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Categories: बीच बहस

सीएए पर नीतीश और योगी आमने-सामने, नीतीश ने कहा- फालतू बातें करना बंद करें

पटना। बिहार विधान सभा चुनाव के अंतिम चरण में एनडीए के घटक दलों के रिश्तों में खटास की कयास एक बार सतह पर आते दिखी। बुधवार को सीमांचल में एक ही मुद्दे पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक दूसरे से जुदा दिखे। यह हुआ सीएए व एनआरसी के सवाल पर। इससे साफ़ है कि दल तो मिल गए पर दिल नहीं मिल पाए हैं। इस मतभेद का दोनों दलों के सामाजिक आधार पर कितना असर पड़ेगा यह चुनावी नतीजों से ही तय होगा।

दोनों दलों के मतभेद का गवाह बना कटिहार का एक चुनावी मैदान। यहां की चुनावी सभा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूरे तेवर में दिखे। भाजपा प्रत्याशी तार किशोर के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए योगी ने कहा कि एनडीए की फिर सरकार बनते ही चुन-चुनकर घुसपैठियों को देश से खदेड़ेंगे। उन्होंने अपने संबोधन में सीएए व एनआरसी को राष्ट्रीयता के सवाल के साथ जोड़ते हुए कहा कि ये घुसपैठिए राज्य व देश को कमजोर कर रहे हैं। कटिहार घुसपैठ की समस्या से त्रस्त है। जानकारों का कहना है सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके भाजपा उम्मीदवार लगातार तीसरी बार विधायक बने हैं।

उधर, उसी वक्त सीमांचल का क्षेत्र कहे जाने वाले किशनगंज में एक बार फिर सीएए व एनआरसी के मुद्दे पर बीजेपी से भिड़ते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नजर आए। कोचाधामन में चुनाव प्रचार करने आए सीएम नीतीश कुमार ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ लोग ऐसी फालतू बातें कर रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) व एनआरसी के तहत कानून के दायरे में आने वाले लोगों को देश के बाहर कर दिया जाएगा। नीतीश ने कहा कि किसी में दम नहीं कि हमारे लोगों को देश से बाहर कर दे। उनके संबोधन से ऐसा लग रहा था कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ऊपर हमला बोल रहे हों। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही योजनाओं को गिनाया।

कोचाधामन से विधायक मुजाहिद आलम जदयू के उम्मीदवार हैं। यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल माना जाता है।

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए के अंदर मतभेद की खबरें पहले भी आती रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार अनुपम कुमार कहते हैं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शुरू से ही गांठ नजर आ रही है। एक रणनीति के तहत नीतीश कुमार के खिलाफ लोजपा ने अपना उम्मीदवार खड़ा किया है। इसके पीछे भाजपा के रणनीतिकार ही काम कर रहे हैं। जिससे कि चुनावी नतीजों में जदयू की सीटें भाजपा से अपेक्षाकृत कम रहें। ऐसे में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी जदयू की कमजोर पड़ जाएगी। चुनाव अभियान के दौरान अचानक विज्ञापनों से नीतीश कुमार का चेहरा गायब होने और प्रधानमंत्री की सभाओं में राज्य सरकार की योजनाओं पर चर्चा न करने के पीछे के कारणों की समीक्षा होती रही है।

तीसरे चरण में बिहार विधानसभा की 78 सीटों पर वोट डाले जाने हैं। सीमांचल के कई विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैं। यहां सीएए व एनआरसी के मुद्दे पर भाजपा जदयू के मतभेद का यहां के चुनावी नतीजों पर सीधा असर पड़ेगा। यहां भाजपा अपना सांप्रदायिक राजनीति का कार्ड खेलकर चुनावी परिणाम को अपने पक्ष में करने की फिराक में है। अब देखना है कि एनडीए के अंदर के मतभेद व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का नतीजा 10 नवंबर को चुनाव परिणाम की घोषणा के दौरान किस रुप में सामने आता है।

(पटना से स्वतंत्र पत्रकार जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on November 5, 2020 4:48 pm

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