वस्त किया जा रहा है, इसके लिए जो भी जिम्मेदार है उसे कड़ा संदेश देने की जरूरत है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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